भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पूर्वक ग्रहण नहीं होता है; क्योंकि कालान्तरका अनुसंधान नहीं होता । जैसे ग्रामाध्यक्ष कुटुम्बियोंसे कर लेकर विषयाध्यक्षको अर्पण करता है, विषयाध्यक्ष सर्वा- ध्यक्षको, सर्वाध्यक्ष भूपतिको कर समर्पण करता है; इसी तरह बाह्येन्द्रिय विषयोंका आलोचन करके मनको अर्पण करती है, मन संकल्प करके अहंकारको अर्पण करता है, अहंकार उसका अभिमान करके अर्थात् संवेदन और स्मृतियोंके समूहको आत्मीयत्वेन ग्रहण करके अर्थात् बाह्येन्द्रियोपलब्ध क्षणिक संवेदन एवं स्मृतियोंको संग्रथित करके सर्वाध्यक्षभूता बुद्धिको समर्पण करता है; इस तरह सभी करण बुद्धिमें अर्थ समर्पण करके पुरुषको अर्थ-प्रकाश कराते हैं। विकास "ज्ञान, जब हम वस्तुओंके साथ सक्रिय सम्बन्धोंमें आते हैं, तब प्राप्त होता है और प्रतीतिसे निर्णयकी ओर विकसित होता है । ज्ञानका विकास प्रत्ययात्मकसे उपपत्त्यात्मक ( युक्तिपूर्ण सिद्धि ) तक, वस्तुओंके रूप-रङ्ग आदिके केवल बहिरङ्ग (ऊपरी-ऊपरी) निर्णयोंसे उनके आवश्यक गुण-धर्मों, पारस्परिक संयोगों तथा नियमोंके विषयमें तर्कपूर्ण निष्कर्षोंतकके मार्गपर होता है । इस प्रकार हम बाह्य ( वस्तुमय ) संसारका उत्तरोत्तर अधिक पूर्ण एवं गम्भीर ज्ञान प्राप्त करते चलते हैं । प्रत्येक अवस्थामें हमारा ज्ञान सीमित है । पर वह इन सीमाओंको जीतता हुआ प्रगति कर रहा है, करता जा रहा है ।" बुद्धिवृत्तिरूप ज्ञानोंका विकास ही नहीं, किंतु ह्रास भी होता है। कोई प्राणी ज्ञान- साधनोंसे ज्ञानार्जन, ज्ञान विकास करता है, किंतु प्रमादसे वह उत्पन्न ज्ञान भी नष्ट हो जाता है । आजके पुरातत्त्ववेत्ता तो यह भी कहते हैं- 'प्रथम ज्ञान अत्यन्त विकसित था, परन्तु अब वह संकुचित हो गया है।' पर वेदों, पुराणों, भारतादि ग्रन्थोंको पढ़नेसे मालूम होगा कि आज पहलेकी अपेक्षा सभी क्षेत्रोंमें ज्ञानका संकोच हो गया है । नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा तो चित् नित्य स्वप्रकाश ही है । उसके विकासका प्रश्न ही नहीं उठता । आवश्यकता एवं स्वतन्त्रता "युक्तिपूर्ण या उपपत्त्यात्मक ज्ञान वस्तुओंकी 'आवश्यकताओं' का उद्घाटन करता है और यह भी बतलाता है कि आवश्यकताका महत्त्व सर्वदा काकतालीय ( ऐक्सिडेण्टल ) से ही विदित होता है । ज्ञानकी प्राप्ति ( Acquisition ) से हमें स्वतन्त्रता मिलती है, जो आवश्यकता- के ज्ञानपर आधारित आत्मनियन्त्रण एवं बाह्यप्रकृति-नियन्त्रणके ही रूपमें है । हम उस समय स्वतन्त्र हैं, जब ज्ञानके आधारपर निश्चित करते हैं कि 'क्या करें' और अपने उद्देश्यकी पूर्तिको प्रभावित करनेवाले विदित विषयोंपर जान-बूझकर नियन्त्रण करनेका प्रयत्न करते हैं ।"