मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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ही रहता है; इसीलिये श्रुतियाँ द्रष्टाकी स्वरूपभूता दृष्टिका सर्वथा अविपरिलोप ही बतलाती हैं— न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते । (बृहदारण्यकोपनिषद् ४।३।२३) आलोचन-सङ्कल्प-अभिमानादिकरण व्यापार बुद्धिमे उपसंक्रान्त होकर बुद्धिके अध्यवसायरूप व्यापारके साथ उसी तरह एक व्यापारवान् हो जाते हैं, जैसे अपनी सेनाके साथ ग्रामाध्यक्षादिकी सेना सर्वाध्यक्षकी ही हो जाती है । वेदान्त-मतानुसार सूक्ष्म पञ्चभूतोंके समष्टि सात्त्विक अंशोंसे मन या अन्तःकरण उत्पन्न होता है । व्यष्टि सात्त्विक अंगोसे श्रोत्रादि पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ- उत्पन्न होती हैं और चित्त, अहङ्कार, बुद्धि सब उसी मन या अन्तः करणकी ही वृत्तियाँ हैं, जैसे लोहपिण्डमें स्वतः दाहकत्व न होनेपर भी वह्निके साथ तादात्म्यसम्बन्ध होनेसे लोहपिण्डमें दाहकत्व होता है, उसी तरह भौतिक अन्तः- करण यद्यपि जड है, उसमें प्रकाशकत्व नहीं है, फिर भी स्वप्रकाश आत्मचैतन्यके तादात्म्याध्यास-सम्बन्धसे उसमें भी चैतन्यका उपलब्ध होने लगता है । स्वप्रकाश अखण्डबोध आत्मा ही मुख्य-ज्ञान है, उसीके प्रकाशसे मन अन्तःकरण आदिमें भी प्रकाश व्यक्त होता है । अनन्त आकाशस्वरूप बोधात्मक ब्रह्म ही उपाधिभेदसे विभिन्न ज्ञानोंके रूपमे भासित होताहै, जैसे घटादि उपाधि-भेदसे घटाकाश आदिका भेद प्रतीत होता है । जहाँ विषयावच्छिन्न चैतन्यका प्रमातृचैतन्यके साथ अभेद होता है, वहाँ अपरोक्ष-ज्ञान होता है । जहाँ प्रमातृचैतन्यसे विषयचैतन्यका भेद विद्यमान रहता है, वहाँ प्रमाणके बलसे केवल परोक्ष ज्ञान होता है । इसलिये अनुव्यवसायको विशिष्ट विषय बनानेके लिये सामान्य-विशेषविषयक ही इन्द्रियोको मानना चाहिये । ‘योगभाष्यकार’का भी यही कहना है— न च तत्सामान्यमात्रग्रहणाकारम्, कथमनालोचितः, विषयविशेष इन्द्रियेण मनसानुव्यवसीयेत । (योगभाष्य ३।४७) कुछ लोग कहते हैं आलोचन-ज्ञान सामान्यज्ञान विषयको ग्रहण करता है; किंतु मन विशिष्टविषयको ग्रहण करता है । परंतु यह ठीक नहीं, वस्तुतः इन्द्रिय- जन्य आलोचन अविविक्त सामान्यविशेषको ग्रहण करता और अनुव्यवसाय-ज्ञान विविक्त सामान्यविशेषको ही ग्रहण करता है इसीलिये ‘योगवार्तिक’में कहा गया है— निर्विकल्पकबोधेऽपि द्वयात्मकस्यापि वस्तुनः । ग्रहणं लक्षणाख्येयं ज्ञात्रा शुद्धं तु गृह्यते ॥ निर्विकल्पकज्ञान सामान्यमात्रको ही नहीं ग्रहण करता; क्योकि उसमें विशेष- का भी प्रतिभास होता है । इसी तरह विशेषमात्रका ही ग्रहण होता है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि उसमें सामान्याकारका भी भान होता है, किंतु सामान्य- विशेष—दोनोंहीका ग्रहण करता है,परंतु ‘यह सामान्य है, यह विशेष’ इस तरह विवेचन-