भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 374

मार्क्स और ज्ञान ६१५ ठीक है, जिसके मतमें मनुष्य एव उसका ज्ञान-विज्ञान सब जडभूत- का ही परिणाम है और अभी विकास ही हो रहा है, वह परम सत्यके सम्बन्धमें इससे अधिक कह ही क्या सकता है ? परंतु अध्यात्मवादी इससे सहमत नहीं होता; क्योंकि वह तो सर्वदा सर्वशक्तिमान् परमेश्वरसे विश्वका निर्माण मानता है । उसीके द्वारा विश्वका निर्धारण एवं संचालन होता है । उस दृष्टिसे सत्य त्रिकालाबाध्य है, पर मार्क्सवादी किसी भी सर्वसम्मत तर्क या सिद्धान्त तथा सत्यको नहीं मानते; इसलिये सब सत्योंको भी अपूर्ण ही कहते हैं । ज्ञानका मूल "ज्ञान वस्तुगत सत्यताकी यथासम्भव निर्दुष्ट प्रतिच्छायाओके रूपमें प्रतिष्ठापित एवं परीक्षित मान्यताओं, दृष्टियो एव प्रस्तावनाओंका योग है । यह निश्चितरूपसे एक सामाजिक उपज है, जिसकी जड़ें सामाजिक व्यवहारोंमें हैं, जिन्हें व्यावहारिक आशाओ एवं अपेक्षाओंकी पूर्तिद्वारा परीक्षित एवं संशोधित कर लिया जाता है । सभी ज्ञानोका प्रारम्भ उन इन्द्रियानु- भूतियोमें निहित है, जिनकी विश्वसनीयता मनुष्यके व्यवहारोंमें सिद्ध है । ज्ञान कभी भी सम्पूर्ण या अन्तिम नहीं हो सकता, परंतु उसका सर्वदा विस्तृत एवं आलोचित होते रहना आवश्यक है ।" वस्तुतः नित्य ज्ञान ही सबका मूल है, उसका मूल कोई नहीं । अनित्य-ज्ञान विषयों एव इन्द्रियोंके सन्निकर्षसे अन्तःकरण-वृत्तिरूप ज्ञान उत्पन्न होता है । वह भी ज्ञान तभी बनता है, जब उसमें नित्य-बोधका प्रतिबिम्ब पड़ता है । सामान्यतया क्रियाएँ ज्ञानके प्रतिफल भले ही हों, परंतु ज्ञान क्रियाओका फल नहीं हो सकता । जड वायु, जल एवं अग्निमें अनेक प्रकारकी क्रियाएँ होती हैं, उन्हें अन्तर्यामी चेतनसे प्रेरित तो कहा जा सकता है, परंतु उन क्रियाओंके द्वारा उनमें कोई ज्ञान नहीं उत्पन्न होता । 'ज्ञायते अनेनेति ज्ञानम्' इस व्युत्पत्तिसे ज्ञान शब्दका अन्तःकरण-वृत्ति अर्थ है । परंतु 'ज्ञप्तिर्ज्ञानम्' इस व्युत्पत्तिसे स्फुरणमात्र ही ज्ञानपदार्थ है । ज्ञानमें क्रिया और स्फुरण दो अंश हैं । जानातिके 'तिङ्'का अर्थ चिदाभास है, धात्वर्थ क्रिया है । दोनोंको मिलाकर ही 'जानाति'का व्यवहार होता है । चैतन्य प्रतिबिम्बयुक्त बुद्धिकी घटादिवृत्ति चैतन्यसे व्याप्त होती है; इसीलिये बुद्धिवृत्तिमें ही ज्ञानकी भ्रान्ति होती है। आरोपित सर्वदृश्यका भासक होनेसे ब्रह्ममें ही ज्ञानता मुख्य है। प्रत्ययकारिता बुद्धिके साक्षीमे अध्यस्त होनेसे साक्षीमें भी भासकत्वकी कल्पना होती है, वस्तुतः है वह भानस्वरूप ही । बुद्धिकर्तृक सभी प्रत्यय चैतन्यखचित ही उत्पन्न होते हैं, इसी आधारपर 'ज्ञानं क्रियते' (ज्ञान किया जाता है) यह व्यवहार होता है। जैसे बुद्धिके पहले अनवच्छिन्नबोध कूटस्थ है, वैसे ही बुद्धि उत्पन्न होनेपर भी वह बोध निष्किय