मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३० मार्क्सवाद और रामराज्य अन्तःकरण रहता है। इसीकी सूक्ष्म पञ्चभूतोके समष्टि सात्त्विक अंशसे भी उत्पत्ति मानी जाती है। वही धर्माधर्मसे प्रेरित होकर नेत्रादि इन्द्रियोद्वारा निकलकर घटादि विषयोको व्याप्त होकर तत्तद्-विषयोके आकारसे आकारित होता है। जैसे पूर्ण सरोवरका जल सेतुच्छिद्रके द्वारा निकलकर कुल्याप्रवाहरूप (नहर-नालियो) से खेतोंमें पहुँचकर तदाकार हो जाता है, वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये। फिर भी जलके समान अन्तःकरण बहता नहीं है, किंतु सूर्यरश्मिके तुल्य ही है। तैजस होनेसे अन्तःकरण दीर्घ प्रभाकारसे परिणत होता है और रश्मि- में समान ही सहसा उसका संकोच भी उपपन्न होता है। अन्तःकरण सावयव है, अतः उसका परिणाम उपपन्न होता है। वह अन्तःकरण घटाद्याकारसे परिणत होकर देहके भीतर और घटादिमें व्याप्त होकर देह एवं घटादिके मध्यमें दण्डाय- मान अविच्छिन्नरूपसे अवस्थित रहता है। देहावच्छिन्न अन्तःकरणका भाग 'अहंकार' एवं 'कर्ता' कहा जाता है। मध्यवर्ती दण्डायमान अन्तःकरणका भाग 'वृत्तिज्ञान' नामकी क्रिया कही जाती है। विषयव्यापक भाग विषयको ज्ञानका कर्म बनानेवाला अभिव्यक्ति योग्य कहा जाता है। वह तीनो ही भाग- वाला अन्तःकरण अतिस्वच्छ होता है, अतः उसमें स्वच्छ काँचपर सौर प्रकाशके समान आत्म-चैतन्य अभिव्यक्त होता है। अभिव्यक्त चैतन्य यद्यपि एक ही है, तथापि अभिव्यञ्जकके त्रैविध्यसे उसमें त्रिधा व्यवहार होता है। कर्तृभागा- वच्छिन्न चिदंश 'प्रमाता', क्रियाभागावच्छिन्न चिदंश 'प्रमाण' और विषयगत योग्यत्वभागावच्छिन्न चिदंश 'प्रमिति' कहलाता है। तीनों ही भागोंमें अनुगत एकाकार अन्तःकरणमें प्रमातृ-प्रमेय-सम्बन्धरूप 'मयेदमवगतम्' (मैंने इसे जाना) यह विशिष्ट व्यवहार बनता है। व्यङ्ग्य चैतन्य एवं व्यञ्जक अन्तःकरणका ऐक्या- ध्यास होनेसे अन्योन्यमें अन्योन्य-धर्मका व्यवहार भी सङ्गत है। प्रकाशरूप होनेसे या प्रकाशसंसृष्ट होनेसे ही वस्तुओका प्रकाश होता है। सूर्यादि प्रकाश- रूप होनेसे प्रकाशित होते हैं। घटादि प्रकाशसंसर्गी होनेसे प्रकाशित होते हैं। वैसे ही आत्मचैतन्य या अखण्ड बोध अथवा नित्यज्ञान प्रकाशरूप होनेसे एवं अन्य वस्तुएँ तत्संसर्गी होनेसे प्रकाशित होती हैं। चैतन्यका विषयके साथ संयोग, समवायादि सम्बन्ध नहीं होता, किंतु आध्यासिक ही संसर्ग होता है। जैसे रज्जुमें सर्पका अध्यास होता है, वैसे ही चैतन्यमें प्रपञ्चका अध्यास है। अतः अधिष्ठान चैतन्यमें प्रपञ्च अध्यस्त है। उसी चैतन्यसे प्रपञ्चका प्रकाश होता है। किंतु वह चैतन्य अविद्यांशोंसे ढका रहता है। उन्हीं आवरणांगोके हटानेके लिये प्रमाता- प्रमाणादिका व्यापार होता है। घटादिकी प्रत्यक्षतामें आलोक, चक्षु, मन आदिकी आवश्यकता पड़ती है। आलोककी अपरोक्षताके लिये अन्य आलोक अपेक्षित नहीं होता। चक्षुके जानमें दूसरे चक्षु आदिकी अपेक्षा नही होती। सर्वविज्ञाता, प्रमाता या ज्ञानको अपने प्रकाशके लिये अन्यकी अपेक्षा नहीं होती। सर्वसाक्षी