भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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दृष्टि सृष्टिपक्षमें तो सुप्त पुरुषके प्रति सभीका मुख्य प्रलय ही होता है । जो लोग स्वतन्त्र अचेतन प्रकृति आदिको ही महत्त्व, अहंतत्त्व आदि सब प्रपञ्चका उपादान मानते हैं, परमेश्वराधिष्ठित अविद्याको नहीं, उनके यहाँ सब वस्तुएँ इदरूपमे ही गृहीत होनी चाहिये । 'अयं कर्ता अयं भोक्ता' ( यह कर्ता है, यह भोक्ता है ) इस रूपसे प्रतीति होनी चाहिये, 'अहं कर्ता अह भोक्ता' ( मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ ) इस प्रकारसे नहीं । ऐसी प्रतीति तो तभी बन सकती है, जब सभी वस्तुएँ आत्मामें अध्यस्त हों । नैयायिक अणु परिमाण मनको इन्द्रिय मानते हैं । उसीको सुख-दुःख, इच्छा ज्ञानका निमित्तकारण मानते हैं । इस मनके बिना आत्मा इन्द्रिय तथा विषयके संयुक्त होनेपर भी एक कालमे अनेक ज्ञान नहीं होते । मन अणु है, अतः एक कालमे अनेक इन्द्रियोंमे संयुक्त नहीं हो सकता । जिस समय वह जिस इन्द्रिय- से संयुक्त होता है, उस समय उसी विषयका ज्ञान होता है । इसीलिये एक कालावच्छेदेन दो ज्ञानकी उत्पत्ति न होना ही मनका लिङ्ग है । 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्ति- र्मनसो लिङ्गम्' (न्यायदर्शन ० १ । १ । १६) यह कहा गया है। मनसे भिन्न मध्यम परिमाण अन्तःकरण नैयायिकोंको मान्य नहीं है । उनके मतानुसार मनके द्वारा सर्वगत आत्मामें समवायसम्बन्धमे ज्ञान-गुणकी उत्पत्ति होती है । आत्मा यद्यपि ज्ञानाश्रय है और वह सर्वगत है तथापि निरवयव होनेसे उसका सर्वसंयोग सम्भव नहीं है, अतः युगपत् ( एक साथ ) सर्वप्रकाश नहीं होगा । क्रियारूप या गुणरूप ज्ञानका- स्वाश्रयका उल्लङ्घन करके-अन्यत्र संयोग सम्भव नहीं है, अतः उस ज्ञानसे किसी भी वस्तुका प्रकाश न होना चाहिये । यदि ज्ञान बिना संसर्गके असंसृष्टका ही ग्रहण करे तो अतिप्रसङ्ग होगा, अर्थात् असंसर्ग समान होनेसे किसी भी वस्तु- का ग्रहण होना चाहिये । 'शरीरावच्छिन्न आत्मप्रदेशसमवायी ज्ञान होता है' इस पक्षमें भी विचारणीय है कि यदि प्रदेश आत्माका स्वाभाविक धर्म है, तब तो आत्मामे सावयवत्वापत्ति होगी । यदि प्रदेश औपाधिक है तो भी ज्ञान तत्प्रदेश- संयुक्त वस्तुका ही ग्राहक है, अतः देहादिसे बाह्य घटादिका प्रकाश न होना चाहिये । यदि ज्ञान बाह्यात्मप्रदेश-संयुक्त वस्तुका भी ग्राहक है, तो फिर सभी बाह्य वस्तुएँ बाह्यात्मप्रदेशसंयुक्त हैं ही, अतः सबका ही ग्रहण होना चाहिये । कुछ लोगोंका यह भी कहना है कि 'ज्ञानाधार आत्मासे मन संयुक्त होता है, मनमे इन्द्रिय संयुक्त होती है और इन्द्रियसे विषय संयुक्त होता है । इस तरहकी संयोग- परम्परासे वस्तुका बोध होता है ।' परन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि यह परम्परा तो ज्ञानोत्पादनमे ही उपयुक्त होती है । ज्ञान उत्पन्न होनेके बाद भी यदि संयोगपरम्परासे विषयका प्रकाश हो तब तो विषयसंयुक्त, तत्संयुक्तादि- रूपसे अवस्थित सभी जगत्का प्रकाश होना चाहिये । वेदान्त-मतानुसार सर्वगत चिदात्माको आवृत करके स्थित भावरूप अविद्या ही सम्पूर्ण जगत्के आकारसे स्थित होती है । शरीरके मध्यमें अविद्याविवर्त्त