मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२८ मार्क्सवाद और रामराज्य नहीं है, तथापि विशेषाकाररूपसे परिणत अज्ञानका ज्ञानके साथ विरोध होता है। घटज्ञानाकारसे परिणत अज्ञान पटादि ज्ञानोंसे विरुद्ध होता ही है। अन्यथा घट- ज्ञानकालमें पटादि सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित होना चाहिये। इस दृष्टिसे सुषुप्ता- वस्थाकारसे परिणत अज्ञानका अशेष विशेष ज्ञानोंके साथ विरोध है ही, अतः अर्थापत्तिसे ज्ञानाभाव सिद्ध होगा। कुछ लोग प्रबोधकालमें ज्ञानका स्मरण होने- से सुषुप्तिमे ज्ञानाभावका अनुमान करते हैं, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि मार्गस्थ तृणादिका भी स्मरण नही होता। फिर भी उनका अभाव नही कहा जा सकता। कहा जाता है कि 'यदि स्मरण न होनेसे अभावका अनुमान नहीं हो सकता, तो अस्मर्यमाण होनेसे गृहमध्यमे प्रातःकाल गज नही था' यह अनुमान कैसे बनेगा?' परंतु यह कोई दोष नही है। वहाँ तो गृहमे कुसूलादि विविध पदार्थोंका अनुभव करके मध्याह्नमे उन्हींका स्मरण करके उनकी अन्यथानुप- पत्तिसे प्रातः गजाभाव प्रमित होता है, अतः सुषुप्तिमे दुःखाभाव एवं ज्ञानाभाव अर्थापत्तिसे ही वेद्य होते हैं। भावरूप अज्ञान, आनन्द तथा आत्माका स्मरण होता है। फिर भी सुषुप्तिमें न अहङ्कारका अनुभव होता है और न तो उत्थितको उसका स्मरण ही होता है। 'सुखमहमस्वाप्सम्' इस रूपसे स्मरणमें जो अहंका उल्लेख होता है, उसकी स्थिति यह है कि सुषुप्तिमें अहंकार अज्ञानमे विलीन हो जाता है। प्रबोधमे वह पुनः उद्भूत होता है। उत्पन्न होकर वही अहङ्कार स्मर्यमाण आत्माको स्पष्ट व्यवहारके लिये सविकल्परूपसे उपलक्षित करता है। अहंकार-वृत्तिका यही प्रयोजन भी है। इसीलिये आत्मा अहंवृत्तिको छोड़कर अन्य अन्तःकरणवृत्तियोसे कभी भी व्यवहृत नही होता। इसीलिये नैष्कर्म्य-सिद्धिकारका कहना है कि 'प्रत्यक्स्वरूप एवं अति सूक्ष्म होने तथा आत्मदृष्टिसे उसका अनुशीलन होनेसे घटपटाद्याकार अन्य वृत्तियोंको छोड़कर अहंवृत्तिसे ही आत्मा उपलक्षित होता है। अहंकार या तो आत्माके साथ ही व्याप्त होकर रहता है अथवा विलयको प्राप्त होता है। उसकी अन्य तीसरी अवस्था नही होती। इसी- लिये अहंबुद्धिसे आत्माका सविकल्प बोध होता है।' इस तरह जाग्रत्-स्वप्नमें आत्मरूपसे भासमान होनेपर भी अहंकार सुषुप्तिमें नहीं रहता, अतः वह स्वप्रकाश आत्माका स्वरूप नहीं है। अहंकार परमेश्वराधिष्ठित स्वविद्यासे ही उत्पन्न होता है। ज्ञानशक्ति एवं क्रियाशक्ति उसका स्वरूप है। कूटस्थ चैतन्यसे ही उसकी सिद्धि होती है। कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि उसके कार्य हैं। सुषुप्तिमें अन्तःकरणका प्रलय हो जाता है, अतः वह वहाँ नही रहता। यद्यपि क्रियाशक्तिरूप प्राण सुषुप्तिमें भी रहता है, तथापि प्राण अहंकारसे भिन्न है, अतः अहंकारके लयमे कोई विरोध नहीं है। यदि प्राण अन्तःकरणका ही अंश माना जाय, तो यह मानना चाहिये कि प्राणांशको छोड़कर अवशिष्ट अन्तःकरणका सुषुप्तिमें लय होता है।