भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पर अङ्गलाघवादिका तारतम्य नहीं बन सकता।' परंतु यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि प्रतियोगिदुःखजनक करण-व्यापारोंके उपरमके तारतम्यसे अङ्गलाघवादिके तारतम्यकी प्रतीति होनेमें कोई भी बाधा नहीं है। वेदान्तसिद्धान्तानुसार तो स्वप्रकाश साक्षिचैतन्यस्वरूप ही आनन्द है। वह यद्यपि सर्वदा ही भासमान रहता है, फिर भी जाग्रत् एवं स्वप्नमें तीव्र वायु विक्षिप्त प्रदीपप्रभाके समान 'अहं मनुष्यः' इत्यादि मिथ्याज्ञानसे विक्षिप्त होनेके कारण स्पष्ट प्रतीत नहीं होता। परंतु सुषुप्तिमें वह मिथ्या ज्ञान नहीं रहता, अतः वहाँ साक्षीरूप आनन्द स्पष्टरूपसे भासित होता है।' आवरणभूत अविद्या ब्रह्मतत्त्वा- कारका आच्छादन करती हुई भी स्वभासक साक्षिचेतन्याकारको नहीं ढकती। अन्यथा बिना साक्षीके तो अविद्या भी सिद्ध न हो सकेगी। अतः सुषुप्तिमें अनुभूत आनन्द, आत्मा एवं भावरूप अज्ञान, इन्हीं तीनोंका सुप्तोत्थितको 'सुखमहमस्वाप्सम्, नाहं किंचिदवेदिषम्' इस तरह स्मरण होता है। कहा जाता है कि 'इन तीनोंका अनुभव अन्तःकरण-वृत्तियोंसे नहीं हो सकता, क्योंकि सुषुप्तिमें वृत्ति नहीं रहती। चैतन्यसे अनुभव हो सकता है, परंतु वह अविनाशी होनेसे संस्कारका उत्पादक न होगा, अतः स्मरण नहीं बनेगा।' परंतु यह ठीक नहीं है। सुषुप्तिमें अविद्या- वृत्तिसे ही तीनोंका ग्रहण सम्भव है। अविद्या-वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे ही उक्त तीनों वस्तुओंका अनुभव होता है, उसीका नाश भी सम्भव है और सस्कार भी सम्भव है। उसी सस्कारसे स्मृति हो सकती है। कहा जाता है कि 'इस तरह तो अविद्या- विशिष्ट आत्मा अनुभवविता होगा और अन्तःकरणविशिष्ट आत्मा स्मर्ता होगा, अतः वैयधिकरण्य होगा। अन्यके अनुभूतका अन्य स्मर्ता नहीं होता।' परंतु यह भी कहना ठीक नहीं है, क्योंकि उत्थानकालमें भी अविद्याविशिष्ट ही आत्मा स्मर्ता है। स्मृत अर्थका शब्दानुविद्ध व्यवहार अन्तःकरणसे होता है। जो कहा जाता है कि 'सुखमस्वाप्सम् नावेदिषम्' यह ज्ञान दुःखाभाव एवं ज्ञानाभावको ही विषय करता है' वह ठीक नहीं है, क्योंकि सुषुप्तिमें यद्यपि ज्ञानाभाव एवं दुःखाभाव रहता है, फिर भी उनका अनुभव नहीं होता, कारण सुषुप्तिमें उनके प्रतियोगी दुःख तथा ज्ञानका स्मरण नहीं रहता। प्रतियोगी- स्मरणके बिना अभावका ग्रहण असम्भव ही होता है। कहा जाता है कि 'तो फिर वेदान्त-पक्षमें भी सौषुप्त ज्ञानाभाव तथा दुःखाभावका अनुभव कैसे होगा?' इसका समाधान अर्थापत्तिसे किया जाता है। उक्त रीतिसे सुषुप्तिके अविक्षिप्त सुखका अनुसरण करके तद्विरोधी दुःखका अभाव प्रमित हो सकता है। परामृष्ट- भावरूप अज्ञानकी अन्यथा अनुपपत्तिसे अज्ञानविरोधी ज्ञानका अभाव निश्चित हो जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि 'भावरूप अज्ञान ज्ञानके विरुद्ध नहीं है, क्योंकि जागरणकालमे ज्ञान ओर अज्ञान दोनों ही एक साथ रहते हैं।' परंतु यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि यद्यपि अज्ञानमात्रका प्रपञ्च-ज्ञानके साथ विरोध