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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पर अङ्गलाघवादिका तारतम्य नहीं बन सकता।' परंतु यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि प्रतियोगिदुःखजनक करण-व्यापारोंके उपरमके तारतम्यसे अङ्गलाघवादिके तारतम्यकी प्रतीति होनेमें कोई भी बाधा नहीं है। वेदान्तसिद्धान्तानुसार तो स्वप्रकाश साक्षिचैतन्यस्वरूप ही आनन्द है। वह यद्यपि सर्वदा ही भासमान रहता है, फिर भी जाग्रत् एवं स्वप्नमें तीव्र वायु विक्षिप्त प्रदीपप्रभाके समान 'अहं मनुष्यः' इत्यादि मिथ्याज्ञानसे विक्षिप्त होनेके कारण स्पष्ट प्रतीत नहीं होता। परंतु सुषुप्तिमें वह मिथ्या ज्ञान नहीं रहता, अतः वहाँ साक्षीरूप आनन्द स्पष्टरूपसे भासित होता है।' आवरणभूत अविद्या ब्रह्मतत्त्वा- कारका आच्छादन करती हुई भी स्वभासक साक्षिचेतन्याकारको नहीं ढकती। अन्यथा बिना साक्षीके तो अविद्या भी सिद्ध न हो सकेगी। अतः सुषुप्तिमें अनुभूत आनन्द, आत्मा एवं भावरूप अज्ञान, इन्हीं तीनोंका सुप्तोत्थितको 'सुखमहमस्वाप्सम्, नाहं किंचिदवेदिषम्' इस तरह स्मरण होता है। कहा जाता है कि 'इन तीनोंका अनुभव अन्तःकरण-वृत्तियोंसे नहीं हो सकता, क्योंकि सुषुप्तिमें वृत्ति नहीं रहती। चैतन्यसे अनुभव हो सकता है, परंतु वह अविनाशी होनेसे संस्कारका उत्पादक न होगा, अतः स्मरण नहीं बनेगा।' परंतु यह ठीक नहीं है। सुषुप्तिमें अविद्या- वृत्तिसे ही तीनोंका ग्रहण सम्भव है। अविद्या-वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे ही उक्त तीनों वस्तुओंका अनुभव होता है, उसीका नाश भी सम्भव है और सस्कार भी सम्भव है। उसी सस्कारसे स्मृति हो सकती है। कहा जाता है कि 'इस तरह तो अविद्या- विशिष्ट आत्मा अनुभवविता होगा और अन्तःकरणविशिष्ट आत्मा स्मर्ता होगा, अतः वैयधिकरण्य होगा। अन्यके अनुभूतका अन्य स्मर्ता नहीं होता।' परंतु यह भी कहना ठीक नहीं है, क्योंकि उत्थानकालमें भी अविद्याविशिष्ट ही आत्मा स्मर्ता है। स्मृत अर्थका शब्दानुविद्ध व्यवहार अन्तःकरणसे होता है। जो कहा जाता है कि 'सुखमस्वाप्सम् नावेदिषम्' यह ज्ञान दुःखाभाव एवं ज्ञानाभावको ही विषय करता है' वह ठीक नहीं है, क्योंकि सुषुप्तिमें यद्यपि ज्ञानाभाव एवं दुःखाभाव रहता है, फिर भी उनका अनुभव नहीं होता, कारण सुषुप्तिमें उनके प्रतियोगी दुःख तथा ज्ञानका स्मरण नहीं रहता। प्रतियोगी- स्मरणके बिना अभावका ग्रहण असम्भव ही होता है। कहा जाता है कि 'तो फिर वेदान्त-पक्षमें भी सौषुप्त ज्ञानाभाव तथा दुःखाभावका अनुभव कैसे होगा?' इसका समाधान अर्थापत्तिसे किया जाता है। उक्त रीतिसे सुषुप्तिके अविक्षिप्त सुखका अनुसरण करके तद्विरोधी दुःखका अभाव प्रमित हो सकता है। परामृष्ट- भावरूप अज्ञानकी अन्यथा अनुपपत्तिसे अज्ञानविरोधी ज्ञानका अभाव निश्चित हो जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि 'भावरूप अज्ञान ज्ञानके विरुद्ध नहीं है, क्योंकि जागरणकालमे ज्ञान ओर अज्ञान दोनों ही एक साथ रहते हैं।' परंतु यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि यद्यपि अज्ञानमात्रका प्रपञ्च-ज्ञानके साथ विरोध

६२८ मार्क्सवाद और रामराज्य नहीं है, तथापि विशेषाकाररूपसे परिणत अज्ञानका ज्ञानके साथ विरोध होता है। घटज्ञानाकारसे परिणत अज्ञान पटादि ज्ञानोंसे विरुद्ध होता ही है। अन्यथा घट- ज्ञानकालमें पटादि सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित होना चाहिये। इस दृष्टिसे सुषुप्ता- वस्थाकारसे परिणत अज्ञानका अशेष विशेष ज्ञानोंके साथ विरोध है ही, अतः अर्थापत्तिसे ज्ञानाभाव सिद्ध होगा। कुछ लोग प्रबोधकालमें ज्ञानका स्मरण होने- से सुषुप्तिमे ज्ञानाभावका अनुमान करते हैं, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि मार्गस्थ तृणादिका भी स्मरण नही होता। फिर भी उनका अभाव नही कहा जा सकता। कहा जाता है कि 'यदि स्मरण न होनेसे अभावका अनुमान नहीं हो सकता, तो अस्मर्यमाण होनेसे गृहमध्यमे प्रातःकाल गज नही था' यह अनुमान कैसे बनेगा?' परंतु यह कोई दोष नही है। वहाँ तो गृहमे कुसूलादि विविध पदार्थोंका अनुभव करके मध्याह्नमे उन्हींका स्मरण करके उनकी अन्यथानुप- पत्तिसे प्रातः गजाभाव प्रमित होता है, अतः सुषुप्तिमे दुःखाभाव एवं ज्ञानाभाव अर्थापत्तिसे ही वेद्य होते हैं। भावरूप अज्ञान, आनन्द तथा आत्माका स्मरण होता है। फिर भी सुषुप्तिमें न अहङ्कारका अनुभव होता है और न तो उत्थितको उसका स्मरण ही होता है। 'सुखमहमस्वाप्सम्' इस रूपसे स्मरणमें जो अहंका उल्लेख होता है, उसकी स्थिति यह है कि सुषुप्तिमें अहंकार अज्ञानमे विलीन हो जाता है। प्रबोधमे वह पुनः उद्भूत होता है। उत्पन्न होकर वही अहङ्कार स्मर्यमाण आत्माको स्पष्ट व्यवहारके लिये सविकल्परूपसे उपलक्षित करता है। अहंकार-वृत्तिका यही प्रयोजन भी है। इसीलिये आत्मा अहंवृत्तिको छोड़कर अन्य अन्तःकरणवृत्तियोसे कभी भी व्यवहृत नही होता। इसीलिये नैष्कर्म्य-सिद्धिकारका कहना है कि 'प्रत्यक्स्वरूप एवं अति सूक्ष्म होने तथा आत्मदृष्टिसे उसका अनुशीलन होनेसे घटपटाद्याकार अन्य वृत्तियोंको छोड़कर अहंवृत्तिसे ही आत्मा उपलक्षित होता है। अहंकार या तो आत्माके साथ ही व्याप्त होकर रहता है अथवा विलयको प्राप्त होता है। उसकी अन्य तीसरी अवस्था नही होती। इसी- लिये अहंबुद्धिसे आत्माका सविकल्प बोध होता है।' इस तरह जाग्रत्-स्वप्नमें आत्मरूपसे भासमान होनेपर भी अहंकार सुषुप्तिमें नहीं रहता, अतः वह स्वप्रकाश आत्माका स्वरूप नहीं है। अहंकार परमेश्वराधिष्ठित स्वविद्यासे ही उत्पन्न होता है। ज्ञानशक्ति एवं क्रियाशक्ति उसका स्वरूप है। कूटस्थ चैतन्यसे ही उसकी सिद्धि होती है। कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि उसके कार्य हैं। सुषुप्तिमें अन्तःकरणका प्रलय हो जाता है, अतः वह वहाँ नही रहता। यद्यपि क्रियाशक्तिरूप प्राण सुषुप्तिमें भी रहता है, तथापि प्राण अहंकारसे भिन्न है, अतः अहंकारके लयमे कोई विरोध नहीं है। यदि प्राण अन्तःकरणका ही अंश माना जाय, तो यह मानना चाहिये कि प्राणांशको छोड़कर अवशिष्ट अन्तःकरणका सुषुप्तिमें लय होता है।

दृष्टि सृष्टिपक्षमें तो सुप्त पुरुषके प्रति सभीका मुख्य प्रलय ही होता है । जो लोग स्वतन्त्र अचेतन प्रकृति आदिको ही महत्त्व, अहंतत्त्व आदि सब प्रपञ्चका उपादान मानते हैं, परमेश्वराधिष्ठित अविद्याको नहीं, उनके यहाँ सब वस्तुएँ इदरूपमे ही गृहीत होनी चाहिये । 'अयं कर्ता अयं भोक्ता' ( यह कर्ता है, यह भोक्ता है ) इस रूपसे प्रतीति होनी चाहिये, 'अहं कर्ता अह भोक्ता' ( मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ ) इस प्रकारसे नहीं । ऐसी प्रतीति तो तभी बन सकती है, जब सभी वस्तुएँ आत्मामें अध्यस्त हों । नैयायिक अणु परिमाण मनको इन्द्रिय मानते हैं । उसीको सुख-दुःख, इच्छा ज्ञानका निमित्तकारण मानते हैं । इस मनके बिना आत्मा इन्द्रिय तथा विषयके संयुक्त होनेपर भी एक कालमे अनेक ज्ञान नहीं होते । मन अणु है, अतः एक कालमे अनेक इन्द्रियोंमे संयुक्त नहीं हो सकता । जिस समय वह जिस इन्द्रिय- से संयुक्त होता है, उस समय उसी विषयका ज्ञान होता है । इसीलिये एक कालावच्छेदेन दो ज्ञानकी उत्पत्ति न होना ही मनका लिङ्ग है । 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्ति- र्मनसो लिङ्गम्' (न्यायदर्शन ० १ । १ । १६) यह कहा गया है। मनसे भिन्न मध्यम परिमाण अन्तःकरण नैयायिकोंको मान्य नहीं है । उनके मतानुसार मनके द्वारा सर्वगत आत्मामें समवायसम्बन्धमे ज्ञान-गुणकी उत्पत्ति होती है । आत्मा यद्यपि ज्ञानाश्रय है और वह सर्वगत है तथापि निरवयव होनेसे उसका सर्वसंयोग सम्भव नहीं है, अतः युगपत् ( एक साथ ) सर्वप्रकाश नहीं होगा । क्रियारूप या गुणरूप ज्ञानका- स्वाश्रयका उल्लङ्घन करके-अन्यत्र संयोग सम्भव नहीं है, अतः उस ज्ञानसे किसी भी वस्तुका प्रकाश न होना चाहिये । यदि ज्ञान बिना संसर्गके असंसृष्टका ही ग्रहण करे तो अतिप्रसङ्ग होगा, अर्थात् असंसर्ग समान होनेसे किसी भी वस्तु- का ग्रहण होना चाहिये । 'शरीरावच्छिन्न आत्मप्रदेशसमवायी ज्ञान होता है' इस पक्षमें भी विचारणीय है कि यदि प्रदेश आत्माका स्वाभाविक धर्म है, तब तो आत्मामे सावयवत्वापत्ति होगी । यदि प्रदेश औपाधिक है तो भी ज्ञान तत्प्रदेश- संयुक्त वस्तुका ही ग्राहक है, अतः देहादिसे बाह्य घटादिका प्रकाश न होना चाहिये । यदि ज्ञान बाह्यात्मप्रदेश-संयुक्त वस्तुका भी ग्राहक है, तो फिर सभी बाह्य वस्तुएँ बाह्यात्मप्रदेशसंयुक्त हैं ही, अतः सबका ही ग्रहण होना चाहिये । कुछ लोगोंका यह भी कहना है कि 'ज्ञानाधार आत्मासे मन संयुक्त होता है, मनमे इन्द्रिय संयुक्त होती है और इन्द्रियसे विषय संयुक्त होता है । इस तरहकी संयोग- परम्परासे वस्तुका बोध होता है ।' परन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि यह परम्परा तो ज्ञानोत्पादनमे ही उपयुक्त होती है । ज्ञान उत्पन्न होनेके बाद भी यदि संयोगपरम्परासे विषयका प्रकाश हो तब तो विषयसंयुक्त, तत्संयुक्तादि- रूपसे अवस्थित सभी जगत्का प्रकाश होना चाहिये । वेदान्त-मतानुसार सर्वगत चिदात्माको आवृत करके स्थित भावरूप अविद्या ही सम्पूर्ण जगत्के आकारसे स्थित होती है । शरीरके मध्यमें अविद्याविवर्त्त

६३० मार्क्सवाद और रामराज्य अन्तःकरण रहता है। इसीकी सूक्ष्म पञ्चभूतोके समष्टि सात्त्विक अंशसे भी उत्पत्ति मानी जाती है। वही धर्माधर्मसे प्रेरित होकर नेत्रादि इन्द्रियोद्वारा निकलकर घटादि विषयोको व्याप्त होकर तत्तद्-विषयोके आकारसे आकारित होता है। जैसे पूर्ण सरोवरका जल सेतुच्छिद्रके द्वारा निकलकर कुल्याप्रवाहरूप (नहर-नालियो) से खेतोंमें पहुँचकर तदाकार हो जाता है, वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये। फिर भी जलके समान अन्तःकरण बहता नहीं है, किंतु सूर्यरश्मिके तुल्य ही है। तैजस होनेसे अन्तःकरण दीर्घ प्रभाकारसे परिणत होता है और रश्मि- में समान ही सहसा उसका संकोच भी उपपन्न होता है। अन्तःकरण सावयव है, अतः उसका परिणाम उपपन्न होता है। वह अन्तःकरण घटाद्याकारसे परिणत होकर देहके भीतर और घटादिमें व्याप्त होकर देह एवं घटादिके मध्यमें दण्डाय- मान अविच्छिन्नरूपसे अवस्थित रहता है। देहावच्छिन्न अन्तःकरणका भाग 'अहंकार' एवं 'कर्ता' कहा जाता है। मध्यवर्ती दण्डायमान अन्तःकरणका भाग 'वृत्तिज्ञान' नामकी क्रिया कही जाती है। विषयव्यापक भाग विषयको ज्ञानका कर्म बनानेवाला अभिव्यक्ति योग्य कहा जाता है। वह तीनो ही भाग- वाला अन्तःकरण अतिस्वच्छ होता है, अतः उसमें स्वच्छ काँचपर सौर प्रकाशके समान आत्म-चैतन्य अभिव्यक्त होता है। अभिव्यक्त चैतन्य यद्यपि एक ही है, तथापि अभिव्यञ्जकके त्रैविध्यसे उसमें त्रिधा व्यवहार होता है। कर्तृभागा- वच्छिन्न चिदंश 'प्रमाता', क्रियाभागावच्छिन्न चिदंश 'प्रमाण' और विषयगत योग्यत्वभागावच्छिन्न चिदंश 'प्रमिति' कहलाता है। तीनों ही भागोंमें अनुगत एकाकार अन्तःकरणमें प्रमातृ-प्रमेय-सम्बन्धरूप 'मयेदमवगतम्' (मैंने इसे जाना) यह विशिष्ट व्यवहार बनता है। व्यङ्ग्य चैतन्य एवं व्यञ्जक अन्तःकरणका ऐक्या- ध्यास होनेसे अन्योन्यमें अन्योन्य-धर्मका व्यवहार भी सङ्गत है। प्रकाशरूप होनेसे या प्रकाशसंसृष्ट होनेसे ही वस्तुओका प्रकाश होता है। सूर्यादि प्रकाश- रूप होनेसे प्रकाशित होते हैं। घटादि प्रकाशसंसर्गी होनेसे प्रकाशित होते हैं। वैसे ही आत्मचैतन्य या अखण्ड बोध अथवा नित्यज्ञान प्रकाशरूप होनेसे एवं अन्य वस्तुएँ तत्संसर्गी होनेसे प्रकाशित होती हैं। चैतन्यका विषयके साथ संयोग, समवायादि सम्बन्ध नहीं होता, किंतु आध्यासिक ही संसर्ग होता है। जैसे रज्जुमें सर्पका अध्यास होता है, वैसे ही चैतन्यमें प्रपञ्चका अध्यास है। अतः अधिष्ठान चैतन्यमें प्रपञ्च अध्यस्त है। उसी चैतन्यसे प्रपञ्चका प्रकाश होता है। किंतु वह चैतन्य अविद्यांशोंसे ढका रहता है। उन्हीं आवरणांगोके हटानेके लिये प्रमाता- प्रमाणादिका व्यापार होता है। घटादिकी प्रत्यक्षतामें आलोक, चक्षु, मन आदिकी आवश्यकता पड़ती है। आलोककी अपरोक्षताके लिये अन्य आलोक अपेक्षित नहीं होता। चक्षुके जानमें दूसरे चक्षु आदिकी अपेक्षा नही होती। सर्वविज्ञाता, प्रमाता या ज्ञानको अपने प्रकाशके लिये अन्यकी अपेक्षा नहीं होती। सर्वसाक्षी

प्रमाताका भी प्रकाशक अखण्डभान साक्षात् अपरोक्ष कहा जाता है। दो उपा- धियोंके एकत्रित होनेसे दो उपहितोंका भी अभेद हो जाता है। जैसे घट और मठ एकत्रित होनेसे घटाकाश और मठाकाश दोनों एक ही हो जाते हैं, वैसे ही जहाँ अन्तःकरण विषय-प्रदेशपर इन्द्रियादिद्वारा जाता है वहाँ विषय एवं अन्तःकरण दोनों उपाधियाँ एकत्रित होनेसे विषयावच्छिन्न चैतन्य और वृत्त्यव- च्छिन्न चैतन्य एक हो जाते हैं। इसीको प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं। जहाँ अन्तः- करणवृत्ति विषयसे संसृष्ट नहीं होती, वहाँ परोक्ष ज्ञान होता है और अन्तःकरण तथा विषय दोनों एकत्रित होनेसे अन्तःकरणावच्छिन्न एवं विषयावच्छिन्न चैतन्यकी एकता हो जाती है। उस समय विषयावच्छिन्न चैतन्यमें अध्यस्त विषय विषया- वच्छिन्न चैतन्याभिन्न अन्तःकरणावच्छिन्न प्रमातृ चैतन्यमें भी अध्यस्त समझा जाता है। इसीलिये प्रमातृ चैतन्यसे विषयका अपरोक्षज्ञान होता है। इसपर शङ्का होती है कि 'अन्तःकरणसे चैतन्यकी अभिव्यक्ति क्या है ? यदि आवरण-विनाश, तब तो घटज्ञानसे ही मोक्ष हो जाना चाहिये, क्योंकि वेदान्त- मतमें आवरण-विनाश ही मोक्ष है। यदि अभिव्यक्ति आत्मगत अतिशय-विशेष है तब तो सातिशय आत्मा विकारी ही होगा।' परन्तु इसका समाधान यह है कि आवरणाभिभव ही अभिव्यक्ति है। एतावता निरावरण चैतन्यसे विषयका प्रकाश होता है। कहा जाता है कि 'चैतन्य सर्वगत है, फिर स्वसंसृष्ट सर्वभासक होनेसे प्रतिकर्म-व्यवस्था नहीं होगी। प्रमाण-प्रमेयादि व्यवहार ही प्रतिकर्म-व्यवस्था है। परन्तु यह दोष नहीं है। 'जो सुख-दुःखादि एक पुरुषसे अनुभूत होते हैं, वे क्या सभी पुरुषोंको अनुभूत होने चाहिये, क्योंकि चैतन्य एक ही है ?' यह आपत्ति है अथवा यह कि 'देवदत्त जिस समय घटका अनुभव करता है, उसी समय सम्पूर्ण जगत्‌का अनुभव होना चाहिये। क्योंकि देवदत्तका चैतन्य सर्वगत है।' पहली आपत्ति इसलिये सङ्गत नहीं है कि केवल चैतन्य अनुभवका हेतु नहीं है, क्योंकि वह अविद्यासे आवृत्त है, किन्तु अन्तःकरणद्वारा अभिव्यक्त चैतन्यसे ही विषयोंका अनुभव होता है। वह अन्तःकरण प्रतिपुरुष भिन्न है, अतः जिस पुरुषके अन्तः- करणसे अभिव्यक्त चैतन्यद्वारा जिस विषयका सम्पर्क होता है, उसीको उसका ज्ञान होता है। दूसरी आपत्ति भी ठीक नहीं है; क्योंकि परिच्छिन्न अन्तःकरणसे अभिव्यक्त चैतन्यका युगपत् सम्पूर्ण जगत्‌से सम्बन्ध नहीं होता, अतः सर्वावभास- का प्रसङ्ग ही नहीं है। अतः प्रतिकर्म-व्यवस्थामें कोई अनुपपत्ति नहीं है। कहा जाता है कि 'परिच्छिन्न अन्तःकरणका भी सूर्यरश्मिवत् सर्वव्यापी परिणाम होगा।' परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि पुण्य-पाप, नेत्र-श्रोत्र आदिके रूपसे अन्तःकरणके परिणामकी सामग्री प्रतिविषयमें निश्चित है, अतः परिणाममें भी व्यवस्था ही सिद्ध होगी। जो कोई योगाभ्यासद्वारा अन्तःकरणकी सर्वव्यापी परिणाम-सामग्री सम्पादन कर लेता है, वह सर्वज्ञता हो ही सकता है। यहाँ भी

६३२ मार्क्सवाद और रामराज्य शङ्का होती है कि 'क्या चैतन्यके असङ्ग होनेके कारण स्वतः विषयोपराग असम्भव होनेसे विषयोपरागके लिये अन्तःकरण-उपाधि अपेक्षित है अथवा उपराग होने- पर भी विषय प्रकाश-सिद्धिके लिये अन्तःकरण-उपाधि मान्य है ?' पहला पक्ष ठीक नहीं है, क्योकि असङ्गी होनेसे अन्तःकरणोपाधिपर भी चैतन्यका उपराग सम्भव नहीं है। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योकि चित् सम्बन्धसे ही प्रकाश सिद्ध होता है, फिर उपाधि व्यर्थ है। तब तो उपाधि-परित्यागसे सर्वगत चैतन्यसे संयुक्त सर्ववस्तु- का प्रकाश होना ही चाहिये। इसी प्रकार यह समाधान भी पर्याप्त नहीं है कि 'प्रति- बिम्बभूत जीव चैतन्य परिच्छिन्न होनेसे सर्वभासक नहीं हो सकता।' बिम्बभूत ईश्वरकी सर्वज्ञता मान्य ही है। यद्यपि जीव-ब्रह्मका अद्वैतवेदान्तमें भेद मान्य नहीं है, तथापि व्यावहारिक अल्पज्ञता-सर्वज्ञता आदिका भेद तो है ही; क्योंकि विषयका अनुभव ब्रह्मचैतन्यरूप है । जीवमे सर्वज्ञताके समान ही अल्पज्ञता भी नहीं बन सकेगी। यदि कहा जाय कि 'जीवोपाधि अन्तःकरणका चक्षु आदिद्वारा विषयसम्बन्ध होता है, अतः जीव विषयोंका ज्ञाता हो सकेगा' सो भी ठीक नहीं, क्योकि यदि अन्तःकरणसे सृष्ट होनेसे जीव ज्ञाता हो तब तो जीवको सदा ही ब्रह्मस्वरूपका भी ज्ञाता होना चाहिये, क्योकि सर्वगत ब्रह्मका अन्तःकरणके साथ संसर्ग है ही। यदि कहा जाय कि 'अविद्योपाधिक ही जीव सर्वगत है और वह सभी जगत्‌को प्रकाशित कर सकता है फिर भी वह अविद्यासे आवृत होनेके कारण स्वयं भी अप्रकाशमान रहता है, अतएव 'अहमज्ञः' ऐसा अनुभव होता है। अविद्या यद्यपि परिच्छिन्न है, फिर भी वह सर्वगत चैतन्यका तिरोधान करती है। नेत्रके समीपमे धारित अङ्गुलिमात्रमे महान् आदित्यादिका भी तिरोधान होता ही है। इस दृष्टिसे जहाँ अन्तःकरणका उपराग (सम्बन्ध) होता है, वही अविद्या-आवरणका अभिभव होता है । वहाँ ही अभिव्यक्त चैतन्यसे किंचित् अंशका ही प्रकाश होता है।' परतु यह ठीक नहीं है; क्योकि अविद्याकार्यभूत अन्तःकरणसे अविद्याका अभिभव असम्भव है। इसलिये प्रतिकर्म-व्यवस्था नहीं बन सकती। इन सब बातोका वेदान्तीय समाधान यह है कि जीव चैतन्य असङ्ग होनेसे यद्यपि अन्यसम्बन्धित नहीं होता, तथापि अन्तःकरणसे उसका सम्बन्ध होता है; क्योकि अन्तःकरणका ऐसा ही स्वभाव है। जैसे सर्वगत भी गोत्वजाति सास्नादि (गल-कम्बलादि) मती गो-व्यक्तिमें ही सम्बन्धित होती है, अन्यत्र नहीं, वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये। अथवा जैसे प्रदीप-प्रभा रूप, रस, गन्ध, वायु आदि प्रदेशोंमें व्याप्त होनेपर भी रूपको ही प्रकाशित करती है, अन्यको नहीं, वैसे ही अन्तःकरण-उपाधि चैतन्यसे विषयोपराग-सिद्धिके लिये सङ्गत होगी । उपरागके बिना चित्प्रकाश विषयोंका प्रकाश नहीं कर सकता। जैसे प्रदीप-प्रकाश स्वसंयुक्त- का ही द्योतक होता है, वैसे ही चैतन्य भी स्वोपरक्तका ही प्रकाशन कर सकता है। ब्रह्म सर्वप्रपञ्चका उपादान कारण है, अतः औपाधिक उपरागके बिना ही स्वस्वरूप-

के समान ही स्वाभिन्न सर्वजगत्का प्रकाशन करता है। जीव ऐसा नहीं कर सकता, क्योकि वह प्रपञ्चका उपादान नहीं है। कहा जा सकता है कि 'जब जीव स्वतः अवभासक नहीं है, तब घटादिके समान ही अन्य सम्बन्धसे भी प्रकाशक नहीं हो सकता।' परन्तु यह ठीक नहीं। केवल लौह तृणादिका दाहक न होनेपर भी लौहपिण्डपर व्यक्त अग्नि जैसे तृणादिका दाहक होता है, वैसे ही असङ्ग-साक्षी चैतन्य विषयोंका प्रकाशक न होनेपर भी अन्तःकरणवशात् निरावरण होकर विषयोंका प्रकाशक होगा। जिस पक्षमे अन्तःकरणस्थ चित्प्रतिबिम्ब ही जीव है, तब तो परिच्छिन्न होनेसे सुतरां प्रतिकर्म व्यवस्था उपपन्न होगी। भले ही विषयानुभव ब्रह्म-चैतन्य हो, फिर भी जीवोपाधिभूत अन्तःकरणका वृत्तिरूप परिणाम जबतक विषयाकार नहीं होता, तबतक वह अव्यक्त ही रहता है। विषयाकार अन्त.करण वृत्तिपर अभिव्यक्त चैतन्यको जीव-चैतन्य भी कहनेमे कोई विरोध नहीं है। ब्रह्मके अन्तःकरण-संसृष्ट होनेपर भी ब्रह्माकार अन्तःकरण वृत्ति न होनेसे जीवको सदा ब्रह्म ज्ञान-प्रसङ्ग नहीं आता। अन्तःकरणस्वरूप मात्र वस्तुका व्यञ्जक नहीं होता, किंतु तत्तद्वस्तवाकार- अन्तःकरणके परिणाम ही उन-उन वस्तुओके व्यञ्जक होते हैं। अतएव तदाकार- वृत्ति न होनेसे ही अन्त.करणमे ही रहनेवाले धर्मादिकी अभिव्यक्ति नहीं होती। जीव भी जीवाकार अहंवृत्तिरूपसे परिणत अन्तःकरणमे ही अभिव्यक्त होता है, अन्तःकरणमात्रमे नहीं। इसीलिये सुषुप्तिमे अहंवृत्ति न होनेसे जीवकी भी प्रतीति नहीं होती। इस तरह अन्तःकरण प्रतिबिम्ब जीवत्व-पक्षमे भी सब व्यवस्था बन जाती है। जिस पक्षमे अविद्योपाधिक सर्वगत जीव है, उस पक्षमे भी आवरणतिरो- धायक अन्तःकरणसे सब व्यवस्था बनती है। जैसे, गोमय-कार्य वृश्चिक एवं मृदादि- कार्य वृक्ष अपने कारण गोमय तथा मृदादिके तिरोधायक होते हैं, वैसे ही अविद्या- कार्य अन्तःकरण भी अविद्याका तिरोधायक बन जाता है। वृश्चिक-शरीरमें गोमयके और वृक्ष-शरीरमें मृदादिके किंचित् भी अंशकी प्रत्यभिज्ञा नहीं होती। इस तरह वेदान्तमतमें प्रमात्रादि व्यवहार ठीक सम्पन्न हो जाते हैं। चिदुपरागके लिये अथवा विषय चैतन्याभेदकी अभिव्यक्तिके लिये या आवरणाभिभवके लिये वृत्तिका उपयोग हो सकता है। वृत्तिके द्वारा चैतन्य तथा विषयका विषय विषयीभाव सम्बन्ध होता है। कुछ लोग विषयसंयुक्त वृत्तिके तादात्म्यसम्बन्धसे चैतन्यद्वारा विषयका प्रकाश मानते हैं। अन्य लोगोका मत है कि अपरोक्ष जीव-चैतन्यके साथ साक्षात् सम्बन्ध- से ही सुखादिका साक्षात्कार होता है, अतः परम्परासम्बन्ध ग्रहण न करके साक्षात् सम्बन्ध ही ग्रहण करना चाहिये। इसलिये जैसे तरङ्ग और तरुके ससंसर्गमे तरुमें नदी-स्पर्श माना जाता है, वैसे ही विषयवृत्ति-संसर्गसे जीव-विषय-संसर्ग भी मान्य

६३४ मार्क्सवाद और रामराज्य है। जैसे कारणाकारण-संयोगसे कार्याकार्य संयोग होता है, वैसे ही कार्याकार्य- संयोगसे कारणाकारण-संयोग भी होता है; अर्थात् नैयायिक लोग जैसे हस्त एवं वृक्षके संयोगसे देह-वृक्षका संयोग मानते हैं, हस्त अवयव होनेसे शरीरका कारण है, वृक्ष शरीरका अकारण है। कारण (हस्त) तथा अकारण (वृक्ष) के संयोगसे कार्य (शरीर) तथा अकार्य (वृक्ष) का सम्बन्ध मान्य है, वैसे ही वृत्ति जीव- चैतन्यका कार्य है और विषय अकार्य है, अतः कार्य (वृत्ति) तथा अकार्य (विषय) संयोगसे कारण (जीव-चैतन्य) और अकारण (विषय) का भी सम्बन्ध बन जायगा। इस तरह वृत्तिद्वारा जीव-चैतन्यका विषयके साथ साक्षात् सम्बन्ध बन जाता है। कुछ लोगोंका यह भी मत है कि 'अन्तःकरणोपहित विषयावभासक चैतन्यका विषयतादात्म्यापन्न ब्रह्म-चैतन्यके साथ अभेदाभिव्यक्तिद्वारा विषयतादात्म्य- सम्पादन ही चिदुपराग है।' इस पक्षमें विषयकी अपरोक्षतामें आध्यासिक सम्बन्ध ही मुख्य कारण है। वृत्तिद्वारा अभेद व्यक्त होनेपर विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न जीवचैतन्य एक ही हो जाता है, अतः विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यमें अध्यस्त विषय-विषयावच्छिन्न चैतन्याभिन्न अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यरूप जीवचैतन्यमें भी अध्यस्त समझा जा सकता है। अभेदाभिव्यक्ति क्या है, इसपर कुछ लोगोंका कहना है कि 'जैसे कुल्याद्वारा तड़ाग एवं केदारसलिलकी एकता होती है, वैसे ही वृत्तिद्वारा विषय एवं अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यकी एकता होती है। यद्यपि विषयावच्छिन्न चैतन्य ब्रह्म-चैतन्य ही है और वही विषय-प्रकाशक है, तथापि वृत्तिद्वारा जीव- चैतन्यके साथ अभेद होनेसे उसमें जीवत्व सम्पन्न हो जाता है, इसलिये जीव विषयका प्रकाशक बन सकता है।' दूसरे लोग कहते हैं कि 'बिम्बस्थानीय विषयावच्छिन्न चैतन्य ब्रह्मके साथ प्रतिबिम्बभूत जीवकी (अभेदाभिव्यक्ति) नहीं होती। व्यावर्तक- उपाधि दर्पणके समान जबतक बनी है तबतक उपहितोंकी एकता नहीं हो सकती। जबतक दर्पण है तबतक बिम्ब-प्रतिबिम्बभाव रहेगा ही। इसी तरह अन्तःकरणादि उपाधि जबतक है तबतक जीव ईश्वरभाव रहेगा ही। फिर ब्रह्म-चैतन्यका जीवचैतन्य बनना असम्भव ही रहेगा। यदि वृत्तिकृत अभेदकी अभिव्यक्तिसे विषयावच्छिन्न ब्रह्म जीव हो जायगा, तब तो ब्रह्मका विषय-संसर्ग न रहनेसे ब्रह्म उस विषयका ज्ञाता न रहेगा। फिर उसकी सर्वज्ञता बाधित होगी। अतः विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य विषयसंसृष्ट वृत्तिके अग्रभागमें विषयप्रकाशक प्रतिबिम्बका समर्पण करता है। उसी प्रतिबिम्बका जीवके साथ एकीभाव होता है। इसी तरह अन्तःकरण, वृत्ति तथा विषयोंसे अवच्छिन्न चैतन्योंमें क्रमेण प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेय-व्यवहार असंकररूपसे सम्पन्न होगा। कहा जा सकता है कि 'वृत्तिसे उपहित चैतन्य विषय-प्रमा होगी, उसका विषयाधिष्ठान चैतन्यके समान विषयके साथ आध्यासिक सम्बन्ध नहीं होगा।

फिर विषयकी अपरोक्षतामें आध्यासिक सम्बन्ध प्रयोजक है, यह सिद्धान्त असङ्गत हो जायगा।' परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि विषयसे अविच्छिन्न विषया- धिष्ठान चैतन्य ही वृत्तिमें प्रतिबिम्बित है। इस दृष्टिसे अभेद उपपन्न होता है। कुछ लोग विषयाधिष्ठान-चैतन्यसे ही विषयका साक्षात् आध्यासिक सम्बन्ध होनेसे बिम्बभूत ब्रह्मचैतन्यको ही विषयप्रकाशक मानते हैं, किंतु बिम्बत्वादि विशिष्टरूप- से उसका भेद होनेपर भी बिम्बत्वोपलक्षितरूपसे एकीभाव ही अभेदाभिव्यक्ति है। बिम्बादिरूपमें भेद बना ही रहता है। अतः जीवब्रह्मके सांकर्यमें एव ब्रह्मकी सर्वज्ञतामें विरोध आदि नहीं। इसी तरह 'वृत्तिसे आवरणका अभिभव होता है, इस पक्षमें भी विचारणीय है कि आवरणाभिभव क्या है ? यदि अज्ञाननाश ही आवरणाभिभव माना जाय तब तो घटज्ञानसे अज्ञानका नाश होगा और अज्ञान- मूलक प्रपञ्चकी ही निवृत्ति हो जायगी। कुछ लोगोंके मतमें चैतन्यमात्रके आवरक अज्ञानका विषयावच्छिन्न-प्रदेशमें ज्ञानसे एकदेशेन नाश उसी तरह होता है जिस तरह महान्धकारमें खद्योत-प्रकाशसे एकदेशेन अन्धकारका नाश होता है। अतः घटज्ञानसे विषयप्रदेशस्थ अज्ञानके एकदेशका ही नाश होगा, सम्पूर्ण अज्ञानका नहीं, अतः प्रपञ्च-निवृत्तिका प्रसङ्ग नहीं होगा। अथवा ज्ञानसे विषयाज्ञानका कट (चटाई) के समान संवेष्टन या संकोच हो जाता है, यही आवरणाभिभव है, अथवा रणमें भीत भट (योद्धा) के पलायनके समान ज्ञानसे विषयावच्छिन्न चैतन्यनिष्ठ अज्ञान हट जाता है, यही आवरणाभिभव है। अन्य लोगोंका कहना है कि 'अज्ञानका एकदेशसे नाश होनेसे उपादान न रहनेसे विषयावच्छिन्न चैतन्य- प्रदेशमें फिर आवरणकी उत्पत्ति न होगी। अतएव मानना यह चाहिये कि चैतन्यमात्रके आवरक अज्ञानका तत्तदाकारवृत्ति संसृष्ट अवस्थावाले विषयावच्छिन्न- चैतन्यको आवरण न करनेका स्वभाव ही आवरणाभिभव है।' कहा जाता है कि घटादि विषयको ढककर स्थित होनेवाले पटके समान विषयावच्छिन्न चैतन्यको आवृत करके स्थित होनेवाला अज्ञान विषयको आवृत क्यों न करेगा ?' परंतु यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योकि 'अहमज्ञः' इस प्रतीतिके आधारपर कहा जा सकता है कि अहमनुभवमें प्रकाशमान चैतन्यका आश्रय करके अज्ञान स्थित होता है और वह स्वाश्रयभूत चैतन्यको आवृत नहीं करता है। अन्य लोगोंका कहना है कि 'घटं न जानामि' (मै घट नहीं जानता) इस तरह अज्ञान घटज्ञान विरुद्धरूपसे प्रतीत होता है। घटज्ञान होनेपर घटका अज्ञान निवृत्त हो जाता है। इस तरह घटज्ञानद्वारा निवर्त्यरूपसे अनुभूयमान घटज्ञान मूलज्ञान नहीं है। शुद्ध चैतन्यविषयक अज्ञान शुद्ध चैतन्य ज्ञानसे ही निवर्त्य होता है। घटज्ञान-निवर्त्य घटाज्ञान वैसा नहीं है, अतएव घटावच्छिन्न चैतन्यविषयक अज्ञान मूलाज्ञानका अवस्थाविशेष है। उस अवस्था-अज्ञान (मूलाज्ञान) का नाश ही आवरणाभिभव है।' कहा जाता है कि 'फिर भी

६३६ मार्क्सवाद और रामराज्य एक ज्ञानसे अज्ञानका नाश होनेपर तत्समानविषयक ज्ञानान्तरोंमें आवरणा- भिभावकता कैसे होगी ?' यह भी ठीक नहीं है, क्योकि जितने ज्ञान हैं, उतने ही अज्ञान हैं। इसलिये प्रत्येक ज्ञानसे प्रत्येक अज्ञानका नाश होता है। यह अवस्थारूप अज्ञान मूलाज्ञानके तुल्य ही अनादि है। व्यावहारिक जगत् और जीवको आवृत करके स्वाप्निक जीव-जगत्को प्रतिभासित करनेवाली आवरण एव विक्षेप-शक्तिवाली निद्रा अज्ञानकी अवस्था है। इसी तरह सुषुप्तिमें अन्त:करणादिके विलीन होनेपर 'सुखमहमस्वाप्सम्, नाहं किंचिदवेदिषम्' ( मै सुखपूर्वक सोया, मैने कुछ नही जाना ) इस तरह स्मरण होनेसे मूलाज्ञानके तुल्य अनुभूयमान सुषुप्ति भी अज्ञानकी अवस्थाविशेषरूप ही है। जाग्रत् भोगप्रद कर्मोंके उपरम होनेपर इन दोनो ही अवस्थाओका प्रादुर्भाव होता है, अतः ये सादि हैं। इसी तरह अन्य अवस्था—अज्ञान भी सादि ही है। यदि सभी मूलाज्ञान अनादि माने जायें तब तो प्रथम उत्पन्न घटज्ञानसे ही घटविषयक सभी अज्ञानोका नाश होगा। किस अज्ञानका नाश हो किसका न हो, इसमें कोई विनिगमका अर्थात् निर्णायक युक्ति नहीं है। 'घटावच्छिन्न चैतन्यावरक सर्व अज्ञानोके नाश हुए बिना घटविषयक प्रकाश ही न होगा। अतः पीछे होनेवाले ज्ञान आवरणके अभिभावक सिद्ध न होंगे।' इसका समाधान कुछ लोग यह करते हैं कि 'जैसे अनेक ज्ञान-प्राग- भावोंके रहनेपर भी एक ज्ञानसे एक ही प्रागभाव नष्ट होता है, संशयादि- उत्पादनमे समर्थ घटावरणरूप अन्य ज्ञान-प्राग्भावोके रहनेपर भी घटज्ञानसे एक घटप्राग्भावके नष्ट होनेपर ही घटविषयका प्रकाश होता है, वैसे ही एक ज्ञान उत्पन्न होनेपर एक ही अज्ञान निवृत्त होता है, इतर अज्ञानोके रहनेपर भी विषयका प्रकाश होता है।' दूसरे लोगोका मत है कि 'सब अज्ञान सर्वदा आवरण नहीं करते, किंतु जिस समय जो अज्ञान आवरण करता है, उस समयके उस ज्ञानसे उसी अज्ञानका नाश होता है। वृत्तिद्वारा आवरक अज्ञानका नाश होनेपर जब वृत्ति उपरत होती है, तब अन्य अज्ञान आवरण करते हैं।' इसपर कहा जाता है कि 'यदि सब अज्ञान सर्वदा आवरक न हो तब तो ब्रह्मज्ञानकालमें ब्रह्मज्ञानसे भी उन अज्ञानोकी निवृत्ति नहीं होगी, फिर तो मुक्तिमें भी उन अज्ञानोकी प्रसक्ति होगी।' परंतु यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि उक्त सभी अज्ञान मूलाज्ञानकी अवस्था ही हैं, अतः ब्रह्मज्ञानसे मूलज्ञानके नष्ट होनेसे उसके अवस्थाभूत अन्य अज्ञानोका भी नाश होना सङ्गत है। कई लोग कहते हैं कि 'अज्ञान स्वभावसे ही सविषय होता है, अतः सभी अज्ञान सर्वदा ही अपने विषयको आवृत करते हैं।' कहा जा सकता है कि 'घटादिविषयकी उत्पत्तिके पहले अज्ञान किसे आवृत करेगा ?' परंतु कारणमें

सूक्ष्मरूपसे घटादि सदा ही रहते हैं अतः उनका आवरण सदा ही हो सकता है । उनके मतानुसार एक ज्ञानसे एक अज्ञानका नाश होता है, अन्योंका अविभव होता है । जैसे 'बहुजनसमाकुल प्रदेशमें एकके ऊपर भी वज्र पड़नेपर दूसरोंका अपसारण हो जाता है, वैसे ही प्रकृतमे भी समझना चाहिये । अथवा जैसे सन्निपातहर औषध एक दोषको हटाता हुआ इतर दोषोंको भी हटाता है, वैसे ही एक अज्ञानको नष्ट करता हुआ भी ज्ञान इतर अज्ञानोंको भी तिरस्कृत करता है । जबतक ज्ञान रहता है तबतक आवरणशक्तिका प्रतिबन्ध ही उनका तिरस्कार है । कहा जा सकता है कि 'धारावाहिक ज्ञानस्थलमें प्रथम वृत्तिके द्वारा अज्ञानका निवारण होगा । परन्तु द्वितीय आदि वृत्तियाँ अज्ञानकी निवारक न होंगी, क्योंकि प्रथम ज्ञानसे ही एक अज्ञानका निवारण और अन्योंका तिरस्कार सम्पन्न है ।' परन्तु इसका समाधान कुछ लोग यह करते हैं कि 'जैसे दीपधारा तमको तिरस्कृत करके स्थित रहती है, वैसे ही वृत्तिधारा भी अज्ञानको तिरस्कृत करके स्थिर होती है । जैसे प्रदीप तिरस्कृत भी तम प्रदीपके उपरत होनेपर पुनः प्रवृत्त होता है, वैसे ही वृत्ति-तिरस्कृत भी अज्ञान-वृत्तिके उपरत होनेपर पुनः विषयको आवृत्त करता है, परन्तु वृत्त्यन्तरोंके उदय होनेपर तिरस्कृत ही रह जाता है, जैसे प्रदीपान्तरके उदय होनेपर तम तिरस्कृत ही रहता है। जिसके रहनेपर अग्रिम क्षणमें जिसका सत्त्व रहता है, जिसके अभावमें जिसका असत्त्व रहता है, वह तज्जन्य मान्य होता है । तथा च प्रदीपधारासे तमके प्रागभावका पालन जैसे सम्पन्न होता है, वैसे ही वृत्ति-परम्परासे अनावरणका परिपालन होता है । वही द्वितीय आदि वृत्तिका फल है ।' कुछ लोगोंके मतानुसार 'पर्यायसे ही अज्ञानविषयको आवृत्त करते हैं, अतः ज्ञान स्वकालके ही आवरक अज्ञानका नाश करता है । इसलिये धारावाहिक ज्ञानस्थलमें द्वितीयादि वृत्तियाँ भी अज्ञानकी नाशक हैं ।' इस पक्षमें कहा जा सकता है कि 'यदि ज्ञानोदयकालमें भी अज्ञान रहता है, तो विषयका आवरण भी सम्भव है ।' परन्तु इसका समाधान यह है कि अवस्थारूप अज्ञान तत्तत्कालोपलक्षितस्वरूपका ही आवरण करते हैं । ज्ञान भी स्वकालोपलक्षितविषयावरक अज्ञानका नाश करते हैं तथा च किसी ज्ञानके उदय होनेपर तत्कालीन विषयावरक अज्ञानका ही नाश होता है । विद्यमान भी अज्ञान अन्यकालीन विषयोंके ही आवरक होते हैं, इसलिये तत्कालीन विषयावभासमे कोई अनुपपत्ति नहीं हो सकती । कुछ लोग कहते हैं कि 'आद्य घटादिज्ञानसे घटादिके अज्ञान नष्ट होते हैं । द्वितीयादि ज्ञानोंसे तो कालविशिष्ट वस्तु-विषयक अज्ञानकी ही निवृत्ति होती है । अतएव एक बार चैत्र-ज्ञान होनेपर 'चैत्र न जानामि' इस प्रकार स्वरूपावरण

६३८ मार्क्सवाद और रामराज्य

अनुभूत नहीं होता । किंतु 'इस समय वह कहाँ है, यह मैं नहीं जानता' इस तरह कालादिविशिष्टविषयक ही आवरणका अनुभव होता है । भले विस्मृतिशालीको एक बार अनुभवके अनन्तर भी स्वरूपावरणकी अनुभूति हो, परंतु अन्यत्र द्वितीयादिज्ञान विशिष्टविषयक ही होते हैं।' कहा जा सकता है कि 'इस तरह तो धारावाहिक ज्ञानस्थलमें द्वितीयादिज्ञान अज्ञाननिवर्तक न होंगे; क्योंकि स्थूल- कालविशिष्टाज्ञान प्रथमज्ञानसे ही निवृत्त हो चुका है । पूर्वापरज्ञानोसे व्यावृत्त सूक्ष्म कालादिविशिष्टाज्ञानकी निवृत्ति द्वितीयादिज्ञानसे हो ही नहीं सकती; क्योकि सूक्ष्मकाल द्वितीयादिज्ञानके विषय ही नहीं हैं।' परंतु धारावाहिक स्थलमें प्रथमोत्पन्न एक ही वृत्ति तावत्काल स्थायीरूपसे मान्य है, अतः वहाँ वृत्तिभेद है ही नहीं। वृत्तिभेद माननेपर भी बहुकालावस्थायी वृत्ति मान्य होती है, अतः स्थूलकालादिविशिष्ट ही वस्तुका अज्ञान निवृत्त होता है । प्रतिक्षण उत्पन्न होनेवाली अनेक वृत्तियोंकी ही यदि धारा मानी जाय, तब तो द्वितीयादिज्ञान ज्ञातविषयक ही होनेसे प्रमाण नहीं हैं । अतः आवरण-निवर्तक न भी हो, तो भी कोई हर्ज नहीं । 'विवरण'कारने साक्षिसिद्ध अज्ञानको ज्ञानाभावभिन्न सिद्ध करनेके लिये अनुमानादि-वेद्य बतलाकर भी अज्ञानको प्रमाणवेद्य इसीलिये कहा है कि अज्ञात- ज्ञापक ही प्रमाण मान्य होता है, अज्ञान सदा ही साक्षिवेद्य होनेसे अज्ञात नहीं है, अतः अनुमानागमादि-वेद्य होनेपर भी वह प्रमाणवेद्य माना जाता है । इसलिये द्वितीयादि वृत्तियाँ उपासनादि वृत्तियोंके तुल्य अज्ञाननिवर्तक न भी हो, तो भी कोई हानि नहीं । प्रमाणवृत्तियोंके ही अज्ञाननिवर्त्तनका नियम होता है । विषयावरक अज्ञान दो प्रकारका मान्य होता है—एक विषयाश्रित होता है, जो कि अनिर्वचनीय रज्जु-सर्पादिका उपादान होता है । अनिर्वचनीयकार्यके उपादानरूपसे उसकी सिद्धि होती है। दूसरा विषयावरक अज्ञान पुरुषमें 'इद- मह न जानामि' ( इसे मै नहीं जानता ) इस रूपसे अनुभूत होता है । पुरुषाश्रित अज्ञान विषयाश्रित सर्पादि विक्षेपका उपादान नहीं हो सकता और विषयाश्रित अज्ञानका प्रकाशरूप साक्षीके साथ संसर्ग नहीं हो सकता, अतः दोनों ही अज्ञान मानना उचित है । परोक्षज्ञानस्थलमें वृत्ति बाहर नहीं जाती, अतः दूरस्थ वृक्षोंमें आप्तवाक्यसे परिमाण-विशेषका ज्ञान होनेसे यद्यपि पुरुषगत अज्ञान नष्ट हो जाता है, तथापि विषयगत अज्ञान नहीं मिटता, अतः उनमें विपरीत परिमाण-भ्रम देखा जाता है । उपदेशके अनन्तर 'शास्त्रार्थे न जानामि' इत्याकारक अज्ञानकी निवृत्ति देखी ही जाती है । अन्य लोगोंका कहना है कि 'जैसे नेत्रगत काचादि दोष विषयको आवृत करते हैं, वैसे ही पुरुषाश्रित अज्ञान ही विषयका आवरक होता है।'

मार्क्स और ज्ञान ६३९ वाचस्पतिमिश्रके मतानुसार 'जीवाश्रित अज्ञानके विषयीभूत ब्रह्मका ही विवर्त्त सम्पूर्ण संसार है। जैसे दर्शकोंसे अविज्ञात मायावी ही अनेक मायिक प्रपञ्चके रूपमें प्रकट होता है, वैसे ही पुरुषसे अज्ञात शुक्तिकादिसे अवच्छिन्न ब्रह्म ही शुक्ति-रजतादिरूपमें विवर्जित होता है । परोक्षवृत्तिसे अज्ञानसम्बन्धी एक आवरणावस्थाकी निवृत्ति होनेपर भी विक्षेपरूप अवस्थान्तर अज्ञान बना रहता है।' अन्य लोगोंका कहना है कि 'शुक्ति-रजतादि परिणाम विषयगत अज्ञानका ही हो सकता है, अतः विषयको आवृत करनेवाले पटके समान विषयगत आवरण ही मानना ठीक है।' कहा जा सकता है कि 'इस तरह अज्ञानका साक्षीके साथ संसर्ग न होनेसे साक्षीके द्वारा उसका प्रकाश नहीं बन सकेगा और परोक्ष-वृत्तिसे विषयसंसर्ग न होनेसे उसकी निवृत्ति भी नहीं बनेगी ।' परन्तु इसका समाधान यह है कि 'शुक्तिमहं न जानामि' यह मूलाज्ञान ही साक्षीसे संसृष्ट है । उसीका साक्षीसे भान होता है । शुक्तिविषयगत अज्ञान मूलाज्ञानका अवस्थाविशेष ही है । शुक्ति आदिका भी मूलाज्ञानके विषयभूत चैतन्यके साथ अभेद होनेसे शुक्तिविषयताका अनुभव उपपन्न हो जायगा । विवरणादिमें मूलाज्ञानके साधन-प्रसङ्गमें 'इदमहं न जानामि' इस रूपसे मूलाज्ञानमें प्रत्यक्ष-प्रमाणका उपन्यास किया गया है। 'अहमज्ञ,' इस प्रकार सामान्यतया अज्ञानका अनुभव मूलाज्ञानका अनुभव माना गया है । 'शुक्तिमहं न जानामि' इत्यादि विषय-विशेषके अज्ञानका अनुभव अवस्था-अज्ञानका ही अनुभव है। फिर भी अवस्था-अवस्थावान्‌का अभेद होनेसे मूलाज्ञानका साक्षिसंसर्ग होनेसे ही अवस्था-ज्ञानका भी भान बन जाता है। अथवा विषयचैतन्य तथा साक्षिचैतन्य, दोनोंका अभेद होनेसे अवस्थाज्ञान भी साक्षिचैतन्यका विषय समझा जा सकता है। परोक्ष-ज्ञान यद्यपि विषयसंसर्ग न होनेसे अज्ञानका निवर्त्तक नहीं है, तथापि सत्ता निश्चय परोक्षवृत्त्यात्मक प्रतिबन्धके कारण अज्ञानके अनुभवकी भ्रान्ति होती है, अतः अपरोक्षज्ञान ही अज्ञानका निवर्त्तक होता है। परन्तु अविद्या-अहंकार सुख-दुःखादि- विषयक अपरोक्षज्ञानमें भी अज्ञाननिवर्त्तकता नहीं होती, क्योंकि ये सब सदा ही साक्षिभाष्य होते हैं, कभी भी अज्ञात नहीं रहते। कूटस्थ, व्यापकचैतन्यसे वृत्तियाँ तथा वृत्तियोंका अभाव भासित होता है। अहंकार आदिका सदा ही साक्षिरूप प्रकाशसे संसर्ग रहता है, अतः वे सदा ही भासमान रहते हैं। अन्य ज्ञानधाराकालमें 'अहम्' भासित ही रहता है। अतएव 'एतावन्तं कालमिदमहं पश्यन्नेवासम्' (इतने कालतक मैं इसे देखता ही रहा ) इस प्रकार अहंकारका अनुसन्धान होता है। जैसे, राहुका प्रकाश राहुसमावृत सूर्य-चन्द्रद्वारा ही होता है, वैसे ही अविद्याका प्रकाश अविद्यावृत साक्षिचेतनद्वारा ही होता है । साक्षीके नित्य होनेपर भी वृत्तिके नाशसे संस्कार और स्मृति हो सकेगी । अनवस्था- भयसे वृत्तिगोचर वृत्ति न माननेपर भी वृत्तिके नाशसे ही तद्गोचर संस्कार आदि

६४० मार्क्सवाद और रामराज्य उपपन्न होते हैं । सुख-दुःखादिके ही नाशसे तद्गोचर सस्कार बन सकेगा । साक्षिचैतन्य स्वतः नित्य होनेपर भी भास्य विशिष्टरूपसे अनित्य है, अतः भास्यके नाशसे तद्विशिष्ट चैतन्यका भी नाश होता है । उसीसे सस्कार, स्मृति आदि बन सकेंगे । अन्य लोग सौषुप्त अज्ञान-सुखादिग्राहक अविद्यावृत्तिके समान अहंकार-सुखादिकी स्मृतिके लिये अविद्या-वृत्ति मानते हैं । उसीके नाशसे सस्कारादि बनते हैं । इस पक्षमें यह कहा जा सकता है कि ‘एतावन्तं कालमिद- महं पश्यन्नेवासम्’ ( इतने समयतक मैं इसे देखता ही रहा ) इस प्रकार विषयज्ञानधाराके साथ अहंकार-ज्ञानकी धारा कैसे बन सकेगी ?’ परंतु यह कोई दोष नहीं है, क्योकि ‘शिरसि मे दु खं पादयोर्मे सुखम्’ ( मेरे सिरमें दुःख है, पैरमें सुख है ) इस तरह जैसे अवच्छेदकके भेदसे सुख-दुःखका यौगपद्य हो सकता है, वैसे ही अहमाकारवृत्ति और इदमाकारवृत्ति--दोनो ही एक साथ रह सकती हैं । कुछ लोग कहते हैं कि ‘अहमाकारवृत्ति अविद्या-वृत्ति नहीं है, किंतु उपास्तिके तुल्य मनोवृत्ति है, ज्ञान नही । ‘सोऽह’ इस प्रत्यभिज्ञामे भी तदंशमें स्मृति है, अहमंशमें ज्ञान नही है । अहमाकारवृत्ति ज्ञान इसलिये नही है कि ज्ञान करण चक्षु-श्रोत्रादि तथा लिङ्गादिसे जन्य नहीं है । मन स्वयं ज्ञानका उपादान है, वह करण नही हो सकता । जैसे ‘पर्वते वह्निमनुमिनोमि’ इस ज्ञानमें परोक्षता- अपरोक्षता दोनो होती है । ‘इदं रजतम्’ इस ज्ञानमें अंशभेदसे जैसे प्रमात्व-अप्रमात्व सम्भव है, वैसे ही ‘सोऽहं’ इस प्रत्यभिज्ञामे भी अंशभेदसे ज्ञानत्व-अज्ञानत्व ( ज्ञानभिन्नत्व ) भी सम्भव है । अन्य लोग मनको इन्द्रिय मानते हैं, अतः ‘मामह जानामि’ इस प्रकारकी वृत्ति ज्ञान ही है, अतएव बाह्यविषयक अपरोक्ष- वृत्ति आवरणकी अभिभावक होती है । इस सम्बन्धमें भी विवाद यह है कि शुक्तिमें ‘इदं रजतम्’ ज्ञान होता है । यहाँ इदमाकार अपरोक्ष वृत्ति होती है, फिर भी इदमंशका आवरण अभिभूत नहीं होता । यदि ऐसा होता, तो शुक्तिमें रजतका अध्यास न होता ।’ इसका कुछ लोग समाधान यह करते हैं कि ‘इदमाकारवृत्ति- से शुक्तीदमंशविषयक अज्ञान निवृत्त होता है । परंतु शुक्तित्व विशेपका अज्ञान निवृत्त नहीं होता । उसी अज्ञानसे रजतका भ्रम होता है, क्योकि शुक्तित्वके अज्ञानसे ही रजतभ्रम होता है । शुक्तित्वज्ञानसे ही रजतभ्रम दूर होता है, अतः शुक्तित्वके अज्ञानसे ही अनिर्वचनीय रजतकी उत्पत्ति होती है । इसीलिये ‘इदं रजतम्’ इस भ्रममें इदमशका स्फुरण होता है । रजतभ्रममें शुक्त्यंश अधिष्ठान है, इदमंश आधार है । सकार्य अज्ञानका विषय अधिष्ठान है । अतद्रूप भी तद्रूपसे आरोप्य बुद्धिमें स्फुरित होते हुए आधार कहा जाता है—‘संसिद्धा सविलासमोहविषये वस्तुन्यधिष्ठानगीर्नोर्धारेध्यसनत्य वस्तुनि ततोऽस्थाने महान्सम्भ्रमः’ ( सक्षेप शारीरक ३ । २३९ )

मार्क्स और ज्ञान ६४१ अन्य लोगोंका मत है कि 'इदमंशाज्ञान'का ही परिणाम रजत है; अतएव 'इदं रजतम्' इस तरह 'इदम्' से संसृष्ट ही रजत प्रतीत होता है। इदमाकारवृत्तिसे आवरण शक्तिमात्रकी निवृत्ति होती है। फिर भी विक्षेप-शक्तिके साथ अज्ञान बना रहता है। वही कल्पित रजतका उपादान है। अधिष्ठान-साक्षात्कारसे अधिष्ठानाज्ञान निवृत्त हो जानेपर भी विक्षेप-शक्तिसहित अज्ञान ही जलप्रति- बिम्बित वृक्षका अधोऽग्रत्वाध्यास तथा जीवन्मुक्तिमे अनुवृत्त प्रपञ्चाध्यासका उपादान होता है।' कुछ आचार्य कहते हैं कि " 'इदं रजतम्' यह ज्ञान भ्रमात्मक है। इसमें इदमाकार-ज्ञान प्रमाणज्ञान नहीं है। 'इदं रजतम्' इस भ्रममें दो ज्ञानोका अनुभव नहीं होता है; अतएव 'इदं' यह प्रमाणज्ञान है, 'रजतम्' यह भ्रमात्मक ज्ञान है।" परंतु यह पक्ष संगत नहीं है; क्योंकि सामान्य-विशेष संसर्गविषयक यहाँ एक ही ज्ञान है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि अधिष्ठान-सामान्यज्ञान अध्यासका कारण है, अतः अध्यास देखकर उसके कारणभूत इदंवृत्तिकी कल्पना करनी चाहिये, क्योंकि अधिष्ठान-सामान्यज्ञान अध्यासका हेतु है ही नहीं। कहा जा सकता है कि 'अधिष्ठान सम्प्रयोगके बिना प्रातिभासिक रजतकी उत्पत्ति नहीं होती। यही इदंवृत्तिके होनेमें प्रमाण है।' परंतु यह ठीक नहीं है। इससे इतना ही सिद्ध होता है कि दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोग ही अध्यासका कारण है। यह भी शङ्का होती हे कि 'इन्द्रिय-सम्प्रयोग सभी भ्रमोंमें कारण नहीं है; क्योंकि अहंकारके अध्यास- में इन्द्रिय-सम्प्रयोग अपेक्षित है ही नही। अतः अधिष्ठान-सामान्यज्ञानको ही अध्यासका हेतु मानना ठीक है। रजतादि अध्यासमें इन्द्रियसे शुक्तिके इदमंशका ज्ञान होता है। अहंकाराध्यासमे स्वतः प्रकाशमान प्रत्यगात्माका सामान्य-ज्ञान हेतु है।' परंतु यह भी ठीक नही है, क्योंकि घटादिके अध्यासमें अधिष्ठान- सामान्यज्ञान नहीं होता है; क्योंकि घटादि प्रत्यक्ष होनेके पहिले घटादिके अधिष्ठानभूत नीरूप ब्रह्ममात्र गोचर चाक्षुष वृत्तिका उत्पन्न होना असम्भव ही है। स्वरूप-प्रकाश तो आवृत ही रहता है। यदि कहा जाय कि 'आवृत-अनावृत साधारण अधिष्ठान प्रकाशमात्र अध्यासका कारण है,' तब तो शुक्तिके इदमंशसे इन्द्रियसम्प्रयोग हुए बिना भी आवृत शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्य रहता ही है, अतः उस समय भी शुक्तिमें रजतका अध्यास होना चाहिये यह भी नहीं कहा जा सकता कि 'अध्यास-सामान्यमें अधिष्ठान-प्रकाश सामान्य हेतु है और प्रातिभासिक अध्यासमें अभिव्यक्त अधिष्ठान-प्रकाश हेतु है, इसलिये कहीं दोष न आयेगा। सामान्यमें सामान्य और विशेषमें विशेष हेतु होता ही है,' क्योंकि 'पीतः शङ्खः, नीलं कृपजलम्' इत्यादि प्रातिभासिक अध्यासोंमें भी अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाश नहीं होता है। रूपके बिना चाक्षुषज्ञान नही होता। शङ्खादिगत शुक्ल-रूपका उपलब्ध उस समय हे ही नहीं। अध्यासके पहले नीरूप शङ्खादि गोचरवृत्ति असम्भव ही है। यदि यह माना जाय कि 'प्रातिभासिक भ्रमोंमें भी रजतादि

६४२ मार्क्सवाद और रामराज्य अध्यासोमे ही अभिव्यक्त अधिष्ठान प्रकाश हेतु है' तो भी ठीक नहीं है, क्योंकि फिर भी ‘पीतः शङ्खः’ इत्यादि स्थलोंमें दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगको हेतु कहना ही पड़ेगा। ऐसी स्थितिमे प्रातिभासिक अध्यासोमें दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगको ही हेतु क्यों न माना जाय ? इसीसे रजताध्यासके कादाचित्कत्वका भी निर्वाह हो जाता है। इसलिये यह नही कहा जा सकता कि सामान्यतया एवं विशेषतया अधिष्ठान प्रकाश अध्यासका कारण है। फिर भी शङ्का होती है कि 'सादृश्यनिरपेक्ष अध्यासोंमें अधिष्ठान-प्रकाश हेतु न भी हो, तो भी सादृश्यसापेक्ष रजतादि अध्यासमें रजतादि सादृश्यभूत भास्वररूप विशेषादिविशिष्ट धर्मिज्ञानको कारण मानना चाहिये। यदि दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगमात्रको अध्यासमें कारण कहा जाय तब तो शुक्तिके तुल्य ही इंगाल (कोयला) में भी रजतादिका अध्यास होना चाहिये।' कुछ लोगोंका कहना है कि 'सादृश्य भी विषयदोषरूपसे ही अध्यासमें कारण है।" परंतु यह ठीक नहीं; क्योकि वि-सदृशमें सादृश्यभ्रमसे भी अध्यास होता है, जैसे कि समुद्रजलमें दूरसे नील शिलातलका अध्यारोप होता है। कुछ लोग सादृश्य-ज्ञान- सामग्रीको ही अध्यासका कारण कहते हैं; परंतु ज्ञान-सामग्री ज्ञानका कारण हो सकती है, अर्थका कारण नहीं । अतः लाघवात् सादृश्य-ज्ञान ही अध्यासका कारण है। कुछ लोग कहते हैं कि 'जैसे स्वतः शुभ्र रजतपात्रगत स्वच्छ जलमें ही नैल्याध्यास होता है, मुक्ताफलमे नैल्याध्यास नही होता, वैसे ही शुक्तिमें ही रजता- ध्यास होता है, इंगालादिमे नही । यह फल-बल-कल्प्य स्वभावभावविशेष ही व्यवस्थाका कारण है। सादृश्यज्ञानका होना-न-होना हेतु नहीं है।' परंतु यह कहना ठीक नहीं, क्योकि स्वतः पटखण्डमें कमल-कुड्मल आदिका अध्यास यद्यपि नही होता तथापि कर्त्तनादिके द्वारा कमलाकार सम्पन्न होनेपर उसी कर्त्तनादिद्वारा कमलाकारघटित पटखण्डमें कमलका अध्यास देखा जाता है। यहाँ वस्तुस्वभावान- पेक्षसादृश्यज्ञान ही अन्वयव्यतिरेकसे अध्यासका हेतु निश्चित होता है। अन्यथा कमलाकाररहित पटखण्डमें भी कमलका भ्रम होना चाहिये। इसपर भी कुछ लोग कहते हैं कि 'सादृश्य-ज्ञानको यदि अध्यासमें कारण माना जाय तो भी विशेष दर्शनप्रतिवध्य रजतादि अध्यासोंमें ही उसे कारण मानना ठीक है।' ‘पीतः शङ्खः’ इत्यादि विशेष दर्शनसे अप्रतिबध्य स्थलोसे सादृश्यज्ञान सम्भव ही नहीं है। विशेष दर्शनसे प्रतिवध्य शुक्ति रजतादि स्थलोंमें प्रतिबन्धक ज्ञान-सामग्रीको प्रतिबन्धक माननेका नियम है। इस दृष्टिसे विशेष दर्शन-सामग्रीको अवश्य प्रति- बन्धक कहना पड़ेगा। इसीसे सब व्यवस्था बन सकती है। फिर सादृश्य-ज्ञानको अध्यासका कारण क्यो माना जाय ? इंगालादिके चक्षुःसम्प्रयुक्त होनेपर उसमें नैल्यादिरूप विशेष दर्शन-सामग्री होनेसे रजतादि अध्यास नही होता। शुक्ति आदिमें भी यदि नीलपृष्ठत्वादिके साथ चक्षुःसम्प्रयोग होता है तो विशेष दर्शन-सामग्री होनेसे रजताध्यास नही होता। सदृशभागमात्रका सम्प्रयोग होनेसे विशेष दर्शन-

सामग्री न होनेके कारण अध्यास होता है। कहा जा सकता है कि 'उस समय भी शुक्तित्वरूप विशेष दर्शनकी सामग्री तो है ही, फिर अध्यास क्यों नहीं होता ?' परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि अध्यास-समयमें भी शुक्तित्व-दर्शनाभावसे तत्सामग्र्यभाव आपको भी मानना ही पड़ेगा। यदि सादृश्य-ज्ञानरूप अध्यास- कारणदोषसे प्रतिबन्धके कारण शुक्तित्व-दर्शन-सामग्र्यभाव मान्य है, तब तो घट्ट- कुटीप्रभातन्यायसे सादृश्य-ज्ञानको अध्यासका कारण मानना ही पड़ा। इसपर दूसरे पक्षका कहना है कि रजताध्याससे समीप आनेपर शुक्तिमे रजतसादृश्यरूप चाकचिक्यके दृश्यमान रहनेपर ही शुक्तित्वका उपलम्भ होता है। इससे सादृश्यज्ञान शुक्तित्वरूप विशेष दर्शनकी सामग्रीका प्रतिबन्धक सिद्ध नहीं हुआ। अतः दूरत्वादि दोषोंसे प्रतिबद्ध होनेसे अथवा शुक्तित्व-व्यञ्जक नीलपृष्ठ- त्वादिग्राहक मानाभावसे विशेष दर्शन-सामग्रीका अभाव मानना पड़ेगा। इसी तरह दूरस्थ समुद्र-जलमें नीलशिलात्वका आरोप हो सकता है; क्योंकि वहाँपर नियत नीलरूपाध्यासके प्रयोजक दोषसे दूरत्वके कारण नीरत्व-व्यञ्जक तरङ्गादि- ग्राहक साधनके संनिहित न होनेसे शुक्लरूप, जलराशित्व आदि विशेषोंके दर्शनकी सामग्रीका अभाव है। विस्तृत वस्त्रमें परिणाहादिरूप विशेष-दर्शनकी सामग्री होनेसे कमलत्वादिका अध्यास नहीं होता है। कर्त्तनादिद्वारा कमलाकारसम्पन्न पटमें विशेष दर्शन-सामग्री न होनेसे कमलत्वादि अध्यास हो जाता है। एक शङ्का यह भी होती है कि अध्यासमें यदि सादृश्य-ज्ञानकी अपेक्षा न हो तो करस्पृष्ट लौहखण्डमें उसके नीलरूपकी ग्राहक विशेष दर्शन सामग्री न होनेसे रजताध्यास क्यों नहीं होता ?' परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि ऐसे स्थलो- में रजताध्यास होता ही है। हाँ, ताम्रादिव्यावर्त्तक विशेष सामग्री न होनेसे ताम्रादि अध्यास भी होता है। कहीं अनेक अध्यास होनेसे अध्यस्तमें संशय भी होता है। 'ताम्र है या रजत है' इत्यादि कहीं रजतप्राय वस्तुपूर्ण कोषगृहादि लौहशकलमें रजतहीका अध्यास होता है। कहीं सादृश्य-ज्ञान रहनेपर भी करणदोष न रहनेसे शुक्तिमें रजताध्यास नहीं होता। वैसे ही कभी अध्यास न भी हो तो भी कोई दोष नहीं। अतः कार्यकल्प्य इदमाकारवृत्ति आवश्यक नहीं है। फिर 'इदमाकारवृत्ति आवरणभङ्ग करती है या नहीं' इत्यादि विचार व्यर्थ है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि 'अप्रतिबद्ध इदमर्थ-सम्प्रयोगरूप कारणसे भी इदमाकारवृत्तिकी कल्पना होगी' क्योंकि इदमर्थ-सम्प्रयोगरूप कारणसे उत्पन्न होती हुई इदंवृत्तिका दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगसे क्षुभित अविद्याके परिणामभूत इदंवृत्तिके समकाल उत्पन्न रजत ही विषय होता है। वहीं प्रातिभासिक रजत दोषयुक्त चक्षुसे गृहीत होता है। कहा जा सकता है कि चक्षुसे रजतका सम्प्रयोग हुए बिना रजत चाक्षुष नहीं हो सकता। दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगजन्य रजत इदवृत्तिके समकाल नहीं हो सकता, क्योंकि ज्ञान-कारण इन्द्रिय सम्प्रयोगसे ज्ञान ही उत्पन्न हो सकता है। रजत तो

अर्थ है, उसकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? अतः इदंवृत्तिके अनन्तर तज्जन्य तदभिव्यक्त साक्षीमें ही रजतका अध्यास होता है. इसलिये साक्षीमे ही रजतका भान होता है । रजतमे चाक्षुषत्वका अनुभव इसलिये होता है कि स्वभासक चैतन्य- व्यञ्जक इदंवृत्तिका चक्षु जनक है, अतः परम्परासे चक्षुर्जन्य होनेके कारण चाक्षु- षत्वका अनुभव होता है । इस पक्षमे अन्य लोग यह दोष देते हे कि 'इस तरह तो पीत शङ्ख- भ्रममें चक्षुकी अपेक्षा न होनी चाहिये; क्योकि रूपके बिना केवल शङ्ख चक्षुसे ग्राह्य हो नही सकता । पीतिमा ग्रहणके लिये भी चक्षु अनावश्यक है, क्योकि साक्षिभास्यत्व-पक्षमें आरोप्य ऐन्द्रियक मान्य नहीं होता ।' यह भी नहीं कहा जा सकता कि 'पीतिमाका स्वरूपाध्यास नहीं होता, अपितु नयनगत पित्तकी पीतिमा ही अनुभूयमान होती है। उसका केवल शङ्ख-संसर्ग ही अध्यस्त होता है, इसलिये उसी पीतिमाके अनुभवार्थ चक्षुकी अपेक्षा होती है ।' कारण इस [

हो सकता। यदि यहाँ नैल्यसंसृष्ट तादृग् जल या गगनादि-अधिष्ठान-गोचर चाक्षुषवृत्ति स्वीकार नहीं की जायगी, तब तो चक्षुका अनुपयोग दुष्परि- हार्य ही होगा। 'पञ्चपादिका' कारकी दृष्टिमें जिस बालकने इस जन्ममें तिक्तरसका अनुभव नहीं किया है, उसे मधुर दुग्धमें तिक्तताकी प्रतीति जन्मान्तरीय अनुभवजन्य संस्कारसे होनी मान्य है। इससे स्वरूपतः अध्यस्त तिक्तरसका रसनासे ही अनुभव मानना स्पष्ट है। अन्यथा रसना-व्यापारके बिना भी तिक्तताकी प्रतीति होनी चाहिये। अतः पूर्वोक्त नीलता-अध्यासस्थलोंमें भी अधिष्ठानसम्प्रयोगसे तद्विषयक चाक्षुषवृत्तिका उदय होता है और उसी समय नीलताका अध्यास होता है। वही अध्यस्त नीलता उस वृत्तिका विषय होती है अतः वह भी चाक्षुष ही है; क्योंकि रूपके बिना गगनादि अधिष्ठानोंमें चाक्षुषवृत्ति हो नहीं सकती। अतः अधिष्ठानावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति न होनेसे अध्यस्तनीलता अधिष्ठान-चैतन्यसे भास्य नहीं हो सकती। तिक्त-रसस्थलोंमें तो अध्यस्त एवं अधिष्ठान दोनों ही एक रसनेन्द्रियग्राह्य नहीं है। त्वक् इन्द्रियसे मधुर दुग्धरूप अधिष्ठान गोचरवृत्ति उत्पन्न होती है। उस वृत्तिसे अधिष्ठान-चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेसे पित्तोपहत रसनाका सम्प्रयोग होता है, उसी चैतन्यमें तिक्तरसका अध्यास होता है। उसी समय अध्यस्त रसविषयक रासनवृत्ति उत्पन्न होती है। त्वगिन्द्रियजन्य अधिष्ठानगोचरवृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्यसे भास्य तिक्तरसमें यदि परम्परासे भी रसनाका उपयोग न होगा तो रासनत्वानुभवका समर्थन किसी भी तरह नहीं होगा। इसी तरह रजतके भी चाक्षुषत्वकी उत्पत्ति हो सकती है। अतएव 'चक्षुषा रजतं पश्यामि' (नेत्रसे रजत देखता हूँ) यह अनुभव होता है। कहा जा सकता है कि 'चक्षुसे रजतका सनिकर्ष हुए बिना ही यदि रजतमें चाक्षुषत्व हो, तब तो प्रत्यक्ष रजतमें विषयेन्द्रिय-सनिकर्ष कारण है, द्रव्य-प्रत्यक्षमें द्रव्येन्द्रिय-सयोग कारण है। रजत-प्रत्यक्षमें रजतेन्द्रिय-सयोग कारण है, इत्यादि कार्य-कारणभाव भङ्ग होगा।' परन्तु यह कोई दोष न होगा। सनिकर्ष, सयोगादि कोई एक कारण अनुगत नहीं है, अतः प्रथम नियम नहीं बनता। नैयायिकोंके मतमें सयोगायोग्य तमरूप अद्रव्यमें भी द्रव्यत्वका अध्यास होता है और सयोगायोग्य गुणादिमें भी द्रव्यत्वका अध्यास होता है, अतः द्वितीय नियमका अभिप्राय यह है कि व्यावहारिक द्रव्यत्वाधिकरणके प्रत्यक्षमें इन्द्रिय- सयोग कारण है, अतः प्रातिभासिक रजतमें तो अधिष्ठानगत इदंत्वके समान ही अधिष्ठानगत द्रव्यत्वका भी आरोप ही होता है। इसलिये प्रातिभासिक द्रव्यत्वाधि- करण रजतके इन्द्रियसयोगके बिना भी प्रत्यक्ष होनेमें कोई हानि नहीं है।

६४६ मार्क्सवाद और रामराज्य अतएव तृतीय नियमका भी कोई अस्तित्व नहीं रह जाता । जहाँ बीज-सामान्यका अङ्कुर सामान्यके साथ कार्य-कारणभाव माननेपर बीजान्तरसे अङ्कुरान्तरकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग होता है, वही विशिष्य कार्य-कारणभाव मानना आवश्यक होता है । प्रकृतमें वह सर्वथा व्यर्थ है । कहा जा सकता है कि 'द्रव्यप्रत्यक्षमें द्रव्य-सयोग कारण है, यह सामान्य नियममात्र माननेसे अन्य द्रव्यसंयोगसे अन्य द्रव्य-प्रत्यक्ष होने लगेगा ।' परंतु यह ठीक नहीं, क्योकि तत्तद्द्रव्यके प्रत्यक्षमें तत्तद्द्रव्यसंयोग कारण है, ऐसा माननेपर कोई अतिप्रसङ्ग नहीं होता । अन्यथा अन्य रजतसंयोगसे अन्य रजतका प्रत्यक्ष होनेका अतिप्रसङ्ग भी अनिवार्य ही होगा । इसके अतिरिक्त 'इदं रजतं पश्यामि, नीलं जलं पश्यामि, नीलं गगनं पश्यामि' इत्यादि अनन्यथासिद्ध अनुभवों- में 'प्रत्यक्षमात्रमें विषय-संनिकर्ष कारण है' इत्यादि नियमोंका व्यावहारिक विषयमें ही संकोच करना चाहिये । कहा जा सकता है कि 'इस तरह तो यही कहना ठीक है कि प्रमामें संनिकर्ष कारण है, भ्रममें नहीं, यह भी सकोच कल्पना हो सकती है । फिर तो असंनिकृष्ट देशान्तरस्थ रजतादिका भी भ्रम हो सकता है । इस तरह अन्यथाख्यातिका प्रसङ्ग होगा।' परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि अभिव्यक्त चैतन्यका सम्बन्ध हुए बिना देशान्तरस्थ रजतकी अपरोक्षता नहीं बन सकती । रजतप्रतीति और बाध, दोनों ही बातोंमें भ्रमविषयक अनिर्वचनीय रजत- को स्वीकार किये बिना काम नहीं चल सकता । कहा जा सकता है कि 'अधिष्ठान-सम्प्रयोगमात्रसे यदि प्रातिभासिक रजत- को ऐन्द्रियक माना जायगा, तब तो शुक्ति-रजताध्यास समयमे ही वहीं कालान्तर- में अध्यसनीय रंग (राँगा) का भी चाक्षुषत्व होना चाहिये । परंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि रजताध्यास समयमे रग-रजतसाधारण चाकचिक्य दिखलायी पड़नेपर भी जिस रागादिरूप दोषके अभावसे वहाँ रगाध्यास नहीं होता, उसी- के कारण रगादिविषयक वृत्ति भी उत्पन्न नहीं होती । रजतमे रागादि होता है, इसीलिये रजताध्यास एव रजताकारवृत्ति उत्पन्न होती है । अतः इदमंशयुक्त रजता- कार एक ही वृत्ति इन्द्रियजन्य उत्पन्न होती है । उमके पहिले इदमाकारवृत्ति नहीं होती । परंतु अन्य लोगोंका मत है कि 'इदमाकारवृत्ति' एक ही होती है । वही अध्यासके प्रति कारण है । अध्यस्त रजतादिका उस वृत्तिसे अभिव्यक्त साक्षि- चैतन्यसे भान होता है । अतः रजताकारवृत्ति निरर्थक है।' अन्य लोगोंके मतानुसार 'इदमाकार सामान्य-ज्ञानरूपिणी एक ही वृत्ति होती है । इद एवं रजत- के तादात्म्यगोचरवृत्ति दूसरी होती है । अतः दो ज्ञान ही मान्य होना ठीक है।' अन्य लोगोंका मत है कि 'जैसे इदमंशावच्छिन्न चैतन्यस्थ अविद्या रजत- ज्ञानाभासरूपसे परिणत होती है, इदंवृत्तिके तुल्य रजतज्ञान अनध्यस्त नहीं है, जैसे रजतमें अधिष्ठानगत इदंताके संसर्गका भान होता है, वैसे ही रजतज्ञानमें