भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 398

मार्क्स और ज्ञान ६३९ वाचस्पतिमिश्रके मतानुसार 'जीवाश्रित अज्ञानके विषयीभूत ब्रह्मका ही विवर्त्त सम्पूर्ण संसार है। जैसे दर्शकोंसे अविज्ञात मायावी ही अनेक मायिक प्रपञ्चके रूपमें प्रकट होता है, वैसे ही पुरुषसे अज्ञात शुक्तिकादिसे अवच्छिन्न ब्रह्म ही शुक्ति-रजतादिरूपमें विवर्जित होता है । परोक्षवृत्तिसे अज्ञानसम्बन्धी एक आवरणावस्थाकी निवृत्ति होनेपर भी विक्षेपरूप अवस्थान्तर अज्ञान बना रहता है।' अन्य लोगोंका कहना है कि 'शुक्ति-रजतादि परिणाम विषयगत अज्ञानका ही हो सकता है, अतः विषयको आवृत करनेवाले पटके समान विषयगत आवरण ही मानना ठीक है।' कहा जा सकता है कि 'इस तरह अज्ञानका साक्षीके साथ संसर्ग न होनेसे साक्षीके द्वारा उसका प्रकाश नहीं बन सकेगा और परोक्ष-वृत्तिसे विषयसंसर्ग न होनेसे उसकी निवृत्ति भी नहीं बनेगी ।' परन्तु इसका समाधान यह है कि 'शुक्तिमहं न जानामि' यह मूलाज्ञान ही साक्षीसे संसृष्ट है । उसीका साक्षीसे भान होता है । शुक्तिविषयगत अज्ञान मूलाज्ञानका अवस्थाविशेष ही है । शुक्ति आदिका भी मूलाज्ञानके विषयभूत चैतन्यके साथ अभेद होनेसे शुक्तिविषयताका अनुभव उपपन्न हो जायगा । विवरणादिमें मूलाज्ञानके साधन-प्रसङ्गमें 'इदमहं न जानामि' इस रूपसे मूलाज्ञानमें प्रत्यक्ष-प्रमाणका उपन्यास किया गया है। 'अहमज्ञ,' इस प्रकार सामान्यतया अज्ञानका अनुभव मूलाज्ञानका अनुभव माना गया है । 'शुक्तिमहं न जानामि' इत्यादि विषय-विशेषके अज्ञानका अनुभव अवस्था-अज्ञानका ही अनुभव है। फिर भी अवस्था-अवस्थावान्‌का अभेद होनेसे मूलाज्ञानका साक्षिसंसर्ग होनेसे ही अवस्था-ज्ञानका भी भान बन जाता है। अथवा विषयचैतन्य तथा साक्षिचैतन्य, दोनोंका अभेद होनेसे अवस्थाज्ञान भी साक्षिचैतन्यका विषय समझा जा सकता है। परोक्ष-ज्ञान यद्यपि विषयसंसर्ग न होनेसे अज्ञानका निवर्त्तक नहीं है, तथापि सत्ता निश्चय परोक्षवृत्त्यात्मक प्रतिबन्धके कारण अज्ञानके अनुभवकी भ्रान्ति होती है, अतः अपरोक्षज्ञान ही अज्ञानका निवर्त्तक होता है। परन्तु अविद्या-अहंकार सुख-दुःखादि- विषयक अपरोक्षज्ञानमें भी अज्ञाननिवर्त्तकता नहीं होती, क्योंकि ये सब सदा ही साक्षिभाष्य होते हैं, कभी भी अज्ञात नहीं रहते। कूटस्थ, व्यापकचैतन्यसे वृत्तियाँ तथा वृत्तियोंका अभाव भासित होता है। अहंकार आदिका सदा ही साक्षिरूप प्रकाशसे संसर्ग रहता है, अतः वे सदा ही भासमान रहते हैं। अन्य ज्ञानधाराकालमें 'अहम्' भासित ही रहता है। अतएव 'एतावन्तं कालमिदमहं पश्यन्नेवासम्' (इतने कालतक मैं इसे देखता ही रहा ) इस प्रकार अहंकारका अनुसन्धान होता है। जैसे, राहुका प्रकाश राहुसमावृत सूर्य-चन्द्रद्वारा ही होता है, वैसे ही अविद्याका प्रकाश अविद्यावृत साक्षिचेतनद्वारा ही होता है । साक्षीके नित्य होनेपर भी वृत्तिके नाशसे संस्कार और स्मृति हो सकेगी । अनवस्था- भयसे वृत्तिगोचर वृत्ति न माननेपर भी वृत्तिके नाशसे ही तद्गोचर संस्कार आदि