मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४० मार्क्सवाद और रामराज्य उपपन्न होते हैं । सुख-दुःखादिके ही नाशसे तद्गोचर सस्कार बन सकेगा । साक्षिचैतन्य स्वतः नित्य होनेपर भी भास्य विशिष्टरूपसे अनित्य है, अतः भास्यके नाशसे तद्विशिष्ट चैतन्यका भी नाश होता है । उसीसे सस्कार, स्मृति आदि बन सकेंगे । अन्य लोग सौषुप्त अज्ञान-सुखादिग्राहक अविद्यावृत्तिके समान अहंकार-सुखादिकी स्मृतिके लिये अविद्या-वृत्ति मानते हैं । उसीके नाशसे सस्कारादि बनते हैं । इस पक्षमें यह कहा जा सकता है कि ‘एतावन्तं कालमिद- महं पश्यन्नेवासम्’ ( इतने समयतक मैं इसे देखता ही रहा ) इस प्रकार विषयज्ञानधाराके साथ अहंकार-ज्ञानकी धारा कैसे बन सकेगी ?’ परंतु यह कोई दोष नहीं है, क्योकि ‘शिरसि मे दु खं पादयोर्मे सुखम्’ ( मेरे सिरमें दुःख है, पैरमें सुख है ) इस तरह जैसे अवच्छेदकके भेदसे सुख-दुःखका यौगपद्य हो सकता है, वैसे ही अहमाकारवृत्ति और इदमाकारवृत्ति--दोनो ही एक साथ रह सकती हैं । कुछ लोग कहते हैं कि ‘अहमाकारवृत्ति अविद्या-वृत्ति नहीं है, किंतु उपास्तिके तुल्य मनोवृत्ति है, ज्ञान नही । ‘सोऽह’ इस प्रत्यभिज्ञामे भी तदंशमें स्मृति है, अहमंशमें ज्ञान नही है । अहमाकारवृत्ति ज्ञान इसलिये नही है कि ज्ञान करण चक्षु-श्रोत्रादि तथा लिङ्गादिसे जन्य नहीं है । मन स्वयं ज्ञानका उपादान है, वह करण नही हो सकता । जैसे ‘पर्वते वह्निमनुमिनोमि’ इस ज्ञानमें परोक्षता- अपरोक्षता दोनो होती है । ‘इदं रजतम्’ इस ज्ञानमें अंशभेदसे जैसे प्रमात्व-अप्रमात्व सम्भव है, वैसे ही ‘सोऽहं’ इस प्रत्यभिज्ञामे भी अंशभेदसे ज्ञानत्व-अज्ञानत्व ( ज्ञानभिन्नत्व ) भी सम्भव है । अन्य लोग मनको इन्द्रिय मानते हैं, अतः ‘मामह जानामि’ इस प्रकारकी वृत्ति ज्ञान ही है, अतएव बाह्यविषयक अपरोक्ष- वृत्ति आवरणकी अभिभावक होती है । इस सम्बन्धमें भी विवाद यह है कि शुक्तिमें ‘इदं रजतम्’ ज्ञान होता है । यहाँ इदमाकार अपरोक्ष वृत्ति होती है, फिर भी इदमंशका आवरण अभिभूत नहीं होता । यदि ऐसा होता, तो शुक्तिमें रजतका अध्यास न होता ।’ इसका कुछ लोग समाधान यह करते हैं कि ‘इदमाकारवृत्ति- से शुक्तीदमंशविषयक अज्ञान निवृत्त होता है । परंतु शुक्तित्व विशेपका अज्ञान निवृत्त नहीं होता । उसी अज्ञानसे रजतका भ्रम होता है, क्योकि शुक्तित्वके अज्ञानसे ही रजतभ्रम होता है । शुक्तित्वज्ञानसे ही रजतभ्रम दूर होता है, अतः शुक्तित्वके अज्ञानसे ही अनिर्वचनीय रजतकी उत्पत्ति होती है । इसीलिये ‘इदं रजतम्’ इस भ्रममें इदमशका स्फुरण होता है । रजतभ्रममें शुक्त्यंश अधिष्ठान है, इदमंश आधार है । सकार्य अज्ञानका विषय अधिष्ठान है । अतद्रूप भी तद्रूपसे आरोप्य बुद्धिमें स्फुरित होते हुए आधार कहा जाता है—‘संसिद्धा सविलासमोहविषये वस्तुन्यधिष्ठानगीर्नोर्धारेध्यसनत्य वस्तुनि ततोऽस्थाने महान्सम्भ्रमः’ ( सक्षेप शारीरक ३ । २३९ )