मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमार्क्स और ज्ञान ६४१ अन्य लोगोंका मत है कि 'इदमंशाज्ञान'का ही परिणाम रजत है; अतएव 'इदं रजतम्' इस तरह 'इदम्' से संसृष्ट ही रजत प्रतीत होता है। इदमाकारवृत्तिसे आवरण शक्तिमात्रकी निवृत्ति होती है। फिर भी विक्षेप-शक्तिके साथ अज्ञान बना रहता है। वही कल्पित रजतका उपादान है। अधिष्ठान-साक्षात्कारसे अधिष्ठानाज्ञान निवृत्त हो जानेपर भी विक्षेप-शक्तिसहित अज्ञान ही जलप्रति- बिम्बित वृक्षका अधोऽग्रत्वाध्यास तथा जीवन्मुक्तिमे अनुवृत्त प्रपञ्चाध्यासका उपादान होता है।' कुछ आचार्य कहते हैं कि " 'इदं रजतम्' यह ज्ञान भ्रमात्मक है। इसमें इदमाकार-ज्ञान प्रमाणज्ञान नहीं है। 'इदं रजतम्' इस भ्रममें दो ज्ञानोका अनुभव नहीं होता है; अतएव 'इदं' यह प्रमाणज्ञान है, 'रजतम्' यह भ्रमात्मक ज्ञान है।" परंतु यह पक्ष संगत नहीं है; क्योंकि सामान्य-विशेष संसर्गविषयक यहाँ एक ही ज्ञान है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि अधिष्ठान-सामान्यज्ञान अध्यासका कारण है, अतः अध्यास देखकर उसके कारणभूत इदंवृत्तिकी कल्पना करनी चाहिये, क्योंकि अधिष्ठान-सामान्यज्ञान अध्यासका हेतु है ही नहीं। कहा जा सकता है कि 'अधिष्ठान सम्प्रयोगके बिना प्रातिभासिक रजतकी उत्पत्ति नहीं होती। यही इदंवृत्तिके होनेमें प्रमाण है।' परंतु यह ठीक नहीं है। इससे इतना ही सिद्ध होता है कि दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोग ही अध्यासका कारण है। यह भी शङ्का होती हे कि 'इन्द्रिय-सम्प्रयोग सभी भ्रमोंमें कारण नहीं है; क्योंकि अहंकारके अध्यास- में इन्द्रिय-सम्प्रयोग अपेक्षित है ही नही। अतः अधिष्ठान-सामान्यज्ञानको ही अध्यासका हेतु मानना ठीक है। रजतादि अध्यासमें इन्द्रियसे शुक्तिके इदमंशका ज्ञान होता है। अहंकाराध्यासमे स्वतः प्रकाशमान प्रत्यगात्माका सामान्य-ज्ञान हेतु है।' परंतु यह भी ठीक नही है, क्योंकि घटादिके अध्यासमें अधिष्ठान- सामान्यज्ञान नहीं होता है; क्योंकि घटादि प्रत्यक्ष होनेके पहिले घटादिके अधिष्ठानभूत नीरूप ब्रह्ममात्र गोचर चाक्षुष वृत्तिका उत्पन्न होना असम्भव ही है। स्वरूप-प्रकाश तो आवृत ही रहता है। यदि कहा जाय कि 'आवृत-अनावृत साधारण अधिष्ठान प्रकाशमात्र अध्यासका कारण है,' तब तो शुक्तिके इदमंशसे इन्द्रियसम्प्रयोग हुए बिना भी आवृत शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्य रहता ही है, अतः उस समय भी शुक्तिमें रजतका अध्यास होना चाहिये यह भी नहीं कहा जा सकता कि 'अध्यास-सामान्यमें अधिष्ठान-प्रकाश सामान्य हेतु है और प्रातिभासिक अध्यासमें अभिव्यक्त अधिष्ठान-प्रकाश हेतु है, इसलिये कहीं दोष न आयेगा। सामान्यमें सामान्य और विशेषमें विशेष हेतु होता ही है,' क्योंकि 'पीतः शङ्खः, नीलं कृपजलम्' इत्यादि प्रातिभासिक अध्यासोंमें भी अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाश नहीं होता है। रूपके बिना चाक्षुषज्ञान नही होता। शङ्खादिगत शुक्ल-रूपका उपलब्ध उस समय हे ही नहीं। अध्यासके पहले नीरूप शङ्खादि गोचरवृत्ति असम्भव ही है। यदि यह माना जाय कि 'प्रातिभासिक भ्रमोंमें भी रजतादि