भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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६३८ मार्क्सवाद और रामराज्य

अनुभूत नहीं होता । किंतु 'इस समय वह कहाँ है, यह मैं नहीं जानता' इस तरह कालादिविशिष्टविषयक ही आवरणका अनुभव होता है । भले विस्मृतिशालीको एक बार अनुभवके अनन्तर भी स्वरूपावरणकी अनुभूति हो, परंतु अन्यत्र द्वितीयादिज्ञान विशिष्टविषयक ही होते हैं।' कहा जा सकता है कि 'इस तरह तो धारावाहिक ज्ञानस्थलमें द्वितीयादिज्ञान अज्ञाननिवर्तक न होंगे; क्योंकि स्थूल- कालविशिष्टाज्ञान प्रथमज्ञानसे ही निवृत्त हो चुका है । पूर्वापरज्ञानोसे व्यावृत्त सूक्ष्म कालादिविशिष्टाज्ञानकी निवृत्ति द्वितीयादिज्ञानसे हो ही नहीं सकती; क्योकि सूक्ष्मकाल द्वितीयादिज्ञानके विषय ही नहीं हैं।' परंतु धारावाहिक स्थलमें प्रथमोत्पन्न एक ही वृत्ति तावत्काल स्थायीरूपसे मान्य है, अतः वहाँ वृत्तिभेद है ही नहीं। वृत्तिभेद माननेपर भी बहुकालावस्थायी वृत्ति मान्य होती है, अतः स्थूलकालादिविशिष्ट ही वस्तुका अज्ञान निवृत्त होता है । प्रतिक्षण उत्पन्न होनेवाली अनेक वृत्तियोंकी ही यदि धारा मानी जाय, तब तो द्वितीयादिज्ञान ज्ञातविषयक ही होनेसे प्रमाण नहीं हैं । अतः आवरण-निवर्तक न भी हो, तो भी कोई हर्ज नहीं । 'विवरण'कारने साक्षिसिद्ध अज्ञानको ज्ञानाभावभिन्न सिद्ध करनेके लिये अनुमानादि-वेद्य बतलाकर भी अज्ञानको प्रमाणवेद्य इसीलिये कहा है कि अज्ञात- ज्ञापक ही प्रमाण मान्य होता है, अज्ञान सदा ही साक्षिवेद्य होनेसे अज्ञात नहीं है, अतः अनुमानागमादि-वेद्य होनेपर भी वह प्रमाणवेद्य माना जाता है । इसलिये द्वितीयादि वृत्तियाँ उपासनादि वृत्तियोंके तुल्य अज्ञाननिवर्तक न भी हो, तो भी कोई हानि नहीं । प्रमाणवृत्तियोंके ही अज्ञाननिवर्त्तनका नियम होता है । विषयावरक अज्ञान दो प्रकारका मान्य होता है—एक विषयाश्रित होता है, जो कि अनिर्वचनीय रज्जु-सर्पादिका उपादान होता है । अनिर्वचनीयकार्यके उपादानरूपसे उसकी सिद्धि होती है। दूसरा विषयावरक अज्ञान पुरुषमें 'इद- मह न जानामि' ( इसे मै नहीं जानता ) इस रूपसे अनुभूत होता है । पुरुषाश्रित अज्ञान विषयाश्रित सर्पादि विक्षेपका उपादान नहीं हो सकता और विषयाश्रित अज्ञानका प्रकाशरूप साक्षीके साथ संसर्ग नहीं हो सकता, अतः दोनों ही अज्ञान मानना उचित है । परोक्षज्ञानस्थलमें वृत्ति बाहर नहीं जाती, अतः दूरस्थ वृक्षोंमें आप्तवाक्यसे परिमाण-विशेषका ज्ञान होनेसे यद्यपि पुरुषगत अज्ञान नष्ट हो जाता है, तथापि विषयगत अज्ञान नहीं मिटता, अतः उनमें विपरीत परिमाण-भ्रम देखा जाता है । उपदेशके अनन्तर 'शास्त्रार्थे न जानामि' इत्याकारक अज्ञानकी निवृत्ति देखी ही जाती है । अन्य लोगोंका कहना है कि 'जैसे नेत्रगत काचादि दोष विषयको आवृत करते हैं, वैसे ही पुरुषाश्रित अज्ञान ही विषयका आवरक होता है।'