भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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सूक्ष्मरूपसे घटादि सदा ही रहते हैं अतः उनका आवरण सदा ही हो सकता है । उनके मतानुसार एक ज्ञानसे एक अज्ञानका नाश होता है, अन्योंका अविभव होता है । जैसे 'बहुजनसमाकुल प्रदेशमें एकके ऊपर भी वज्र पड़नेपर दूसरोंका अपसारण हो जाता है, वैसे ही प्रकृतमे भी समझना चाहिये । अथवा जैसे सन्निपातहर औषध एक दोषको हटाता हुआ इतर दोषोंको भी हटाता है, वैसे ही एक अज्ञानको नष्ट करता हुआ भी ज्ञान इतर अज्ञानोंको भी तिरस्कृत करता है । जबतक ज्ञान रहता है तबतक आवरणशक्तिका प्रतिबन्ध ही उनका तिरस्कार है । कहा जा सकता है कि 'धारावाहिक ज्ञानस्थलमें प्रथम वृत्तिके द्वारा अज्ञानका निवारण होगा । परन्तु द्वितीय आदि वृत्तियाँ अज्ञानकी निवारक न होंगी, क्योंकि प्रथम ज्ञानसे ही एक अज्ञानका निवारण और अन्योंका तिरस्कार सम्पन्न है ।' परन्तु इसका समाधान कुछ लोग यह करते हैं कि 'जैसे दीपधारा तमको तिरस्कृत करके स्थित रहती है, वैसे ही वृत्तिधारा भी अज्ञानको तिरस्कृत करके स्थिर होती है । जैसे प्रदीप तिरस्कृत भी तम प्रदीपके उपरत होनेपर पुनः प्रवृत्त होता है, वैसे ही वृत्ति-तिरस्कृत भी अज्ञान-वृत्तिके उपरत होनेपर पुनः विषयको आवृत्त करता है, परन्तु वृत्त्यन्तरोंके उदय होनेपर तिरस्कृत ही रह जाता है, जैसे प्रदीपान्तरके उदय होनेपर तम तिरस्कृत ही रहता है। जिसके रहनेपर अग्रिम क्षणमें जिसका सत्त्व रहता है, जिसके अभावमें जिसका असत्त्व रहता है, वह तज्जन्य मान्य होता है । तथा च प्रदीपधारासे तमके प्रागभावका पालन जैसे सम्पन्न होता है, वैसे ही वृत्ति-परम्परासे अनावरणका परिपालन होता है । वही द्वितीय आदि वृत्तिका फल है ।' कुछ लोगोंके मतानुसार 'पर्यायसे ही अज्ञानविषयको आवृत्त करते हैं, अतः ज्ञान स्वकालके ही आवरक अज्ञानका नाश करता है । इसलिये धारावाहिक ज्ञानस्थलमें द्वितीयादि वृत्तियाँ भी अज्ञानकी नाशक हैं ।' इस पक्षमें कहा जा सकता है कि 'यदि ज्ञानोदयकालमें भी अज्ञान रहता है, तो विषयका आवरण भी सम्भव है ।' परन्तु इसका समाधान यह है कि अवस्थारूप अज्ञान तत्तत्कालोपलक्षितस्वरूपका ही आवरण करते हैं । ज्ञान भी स्वकालोपलक्षितविषयावरक अज्ञानका नाश करते हैं तथा च किसी ज्ञानके उदय होनेपर तत्कालीन विषयावरक अज्ञानका ही नाश होता है । विद्यमान भी अज्ञान अन्यकालीन विषयोंके ही आवरक होते हैं, इसलिये तत्कालीन विषयावभासमे कोई अनुपपत्ति नहीं हो सकती । कुछ लोग कहते हैं कि 'आद्य घटादिज्ञानसे घटादिके अज्ञान नष्ट होते हैं । द्वितीयादि ज्ञानोंसे तो कालविशिष्ट वस्तु-विषयक अज्ञानकी ही निवृत्ति होती है । अतएव एक बार चैत्र-ज्ञान होनेपर 'चैत्र न जानामि' इस प्रकार स्वरूपावरण