मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
सूक्ष्मरूपसे घटादि सदा ही रहते हैं अतः उनका आवरण सदा ही हो सकता है । उनके मतानुसार एक ज्ञानसे एक अज्ञानका नाश होता है, अन्योंका अविभव होता है । जैसे 'बहुजनसमाकुल प्रदेशमें एकके ऊपर भी वज्र पड़नेपर दूसरोंका अपसारण हो जाता है, वैसे ही प्रकृतमे भी समझना चाहिये । अथवा जैसे सन्निपातहर औषध एक दोषको हटाता हुआ इतर दोषोंको भी हटाता है, वैसे ही एक अज्ञानको नष्ट करता हुआ भी ज्ञान इतर अज्ञानोंको भी तिरस्कृत करता है । जबतक ज्ञान रहता है तबतक आवरणशक्तिका प्रतिबन्ध ही उनका तिरस्कार है । कहा जा सकता है कि 'धारावाहिक ज्ञानस्थलमें प्रथम वृत्तिके द्वारा अज्ञानका निवारण होगा । परन्तु द्वितीय आदि वृत्तियाँ अज्ञानकी निवारक न होंगी, क्योंकि प्रथम ज्ञानसे ही एक अज्ञानका निवारण और अन्योंका तिरस्कार सम्पन्न है ।' परन्तु इसका समाधान कुछ लोग यह करते हैं कि 'जैसे दीपधारा तमको तिरस्कृत करके स्थित रहती है, वैसे ही वृत्तिधारा भी अज्ञानको तिरस्कृत करके स्थिर होती है । जैसे प्रदीप तिरस्कृत भी तम प्रदीपके उपरत होनेपर पुनः प्रवृत्त होता है, वैसे ही वृत्ति-तिरस्कृत भी अज्ञान-वृत्तिके उपरत होनेपर पुनः विषयको आवृत्त करता है, परन्तु वृत्त्यन्तरोंके उदय होनेपर तिरस्कृत ही रह जाता है, जैसे प्रदीपान्तरके उदय होनेपर तम तिरस्कृत ही रहता है। जिसके रहनेपर अग्रिम क्षणमें जिसका सत्त्व रहता है, जिसके अभावमें जिसका असत्त्व रहता है, वह तज्जन्य मान्य होता है । तथा च प्रदीपधारासे तमके प्रागभावका पालन जैसे सम्पन्न होता है, वैसे ही वृत्ति-परम्परासे अनावरणका परिपालन होता है । वही द्वितीय आदि वृत्तिका फल है ।' कुछ लोगोंके मतानुसार 'पर्यायसे ही अज्ञानविषयको आवृत्त करते हैं, अतः ज्ञान स्वकालके ही आवरक अज्ञानका नाश करता है । इसलिये धारावाहिक ज्ञानस्थलमें द्वितीयादि वृत्तियाँ भी अज्ञानकी नाशक हैं ।' इस पक्षमें कहा जा सकता है कि 'यदि ज्ञानोदयकालमें भी अज्ञान रहता है, तो विषयका आवरण भी सम्भव है ।' परन्तु इसका समाधान यह है कि अवस्थारूप अज्ञान तत्तत्कालोपलक्षितस्वरूपका ही आवरण करते हैं । ज्ञान भी स्वकालोपलक्षितविषयावरक अज्ञानका नाश करते हैं तथा च किसी ज्ञानके उदय होनेपर तत्कालीन विषयावरक अज्ञानका ही नाश होता है । विद्यमान भी अज्ञान अन्यकालीन विषयोंके ही आवरक होते हैं, इसलिये तत्कालीन विषयावभासमे कोई अनुपपत्ति नहीं हो सकती । कुछ लोग कहते हैं कि 'आद्य घटादिज्ञानसे घटादिके अज्ञान नष्ट होते हैं । द्वितीयादि ज्ञानोंसे तो कालविशिष्ट वस्तु-विषयक अज्ञानकी ही निवृत्ति होती है । अतएव एक बार चैत्र-ज्ञान होनेपर 'चैत्र न जानामि' इस प्रकार स्वरूपावरण
६३८ मार्क्सवाद और रामराज्य
अनुभूत नहीं होता । किंतु 'इस समय वह कहाँ है, यह मैं नहीं जानता' इस तरह कालादिविशिष्टविषयक ही आवरणका अनुभव होता है । भले विस्मृतिशालीको एक बार अनुभवके अनन्तर भी स्वरूपावरणकी अनुभूति हो, परंतु अन्यत्र द्वितीयादिज्ञान विशिष्टविषयक ही होते हैं।' कहा जा सकता है कि 'इस तरह तो धारावाहिक ज्ञानस्थलमें द्वितीयादिज्ञान अज्ञाननिवर्तक न होंगे; क्योंकि स्थूल- कालविशिष्टाज्ञान प्रथमज्ञानसे ही निवृत्त हो चुका है । पूर्वापरज्ञानोसे व्यावृत्त सूक्ष्म कालादिविशिष्टाज्ञानकी निवृत्ति द्वितीयादिज्ञानसे हो ही नहीं सकती; क्योकि सूक्ष्मकाल द्वितीयादिज्ञानके विषय ही नहीं हैं।' परंतु धारावाहिक स्थलमें प्रथमोत्पन्न एक ही वृत्ति तावत्काल स्थायीरूपसे मान्य है, अतः वहाँ वृत्तिभेद है ही नहीं। वृत्तिभेद माननेपर भी बहुकालावस्थायी वृत्ति मान्य होती है, अतः स्थूलकालादिविशिष्ट ही वस्तुका अज्ञान निवृत्त होता है । प्रतिक्षण उत्पन्न होनेवाली अनेक वृत्तियोंकी ही यदि धारा मानी जाय, तब तो द्वितीयादिज्ञान ज्ञातविषयक ही होनेसे प्रमाण नहीं हैं । अतः आवरण-निवर्तक न भी हो, तो भी कोई हर्ज नहीं । 'विवरण'कारने साक्षिसिद्ध अज्ञानको ज्ञानाभावभिन्न सिद्ध करनेके लिये अनुमानादि-वेद्य बतलाकर भी अज्ञानको प्रमाणवेद्य इसीलिये कहा है कि अज्ञात- ज्ञापक ही प्रमाण मान्य होता है, अज्ञान सदा ही साक्षिवेद्य होनेसे अज्ञात नहीं है, अतः अनुमानागमादि-वेद्य होनेपर भी वह प्रमाणवेद्य माना जाता है । इसलिये द्वितीयादि वृत्तियाँ उपासनादि वृत्तियोंके तुल्य अज्ञाननिवर्तक न भी हो, तो भी कोई हानि नहीं । प्रमाणवृत्तियोंके ही अज्ञाननिवर्त्तनका नियम होता है । विषयावरक अज्ञान दो प्रकारका मान्य होता है—एक विषयाश्रित होता है, जो कि अनिर्वचनीय रज्जु-सर्पादिका उपादान होता है । अनिर्वचनीयकार्यके उपादानरूपसे उसकी सिद्धि होती है। दूसरा विषयावरक अज्ञान पुरुषमें 'इद- मह न जानामि' ( इसे मै नहीं जानता ) इस रूपसे अनुभूत होता है । पुरुषाश्रित अज्ञान विषयाश्रित सर्पादि विक्षेपका उपादान नहीं हो सकता और विषयाश्रित अज्ञानका प्रकाशरूप साक्षीके साथ संसर्ग नहीं हो सकता, अतः दोनों ही अज्ञान मानना उचित है । परोक्षज्ञानस्थलमें वृत्ति बाहर नहीं जाती, अतः दूरस्थ वृक्षोंमें आप्तवाक्यसे परिमाण-विशेषका ज्ञान होनेसे यद्यपि पुरुषगत अज्ञान नष्ट हो जाता है, तथापि विषयगत अज्ञान नहीं मिटता, अतः उनमें विपरीत परिमाण-भ्रम देखा जाता है । उपदेशके अनन्तर 'शास्त्रार्थे न जानामि' इत्याकारक अज्ञानकी निवृत्ति देखी ही जाती है । अन्य लोगोंका कहना है कि 'जैसे नेत्रगत काचादि दोष विषयको आवृत करते हैं, वैसे ही पुरुषाश्रित अज्ञान ही विषयका आवरक होता है।'
मार्क्स और ज्ञान ६३९ वाचस्पतिमिश्रके मतानुसार 'जीवाश्रित अज्ञानके विषयीभूत ब्रह्मका ही विवर्त्त सम्पूर्ण संसार है। जैसे दर्शकोंसे अविज्ञात मायावी ही अनेक मायिक प्रपञ्चके रूपमें प्रकट होता है, वैसे ही पुरुषसे अज्ञात शुक्तिकादिसे अवच्छिन्न ब्रह्म ही शुक्ति-रजतादिरूपमें विवर्जित होता है । परोक्षवृत्तिसे अज्ञानसम्बन्धी एक आवरणावस्थाकी निवृत्ति होनेपर भी विक्षेपरूप अवस्थान्तर अज्ञान बना रहता है।' अन्य लोगोंका कहना है कि 'शुक्ति-रजतादि परिणाम विषयगत अज्ञानका ही हो सकता है, अतः विषयको आवृत करनेवाले पटके समान विषयगत आवरण ही मानना ठीक है।' कहा जा सकता है कि 'इस तरह अज्ञानका साक्षीके साथ संसर्ग न होनेसे साक्षीके द्वारा उसका प्रकाश नहीं बन सकेगा और परोक्ष-वृत्तिसे विषयसंसर्ग न होनेसे उसकी निवृत्ति भी नहीं बनेगी ।' परन्तु इसका समाधान यह है कि 'शुक्तिमहं न जानामि' यह मूलाज्ञान ही साक्षीसे संसृष्ट है । उसीका साक्षीसे भान होता है । शुक्तिविषयगत अज्ञान मूलाज्ञानका अवस्थाविशेष ही है । शुक्ति आदिका भी मूलाज्ञानके विषयभूत चैतन्यके साथ अभेद होनेसे शुक्तिविषयताका अनुभव उपपन्न हो जायगा । विवरणादिमें मूलाज्ञानके साधन-प्रसङ्गमें 'इदमहं न जानामि' इस रूपसे मूलाज्ञानमें प्रत्यक्ष-प्रमाणका उपन्यास किया गया है। 'अहमज्ञ,' इस प्रकार सामान्यतया अज्ञानका अनुभव मूलाज्ञानका अनुभव माना गया है । 'शुक्तिमहं न जानामि' इत्यादि विषय-विशेषके अज्ञानका अनुभव अवस्था-अज्ञानका ही अनुभव है। फिर भी अवस्था-अवस्थावान्का अभेद होनेसे मूलाज्ञानका साक्षिसंसर्ग होनेसे ही अवस्था-ज्ञानका भी भान बन जाता है। अथवा विषयचैतन्य तथा साक्षिचैतन्य, दोनोंका अभेद होनेसे अवस्थाज्ञान भी साक्षिचैतन्यका विषय समझा जा सकता है। परोक्ष-ज्ञान यद्यपि विषयसंसर्ग न होनेसे अज्ञानका निवर्त्तक नहीं है, तथापि सत्ता निश्चय परोक्षवृत्त्यात्मक प्रतिबन्धके कारण अज्ञानके अनुभवकी भ्रान्ति होती है, अतः अपरोक्षज्ञान ही अज्ञानका निवर्त्तक होता है। परन्तु अविद्या-अहंकार सुख-दुःखादि- विषयक अपरोक्षज्ञानमें भी अज्ञाननिवर्त्तकता नहीं होती, क्योंकि ये सब सदा ही साक्षिभाष्य होते हैं, कभी भी अज्ञात नहीं रहते। कूटस्थ, व्यापकचैतन्यसे वृत्तियाँ तथा वृत्तियोंका अभाव भासित होता है। अहंकार आदिका सदा ही साक्षिरूप प्रकाशसे संसर्ग रहता है, अतः वे सदा ही भासमान रहते हैं। अन्य ज्ञानधाराकालमें 'अहम्' भासित ही रहता है। अतएव 'एतावन्तं कालमिदमहं पश्यन्नेवासम्' (इतने कालतक मैं इसे देखता ही रहा ) इस प्रकार अहंकारका अनुसन्धान होता है। जैसे, राहुका प्रकाश राहुसमावृत सूर्य-चन्द्रद्वारा ही होता है, वैसे ही अविद्याका प्रकाश अविद्यावृत साक्षिचेतनद्वारा ही होता है । साक्षीके नित्य होनेपर भी वृत्तिके नाशसे संस्कार और स्मृति हो सकेगी । अनवस्था- भयसे वृत्तिगोचर वृत्ति न माननेपर भी वृत्तिके नाशसे ही तद्गोचर संस्कार आदि
६४० मार्क्सवाद और रामराज्य उपपन्न होते हैं । सुख-दुःखादिके ही नाशसे तद्गोचर सस्कार बन सकेगा । साक्षिचैतन्य स्वतः नित्य होनेपर भी भास्य विशिष्टरूपसे अनित्य है, अतः भास्यके नाशसे तद्विशिष्ट चैतन्यका भी नाश होता है । उसीसे सस्कार, स्मृति आदि बन सकेंगे । अन्य लोग सौषुप्त अज्ञान-सुखादिग्राहक अविद्यावृत्तिके समान अहंकार-सुखादिकी स्मृतिके लिये अविद्या-वृत्ति मानते हैं । उसीके नाशसे सस्कारादि बनते हैं । इस पक्षमें यह कहा जा सकता है कि ‘एतावन्तं कालमिद- महं पश्यन्नेवासम्’ ( इतने समयतक मैं इसे देखता ही रहा ) इस प्रकार विषयज्ञानधाराके साथ अहंकार-ज्ञानकी धारा कैसे बन सकेगी ?’ परंतु यह कोई दोष नहीं है, क्योकि ‘शिरसि मे दु खं पादयोर्मे सुखम्’ ( मेरे सिरमें दुःख है, पैरमें सुख है ) इस तरह जैसे अवच्छेदकके भेदसे सुख-दुःखका यौगपद्य हो सकता है, वैसे ही अहमाकारवृत्ति और इदमाकारवृत्ति--दोनो ही एक साथ रह सकती हैं । कुछ लोग कहते हैं कि ‘अहमाकारवृत्ति अविद्या-वृत्ति नहीं है, किंतु उपास्तिके तुल्य मनोवृत्ति है, ज्ञान नही । ‘सोऽह’ इस प्रत्यभिज्ञामे भी तदंशमें स्मृति है, अहमंशमें ज्ञान नही है । अहमाकारवृत्ति ज्ञान इसलिये नही है कि ज्ञान करण चक्षु-श्रोत्रादि तथा लिङ्गादिसे जन्य नहीं है । मन स्वयं ज्ञानका उपादान है, वह करण नही हो सकता । जैसे ‘पर्वते वह्निमनुमिनोमि’ इस ज्ञानमें परोक्षता- अपरोक्षता दोनो होती है । ‘इदं रजतम्’ इस ज्ञानमें अंशभेदसे जैसे प्रमात्व-अप्रमात्व सम्भव है, वैसे ही ‘सोऽहं’ इस प्रत्यभिज्ञामे भी अंशभेदसे ज्ञानत्व-अज्ञानत्व ( ज्ञानभिन्नत्व ) भी सम्भव है । अन्य लोग मनको इन्द्रिय मानते हैं, अतः ‘मामह जानामि’ इस प्रकारकी वृत्ति ज्ञान ही है, अतएव बाह्यविषयक अपरोक्ष- वृत्ति आवरणकी अभिभावक होती है । इस सम्बन्धमें भी विवाद यह है कि शुक्तिमें ‘इदं रजतम्’ ज्ञान होता है । यहाँ इदमाकार अपरोक्ष वृत्ति होती है, फिर भी इदमंशका आवरण अभिभूत नहीं होता । यदि ऐसा होता, तो शुक्तिमें रजतका अध्यास न होता ।’ इसका कुछ लोग समाधान यह करते हैं कि ‘इदमाकारवृत्ति- से शुक्तीदमंशविषयक अज्ञान निवृत्त होता है । परंतु शुक्तित्व विशेपका अज्ञान निवृत्त नहीं होता । उसी अज्ञानसे रजतका भ्रम होता है, क्योकि शुक्तित्वके अज्ञानसे ही रजतभ्रम होता है । शुक्तित्वज्ञानसे ही रजतभ्रम दूर होता है, अतः शुक्तित्वके अज्ञानसे ही अनिर्वचनीय रजतकी उत्पत्ति होती है । इसीलिये ‘इदं रजतम्’ इस भ्रममें इदमशका स्फुरण होता है । रजतभ्रममें शुक्त्यंश अधिष्ठान है, इदमंश आधार है । सकार्य अज्ञानका विषय अधिष्ठान है । अतद्रूप भी तद्रूपसे आरोप्य बुद्धिमें स्फुरित होते हुए आधार कहा जाता है—‘संसिद्धा सविलासमोहविषये वस्तुन्यधिष्ठानगीर्नोर्धारेध्यसनत्य वस्तुनि ततोऽस्थाने महान्सम्भ्रमः’ ( सक्षेप शारीरक ३ । २३९ )
मार्क्स और ज्ञान ६४१ अन्य लोगोंका मत है कि 'इदमंशाज्ञान'का ही परिणाम रजत है; अतएव 'इदं रजतम्' इस तरह 'इदम्' से संसृष्ट ही रजत प्रतीत होता है। इदमाकारवृत्तिसे आवरण शक्तिमात्रकी निवृत्ति होती है। फिर भी विक्षेप-शक्तिके साथ अज्ञान बना रहता है। वही कल्पित रजतका उपादान है। अधिष्ठान-साक्षात्कारसे अधिष्ठानाज्ञान निवृत्त हो जानेपर भी विक्षेप-शक्तिसहित अज्ञान ही जलप्रति- बिम्बित वृक्षका अधोऽग्रत्वाध्यास तथा जीवन्मुक्तिमे अनुवृत्त प्रपञ्चाध्यासका उपादान होता है।' कुछ आचार्य कहते हैं कि " 'इदं रजतम्' यह ज्ञान भ्रमात्मक है। इसमें इदमाकार-ज्ञान प्रमाणज्ञान नहीं है। 'इदं रजतम्' इस भ्रममें दो ज्ञानोका अनुभव नहीं होता है; अतएव 'इदं' यह प्रमाणज्ञान है, 'रजतम्' यह भ्रमात्मक ज्ञान है।" परंतु यह पक्ष संगत नहीं है; क्योंकि सामान्य-विशेष संसर्गविषयक यहाँ एक ही ज्ञान है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि अधिष्ठान-सामान्यज्ञान अध्यासका कारण है, अतः अध्यास देखकर उसके कारणभूत इदंवृत्तिकी कल्पना करनी चाहिये, क्योंकि अधिष्ठान-सामान्यज्ञान अध्यासका हेतु है ही नहीं। कहा जा सकता है कि 'अधिष्ठान सम्प्रयोगके बिना प्रातिभासिक रजतकी उत्पत्ति नहीं होती। यही इदंवृत्तिके होनेमें प्रमाण है।' परंतु यह ठीक नहीं है। इससे इतना ही सिद्ध होता है कि दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोग ही अध्यासका कारण है। यह भी शङ्का होती हे कि 'इन्द्रिय-सम्प्रयोग सभी भ्रमोंमें कारण नहीं है; क्योंकि अहंकारके अध्यास- में इन्द्रिय-सम्प्रयोग अपेक्षित है ही नही। अतः अधिष्ठान-सामान्यज्ञानको ही अध्यासका हेतु मानना ठीक है। रजतादि अध्यासमें इन्द्रियसे शुक्तिके इदमंशका ज्ञान होता है। अहंकाराध्यासमे स्वतः प्रकाशमान प्रत्यगात्माका सामान्य-ज्ञान हेतु है।' परंतु यह भी ठीक नही है, क्योंकि घटादिके अध्यासमें अधिष्ठान- सामान्यज्ञान नहीं होता है; क्योंकि घटादि प्रत्यक्ष होनेके पहिले घटादिके अधिष्ठानभूत नीरूप ब्रह्ममात्र गोचर चाक्षुष वृत्तिका उत्पन्न होना असम्भव ही है। स्वरूप-प्रकाश तो आवृत ही रहता है। यदि कहा जाय कि 'आवृत-अनावृत साधारण अधिष्ठान प्रकाशमात्र अध्यासका कारण है,' तब तो शुक्तिके इदमंशसे इन्द्रियसम्प्रयोग हुए बिना भी आवृत शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्य रहता ही है, अतः उस समय भी शुक्तिमें रजतका अध्यास होना चाहिये यह भी नहीं कहा जा सकता कि 'अध्यास-सामान्यमें अधिष्ठान-प्रकाश सामान्य हेतु है और प्रातिभासिक अध्यासमें अभिव्यक्त अधिष्ठान-प्रकाश हेतु है, इसलिये कहीं दोष न आयेगा। सामान्यमें सामान्य और विशेषमें विशेष हेतु होता ही है,' क्योंकि 'पीतः शङ्खः, नीलं कृपजलम्' इत्यादि प्रातिभासिक अध्यासोंमें भी अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाश नहीं होता है। रूपके बिना चाक्षुषज्ञान नही होता। शङ्खादिगत शुक्ल-रूपका उपलब्ध उस समय हे ही नहीं। अध्यासके पहले नीरूप शङ्खादि गोचरवृत्ति असम्भव ही है। यदि यह माना जाय कि 'प्रातिभासिक भ्रमोंमें भी रजतादि
६४२ मार्क्सवाद और रामराज्य अध्यासोमे ही अभिव्यक्त अधिष्ठान प्रकाश हेतु है' तो भी ठीक नहीं है, क्योंकि फिर भी ‘पीतः शङ्खः’ इत्यादि स्थलोंमें दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगको हेतु कहना ही पड़ेगा। ऐसी स्थितिमे प्रातिभासिक अध्यासोमें दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगको ही हेतु क्यों न माना जाय ? इसीसे रजताध्यासके कादाचित्कत्वका भी निर्वाह हो जाता है। इसलिये यह नही कहा जा सकता कि सामान्यतया एवं विशेषतया अधिष्ठान प्रकाश अध्यासका कारण है। फिर भी शङ्का होती है कि 'सादृश्यनिरपेक्ष अध्यासोंमें अधिष्ठान-प्रकाश हेतु न भी हो, तो भी सादृश्यसापेक्ष रजतादि अध्यासमें रजतादि सादृश्यभूत भास्वररूप विशेषादिविशिष्ट धर्मिज्ञानको कारण मानना चाहिये। यदि दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगमात्रको अध्यासमें कारण कहा जाय तब तो शुक्तिके तुल्य ही इंगाल (कोयला) में भी रजतादिका अध्यास होना चाहिये।' कुछ लोगोंका कहना है कि 'सादृश्य भी विषयदोषरूपसे ही अध्यासमें कारण है।" परंतु यह ठीक नहीं; क्योकि वि-सदृशमें सादृश्यभ्रमसे भी अध्यास होता है, जैसे कि समुद्रजलमें दूरसे नील शिलातलका अध्यारोप होता है। कुछ लोग सादृश्य-ज्ञान- सामग्रीको ही अध्यासका कारण कहते हैं; परंतु ज्ञान-सामग्री ज्ञानका कारण हो सकती है, अर्थका कारण नहीं । अतः लाघवात् सादृश्य-ज्ञान ही अध्यासका कारण है। कुछ लोग कहते हैं कि 'जैसे स्वतः शुभ्र रजतपात्रगत स्वच्छ जलमें ही नैल्याध्यास होता है, मुक्ताफलमे नैल्याध्यास नही होता, वैसे ही शुक्तिमें ही रजता- ध्यास होता है, इंगालादिमे नही । यह फल-बल-कल्प्य स्वभावभावविशेष ही व्यवस्थाका कारण है। सादृश्यज्ञानका होना-न-होना हेतु नहीं है।' परंतु यह कहना ठीक नहीं, क्योकि स्वतः पटखण्डमें कमल-कुड्मल आदिका अध्यास यद्यपि नही होता तथापि कर्त्तनादिके द्वारा कमलाकार सम्पन्न होनेपर उसी कर्त्तनादिद्वारा कमलाकारघटित पटखण्डमें कमलका अध्यास देखा जाता है। यहाँ वस्तुस्वभावान- पेक्षसादृश्यज्ञान ही अन्वयव्यतिरेकसे अध्यासका हेतु निश्चित होता है। अन्यथा कमलाकाररहित पटखण्डमें भी कमलका भ्रम होना चाहिये। इसपर भी कुछ लोग कहते हैं कि 'सादृश्य-ज्ञानको यदि अध्यासमें कारण माना जाय तो भी विशेष दर्शनप्रतिवध्य रजतादि अध्यासोंमें ही उसे कारण मानना ठीक है।' ‘पीतः शङ्खः’ इत्यादि विशेष दर्शनसे अप्रतिबध्य स्थलोसे सादृश्यज्ञान सम्भव ही नहीं है। विशेष दर्शनसे प्रतिवध्य शुक्ति रजतादि स्थलोंमें प्रतिबन्धक ज्ञान-सामग्रीको प्रतिबन्धक माननेका नियम है। इस दृष्टिसे विशेष दर्शन-सामग्रीको अवश्य प्रति- बन्धक कहना पड़ेगा। इसीसे सब व्यवस्था बन सकती है। फिर सादृश्य-ज्ञानको अध्यासका कारण क्यो माना जाय ? इंगालादिके चक्षुःसम्प्रयुक्त होनेपर उसमें नैल्यादिरूप विशेष दर्शन-सामग्री होनेसे रजतादि अध्यास नही होता। शुक्ति आदिमें भी यदि नीलपृष्ठत्वादिके साथ चक्षुःसम्प्रयोग होता है तो विशेष दर्शन-सामग्री होनेसे रजताध्यास नही होता। सदृशभागमात्रका सम्प्रयोग होनेसे विशेष दर्शन-
सामग्री न होनेके कारण अध्यास होता है। कहा जा सकता है कि 'उस समय भी शुक्तित्वरूप विशेष दर्शनकी सामग्री तो है ही, फिर अध्यास क्यों नहीं होता ?' परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि अध्यास-समयमें भी शुक्तित्व-दर्शनाभावसे तत्सामग्र्यभाव आपको भी मानना ही पड़ेगा। यदि सादृश्य-ज्ञानरूप अध्यास- कारणदोषसे प्रतिबन्धके कारण शुक्तित्व-दर्शन-सामग्र्यभाव मान्य है, तब तो घट्ट- कुटीप्रभातन्यायसे सादृश्य-ज्ञानको अध्यासका कारण मानना ही पड़ा। इसपर दूसरे पक्षका कहना है कि रजताध्याससे समीप आनेपर शुक्तिमे रजतसादृश्यरूप चाकचिक्यके दृश्यमान रहनेपर ही शुक्तित्वका उपलम्भ होता है। इससे सादृश्यज्ञान शुक्तित्वरूप विशेष दर्शनकी सामग्रीका प्रतिबन्धक सिद्ध नहीं हुआ। अतः दूरत्वादि दोषोंसे प्रतिबद्ध होनेसे अथवा शुक्तित्व-व्यञ्जक नीलपृष्ठ- त्वादिग्राहक मानाभावसे विशेष दर्शन-सामग्रीका अभाव मानना पड़ेगा। इसी तरह दूरस्थ समुद्र-जलमें नीलशिलात्वका आरोप हो सकता है; क्योंकि वहाँपर नियत नीलरूपाध्यासके प्रयोजक दोषसे दूरत्वके कारण नीरत्व-व्यञ्जक तरङ्गादि- ग्राहक साधनके संनिहित न होनेसे शुक्लरूप, जलराशित्व आदि विशेषोंके दर्शनकी सामग्रीका अभाव है। विस्तृत वस्त्रमें परिणाहादिरूप विशेष-दर्शनकी सामग्री होनेसे कमलत्वादिका अध्यास नहीं होता है। कर्त्तनादिद्वारा कमलाकारसम्पन्न पटमें विशेष दर्शन-सामग्री न होनेसे कमलत्वादि अध्यास हो जाता है। एक शङ्का यह भी होती है कि अध्यासमें यदि सादृश्य-ज्ञानकी अपेक्षा न हो तो करस्पृष्ट लौहखण्डमें उसके नीलरूपकी ग्राहक विशेष दर्शन सामग्री न होनेसे रजताध्यास क्यों नहीं होता ?' परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि ऐसे स्थलो- में रजताध्यास होता ही है। हाँ, ताम्रादिव्यावर्त्तक विशेष सामग्री न होनेसे ताम्रादि अध्यास भी होता है। कहीं अनेक अध्यास होनेसे अध्यस्तमें संशय भी होता है। 'ताम्र है या रजत है' इत्यादि कहीं रजतप्राय वस्तुपूर्ण कोषगृहादि लौहशकलमें रजतहीका अध्यास होता है। कहीं सादृश्य-ज्ञान रहनेपर भी करणदोष न रहनेसे शुक्तिमें रजताध्यास नहीं होता। वैसे ही कभी अध्यास न भी हो तो भी कोई दोष नहीं। अतः कार्यकल्प्य इदमाकारवृत्ति आवश्यक नहीं है। फिर 'इदमाकारवृत्ति आवरणभङ्ग करती है या नहीं' इत्यादि विचार व्यर्थ है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि 'अप्रतिबद्ध इदमर्थ-सम्प्रयोगरूप कारणसे भी इदमाकारवृत्तिकी कल्पना होगी' क्योंकि इदमर्थ-सम्प्रयोगरूप कारणसे उत्पन्न होती हुई इदंवृत्तिका दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगसे क्षुभित अविद्याके परिणामभूत इदंवृत्तिके समकाल उत्पन्न रजत ही विषय होता है। वहीं प्रातिभासिक रजत दोषयुक्त चक्षुसे गृहीत होता है। कहा जा सकता है कि चक्षुसे रजतका सम्प्रयोग हुए बिना रजत चाक्षुष नहीं हो सकता। दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगजन्य रजत इदवृत्तिके समकाल नहीं हो सकता, क्योंकि ज्ञान-कारण इन्द्रिय सम्प्रयोगसे ज्ञान ही उत्पन्न हो सकता है। रजत तो
अर्थ है, उसकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? अतः इदंवृत्तिके अनन्तर तज्जन्य तदभिव्यक्त साक्षीमें ही रजतका अध्यास होता है. इसलिये साक्षीमे ही रजतका भान होता है । रजतमे चाक्षुषत्वका अनुभव इसलिये होता है कि स्वभासक चैतन्य- व्यञ्जक इदंवृत्तिका चक्षु जनक है, अतः परम्परासे चक्षुर्जन्य होनेके कारण चाक्षु- षत्वका अनुभव होता है । इस पक्षमे अन्य लोग यह दोष देते हे कि 'इस तरह तो पीत शङ्ख- भ्रममें चक्षुकी अपेक्षा न होनी चाहिये; क्योकि रूपके बिना केवल शङ्ख चक्षुसे ग्राह्य हो नही सकता । पीतिमा ग्रहणके लिये भी चक्षु अनावश्यक है, क्योकि साक्षिभास्यत्व-पक्षमें आरोप्य ऐन्द्रियक मान्य नहीं होता ।' यह भी नहीं कहा जा सकता कि 'पीतिमाका स्वरूपाध्यास नहीं होता, अपितु नयनगत पित्तकी पीतिमा ही अनुभूयमान होती है। उसका केवल शङ्ख-संसर्ग ही अध्यस्त होता है, इसलिये उसी पीतिमाके अनुभवार्थ चक्षुकी अपेक्षा होती है ।' कारण इस [
हो सकता। यदि यहाँ नैल्यसंसृष्ट तादृग् जल या गगनादि-अधिष्ठान-गोचर चाक्षुषवृत्ति स्वीकार नहीं की जायगी, तब तो चक्षुका अनुपयोग दुष्परि- हार्य ही होगा। 'पञ्चपादिका' कारकी दृष्टिमें जिस बालकने इस जन्ममें तिक्तरसका अनुभव नहीं किया है, उसे मधुर दुग्धमें तिक्तताकी प्रतीति जन्मान्तरीय अनुभवजन्य संस्कारसे होनी मान्य है। इससे स्वरूपतः अध्यस्त तिक्तरसका रसनासे ही अनुभव मानना स्पष्ट है। अन्यथा रसना-व्यापारके बिना भी तिक्तताकी प्रतीति होनी चाहिये। अतः पूर्वोक्त नीलता-अध्यासस्थलोंमें भी अधिष्ठानसम्प्रयोगसे तद्विषयक चाक्षुषवृत्तिका उदय होता है और उसी समय नीलताका अध्यास होता है। वही अध्यस्त नीलता उस वृत्तिका विषय होती है अतः वह भी चाक्षुष ही है; क्योंकि रूपके बिना गगनादि अधिष्ठानोंमें चाक्षुषवृत्ति हो नहीं सकती। अतः अधिष्ठानावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति न होनेसे अध्यस्तनीलता अधिष्ठान-चैतन्यसे भास्य नहीं हो सकती। तिक्त-रसस्थलोंमें तो अध्यस्त एवं अधिष्ठान दोनों ही एक रसनेन्द्रियग्राह्य नहीं है। त्वक् इन्द्रियसे मधुर दुग्धरूप अधिष्ठान गोचरवृत्ति उत्पन्न होती है। उस वृत्तिसे अधिष्ठान-चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेसे पित्तोपहत रसनाका सम्प्रयोग होता है, उसी चैतन्यमें तिक्तरसका अध्यास होता है। उसी समय अध्यस्त रसविषयक रासनवृत्ति उत्पन्न होती है। त्वगिन्द्रियजन्य अधिष्ठानगोचरवृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्यसे भास्य तिक्तरसमें यदि परम्परासे भी रसनाका उपयोग न होगा तो रासनत्वानुभवका समर्थन किसी भी तरह नहीं होगा। इसी तरह रजतके भी चाक्षुषत्वकी उत्पत्ति हो सकती है। अतएव 'चक्षुषा रजतं पश्यामि' (नेत्रसे रजत देखता हूँ) यह अनुभव होता है। कहा जा सकता है कि 'चक्षुसे रजतका सनिकर्ष हुए बिना ही यदि रजतमें चाक्षुषत्व हो, तब तो प्रत्यक्ष रजतमें विषयेन्द्रिय-सनिकर्ष कारण है, द्रव्य-प्रत्यक्षमें द्रव्येन्द्रिय-सयोग कारण है। रजत-प्रत्यक्षमें रजतेन्द्रिय-सयोग कारण है, इत्यादि कार्य-कारणभाव भङ्ग होगा।' परन्तु यह कोई दोष न होगा। सनिकर्ष, सयोगादि कोई एक कारण अनुगत नहीं है, अतः प्रथम नियम नहीं बनता। नैयायिकोंके मतमें सयोगायोग्य तमरूप अद्रव्यमें भी द्रव्यत्वका अध्यास होता है और सयोगायोग्य गुणादिमें भी द्रव्यत्वका अध्यास होता है, अतः द्वितीय नियमका अभिप्राय यह है कि व्यावहारिक द्रव्यत्वाधिकरणके प्रत्यक्षमें इन्द्रिय- सयोग कारण है, अतः प्रातिभासिक रजतमें तो अधिष्ठानगत इदंत्वके समान ही अधिष्ठानगत द्रव्यत्वका भी आरोप ही होता है। इसलिये प्रातिभासिक द्रव्यत्वाधि- करण रजतके इन्द्रियसयोगके बिना भी प्रत्यक्ष होनेमें कोई हानि नहीं है।
६४६ मार्क्सवाद और रामराज्य अतएव तृतीय नियमका भी कोई अस्तित्व नहीं रह जाता । जहाँ बीज-सामान्यका अङ्कुर सामान्यके साथ कार्य-कारणभाव माननेपर बीजान्तरसे अङ्कुरान्तरकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग होता है, वही विशिष्य कार्य-कारणभाव मानना आवश्यक होता है । प्रकृतमें वह सर्वथा व्यर्थ है । कहा जा सकता है कि 'द्रव्यप्रत्यक्षमें द्रव्य-सयोग कारण है, यह सामान्य नियममात्र माननेसे अन्य द्रव्यसंयोगसे अन्य द्रव्य-प्रत्यक्ष होने लगेगा ।' परंतु यह ठीक नहीं, क्योकि तत्तद्द्रव्यके प्रत्यक्षमें तत्तद्द्रव्यसंयोग कारण है, ऐसा माननेपर कोई अतिप्रसङ्ग नहीं होता । अन्यथा अन्य रजतसंयोगसे अन्य रजतका प्रत्यक्ष होनेका अतिप्रसङ्ग भी अनिवार्य ही होगा । इसके अतिरिक्त 'इदं रजतं पश्यामि, नीलं जलं पश्यामि, नीलं गगनं पश्यामि' इत्यादि अनन्यथासिद्ध अनुभवों- में 'प्रत्यक्षमात्रमें विषय-संनिकर्ष कारण है' इत्यादि नियमोंका व्यावहारिक विषयमें ही संकोच करना चाहिये । कहा जा सकता है कि 'इस तरह तो यही कहना ठीक है कि प्रमामें संनिकर्ष कारण है, भ्रममें नहीं, यह भी सकोच कल्पना हो सकती है । फिर तो असंनिकृष्ट देशान्तरस्थ रजतादिका भी भ्रम हो सकता है । इस तरह अन्यथाख्यातिका प्रसङ्ग होगा।' परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि अभिव्यक्त चैतन्यका सम्बन्ध हुए बिना देशान्तरस्थ रजतकी अपरोक्षता नहीं बन सकती । रजतप्रतीति और बाध, दोनों ही बातोंमें भ्रमविषयक अनिर्वचनीय रजत- को स्वीकार किये बिना काम नहीं चल सकता । कहा जा सकता है कि 'अधिष्ठान-सम्प्रयोगमात्रसे यदि प्रातिभासिक रजत- को ऐन्द्रियक माना जायगा, तब तो शुक्ति-रजताध्यास समयमे ही वहीं कालान्तर- में अध्यसनीय रंग (राँगा) का भी चाक्षुषत्व होना चाहिये । परंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि रजताध्यास समयमे रग-रजतसाधारण चाकचिक्य दिखलायी पड़नेपर भी जिस रागादिरूप दोषके अभावसे वहाँ रगाध्यास नहीं होता, उसी- के कारण रगादिविषयक वृत्ति भी उत्पन्न नहीं होती । रजतमे रागादि होता है, इसीलिये रजताध्यास एव रजताकारवृत्ति उत्पन्न होती है । अतः इदमंशयुक्त रजता- कार एक ही वृत्ति इन्द्रियजन्य उत्पन्न होती है । उमके पहिले इदमाकारवृत्ति नहीं होती । परंतु अन्य लोगोंका मत है कि 'इदमाकारवृत्ति' एक ही होती है । वही अध्यासके प्रति कारण है । अध्यस्त रजतादिका उस वृत्तिसे अभिव्यक्त साक्षि- चैतन्यसे भान होता है । अतः रजताकारवृत्ति निरर्थक है।' अन्य लोगोंके मतानुसार 'इदमाकार सामान्य-ज्ञानरूपिणी एक ही वृत्ति होती है । इद एवं रजत- के तादात्म्यगोचरवृत्ति दूसरी होती है । अतः दो ज्ञान ही मान्य होना ठीक है।' अन्य लोगोंका मत है कि 'जैसे इदमंशावच्छिन्न चैतन्यस्थ अविद्या रजत- ज्ञानाभासरूपसे परिणत होती है, इदंवृत्तिके तुल्य रजतज्ञान अनध्यस्त नहीं है, जैसे रजतमें अधिष्ठानगत इदंताके संसर्गका भान होता है, वैसे ही रजतज्ञानमें
अधिष्ठानगत इदन्त्व-विषयत्व-संसर्गका भान [हो सकता है । अतः 'इदं रजतम्' यह द्वितीय ज्ञान इदंविषयक नहीं कहा जा सकता ।' कहा जा सकता है कि 'साक्षिचैतन्यसे ही सब पदार्थोंका भान हो सकता है, वृत्तिकी क्या आवश्यकता है ? यदि घटादिविषयक संस्कारके लिये वृत्ति आवश्यक भी हो, तो भी उसका निर्गम अनावश्यक है । परोक्षस्थलके समान ही अनिर्गत वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे ही घटादिका प्रकाश हो ही सकता है । फिर भी परोक्ष-अपरोक्षकी विलक्षणता वैसे ही उत्पन्न हो सकेगी, जैसे परोक्षमें भी शाब्द एवं अनुमितिमें करणविशेषप्रयुक्तवृत्तिसे विलक्षणता सम्पन्न हो जाती है।' अन्य लोगोंके अनुसार 'प्रत्यक्ष-स्थलमें विषयावच्छिन्न चैतन्य ही विषयप्रकाश होता है, अतः विषय-चैतन्यकी अभिव्यक्तिके लिये वृत्तिनिर्गम आवश्यक है । परोक्ष-स्थलमें व्यवहित वन्ध्यादिके साथ वृत्ति-संसर्ग नहीं होता, वहाँ इन्द्रियोंके समान वृत्ति-निर्गमका द्वार उपलब्ध नहीं होता, अतः अगत्या अनिर्गत वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य ही स्वरूपसम्बन्धसे विषय-प्रकाश माना जाता है ।' अन्य लोगोंके मता- नुसार जैसे साक्षात् चैतन्यसंसर्गी अहंकार तथा सुख-दुःखादिका चैतन्यसे प्रकाश होता है, वैसे ही विषयसंसृष्ट चैतन्य ही अपरोक्षताका हेतु है। अतः विषय-चैतन्यकी अभिव्यक्तिके लिये वृत्ति-चैतन्य आवश्यक है । अन्य लोगोंका कहना है कि 'शब्दानुमानावगत विषयोंकी अपेक्षा प्रत्यक्षा- वगत विषयकी स्पष्टता अनुभूत होती है । रसालके सौगन्ध्य-माधुर्यादिकी हजारों शब्दानुमानोंसे भी उतनी स्पष्टता नहीं होती जितनी रासन, घ्राणजादि प्रत्यक्ष-ज्ञानसे होती है; क्योंकि प्रत्यक्षके बिना रसालका माधुर्य-सौगन्ध्य कैसा है, यह जिज्ञासा बनी ही रहती है । अतः प्रत्यक्ष ग्राह्य पदार्थ अभिव्यक्त अपरोक्ष-चैतन्यसे अव- गुण्ठित होता है, इसलिये उसकी स्पष्टताविषयक जिज्ञासा प्रशान्त हो जाती है । शब्दसे रसालकी मधुरता आदिका ज्ञान होनेपर भी तद्गत माधुर्यादि वृत्ति अवान्तर जातिका बोध नहीं होता । इसीलिये साक्षिवेद्य सुखादि भी स्पष्ट हैं । शब्दवृत्ति- वेद्य ब्रह्म भी मननादिके पहले अस्पष्ट होता है । मननादिसे जब पूर्ण अज्ञान मिटता है तब स्पष्टता होती है।' इसपर भी कुछ लोग कहते हैं कि 'विषयावच्छिन्न चैतन्यगत आवरक अज्ञान अनिर्गतवृत्तिसे नष्ट हो सकेगा और कहीं अतिप्रसङ्ग भी नहीं होगा।' कहा जा सकता है कि 'समानविषयक होनेसे देवदत्तके घट- ज्ञानसे यज्ञदत्तके घटाज्ञानकी निवृत्ति होनी चाहिये । अहमर्थ एव विषयचैतन्यमें रहनेवाले ज्ञान-अज्ञानका भिन्नाश्रय होनेपर भी विरोध होगा ही, क्योंकि समाना- श्रयता विरोधका प्रयोजक नहीं।' परन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि समानाश्रय- विषयत्वको ज्ञानाज्ञानके विरोधका प्रयोजक मानकर वृत्ति-निर्गम माननेपर भी देव- दत्तीय घटज्ञान एवं यज्ञदत्तीय घटाज्ञान दोनों ही एक घटावच्छिन्न चैतन्यको
६४८ मार्क्सवाद और रामराज्य
आश्रय करते हैं, अतः अतिप्रसङ्ग होगा ही। इसलिये कहना पडेगा कि 'विशिष्ट विरोधप्रयोजक जो अज्ञान जिस पुरुषके प्रति जिस विषयका आवरण करता है वही अज्ञान तद्विषयक ज्ञानसे निवृत्त होता है। फिर समानाश्रयता अपेक्षित नहीं है। दूसरे लोग उपर्युक्त पक्षको असङ्गत कहते हैं। उनके अनुसार 'वृत्ति- निर्गम अङ्गीकार किये बिना ज्ञान एव अज्ञानके विरोधका कोई भी प्रयोजक निश्चित नही हो सकेगा।' कोई लोग विषयगत अज्ञानकी निवृत्तिके लिये वृत्तिका निर्गम आवश्यक समझते हैं। कुछ लोग चिदुपरागार्थ अर्थात् चैतन्यके साथ सम्बन्धके लिये वृत्ति-निर्गम आवश्यक समझते हैं और कई लोग अभेदकी अभिव्यक्तिके लिये वृत्ति-निर्गम आवश्यक समझते हैं।
'तत्त्वशुद्धि' कारका कहना है कि 'प्रत्यक्ष-प्रमाण न तो घटपटादिको ग्रहण ही करता है और न उनका सत्त्व ही ग्रहण करता है। किंतु वह (प्रत्यक्ष-प्रमाण) अधिष्ठानरूपसे घटादि-अनुगत सन्मात्रको ही ग्रहण करता है। 'सत्' ही प्रत्यक्ष-प्रमाणका विषय है, घटादिका प्रत्यक्ष नही होता। जैसे भ्रममें अधिष्ठानका इदमंश ही प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, इन्द्रियोका अन्वय-व्यतिरेक इदमंशके प्रत्यक्षमें ही उपक्षीण हो जाता है, आरोपित रजतांशका प्रतिभास भ्रान्तिसे होता है, वैसे सन्मात्रका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है। उसीमें इन्द्रियका व्यापार सार्थक है। घटादि- भेद प्रतिभास, भ्रान्तिसे ही होता है।' कहा जा सकता है कि 'रजतादिकी तरह घटादिका बाध नहीं होता, अतः घटादि-प्रतिभासको भ्रान्ति मानना निर्मूल है।' परंतु यह ठीक नही । बाधदृष्टि न होनेपर भी देशकालव्यवहित वस्तुके समान घटादिभेद वस्तु प्रत्यक्षके अयोग्य है, अतः उनका प्रतिभास भ्रान्ति है। इन्द्रिय-व्यापारके अनन्तर प्रतीयमान घट स्वभिन्न समस्त पदार्थोंसे भिन्न ही प्रतीत होता है। घटादि सर्वभिन्नरूपसे असन्दिग्ध, अविपर्यस्तरूपसे प्रतीत होते हैं। भेद- ग्रह प्रतियोगिग्रह-सापेक्ष होता है। परंतु देश, काल व्यवधानसे असंनिकृष्ट प्रति- योगियोंका प्रत्यक्षसे ग्रहण नहीं हो सकता। जो लोग कहते हैं कि 'भेदज्ञान प्रति- योगि-अंशमें सस्कारकी वैसे ही अपेक्षा करता है, जैसे प्रत्यभिज्ञान तत्ताशमें संस्कारकी अपेक्षा करता है।' परंतु यहाँ तो प्रतियोगि-अंशमे स्मृति भी सम्भव नहीं है। कहा जाता है कि 'वस्तुभेद होनेसे कनकाचल भेदका प्रतियोगी है— इस तरहके अनुमानसे प्रतियोगि-सम्बन्धगोचर संस्कार सम्भव है।' परंतु यह भी ठीक नहीं है। भेदज्ञानके बिना अनुमिति भी नही होगी। अनुमिति तभी हो सकती है, जब पक्ष, साध्य, हेतुका भेद ज्ञात हो। पक्षादि-भेदज्ञान तभी हो सकता है, जब अनुमिति हो। इस तरह आत्माश्रय दोष होता है। अतः भेदगत प्रतियोगि-सम्बन्धका भान नही हो सकता। पक्षादिके अभेद-भ्रम निराकरणके लिये भेदज्ञान आवश्यक है। सम्बन्धिद्वयका प्रत्यक्ष हुए बिना सम्बन्धका प्रत्यक्ष
नहीं होता। प्रतियोगीका प्रत्यक्ष हुए बिना प्रतियोगी-विशिष्ट भेदका प्रत्यक्ष नहीं होता। प्रत्यक्षायोग्य प्रतियोगीका प्रतिभान भ्रान्तिरूप ही है। फिर उसी ज्ञानमें भासित भेद एव भेदविशिष्ट घटादि भी उसी भ्रममें भासित होते हैं, अतः निर्विशेष सन्मात्र ही भासित होते हैं। अनुभव और आत्मा 'वार्तिककार' में संवित्के सम्बन्धमे महत्त्वपूर्ण बातें कही गयी हैं। संवित्का भेद स्वतः नहीं कहा जा सकता। घटसंवित्, पटसंवित् इस रूपसे वेद्य- पूर्वक ही संवित्का भेद भासित होता है, अतः संवित्का यह भेद स्वाभाविक नहीं, किंतु घटादि उपाधिके कारण ही प्रतीत होता है। वह सुतरां भ्रम है। इसी प्रकार सम्यक् ज्ञान, सशय एव मिथ्याज्ञान इत्यादि भेद भी संवित्के स्वाभाविक नहीं हैं; क्योंकि ये भेद बुद्धिगत हैं। चिद्रूप संवित् तो सम्यक्, सशय, मिथ्या आदि सभी ज्ञानोंमें समान है, क्योंकि बाध न होनेसे रज्जु-सर्पका भी स्फुरण मिथ्या नहीं। यदि स्फूर्तिका बाध हो, तब तो रज्जुतत्त्वका भी स्फुरण कैसे हो सकेगा ? यदि कहा जाय कि रज्जुस्फूर्ति सर्पस्फूर्तिसे पृथक् है, तो यह भी ठीक नहीं क्योंकि ऐसी स्थितिमें दो स्फूर्तियोंमें स्फूर्ति शब्दका प्रयोग कैसे होगा ? कहा जा सकता है कि स्फूर्तित्व-जातिके अनुगमसे ही दोनोंमें स्फूर्ति शब्दका प्रयोग हो सकेगा। परंतु वेदान्तमतानुसार व्यक्ति-जातिके स्थानमें व्यावृत्त एवं अनुवृत्त शब्दका प्रयोग होता है। तदनुसार यहाँ चित् अनुवृत्त है, बुद्धि व्यावृत्त है। तथा च सर्पबुद्धि, रज्जुबुद्धियोंकी परस्पर व्यावृत्ति होनेपर भी चित् या स्फूर्ति उभयत्र अनुगत है। उसीको कोई जाति कह लेते हैं। गोत्वादिमे भी यही न्याय लागू हो सकता है। सर्वत्र अनुगत ब्रह्म ही गोत्वादि जाति है। व्यावृत्त व्यक्ति मायिक है। इस तरह सम्यक्, सशय, मिथ्या आदि विभिन्न आकारवाली बुद्धि है। इसी तरह प्रमाता- प्रमाणादिका भी भेद है। जैसे घटादिका भेद है, वैसे ही सम्यक्त्वादि और प्रमात्रादिमे भी भेद है। परंतु यह भेद कल्पित है। इन्हीं कल्पित भेदोंसे संवित्- का भेद भी कल्पित होता है। वस्तुतः प्रत्यक्स्वरूप संवित् स्वतःसिद्ध है और एक है। उसीके आधारपर भावाभाव सब व्यवहार चलता है। बोध, अनुभव, संवित् आदि शब्दोंसे वही परब्रह्म आत्मा कहा जाता है। अनुभवरूप संवित्से ही अहंप्रत्ययकी भी सिद्धि होती है। जो लोग अहंप्रत्ययसे आत्मसिद्धि मानते हैं, उनके यहाँ भी अहप्रत्ययसिद्धिके लिये अनुभवरूप आत्माकी अपेक्षा रहेगी ही इस तरह अन्योन्याश्रय दोष होगा। जो अहंधीको स्वप्रकाश एव आत्माको जड कहते हैं, उनका केवल भाषाका ही भेद है। स्वप्रकाशसे ही जड़की सिद्धि होती है। इस सम्बन्धमें उनका तथा वेदान्तीका ऐकमत्य ही है।
६५० मार्क्सवाद और रामराज्य
श्रुतिके अनुसार ब्रह्म जड नहीं है; क्योंकि 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' यह श्रुति ब्रह्मको ज्ञानरूप कहती है । यह भी विचारणीय है कि यदि संवित् प्रमेय है, तब तो प्रमेयविषयक प्रमा फलरूप संवित् अन्य होनी चाहिये । परंतु दो संवित्का उपलम्भ नहीं होता । यदि कहा जाय कि यद्यपि अन्य संवित्का उपलम्भ नहीं होता तथापि व्यवहारलिङ्गसे उसका अनुमान किया जायगा, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि फलरूप संवित् तो स्वप्रकाश होती है, फिर उसके अनुमानकी बात कैसे चल सकती है ? कहा जाता है कि जैसे 'अयं घट:' इस व्यवसायज्ञानका-प्रकाशक 'घटज्ञानवानहं' यह अनुव्यवसायज्ञान होता है, वैसे ही आत्मामें भी संवित् एवं तद्विषयक संवित् इस तरह दो संवित् मान्य हैं । परंतु यह कहना असङ्गत है, क्योंकि यह प्रतीतिसे पराहत है अर्थात् दो संवित्की प्रतीति नहीं होती । जैसे घटादिविषयक संवित् होती है, वैसे संविद्विषयक संवित्की प्रतीति नहीं होती । कुछ लोग कहते हैं कि आत्मा द्रव्य एवं बोधस्वरूप है, अतः आत्मा द्रव्यरूपसे प्रमेय है और बोधरूपसे प्रमाता । इस तरह एकहीमें ग्राह्यता-ग्राहकता दोनों ही बन सकती है ।' परंतु इस मतमें भी आत्मा अहंधीगम्य नहीं हो सकता । यदि द्रव्यांश अहंबुद्धि है, तो अन्योन्याश्रय दोष होगा; क्योंकि जैसे भासमान ही दीप घटादिका प्रकाशक होता है, वैसे ही भासमान ही बुद्धि किसीका साधक हो सकती है । अतः उसके प्रकाशके लिये बोध आवश्यक होगा । तदर्थ आत्माके ज्ञाततारूप लिङ्गसे अहंबुद्धिका अनुमान करना पडेगा । लिङ्गज्ञानमें ज्ञातताविशिष्ट आत्माका भी ज्ञान हो जायगा । तथा च आत्माके ज्ञानमें अहंबुद्धि होगी एवं अहंबुद्धिसे आत्माका ज्ञान होगा । यदि अहंबुद्धि बोधांश ही है, तो अन्तःकरणरूप उपाधिसे बोध ही अहंबुद्धि भी है और उसीसे सर्वव्यवहार उपपन्न हो सकता है, फिर द्रव्यांशका अङ्गीकार करना व्यर्थ है । फिर भी कहा जाता है कि 'यदि बोध स्वप्रकाश ही है, तो वेदान्तोंका क्या प्रयोजन रहेगा ?' परंतु इसका समाधान यही है कि उसी बोधका अनुवाद करके उसे ब्रह्मरूप समझाना ही वेदान्तोंका प्रयोजन है । उस अखण्ड स्वप्रकाश बोधसे प्रत्यक्षानुमानागमादि प्रमाण एवं जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, समाधि, मूर्च्छा-अवस्था स्वतः सत्तास्फूर्तिरहित होनेपर भी प्रकाशित होते हैं। इसी तरह निखिल प्रपञ्च जिस बोधके प्रसादसे सत्ता- स्फूर्तिवाला होकर भासमान होता है, जो स्वयं स्वमहिमस्थ एवं स्वप्रकाश- बोध है, वही ब्रह्मात्मा है। जो स्वयं अन्यार्थ नहीं है और सब कुछ जिसके लिये है, वही निरतिशय पर-प्रेमका आस्पद आत्मा एव आनन्दस्वरूप बोध ही सब कुछ है; अर्थात् सब कुछ उसीमें अध्यस्त है। भावाभावात्मक सभी पदार्थ जिसका आश्रय करते हैं, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि परस्पर विलक्षण अविद्याकार्यस्वरूप जगत् जिसमें प्रतिभासित होता है, वही सर्वविकारशून्य, सर्वसाक्षी अखण्ड बोध ब्रह्म है ।
मार्क्स और ज्ञान ६५१ कहा जा सकता है 'निद्रामें किसी नित्य अनुभवका पता नहीं लगता, फिर उसे अवस्थात्रय-साक्षी कैसे कहा जा सकता है ?'' परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि निद्राकालमें भी सुख, निद्रा, विशेषज्ञानाभाव, सुखादिके भासक असंकुचित बोधका अस्तित्व है ही; अतएव श्रुति कहती है 'न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते' ( बृह० उ० ४ । ३ । २३ ) । अर्थात् द्रष्टाकी स्वरूपभूता नित्य-दृष्टि कभी भी लुप्त नहीं होती । फिर भी जागरस्वप्नमें प्रकाश्य स्फुट होनेसे प्रकाशकत्व स्फुट है, सुप्तिमें स्थूल दृश्य न होनेसे औपाधिक साक्षिता स्फुट नहीं होती । वस्तुतः साक्ष्यके सम्बन्धसे ही आत्मामें साक्षिताका भी व्यवहार होता है । प्रत्यग्बोधस्वरूप आत्मा तो मन, बुद्धि एव वाक्का भासक होनेसे उनका भी अगोचर ही है। उसीमें कर्तृत्वादि अविद्या- कल्पित है। अविद्या भी बोधसे ही प्रकाशित होती है । अविद्या अनादि होने पर भी ब्रह्माकारवृत्तिसे बाधित हो जाती है । जैसे सौरालोकप्रकाशित तूलराशि सूर्यकान्तपर अग्निरूपसे व्यक्त उसी सौरालोकसे दग्ध हो जाती है, वैसे ही अविद्या- भासक भान ही ब्रह्माकारवृत्तिपर प्रकट होकर अविद्याका दाहक हो जाता है। भले वह बोध देह, बुद्धि, मस्तिष्क आदिमें ही प्रतीत हो, फिर भी वह स्वतन्त्र है, देहादिका धर्म नहीं है । भले गृह, क्षेत्र आदिमें दिव्य रत्नादि मिले, फिर भी वे गृह-क्षेत्रादिके धर्म नहीं हैं । भले ही काष्ठादिमें अग्नि उपलब्ध हो फिर भी अग्नि स्वतन्त्र है, काष्ठादिका धर्म नहीं है, वैसे ही बोध स्वतन्त्र, नित्य एव ब्रह्मात्मस्वरूप है, वह देहादिका धर्म नहीं है । अनुभव-विमर्श अनुभव यदि दूसरे अनुभवसे अनुभाव्य होगा तो अनवस्थादोष होगा, क्योंकि वह जिस अनुभवसे अनुभाव्य होगा, उसे भी किसी अन्य अनुभवसे अनुभाव्य होना पड़ेगा । यदि प्रथमानुभवसे द्वितीयका एव द्वितीयसे प्रथमका अनुभव माना जाय तो अन्योन्याश्रयदोष होगा । प्रथमका द्वितीयसे, द्वितीय- का तृतीयसे अनुभव मानें, तो अनवस्था और यदि प्रथमानुभवका अपनेसे ही अनुभव माना जाय तो आत्माश्रय-दोष होगा एव वही कर्म और वही कर्त्ता होने- से कर्म-कर्त्तृ-विरोध भी होगा । अतएव अनुभवत्व एवं अनुभाव्यत्व दोनोंका सामानाधिकरण्य नहीं हो सकता । लोग कहते हैं कि 'यदि अननुभाव्यत्वके कारण अनुभवका अनुभवत्व सिद्ध किया जायगा, तब तो खपुष्प भी अननुभाव्य है, अतः उसमें भी अनुभवत्व ठहरेगा।' परंतु ऐसा कहना ठीक नहीं । जैसे गोमें गोत्व, घटमें घटत्व होता है, वैसे ही अनुभवमें अनुभवत्व सिद्ध ही है । फिर उसे अननुभाव्यत्वरूप साधनसे सिद्ध क्या करना है ? फिर भी यदि अननु- भाव्यत्वरूपसे अनुभवत्व सिद्ध भी करना पड़े तो 'सत्त्वे सत्यननुभाव्यत्व' अर्थात् सत्त्वविशिष्ट अननुभाव्यत्व भी अनुभवत्वका साधक हेतु माना जाता है । तथा च
६५२ मार्क्सवाद और रामराज्य
खपुष्पमें भले ही अनुभाव्यत्व रहे, परंतु विशेषणभूत सत्त्व न होनेसे उसमें अनुभवत्व नहीं जायगा । अज्ञात घटमें भी अनुभवयोग्यता है ही । अनुभवितुं योग्य ही अनुभाव्य होता है, अतः उसमें भी अतिव्याप्ति न होगी । कुछ लोग कहते हैं कि 'जो वर्तमान दशामें स्वाश्रयके प्रति स्वसत्तासे ही स्वविषयका साधन है, वही अनुभूति है ।' परंतु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि विषय-साधनत्व विषय प्रकाशकत्व ही है । उसका भी अर्थ होगा विषय- प्रकाशजनकत्व । विषय-प्रकाश विषयानुभवरूप ही होगा । तथा च निष्कर्ष यह निकलेगा कि अनुभव-अनुभवका जनक है । यदि इन दोनों अनुभवोंकी एकता मान्य है, तब तो आत्माश्रय-दोष होगा । जैसे स्वयं देवदत्त अपनेसे उत्पन्न नहीं हो सकता, वैसे अनुभव भी अपनेसे ही उत्पन्न नहीं हो सकता । यदि दोनोंका भेद माना जाय तो द्वितीय अनुभवको प्रथमानुभवसे जन्य कहना पड़ेगा । परंतु प्रथमानुभव किससे उत्पन्न होगा ? यदि उसे विषयेन्द्रिय- सन्निकर्षसे जन्य मानें, तब तो द्वितीय अनुभवको भी उस सन्निकर्षसे जन्य मानना चाहिये । फिर उसे प्रथमानुभवसे जन्य क्यों माना जाय ? अतः 'अनुभव स्वविषय अनुभवका जनक है' यह कल्पना व्यर्थ ही है । 'अनुभव स्वाश्रयके प्रति स्वविषयका प्रकाशक है' इस तरह 'स्वाश्रयके प्रति' यह अंश भी व्यर्थ ही है; क्योंकि अनुभव किसीके आश्रित नहीं रहता । जो कहते हैं कि 'अनुभव आत्माके आश्रित रहता है', वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभव स्वयं ही तो आत्मा है । कुछ लोग कहते हैं कि 'अनुभविता ही आत्मा है, अनुभव नहीं', पर यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभव ही अनुभविता भी है । जैसे प्रकाशस्वरूप सविता ही प्रकाशक भी कहा जा सकता है, वैसे ही अनुभवस्वरूप आत्मा ही अनुभविता भी कहा जा सकता है । कहा जाता है कि 'सङ्कोचविकासशाली धर्मभूत नित्यद्रव्य आत्मस्वरूपसे भिन्न ही ज्ञान है ।' परंतु संकोचविकास साव- यव पदार्थका ही धर्म होता है । जो विकारी है, वह नित्यद्रव्य नहीं हो सकता । फिर इस पक्षमें यदि धर्मभूत ज्ञानद्रव्य स्वसत्तासे ही स्वविषयका प्रकाशक होता है, तो इसी तरह ज्ञानस्वरूप आत्मा भी स्वसत्तासे विषयप्रकाशक हो ही सकता है । वस्तुतस्तु शुद्ध बोध ब्रह्मस्वरूप ही है, अतएव वह निर्धर्मक ही है । अतएव उसमें अनुभवत्व, बोधत्वादि धर्मकी कल्पना व्यर्थ है । 'अनुभवका लक्षण क्या है ?' इस प्रश्नका उत्तर यही है कि अनुभवका स्वरूप लक्षण अनुभव ही है । यदि अनुभवका भी अन्य स्वरूप हो, तब तो उस स्वरूपका भी कोई अन्य स्वरूप होगा एवं उस स्वरूपका भी अन्य स्वरूप होगा, फिर अनवस्थाप्रसङ्ग अनिवार्य होगा । तटस्थ लक्षण अनुभवका वही है, जो ब्रह्मका है—'यतो वा इमानि भूतानि
जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद्ब्रह्म' (तैत्ति० उप० ३ । १) अर्थात् जिससे समस्त भूत उत्पन्न होते हैं, जिसमें जीवित रहते हैं और जिसमें विलीन होते हैं, वही ब्रह्म है। कहा जाता है कि 'अनुभव यदि परप्रकाश होगा, तो अनवस्थादि दोष होंगे, अतः उसे स्वयंप्रकाश कहना पड़ेगा। इस तरह स्वयंप्रकाशत्व धर्म उसमें रह सकता है, फिर उसे निर्धर्मक कैसे कहा जा सकता है ?' पर यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि यद्यपि ब्रह्ममें व्यावहारिक सधर्मकत्व है, तथा पार- मार्थिक धर्म उसमें कोई नहीं है, क्योंकि वह सजातीय-विजातीय-स्वगत सर्वविध भेदशून्य है। कहा जाता है कि 'अनन्यावभास्यत्वविशिष्ट स्वेतरसर्वावभासकत्व ही स्वयंप्रकाशत्व है। अनुभवके सर्वावभासक होनेका अर्थ है सर्वावभास या सर्वानु- भवजनक होना।' परन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है । वस्तुतः निर्विकल्पक ज्ञान चैतन्य शब्दसे कहा जाता है और सविकल्पक ज्ञान वृत्तिशब्दवाच्य है। इस दृष्टिसे सविकल्पक ज्ञानकी उत्पत्ति निर्विकल्पक ज्ञानसे हो सकती है। यहाँ भी प्रश्न होता है कि 'वृत्तिज्ञान क्या है ? वृत्ति चैतन्य या अन्य कुछ ?' पहला पक्ष इस- लिये ठीक नहीं कि वृत्ति स्वयं जड है, वह विषयावभासक नहीं हो सकती। ज्ञान भासक होता है ।। भान ही ज्ञान है। जडवृत्ति तो स्वकालमें भी भानरूप नहीं बन सकती । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं, क्योंकि चैतन्यको तो वृत्तिज्ञानका जनक ऊपर कहा गया है। फिर वही जन्य कैसे होगा ? तीसरा पक्ष भी सङ्गत नहीं है। वृत्ति एवं चैतन्यसे भिन्न ज्ञानरूप कोई वस्तु प्रसिद्ध नहीं है। उपर्युक्त प्रश्न- का समाधान यह है कि वृत्तिप्रतिफलित चैतन्य ही वृत्तिज्ञान है। वही चैतन्य विषयचैतन्यसे अभिन्न होकर प्रत्यक्ष होता है। इसीलिये केवल चैतन्य एवं केवल वृत्तिसे वह वृत्तिज्ञान अन्य ही है। एक ही ज्ञानमें उपाधिभेदसे जन्यजनकभाव हो सकता है। अथवा अनुभव 'स्वेतर सर्वावभासक है' उसका अर्थ यह है कि स्वेतर सभी विषयोंमें 'भाति' (प्रतीत होता है) इत्याकारक प्रतीतिविषयताका जनक है। 'भाति' इस प्रतीतिकी विषयता ही सर्वावभास्यता है। चिदाभासरूप फलकी व्याप्ति हुए बिना कोई भी जड वस्तु 'भाति' इस प्रतीतिका विषय नहीं हो सकती । एतावता स्वतः सर्वदा सर्वका अवभासन करता हुआ भी वृत्ति- प्रतिबिम्बित चैतन्यके द्वारा सभी वस्तुओंमें 'भाति' (भासमान है) इस प्रतीति- की विषयता होती है। कहा जा सकता है कि 'भाति यह प्रतीति ही तो अनुभव है, इससे अतिरिक्त अनुभव कुछ नहीं है।' परन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि प्रतीतिसे अतिरिक्त अनुभव है। चक्षुसे घटका साक्षात्कार करके पुरुष निश्चय करता है कि घट है और भासमान है। इस तरह घटसाक्षात्काररूप अनुभवसे भिन्न ही अनुभवजन्य प्रतीति होती है।
६५४ मार्क्सवाद और रामराज्य फिर भी 'भाति' इस प्रतीतिसे भिन्न अनुभव क्या है ? इस प्रश्नका उत्तर वस्तुतः दुर्वच ही है। यद्यपि कहा जाता है कि 'निर्विकल्पक अनुभव ही दुर्वच होता है, सविकल्पक अनुभव तो सुवच ही होता है।' तो भी यह ठीक नहीं, क्योकि सविकल्पक अनुभवकी भी वही दशा होती है। हाँ, भेद यह है कि निर्विकल्पक अनुभवका विषय दुर्वच है, सविकल्पक अनुभवविषय सुवच होता है। स्वयं अनुभव तो दोनो ही दुर्वच ही होते हैं। विषयभेदके कारण वही अनुभवका सविकल्प-निर्विकल्परूप द्वैविध्य भी होता है। स्वतः तो अनुभव एक ही होता है। वह अनन्यावभास्य होकर स्वेतर सर्वका भासक होता है। यही उसका लक्षण है। यद्यपि यहाँ भी बहुत से विकल्प उठते हैं, जैसे अनुभवका घटावभासकत्व क्या है ? घट इत्याकारक प्रतीतिकी जनकता अथवा घट इस प्रतीतिविषयताकी जनकता अथवा घटाकारानुभवजनकत्व अथवा घटानुभवविषयत्वजनकत्व ? अनुभव और प्रतीति यदि एक ही हैं, तो अनुभव अनुभवका जनक कैसे हो सकेगा ? क्योकि अभेदमें कार्यकारणभाव नहीं होता। दूसरा पक्ष भी ठीक नही है, क्योकि घट तो सर्वदा विषय ही होता है, अतः उसमें विषयता सदा ही रहती है। फिर उसमें कादाचित्क जन्यता और अनुभवमें जनकता कैसे सम्भव होगी ? इस तरह अन्य पक्ष भी असङ्गत ही हैं। इस सम्बन्धमें अध्यात्मवादियोका समाधान स्पष्ट है। प्रतीतिशब्द- प्रयोगलक्षण व्यवहार है। अनुभव उससे भिन्न उसका जनक है। इस तरह प्रतीति और अनुभवमें भेद होता है। यद्यपि स्वानुभवसमयमें शब्दप्रयोग नही होता, परोपदेशसमयमें ही शब्दप्रयोग होता है, तथापि स्वानुभव-समयमें भी सूक्ष्म मानसिक शब्दप्रयोग होता ही है। इस तरह प्रतीतिजनकता अनुभवमें सङ्गत है ही। इसी तरह अनुभूत घट ही 'घट' इस व्यवहारका विषय होता है। अतः अनुभव ही घटकी व्यवहारविषयताका जनक है। यदि घटका अनुभव न हो तो घटमें व्यवहारविषयता ही नही बन सकती। तीसरे पक्षमें भी कोई बाधा नहीं, क्योकि केवल अनुभव घटानुभवका जनक हो ही सकता है। जैसे केवल प्रकाश घटप्रकाशका जनक कहा जा सकता है, वैसे ही यहाँ भी व्यवहार हो सकता है। निरुपाधिक अनुभव सोपाधिक अनुभवका जनक है। इस तरह घटरूप उपाधि- के द्वारा कार्यकारणभाव होता है। अतएव चौथा पक्ष भी ठीक ही है। भले ही घट सर्वदा ही सामान्यानुभवका विषय हो, तथापि विशेषानुभवविषयता सदा नहीं रहती। किंतु चक्षु एवं घटका संयोग होनेसे ही घट विशेषानुभवका विषय होता है। इस तरह घटानुभवविषयत्वजनकता भी अनुभवकी घटावभासकता हो ही सकती है। फिर प्रश्न होता है कि 'वह सामान्यानुभव साक्षिचैतन्यरूप है अथवा साक्ष्याकार-वृत्तितारूप ?' कहा जा सकता है कि 'साक्ष्याकार-वृत्ति होनेपर
साक्षीका साक्षात्कार समझा जायगा और फिर तो सभीको मुक्त ही होना चाहिये।' परंतु यह ठीक नहीं है, कारण कि प्रमाणजन्य साक्षात्कारवृत्तिसे साक्षीके आवरक अज्ञानकी निवृत्ति के विना साक्षात्कार नहीं होता। इसपर भी विचार चलता है कि 'साक्षीका साक्षात्कार क्या हो सकता है? क्योकि अनुभवका अनुभव क्या होगा?' परंतु इसका भी समाधान यही है कि साक्षीसे भिन्न द्वैतका अनुभव न होना ही साक्षीका साक्षात्कार है। कहा जा सकता है कि 'इस तरह तो द्वैतानुभवाभाव ही साक्षीका अनुभव हुआ।' परंतु यह ठीक नहीं, क्योकि अनुभव नित्य है। फिर वह अभावका प्रतियोगी कैसे बन सकता है? अतः विशेष अनुभवका अभाव ही सामान्यानुभव है। विशेषानुभव तो चक्षुघट- संयोग आदिसे उत्पन्न होता है, अतः उसका अभाव हो सकता है। विशेषानुभव- दशामे भी यद्यपि सामान्यानुभव रहता है, तथापि वह असत्-जैसा ही रहता है, किंतु विशेषानुभवाभावदशामें सामान्यानुभव सत्ताप्रकर्षको प्राप्त हो जाता है। इसीलिये विशेषानुभवाभाव सामान्यानुभवरूप साक्षीका साक्षात्कार है। कहा जाता है कि 'विशेषानुभवाभावदशामें अज्ञानका ही अनुभव होता है, साक्षीका नही।' परंतु यह भी ठीक नही; क्योकि साक्षीके आवरक अज्ञानका अनुभव ही साक्षीके अनुभवरूपसे व्यवहृत होता है। अज्ञानावच्छिन्न साक्षीका अनुभव ही सामान्यानुभव है। कहा जाता है कि 'यद्यपि सोपाधिक साक्षीका अनुभव हो सकता है, क्योकि वह अनुभाव्य होता है। परंतु केवल साक्षीका अनुभव कैसे हो सकेगा? केवल साक्षी ही अनुभव है, यह भी नहीं कहा जा सकता।' परंतु यह कथन ठीक नहीं है, क्योकि जबतक अविद्या रहती है, तबतक साक्षी केवल रह ही नही सकता। अविद्या उपाधिके द्वारा साक्षीकी सोपाधिकता बनी रहती है। यह भी कहा जाता है कि 'फिर तो समाधिमें भी अज्ञान रहता है, अतः वहाँ भी साक्षीका स्फुरण कैसे होगा?' पर यह भी ठीक नहीं, क्योंकि यदि समाधिमें साक्षी केवल ही है, उपाधिशून्य है, तब तो अवश्य समाधिमें साक्षीका अनुभव नहीं हो सकता; क्योंकि साक्षीका अनुभव करनेके लिये वहाँ कोई प्रमाता ही नही होता। किंतु उस समय केवल साक्षी ही रहता है। इसीलिये उस समय 'मै साक्षीको देख रहा हूँ' ऐसी प्रतीति नही होती। अतः अज्ञान एव अज्ञानकार्य जिस किसी विशेषके अनुभवका अभाव ही साक्षीका साक्षात्कार है। कहा जा सकता है कि 'अभाव साक्षात्काररूप कैसे हो सकता है?' पर यह ठीक नही, क्योंकि अभाव स्वय अधिकरणरूप ही होता है। अतः विशेषानुभवाभावाधिकरण साक्षी ही साक्षीका साक्षात्कार है।
६५६ मार्क्सवाद और रामराज्य विशेषका अध्यास सामान्यमें ही होता है । अध्यासाभाव अधिष्ठानसे अनति- रिक्त अधिष्ठानरूप ही होता है । विशेषानुभवाभावरूप साक्षीका साक्षात्कार उपपन्न हो सकता है । अथवा यह भी कहा जा सकता है कि 'साक्षीका ही परिशेष रहना साक्षीका अनुभव है और सर्वद्वैतकी अप्रतीति होनेपर ही वह होता है।' यह भी कहा जा सकता है कि 'साक्षिस्वरूप ही साक्षीका साक्षात्कार है। जैसे राहुका शिर, आत्माका चैतन्य, सूर्यका प्रकाश आदि स्थानोंमें अभेदमें भी भेद-व्यवहार होता है, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिये । इस तरह प्रत्यगभिन्न स्वयंप्रकाश ब्रह्म ही नित्य अनुभव है।' कुछ लोग कहते है कि 'अनुभवका प्रागभाव अनुभवसे ही गृहीत होता है, अतः अनुभवको नित्य नहीं कहा जा सकता ।' परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि फिर प्रश्न होगा कि 'जिस किसी वस्तुका जिस किसीमे गृह्यमाण प्रागभाव होता है अथवा अगृह्यमाण भी प्रागभाव होता है ?' दूसरा पक्ष तो सर्वथा असङ्गत है, क्योकि इस तरह तो प्रमाणके बिना ही किसी वस्तुका अस्तित्व सिद्ध हो सकेगा । पहला पक्ष भी ठीक नही है, क्योंकि यहाँ विचारणीय यह है कि अनुभवका प्रागभाव अपनेसे ही ग्राह्य है या अन्यसे ? पहली बात ठीक नही; क्योकि पुत्रका प्रागभाव पितासे गृह्यमाण होता है, स्वयं पुत्र अपना प्रागभाव ग्रहण नही कर सकता । इसी तरह अनुभव स्वयं अपना प्रागभाव ग्रहण नहीं कर सकता । यदि अपने प्रागभाव-ग्रहणके समय अनुभव रहता है, तो उसका प्रागभाव कैसे कहा जा सकता है ? यदि स्वयं नहीं है, तो प्रागभावका ग्रहण किस तरह होगा ? स्वप्रागभाव अन्यसे गृहीत होना तो ठीक है, परंतु प्रकृतमे तो अनुभवसे भिन्न सब जड ही है। फिर जडसे अनुभव-प्रागभाव किस तरह गृहीत हो सकेगा ? 'अनुभवका प्रागभाव आत्मासे गृहीत होगा' यह भी नही कहा जा सकता; क्योकि आत्मा ही तो अनुभव है । कहा जाता है कि 'अनुभवके प्रागभावको अनुभव ग्रहण नही करता यह आपने कहीं देखा है या नहीं ?' पहला पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि उसी आपके दर्शनसे अनुभवका प्रागभाव सिद्ध हो जायगा । अनुभवका अपने प्रागभावको ग्रहण न करना भी अनुभवका प्रागभाव ही है । उसका दर्शन आपको है ही । दूसरा पक्ष भी इसलिये ठीक नही है कि यदि आपने यह देखा ही नहीं, तो कैसे कह सकते हैं कि 'अनुभव अपने प्रागभावको ग्रहण नहीं करता ?' यदि अदृष्ट भी ग्राह्य हो, तब तो शशशृङ्ग भी ग्राह्य हो सकेगा ।' परंतु इस कथनमें कुछ सार नहीं है, क्योकि पुत्रका प्रागभाव पुत्र स्वयं ग्रहण नहीं करता । 'यह मैने देखा है' इससे स्वप्रागभाव अपनेसे गृहीत नही होता, यह व्याप्तिज्ञान होता है । इसी आधारपर यह कहना सङ्गत है कि 'अनुभव-प्रागभावको अनुभव नही ग्रहण कर सकता ।'