मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअधिष्ठानगत इदन्त्व-विषयत्व-संसर्गका भान [हो सकता है । अतः 'इदं रजतम्' यह द्वितीय ज्ञान इदंविषयक नहीं कहा जा सकता ।' कहा जा सकता है कि 'साक्षिचैतन्यसे ही सब पदार्थोंका भान हो सकता है, वृत्तिकी क्या आवश्यकता है ? यदि घटादिविषयक संस्कारके लिये वृत्ति आवश्यक भी हो, तो भी उसका निर्गम अनावश्यक है । परोक्षस्थलके समान ही अनिर्गत वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे ही घटादिका प्रकाश हो ही सकता है । फिर भी परोक्ष-अपरोक्षकी विलक्षणता वैसे ही उत्पन्न हो सकेगी, जैसे परोक्षमें भी शाब्द एवं अनुमितिमें करणविशेषप्रयुक्तवृत्तिसे विलक्षणता सम्पन्न हो जाती है।' अन्य लोगोंके अनुसार 'प्रत्यक्ष-स्थलमें विषयावच्छिन्न चैतन्य ही विषयप्रकाश होता है, अतः विषय-चैतन्यकी अभिव्यक्तिके लिये वृत्तिनिर्गम आवश्यक है । परोक्ष-स्थलमें व्यवहित वन्ध्यादिके साथ वृत्ति-संसर्ग नहीं होता, वहाँ इन्द्रियोंके समान वृत्ति-निर्गमका द्वार उपलब्ध नहीं होता, अतः अगत्या अनिर्गत वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य ही स्वरूपसम्बन्धसे विषय-प्रकाश माना जाता है ।' अन्य लोगोंके मता- नुसार जैसे साक्षात् चैतन्यसंसर्गी अहंकार तथा सुख-दुःखादिका चैतन्यसे प्रकाश होता है, वैसे ही विषयसंसृष्ट चैतन्य ही अपरोक्षताका हेतु है। अतः विषय-चैतन्यकी अभिव्यक्तिके लिये वृत्ति-चैतन्य आवश्यक है । अन्य लोगोंका कहना है कि 'शब्दानुमानावगत विषयोंकी अपेक्षा प्रत्यक्षा- वगत विषयकी स्पष्टता अनुभूत होती है । रसालके सौगन्ध्य-माधुर्यादिकी हजारों शब्दानुमानोंसे भी उतनी स्पष्टता नहीं होती जितनी रासन, घ्राणजादि प्रत्यक्ष-ज्ञानसे होती है; क्योंकि प्रत्यक्षके बिना रसालका माधुर्य-सौगन्ध्य कैसा है, यह जिज्ञासा बनी ही रहती है । अतः प्रत्यक्ष ग्राह्य पदार्थ अभिव्यक्त अपरोक्ष-चैतन्यसे अव- गुण्ठित होता है, इसलिये उसकी स्पष्टताविषयक जिज्ञासा प्रशान्त हो जाती है । शब्दसे रसालकी मधुरता आदिका ज्ञान होनेपर भी तद्गत माधुर्यादि वृत्ति अवान्तर जातिका बोध नहीं होता । इसीलिये साक्षिवेद्य सुखादि भी स्पष्ट हैं । शब्दवृत्ति- वेद्य ब्रह्म भी मननादिके पहले अस्पष्ट होता है । मननादिसे जब पूर्ण अज्ञान मिटता है तब स्पष्टता होती है।' इसपर भी कुछ लोग कहते हैं कि 'विषयावच्छिन्न चैतन्यगत आवरक अज्ञान अनिर्गतवृत्तिसे नष्ट हो सकेगा और कहीं अतिप्रसङ्ग भी नहीं होगा।' कहा जा सकता है कि 'समानविषयक होनेसे देवदत्तके घट- ज्ञानसे यज्ञदत्तके घटाज्ञानकी निवृत्ति होनी चाहिये । अहमर्थ एव विषयचैतन्यमें रहनेवाले ज्ञान-अज्ञानका भिन्नाश्रय होनेपर भी विरोध होगा ही, क्योंकि समाना- श्रयता विरोधका प्रयोजक नहीं।' परन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि समानाश्रय- विषयत्वको ज्ञानाज्ञानके विरोधका प्रयोजक मानकर वृत्ति-निर्गम माननेपर भी देव- दत्तीय घटज्ञान एवं यज्ञदत्तीय घटाज्ञान दोनों ही एक घटावच्छिन्न चैतन्यको