भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 866 में से

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६४६ मार्क्सवाद और रामराज्य अतएव तृतीय नियमका भी कोई अस्तित्व नहीं रह जाता । जहाँ बीज-सामान्यका अङ्कुर सामान्यके साथ कार्य-कारणभाव माननेपर बीजान्तरसे अङ्कुरान्तरकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग होता है, वही विशिष्य कार्य-कारणभाव मानना आवश्यक होता है । प्रकृतमें वह सर्वथा व्यर्थ है । कहा जा सकता है कि 'द्रव्यप्रत्यक्षमें द्रव्य-सयोग कारण है, यह सामान्य नियममात्र माननेसे अन्य द्रव्यसंयोगसे अन्य द्रव्य-प्रत्यक्ष होने लगेगा ।' परंतु यह ठीक नहीं, क्योकि तत्तद्द्रव्यके प्रत्यक्षमें तत्तद्द्रव्यसंयोग कारण है, ऐसा माननेपर कोई अतिप्रसङ्ग नहीं होता । अन्यथा अन्य रजतसंयोगसे अन्य रजतका प्रत्यक्ष होनेका अतिप्रसङ्ग भी अनिवार्य ही होगा । इसके अतिरिक्त 'इदं रजतं पश्यामि, नीलं जलं पश्यामि, नीलं गगनं पश्यामि' इत्यादि अनन्यथासिद्ध अनुभवों- में 'प्रत्यक्षमात्रमें विषय-संनिकर्ष कारण है' इत्यादि नियमोंका व्यावहारिक विषयमें ही संकोच करना चाहिये । कहा जा सकता है कि 'इस तरह तो यही कहना ठीक है कि प्रमामें संनिकर्ष कारण है, भ्रममें नहीं, यह भी सकोच कल्पना हो सकती है । फिर तो असंनिकृष्ट देशान्तरस्थ रजतादिका भी भ्रम हो सकता है । इस तरह अन्यथाख्यातिका प्रसङ्ग होगा।' परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि अभिव्यक्त चैतन्यका सम्बन्ध हुए बिना देशान्तरस्थ रजतकी अपरोक्षता नहीं बन सकती । रजतप्रतीति और बाध, दोनों ही बातोंमें भ्रमविषयक अनिर्वचनीय रजत- को स्वीकार किये बिना काम नहीं चल सकता । कहा जा सकता है कि 'अधिष्ठान-सम्प्रयोगमात्रसे यदि प्रातिभासिक रजत- को ऐन्द्रियक माना जायगा, तब तो शुक्ति-रजताध्यास समयमे ही वहीं कालान्तर- में अध्यसनीय रंग (राँगा) का भी चाक्षुषत्व होना चाहिये । परंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि रजताध्यास समयमे रग-रजतसाधारण चाकचिक्य दिखलायी पड़नेपर भी जिस रागादिरूप दोषके अभावसे वहाँ रगाध्यास नहीं होता, उसी- के कारण रगादिविषयक वृत्ति भी उत्पन्न नहीं होती । रजतमे रागादि होता है, इसीलिये रजताध्यास एव रजताकारवृत्ति उत्पन्न होती है । अतः इदमंशयुक्त रजता- कार एक ही वृत्ति इन्द्रियजन्य उत्पन्न होती है । उमके पहिले इदमाकारवृत्ति नहीं होती । परंतु अन्य लोगोंका मत है कि 'इदमाकारवृत्ति' एक ही होती है । वही अध्यासके प्रति कारण है । अध्यस्त रजतादिका उस वृत्तिसे अभिव्यक्त साक्षि- चैतन्यसे भान होता है । अतः रजताकारवृत्ति निरर्थक है।' अन्य लोगोंके मतानुसार 'इदमाकार सामान्य-ज्ञानरूपिणी एक ही वृत्ति होती है । इद एवं रजत- के तादात्म्यगोचरवृत्ति दूसरी होती है । अतः दो ज्ञान ही मान्य होना ठीक है।' अन्य लोगोंका मत है कि 'जैसे इदमंशावच्छिन्न चैतन्यस्थ अविद्या रजत- ज्ञानाभासरूपसे परिणत होती है, इदंवृत्तिके तुल्य रजतज्ञान अनध्यस्त नहीं है, जैसे रजतमें अधिष्ठानगत इदंताके संसर्गका भान होता है, वैसे ही रजतज्ञानमें

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