मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 404, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंहो सकता। यदि यहाँ नैल्यसंसृष्ट तादृग् जल या गगनादि-अधिष्ठान-गोचर चाक्षुषवृत्ति स्वीकार नहीं की जायगी, तब तो चक्षुका अनुपयोग दुष्परि- हार्य ही होगा। 'पञ्चपादिका' कारकी दृष्टिमें जिस बालकने इस जन्ममें तिक्तरसका अनुभव नहीं किया है, उसे मधुर दुग्धमें तिक्तताकी प्रतीति जन्मान्तरीय अनुभवजन्य संस्कारसे होनी मान्य है। इससे स्वरूपतः अध्यस्त तिक्तरसका रसनासे ही अनुभव मानना स्पष्ट है। अन्यथा रसना-व्यापारके बिना भी तिक्तताकी प्रतीति होनी चाहिये। अतः पूर्वोक्त नीलता-अध्यासस्थलोंमें भी अधिष्ठानसम्प्रयोगसे तद्विषयक चाक्षुषवृत्तिका उदय होता है और उसी समय नीलताका अध्यास होता है। वही अध्यस्त नीलता उस वृत्तिका विषय होती है अतः वह भी चाक्षुष ही है; क्योंकि रूपके बिना गगनादि अधिष्ठानोंमें चाक्षुषवृत्ति हो नहीं सकती। अतः अधिष्ठानावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति न होनेसे अध्यस्तनीलता अधिष्ठान-चैतन्यसे भास्य नहीं हो सकती। तिक्त-रसस्थलोंमें तो अध्यस्त एवं अधिष्ठान दोनों ही एक रसनेन्द्रियग्राह्य नहीं है। त्वक् इन्द्रियसे मधुर दुग्धरूप अधिष्ठान गोचरवृत्ति उत्पन्न होती है। उस वृत्तिसे अधिष्ठान-चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेसे पित्तोपहत रसनाका सम्प्रयोग होता है, उसी चैतन्यमें तिक्तरसका अध्यास होता है। उसी समय अध्यस्त रसविषयक रासनवृत्ति उत्पन्न होती है। त्वगिन्द्रियजन्य अधिष्ठानगोचरवृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्यसे भास्य तिक्तरसमें यदि परम्परासे भी रसनाका उपयोग न होगा तो रासनत्वानुभवका समर्थन किसी भी तरह नहीं होगा। इसी तरह रजतके भी चाक्षुषत्वकी उत्पत्ति हो सकती है। अतएव 'चक्षुषा रजतं पश्यामि' (नेत्रसे रजत देखता हूँ) यह अनुभव होता है। कहा जा सकता है कि 'चक्षुसे रजतका सनिकर्ष हुए बिना ही यदि रजतमें चाक्षुषत्व हो, तब तो प्रत्यक्ष रजतमें विषयेन्द्रिय-सनिकर्ष कारण है, द्रव्य-प्रत्यक्षमें द्रव्येन्द्रिय-सयोग कारण है। रजत-प्रत्यक्षमें रजतेन्द्रिय-सयोग कारण है, इत्यादि कार्य-कारणभाव भङ्ग होगा।' परन्तु यह कोई दोष न होगा। सनिकर्ष, सयोगादि कोई एक कारण अनुगत नहीं है, अतः प्रथम नियम नहीं बनता। नैयायिकोंके मतमें सयोगायोग्य तमरूप अद्रव्यमें भी द्रव्यत्वका अध्यास होता है और सयोगायोग्य गुणादिमें भी द्रव्यत्वका अध्यास होता है, अतः द्वितीय नियमका अभिप्राय यह है कि व्यावहारिक द्रव्यत्वाधिकरणके प्रत्यक्षमें इन्द्रिय- सयोग कारण है, अतः प्रातिभासिक रजतमें तो अधिष्ठानगत इदंत्वके समान ही अधिष्ठानगत द्रव्यत्वका भी आरोप ही होता है। इसलिये प्रातिभासिक द्रव्यत्वाधि- करण रजतके इन्द्रियसयोगके बिना भी प्रत्यक्ष होनेमें कोई हानि नहीं है।