भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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अर्थ है, उसकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? अतः इदंवृत्तिके अनन्तर तज्जन्य तदभिव्यक्त साक्षीमें ही रजतका अध्यास होता है. इसलिये साक्षीमे ही रजतका भान होता है । रजतमे चाक्षुषत्वका अनुभव इसलिये होता है कि स्वभासक चैतन्य- व्यञ्जक इदंवृत्तिका चक्षु जनक है, अतः परम्परासे चक्षुर्जन्य होनेके कारण चाक्षु- षत्वका अनुभव होता है । इस पक्षमे अन्य लोग यह दोष देते हे कि 'इस तरह तो पीत शङ्ख- भ्रममें चक्षुकी अपेक्षा न होनी चाहिये; क्योकि रूपके बिना केवल शङ्ख चक्षुसे ग्राह्य हो नही सकता । पीतिमा ग्रहणके लिये भी चक्षु अनावश्यक है, क्योकि साक्षिभास्यत्व-पक्षमें आरोप्य ऐन्द्रियक मान्य नहीं होता ।' यह भी नहीं कहा जा सकता कि 'पीतिमाका स्वरूपाध्यास नहीं होता, अपितु नयनगत पित्तकी पीतिमा ही अनुभूयमान होती है। उसका केवल शङ्ख-संसर्ग ही अध्यस्त होता है, इसलिये उसी पीतिमाके अनुभवार्थ चक्षुकी अपेक्षा होती है ।' कारण इस [