मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३६ मार्क्सवाद और रामराज्य एक ज्ञानसे अज्ञानका नाश होनेपर तत्समानविषयक ज्ञानान्तरोंमें आवरणा- भिभावकता कैसे होगी ?' यह भी ठीक नहीं है, क्योकि जितने ज्ञान हैं, उतने ही अज्ञान हैं। इसलिये प्रत्येक ज्ञानसे प्रत्येक अज्ञानका नाश होता है। यह अवस्थारूप अज्ञान मूलाज्ञानके तुल्य ही अनादि है। व्यावहारिक जगत् और जीवको आवृत करके स्वाप्निक जीव-जगत्को प्रतिभासित करनेवाली आवरण एव विक्षेप-शक्तिवाली निद्रा अज्ञानकी अवस्था है। इसी तरह सुषुप्तिमें अन्त:करणादिके विलीन होनेपर 'सुखमहमस्वाप्सम्, नाहं किंचिदवेदिषम्' ( मै सुखपूर्वक सोया, मैने कुछ नही जाना ) इस तरह स्मरण होनेसे मूलाज्ञानके तुल्य अनुभूयमान सुषुप्ति भी अज्ञानकी अवस्थाविशेषरूप ही है। जाग्रत् भोगप्रद कर्मोंके उपरम होनेपर इन दोनो ही अवस्थाओका प्रादुर्भाव होता है, अतः ये सादि हैं। इसी तरह अन्य अवस्था—अज्ञान भी सादि ही है। यदि सभी मूलाज्ञान अनादि माने जायें तब तो प्रथम उत्पन्न घटज्ञानसे ही घटविषयक सभी अज्ञानोका नाश होगा। किस अज्ञानका नाश हो किसका न हो, इसमें कोई विनिगमका अर्थात् निर्णायक युक्ति नहीं है। 'घटावच्छिन्न चैतन्यावरक सर्व अज्ञानोके नाश हुए बिना घटविषयक प्रकाश ही न होगा। अतः पीछे होनेवाले ज्ञान आवरणके अभिभावक सिद्ध न होंगे।' इसका समाधान कुछ लोग यह करते हैं कि 'जैसे अनेक ज्ञान-प्राग- भावोंके रहनेपर भी एक ज्ञानसे एक ही प्रागभाव नष्ट होता है, संशयादि- उत्पादनमे समर्थ घटावरणरूप अन्य ज्ञान-प्राग्भावोके रहनेपर भी घटज्ञानसे एक घटप्राग्भावके नष्ट होनेपर ही घटविषयका प्रकाश होता है, वैसे ही एक ज्ञान उत्पन्न होनेपर एक ही अज्ञान निवृत्त होता है, इतर अज्ञानोके रहनेपर भी विषयका प्रकाश होता है।' दूसरे लोगोका मत है कि 'सब अज्ञान सर्वदा आवरण नहीं करते, किंतु जिस समय जो अज्ञान आवरण करता है, उस समयके उस ज्ञानसे उसी अज्ञानका नाश होता है। वृत्तिद्वारा आवरक अज्ञानका नाश होनेपर जब वृत्ति उपरत होती है, तब अन्य अज्ञान आवरण करते हैं।' इसपर कहा जाता है कि 'यदि सब अज्ञान सर्वदा आवरक न हो तब तो ब्रह्मज्ञानकालमें ब्रह्मज्ञानसे भी उन अज्ञानोकी निवृत्ति नहीं होगी, फिर तो मुक्तिमें भी उन अज्ञानोकी प्रसक्ति होगी।' परंतु यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि उक्त सभी अज्ञान मूलाज्ञानकी अवस्था ही हैं, अतः ब्रह्मज्ञानसे मूलज्ञानके नष्ट होनेसे उसके अवस्थाभूत अन्य अज्ञानोका भी नाश होना सङ्गत है। कई लोग कहते हैं कि 'अज्ञान स्वभावसे ही सविषय होता है, अतः सभी अज्ञान सर्वदा ही अपने विषयको आवृत करते हैं।' कहा जा सकता है कि 'घटादिविषयकी उत्पत्तिके पहले अज्ञान किसे आवृत करेगा ?' परंतु कारणमें