मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३२ मार्क्सवाद और रामराज्य शङ्का होती है कि 'क्या चैतन्यके असङ्ग होनेके कारण स्वतः विषयोपराग असम्भव होनेसे विषयोपरागके लिये अन्तःकरण-उपाधि अपेक्षित है अथवा उपराग होने- पर भी विषय प्रकाश-सिद्धिके लिये अन्तःकरण-उपाधि मान्य है ?' पहला पक्ष ठीक नहीं है, क्योकि असङ्गी होनेसे अन्तःकरणोपाधिपर भी चैतन्यका उपराग सम्भव नहीं है। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योकि चित् सम्बन्धसे ही प्रकाश सिद्ध होता है, फिर उपाधि व्यर्थ है। तब तो उपाधि-परित्यागसे सर्वगत चैतन्यसे संयुक्त सर्ववस्तु- का प्रकाश होना ही चाहिये। इसी प्रकार यह समाधान भी पर्याप्त नहीं है कि 'प्रति- बिम्बभूत जीव चैतन्य परिच्छिन्न होनेसे सर्वभासक नहीं हो सकता।' बिम्बभूत ईश्वरकी सर्वज्ञता मान्य ही है। यद्यपि जीव-ब्रह्मका अद्वैतवेदान्तमें भेद मान्य नहीं है, तथापि व्यावहारिक अल्पज्ञता-सर्वज्ञता आदिका भेद तो है ही; क्योंकि विषयका अनुभव ब्रह्मचैतन्यरूप है । जीवमे सर्वज्ञताके समान ही अल्पज्ञता भी नहीं बन सकेगी। यदि कहा जाय कि 'जीवोपाधि अन्तःकरणका चक्षु आदिद्वारा विषयसम्बन्ध होता है, अतः जीव विषयोंका ज्ञाता हो सकेगा' सो भी ठीक नहीं, क्योकि यदि अन्तःकरणसे सृष्ट होनेसे जीव ज्ञाता हो तब तो जीवको सदा ही ब्रह्मस्वरूपका भी ज्ञाता होना चाहिये, क्योकि सर्वगत ब्रह्मका अन्तःकरणके साथ संसर्ग है ही। यदि कहा जाय कि 'अविद्योपाधिक ही जीव सर्वगत है और वह सभी जगत्को प्रकाशित कर सकता है फिर भी वह अविद्यासे आवृत होनेके कारण स्वयं भी अप्रकाशमान रहता है, अतएव 'अहमज्ञः' ऐसा अनुभव होता है। अविद्या यद्यपि परिच्छिन्न है, फिर भी वह सर्वगत चैतन्यका तिरोधान करती है। नेत्रके समीपमे धारित अङ्गुलिमात्रमे महान् आदित्यादिका भी तिरोधान होता ही है। इस दृष्टिसे जहाँ अन्तःकरणका उपराग (सम्बन्ध) होता है, वही अविद्या-आवरणका अभिभव होता है । वहाँ ही अभिव्यक्त चैतन्यसे किंचित् अंशका ही प्रकाश होता है।' परतु यह ठीक नहीं है; क्योकि अविद्याकार्यभूत अन्तःकरणसे अविद्याका अभिभव असम्भव है। इसलिये प्रतिकर्म-व्यवस्था नहीं बन सकती। इन सब बातोका वेदान्तीय समाधान यह है कि जीव चैतन्य असङ्ग होनेसे यद्यपि अन्यसम्बन्धित नहीं होता, तथापि अन्तःकरणसे उसका सम्बन्ध होता है; क्योकि अन्तःकरणका ऐसा ही स्वभाव है। जैसे सर्वगत भी गोत्वजाति सास्नादि (गल-कम्बलादि) मती गो-व्यक्तिमें ही सम्बन्धित होती है, अन्यत्र नहीं, वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये। अथवा जैसे प्रदीप-प्रभा रूप, रस, गन्ध, वायु आदि प्रदेशोंमें व्याप्त होनेपर भी रूपको ही प्रकाशित करती है, अन्यको नहीं, वैसे ही अन्तःकरण-उपाधि चैतन्यसे विषयोपराग-सिद्धिके लिये सङ्गत होगी । उपरागके बिना चित्प्रकाश विषयोंका प्रकाश नहीं कर सकता। जैसे प्रदीप-प्रकाश स्वसंयुक्त- का ही द्योतक होता है, वैसे ही चैतन्य भी स्वोपरक्तका ही प्रकाशन कर सकता है। ब्रह्म सर्वप्रपञ्चका उपादान कारण है, अतः औपाधिक उपरागके बिना ही स्वस्वरूप-