मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके समान ही स्वाभिन्न सर्वजगत्का प्रकाशन करता है। जीव ऐसा नहीं कर सकता, क्योकि वह प्रपञ्चका उपादान नहीं है। कहा जा सकता है कि 'जब जीव स्वतः अवभासक नहीं है, तब घटादिके समान ही अन्य सम्बन्धसे भी प्रकाशक नहीं हो सकता।' परन्तु यह ठीक नहीं। केवल लौह तृणादिका दाहक न होनेपर भी लौहपिण्डपर व्यक्त अग्नि जैसे तृणादिका दाहक होता है, वैसे ही असङ्ग-साक्षी चैतन्य विषयोंका प्रकाशक न होनेपर भी अन्तःकरणवशात् निरावरण होकर विषयोंका प्रकाशक होगा। जिस पक्षमे अन्तःकरणस्थ चित्प्रतिबिम्ब ही जीव है, तब तो परिच्छिन्न होनेसे सुतरां प्रतिकर्म व्यवस्था उपपन्न होगी। भले ही विषयानुभव ब्रह्म-चैतन्य हो, फिर भी जीवोपाधिभूत अन्तःकरणका वृत्तिरूप परिणाम जबतक विषयाकार नहीं होता, तबतक वह अव्यक्त ही रहता है। विषयाकार अन्त.करण वृत्तिपर अभिव्यक्त चैतन्यको जीव-चैतन्य भी कहनेमे कोई विरोध नहीं है। ब्रह्मके अन्तःकरण-संसृष्ट होनेपर भी ब्रह्माकार अन्तःकरण वृत्ति न होनेसे जीवको सदा ब्रह्म ज्ञान-प्रसङ्ग नहीं आता। अन्तःकरणस्वरूप मात्र वस्तुका व्यञ्जक नहीं होता, किंतु तत्तद्वस्तवाकार- अन्तःकरणके परिणाम ही उन-उन वस्तुओके व्यञ्जक होते हैं। अतएव तदाकार- वृत्ति न होनेसे ही अन्त.करणमे ही रहनेवाले धर्मादिकी अभिव्यक्ति नहीं होती। जीव भी जीवाकार अहंवृत्तिरूपसे परिणत अन्तःकरणमे ही अभिव्यक्त होता है, अन्तःकरणमात्रमे नहीं। इसीलिये सुषुप्तिमे अहंवृत्ति न होनेसे जीवकी भी प्रतीति नहीं होती। इस तरह अन्तःकरण प्रतिबिम्ब जीवत्व-पक्षमे भी सब व्यवस्था बन जाती है। जिस पक्षमे अविद्योपाधिक सर्वगत जीव है, उस पक्षमे भी आवरणतिरो- धायक अन्तःकरणसे सब व्यवस्था बनती है। जैसे, गोमय-कार्य वृश्चिक एवं मृदादि- कार्य वृक्ष अपने कारण गोमय तथा मृदादिके तिरोधायक होते हैं, वैसे ही अविद्या- कार्य अन्तःकरण भी अविद्याका तिरोधायक बन जाता है। वृश्चिक-शरीरमें गोमयके और वृक्ष-शरीरमें मृदादिके किंचित् भी अंशकी प्रत्यभिज्ञा नहीं होती। इस तरह वेदान्तमतमें प्रमात्रादि व्यवहार ठीक सम्पन्न हो जाते हैं। चिदुपरागके लिये अथवा विषय चैतन्याभेदकी अभिव्यक्तिके लिये या आवरणाभिभवके लिये वृत्तिका उपयोग हो सकता है। वृत्तिके द्वारा चैतन्य तथा विषयका विषय विषयीभाव सम्बन्ध होता है। कुछ लोग विषयसंयुक्त वृत्तिके तादात्म्यसम्बन्धसे चैतन्यद्वारा विषयका प्रकाश मानते हैं। अन्य लोगोका मत है कि अपरोक्ष जीव-चैतन्यके साथ साक्षात् सम्बन्ध- से ही सुखादिका साक्षात्कार होता है, अतः परम्परासम्बन्ध ग्रहण न करके साक्षात् सम्बन्ध ही ग्रहण करना चाहिये। इसलिये जैसे तरङ्ग और तरुके ससंसर्गमे तरुमें नदी-स्पर्श माना जाता है, वैसे ही विषयवृत्ति-संसर्गसे जीव-विषय-संसर्ग भी मान्य