मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३४ मार्क्सवाद और रामराज्य है। जैसे कारणाकारण-संयोगसे कार्याकार्य संयोग होता है, वैसे ही कार्याकार्य- संयोगसे कारणाकारण-संयोग भी होता है; अर्थात् नैयायिक लोग जैसे हस्त एवं वृक्षके संयोगसे देह-वृक्षका संयोग मानते हैं, हस्त अवयव होनेसे शरीरका कारण है, वृक्ष शरीरका अकारण है। कारण (हस्त) तथा अकारण (वृक्ष) के संयोगसे कार्य (शरीर) तथा अकार्य (वृक्ष) का सम्बन्ध मान्य है, वैसे ही वृत्ति जीव- चैतन्यका कार्य है और विषय अकार्य है, अतः कार्य (वृत्ति) तथा अकार्य (विषय) संयोगसे कारण (जीव-चैतन्य) और अकारण (विषय) का भी सम्बन्ध बन जायगा। इस तरह वृत्तिद्वारा जीव-चैतन्यका विषयके साथ साक्षात् सम्बन्ध बन जाता है। कुछ लोगोंका यह भी मत है कि 'अन्तःकरणोपहित विषयावभासक चैतन्यका विषयतादात्म्यापन्न ब्रह्म-चैतन्यके साथ अभेदाभिव्यक्तिद्वारा विषयतादात्म्य- सम्पादन ही चिदुपराग है।' इस पक्षमें विषयकी अपरोक्षतामें आध्यासिक सम्बन्ध ही मुख्य कारण है। वृत्तिद्वारा अभेद व्यक्त होनेपर विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न जीवचैतन्य एक ही हो जाता है, अतः विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यमें अध्यस्त विषय-विषयावच्छिन्न चैतन्याभिन्न अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यरूप जीवचैतन्यमें भी अध्यस्त समझा जा सकता है। अभेदाभिव्यक्ति क्या है, इसपर कुछ लोगोंका कहना है कि 'जैसे कुल्याद्वारा तड़ाग एवं केदारसलिलकी एकता होती है, वैसे ही वृत्तिद्वारा विषय एवं अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यकी एकता होती है। यद्यपि विषयावच्छिन्न चैतन्य ब्रह्म-चैतन्य ही है और वही विषय-प्रकाशक है, तथापि वृत्तिद्वारा जीव- चैतन्यके साथ अभेद होनेसे उसमें जीवत्व सम्पन्न हो जाता है, इसलिये जीव विषयका प्रकाशक बन सकता है।' दूसरे लोग कहते हैं कि 'बिम्बस्थानीय विषयावच्छिन्न चैतन्य ब्रह्मके साथ प्रतिबिम्बभूत जीवकी (अभेदाभिव्यक्ति) नहीं होती। व्यावर्तक- उपाधि दर्पणके समान जबतक बनी है तबतक उपहितोंकी एकता नहीं हो सकती। जबतक दर्पण है तबतक बिम्ब-प्रतिबिम्बभाव रहेगा ही। इसी तरह अन्तःकरणादि उपाधि जबतक है तबतक जीव ईश्वरभाव रहेगा ही। फिर ब्रह्म-चैतन्यका जीवचैतन्य बनना असम्भव ही रहेगा। यदि वृत्तिकृत अभेदकी अभिव्यक्तिसे विषयावच्छिन्न ब्रह्म जीव हो जायगा, तब तो ब्रह्मका विषय-संसर्ग न रहनेसे ब्रह्म उस विषयका ज्ञाता न रहेगा। फिर उसकी सर्वज्ञता बाधित होगी। अतः विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य विषयसंसृष्ट वृत्तिके अग्रभागमें विषयप्रकाशक प्रतिबिम्बका समर्पण करता है। उसी प्रतिबिम्बका जीवके साथ एकीभाव होता है। इसी तरह अन्तःकरण, वृत्ति तथा विषयोंसे अवच्छिन्न चैतन्योंमें क्रमेण प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेय-व्यवहार असंकररूपसे सम्पन्न होगा। कहा जा सकता है कि 'वृत्तिसे उपहित चैतन्य विषय-प्रमा होगी, उसका विषयाधिष्ठान चैतन्यके समान विषयके साथ आध्यासिक सम्बन्ध नहीं होगा।