मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
होते हैं । उनमें उत्तरोत्तर स्पष्टता होती रहती है । शिक्षणपरम्परा या किसी कारणसे अभिव्यक्त विशेष ज्ञान ही सामाजिक चेतनाका मूल है । अतएव श्रम- क्रिया-शक्तिजनित सामाजिक विकास अंशतः मान लेनेपर भी हर क्रियाके मूलमें ज्ञान है । यह न भूलना चाहिये कि क्रिया इच्छाजन्य है, इच्छा ज्ञान- जन्य है, क्रियाजन्य जब इच्छा भी नहीं है, तब इच्छाका भी जनक ज्ञान क्रियाजन्य कैसे होगा ? प्रयोगकी प्राथमिकताकी बुनियादपर प्रयोग और सिद्धान्तके समन्वय- का मार्क्सकीय शिक्षाका सिद्धान्त सर्वथा असङ्गत है । द्वन्द्वन्याय और विकास मार्क्सवादी कहते हैं कि "जगत् परिवर्तनशील है। विकास परिवर्तनका ही एक प्रकार है। इस परिवर्तनको देखनेके विभिन्न दृष्टिकोण हैं। अतिभौतिकवादी और नैसर्गिकवादीका दृष्टिकोण एक है। और द्वन्द्वात्मक भौतिकवादीका दृष्टिकोण और है। लेनिनकी व्याख्यासे इसपर काफी प्रकाश पड़ता है। विकास विरोधियोंका सङ्घर्ष है। विकासकी दो ऐतिहासिक धाराएँ हैं । पहली विकासवृद्धि और ह्रास तथा दुहरानेके रूपमें और दूसरी विकासविरोधियोंके समन्वित एकत्व तथा परस्परसम्बन्धित रूप- में । पहली धारणा मृत, शुष्क, निःसार है, दूसरी जीवित है । दूसरी धारणाके द्वारा ही हर विद्यमान वस्तुकी स्वयं गति समझी जा सकती है और इसकी कल्पना की जा सकती है कि पुरानेका ध्वंस होकर नयेका आविर्भाव कैसे होता है' ( लेनिन—मेटेरियेलिज्म एण्ड इम्पीरियलिज्म—क्रिटिसिज्म ) "विकासकी पहली धारणासे हम मौलिक परिवर्तनको नहीं समझ सकते । इस धारणाके अनुसार परिवर्तनको क्रमपरिवर्तनके रूपमें देखा जाता है । 'परिवर्तित वस्तु भी मुख्यतः मूल वस्तु ही है। मूल वस्तुमें परिवर्तनकी मात्रा अत्यल्प होती है और इन स्वल्प मात्राओंको जोडकर ही परिवर्तित वस्तु बन जाती है । लेकिन इस प्रकार मौलिक परिवर्तनोंको समझा नहीं जा सकता । उदाहरणोंसे यह सिद्ध है कि प्राकृतिक वस्तुओंकी एक अवस्थासे दूसरी अवस्थाकी कुदान होती है। प्रकृतिमें क्रान्तिकारी परिवर्तनके उदाहरण मिलते हैं । विकास ही प्रकृतिका एक- मात्र नियम नहीं है, क्रान्तिकारी परिवर्तनका भी उसमें स्थान है । किसी वस्तुके आविर्भाव या तिरोभावकी कल्पना उसके क्रमशः आविर्भाव या तिरोभावकी कल्पना है । लेकिन सत् ( अस्तित्व ) का परिवर्तन न केवल एक गुणसे दूसरे गुणका परिवर्तन है, बल्कि परिमाणात्मकसे गुणात्मक परिवर्तन है । इस प्रकार एक परिवर्तन घटित होता है, जो एक दृश्यगत घटनाको दूसरीके स्थानापन्न करता है और धारा टूट जाती है, जब प्रवाहकी धारा टूट जाती है, तब विकासके रास्तेमें एक आकस्मिक परिवर्तन घटित होता है । हीगेलने अनेकों दृष्टान्तोंसे
६०८ मार्क्सवाद और रामराज्य यह प्रमाणित किया है कि 'प्रकृति और इतिहासमें कितनी ही बार आकस्मिक परिवर्तन होते रहते हैं।' साधारण जन-विदित विकासवादके सिद्धान्तके पोलेपनको उन्होंने अच्छी तरह दर्शाया है। हीगेलके शब्दोंमे क्रमविवर्तनकी बुनियादी बात यह है कि जिसका आविर्भाव होता है, वह पहलेसे ही विद्यमान रहता है, केवल सूक्ष्म होनेके कारण अदृश्य रहता है। इसी प्रकार जब हम किसी दृश्यगत घटनाके तिरोभावकी बात करते हैं, तब हम ऐसी कल्पना करते हैं कि जिसका तिरोभाव होता है, वह तिरोहित हो चुका है और पूर्वगत घटनाका जो स्थान लेता है, वह पहलेसे ही विद्यमान है, लेकिन दोनो ही दृष्टिगोचर नही होते। परंतु इस प्रकारसे हम आविर्भाव या तिरोभावके सम्पूर्ण ज्ञानको दबा देते हैं। किसी घटनाके आविर्भाव या तिरोभावकी व्याख्या क्रमविवर्तनके द्वारा करना शब्दसम्भारमात्र है और इसका अन्तर्हित अर्थ यह है कि जो वस्तु आविर्भाव या तिरोभावकी प्रक्रियामें है, हम ऐसा समझते हैं कि वह आविर्भूत या तिरोहित हो चुकी है ! 'हीगेलने स्वयं इस वस्तुका जो वर्णन दिया है, वह महत्त्वपूर्ण है। लोग परिवर्तनको उसके क्रमकी न्यूनतासे अपनी कल्पनाके अन्तर्गत करना चाहते हैं, लेकिन क्रमिक परिवर्तन नाममात्रका परिवर्तन है और गुणात्मक परिवर्तनके विपरीत है। क्रमिकता दो वास्तविकताके संयोगको, चाहे ये दो अवस्थाएँ हों, चाहे दो स्वतन्त्र वस्तु, दबा देती है। परिवर्तन समझनेके लिये जिनकी आवश्यकता है, उनका अपसरण हो जाता है। संगीतसम्बन्धोंमें परवर्ती स्वर आरम्भके मूलस्वरसे दूर हट जाता है। फिर ऐसा मालूम होता है कि एकाएक वह मूलस्वर लौट आया। यह पिछले स्वरमें जोड़का परिणाम नहीं है, इसका सम्बन्ध दूरके स्वरसे मालूम पड़ता है। सब मृत्यु और जन्म धारावाहिक क्रमिक न होकर इसके विघ्न ही हैं और परिमाणात्मकसे गुणात्मक परिवर्तनकी यह एक कुदान है। साधारण कल्पना जब कि किसी उत्थान या निर्वाणका ख्याल करती है, तब इसे वह क्रमिक उत्थान या निर्वाणके रूपमे देखती है, परंतु अस्तित्वमें परिवर्तन न केवल एक परिमाणसे दूसरे परिमाणका रूपान्तरण है, बल्कि गुणात्मकसे परिमाणात्मक तथा इसके विपरीत रूपान्तरणमें है। यह स्वरसे भिन्न होनेकी एक क्रिया है, जो क्रमकी धारा तोड़ देती है। "प्रारम्भिक बात यह है कि प्रकृतिको समझनेके लिये इसके इतिहासके अध्ययनकी आवश्यकता है। परिमाणकी दृष्टिसे यह तो निश्चय ही है कि किसी भी मुहूर्तमें विश्व ( संसार ) वही है, जो पहले था और जो कि भविष्यके संसार- के निर्माणकी क्रियामें है । इसी अनुमानके आधारपर विश्व ( संसार ) बुद्धिगम्य और व्यवहारयोग्य है । गुणात्मक दृष्टिसे यह समानरूपमें स्वयं सिद्ध है कि किन्हीं दो मुहूर्तोंमें विश्व ( ससार ) एक-सा नहीं है। यहाँतक हालत डार्विन
की क्रान्तिकारी पुस्तक 'ओरिजन आफ मैन' के प्रकाशित होनेके बाद, साधारण विकासवादकी कल्पनाके अनुरूप ही है। लेकिन यदि इस कल्पनाको व्यवहारोप- योगी बनाना है तो इसे और गहराईतक ले जाना पड़ेगा। विशेषकर इस जानकारीकी आवश्यकता है कि विश्व ( संसार ) का निरन्तर रूप-परिवर्तन ऊपरी परिवर्तनतक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका बुनियादी संघटन भी उसमें सम्मिलित है और वे गतियाँ भी, जिनके योगकी सम्पूर्णतामें विश्वकी क्रियाशीलता है। इस ज्ञानसे भी इसको समृद्ध करना चाहिये कि विश्वके असीम परिवर्तनमें अपरिवर्तनीयताकी मात्रा कितनी है। विज्ञानमें पुनरावर्तनके दृष्टान्तोंसे यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है।'"
पर ये बातें अविचारितरमणीय हैं। वस्तुतः विकास परिणामका ही एक स्वरूप है। परिणामवादमे सत्कार्यवाद ही मान्य होता है। क्रमपरिवर्तन या प्राकृतिक वस्तुओंकी एक अवस्थासे दूसरी अवस्थामें कुदान अर्थात् क्रान्तिकारी परिवर्तन सब परिणाम ही हैं। बादलोंकी टक्करसे तत्काल दिग्दिगन्तव्यापी महाविद्युत्प्रकाशका विकास, काष्ठसे अग्निका क्रमिक विकास, जलका शीतल होना या बर्फ बन जाना, गर्म होना या भाप बन जाना, कुछ भी परिणामसे भिन्न नहीं है और न तो मूल वस्तुसे अत्यन्त भिन्न किसी वस्त्वन्तरका निर्माण ही होता है। अल्पज्ञ, अल्पायु मानवोंकी दृष्टिमे उत्तरोत्तर नवीन-नवीन वस्तुका ही विकास होता है। परंतु ईश्वर और दीर्घायु, दीर्घज्ञ, दीर्घदर्शी महर्षियोंकी दृष्टिमें वही भूतग्राम पुनः-पुनः उत्पन्न होकर प्रलीन हुआ करता है—'भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।' (गीता ८।१९)। किसी प्रकारका भी परिवर्तन मर्त्यता, शुष्कता एव निःसारताका ही द्योतक है। जड वस्तु न स्वयं गति है, न सार और न अमृत ही है; बल्कि वह क्रियाशील, विकारी एव ध्वस्त होनेवाली वस्तु है। जो भी उत्पन्न होनेवाली वस्तु है; उसकी वृद्धि, परिणाम, अपक्षय एवं विनाश ध्रुव है। अविनश्वर तो सर्वकारण, सर्वाधिष्ठान, अखण्डबोधात्मक ब्रह्मात्मा है, जिसे मोहवश मार्क्सवादी भुलानेका प्रयत्न करते हैं। मार्क्सवादी और हीगेल जिसे 'आकस्मिक घटना एव प्रकृतिकी कुदान या क्रान्ति' कहते हैं, विकासवादी जिसे 'क्रमिक' कहते हैं, दोनोंका ही सांख्यीय परिणामवादमें अन्तर्भाव है। केवल शीघ्रता एव विलम्बमात्रसे परिणाममें भेद नहीं हो जाता और इस अर्थमें कि अत्यन्त अविद्यमान ( बालूमें तेल-जैसी चीज ) का कभी भी आविर्भाव नही हो सकता, कोई भी आकस्मिक घटना नहीं होती। परंतु एक अल्पज्ञकी दृष्टिमें कई वस्तुएँ आकस्मिक ही प्रतीत होती हैं। जलके बर्फ बन जाने या भाप बन जानेपर स्थूल रूपमे क्रमविच्छेद प्रतीत होने-
पर भी सूक्ष्मक्रम ज्यो-का-त्यो विद्यमान रहता ही है। चाहे जन्म और मरण हो, चाहे परिमाणात्मकसे गुणात्मक परिवर्तन हो, चाहे गुणात्मकसे परिमाणात्मक परिवर्तन हो, मूल वस्तुका अत्यन्त विच्छेद कभी नहीं होता। माता-पिताका सूक्ष्म शुक्रशोणित ही एकत्रित होकर क्रमेण विकसित होकर गर्भावस्था, शैशवावस्था, यौवन एवं वार्धक-अवस्थाको प्राप्त होता है। 'जायते अस्ति वर्धते' आदि षड्विध भावविकारको प्राप्त होते हुए भी मूलतः प्राकृतिक वस्तु ही सब कुछ थी और है। परमार्थ-सत्यदृष्टिसे सब कुछ स्वप्रकाश सत्से अनतिरिक्त ही है। दो अवस्थाएँ या दो स्वतन्त्र अवस्थावाली वस्तुएँ मूल वस्तुसे भिन्न नहीं होतीं, अतः उनका संयोग भी कोई नयी वस्तु नहीं है। रूईसे चाहे कितने भी चमत्कारपूर्ण वस्त्र, मृत्तिकासे कितने ही अच्छे मकान और लोहेसे कितने ही अच्छे यन्त्र बन जायँ, फिर भी क्या ये सब वस्तुएँ चाकचिक्यमात्रसे मूल वस्तुसे भिन्न हो जायेंगी ? बर्फ बन जानेपर भी क्या जलसे कोई बर्फ स्वतन्त्र वस्तु हो जायगी ? मार्क्सवादियों एव हीगेलियन लोगोके वागाडम्बरमात्रसे कार्य कभी कारणसे भिन्न नहीं हो सकता। संगीतके स्वरोमें भी परस्परभिन्नता और विच्छिन्नता आरोहावरोहसे भिन्न होते हुए भी परिणामीके क्रमिक परिणाममें कोई अन्तर नहीं है। पुष्कर-शतपत्रका तत्क्षणच्छेद यद्यपि अक्रमिक ही प्रतीत होता है, फिर भी वहाँ सूक्ष्म क्रम रहता ही है। निर्वाण या निर्माणमें भी मूल वस्तुसे भिन्नका अस्तित्व नहीं होता। प्रकृतिके पदार्थोंमें एक-सी परिणामधारा नहीं होती। वह धारा कभी सूक्ष्म होती है, कभी स्थूल। सूक्ष्म धाराका स्थूल धाराके रूपमें परिवर्तन ही जन्म कहा जाता है। स्थूल धाराका पुनः सूक्ष्म धारामें परिवर्तन होनेमे ही ध्वंस या मरणका व्यवहार होने लगता है। इसीको 'धारा टूट जाना' कहा जाता है। इसीमें मूल वस्तु भिन्न होनेकी भ्रान्ति होने लगती है। इतिहासका अध्ययन और उससे भी अधिक दर्शनका अध्ययन - प्राकृतिक परिणाम समझनेके लिये आवश्यक है। किसी प्रकारके परिवर्तन एवं परिवर्तनशील विश्वके मूलमें एक अपरिवर्तनशील, स्वतःसिद्ध स्वप्रकाश अखण्डबोध साक्षीका रहना अनिवार्य है, जिसके बिना न क्रमिक परिवर्तन, न आकस्मिक परिवर्तन ही सिद्ध होता है। विश्व एवं उसकी मूलभूत सप्तप्रकृति, विकृति एवं अविकृतिभूत मूलप्रकृति, सबका ही परिवर्तन तत्त्वदर्शियोंद्वारा अनुभूत है। परंतु उससे भी परस्तात् वह स्वयंसिद्ध सत्ता, जिसके बिना सब असत् एव अप्रकाश, निरात्मक हो जाते हैं, महर्षियोंद्वारा साक्षात्कृत है।
दशम परिच्छेद मार्क्स और ज्ञान ( मार्क्सीय मन या ज्ञानपर विचार ) ( १ ) मन और शरीर मोरिस कॉर्न फोर्थकी ‘दि थ्योरी आफ नालेज’में कहा गया है कि— “मन शरीरसे विभाज्य नहीं है। मानसिक क्रियाएँ मस्तिष्ककी क्रियाएँ हैं। मस्तिष्क प्राणीके बाह्य जगत्के साथ रहनेवाले जटिलतम सम्बन्धोंका अवयव है। वस्तुओंकी प्रत्यात्मिका जानकारी ( Conscious, awareness ) का प्रथम रूप ‘सेंसेशन’ ( Sensation ) अनुभूति है, जो प्रतिनियत सहज प्रति- क्रियाओ; ‘कण्डीशण्ड रिफ्लेक्सेज़’ ( Conditioned reflexes ) के विकाससे उत्पन्न होता है। अनुभूतियाँ ( सेसेशन ) प्राणीके लिये बाह्य-जगत्के साथ उसका जो सम्बन्ध है, उसके सकेतोंकी एक पद्धति निर्मित करती हैं। मनुष्यमें एक द्वितीय संकेतपद्धति विकसित हो गयी है—वाणी ! यह काल्पनिक ( भावप्रधान ) [ ऐब्स्ट्रेक्टिंग ] और साधारणीकरणके कार्य करती है और इसी वाणीसे सम्पूर्ण उच्चतर मानसिक जीवन बढ़ चलता है, जो कि मनुष्य प्राणीकी निजी विशेषता है। मानसिक प्रक्रियाओंकी अनिवार्य बात यह है कि उन्हीं गतिविधियोंके भीतर और उन्हींके द्वारा प्राणी अपने चारों ओरके वातावरणके साथ जटिल और विभिन्न सम्बन्ध अनवरत बनाता रहता है । इसलिये प्रत्ययोंकी प्रक्रियाएँ वास्तवमें बाह्य जड़ ( मेटोरियल ) सत्यको प्रतिबिम्बित करनेवाली प्रक्रियाएँ हैं। मस्तिष्ककी जीवन प्रक्रियामें जड ( भौतिक ) जगत्का प्रतिबिम्ब ही ‘प्रत्यय’ ( कौन्शसनेस ) है।”
६१२ मार्क्सवाद और रामराज्य आश्चर्य है कि इस विज्ञानके युगमें जब कि सूक्ष्म-से-सूक्ष्म वस्तुओकी खोज हो रही है, तब भी मन-जैसी सूक्ष्मवस्तुको जड स्थूल देहकी ही एक अवस्था माना जाता है । इसपर आगे पर्याप्त विवेचन किया जायगा कि मन दर्शन, श्रवण आदि इन्द्रियजन्य क्रियाओमे सहकारी सूक्ष्म देहसे भिन्न तत्त्वान्तर है । 'मनुष्यकी मानसिक क्रियाओंका विकास उसके सामाजिक कार्यकलापोंसे उद्भूत होता है । इसकी प्रक्रिया है—दर्शन, प्रेक्षण, अनुभूति, प्रतीति, ज्ञान ( Perception ) से विचारणा । विचारने एवं बोलनेकी क्षमता उत्पन्न होती है, सामाजिक श्रमकी प्रक्रियासे; जो ( सामाजिक श्रम ) कि मनुष्यका मूलभूत ( आधारभूत ) सामाजिक कार्य ( प्रवृत्ति ) है ।'' सामाजिक कार्य-कलापोका प्रभाव यद्यपि क्रियाओपर अवश्य पड़ता है, परन्तु एतावता प्रकाशस्वरूप बोध, जड, बाह्य वस्तुओ एवं उनकी जड़ क्रियाओका परिणाम नहीं हो सकता । “विचारनेमें हम उन प्रारम्भिक धारणाओंसे, जिनके अनुसार साक्षादिन्द्रिय- गम्य वस्तुएँ हैं—प्रारम्भकर कल्पनामयी धारणाओकी ओर आगे बढ़ते हैं । कल्पनामयी धारणाओका उद्गम है सामाजिक सम्बन्धोंके विकास तथा बाह्य प्रकृतिसे सम्बद्ध उत्पादनविषयक एवं अन्य प्रवृत्तियोंके विकाससे, जब कि मनुष्योके अज्ञान तथा असहायता जन्म देती है रहस्यमयी, इन्द्रजालमयी तथा स्वप्निक, मृगमरीचिकामयी काल्पनिक धारणाओको । मानसिक श्रम, मस्तिष्किक श्रम (दिमागी मेहनत) का भौतिक श्रमसे विभाजन काल्पनिक धारणाओसे ही प्रारम्भ होता है और फिर सैद्धान्तिक प्रवृत्तियोंका व्यावहारिक प्रवृत्तियोंसे सम्बन्धविच्छेद होता है; जिसमें कि सिद्धान्तकी सत्यसे दूर उड़ चलनेकी प्रवृत्ति हो जाती है । आदर्शवादी एवं भौतिकवादी दलोकी विचारपद्धतिके विरोधकी शाखाएँ ही नहीं, स्कन्ध भी यहींसे पृथक् होते हैं ।” वस्तुतः किन्हीं भी प्रवृत्तियोंमें ज्ञान ही मूल होता है । ज्ञानसे ही संघ या समाजका निर्माण होता है । स्थूल बाह्य-जगत्की अपेक्षा मन बहुत सूक्ष्म है । अतः मानसिक ज्ञान-विज्ञान तथा कल्पनामें एक ही भौतिक स्थूल प्रवृत्तियाँ आगे बढ़ी होती हैं, यह स्वाभाविक है । इतना ही क्यों, मन ही तो सबका मूल भी है । आदर्शवाद ‘काल्पनिक धारणाओका प्रयोग किसी न-किसी प्रकारकी वस्तुओ अथवा विचार-पद्धतियोकी सुव्यवस्थित दृष्टियोंके निरूपणमें ही किया जाता है । ये दृष्टियाँ या विचारपद्धतियाँ समाज-विकासकी विभिन्न अवस्थाओमें विभिन्न
मार्क्स और ज्ञान ६१३ सामाजिक वर्गोंद्वारा आविष्कृत होती हैं । आदर्शविषयक विकास समाजके भौतिक जीवनके विकासपर अवलम्बित है तथा आदर्शादि वर्गविशेषकी रुचियों या स्वार्थोंकी पूर्ति करते हैं । परन्तु इसके साथ-ही-साथ यह भी आवश्यक है कि आदर्शवाद ऐसा बनाया जाय कि वह बौद्धिक आवश्यकताओंकी भी पूर्ति कर सके । इसीके परिणामस्वरूप आदर्शवादोंके विकास तथा उनकी आलोचनामे निरन्तर वदतोव्याघात या विरुद्धताएँ रहा करती हैं और इसीलिये उसकी आलोचना भी की जाती है । इसीलिये आदर्शवादोंमें सत्य एव कल्पना-मृगमरीचिका दोनोंके तत्त्व साथ-साथ रहते हैं ।” वस्तुतः सूक्ष्मबोधतक बुद्धिके न पहुँचनेके कारण ही भौतिकवादियोंको बहुत-से निगूढ़ तत्त्वोंमें केवल कल्पना ही दृष्टिगोचर होती है । व्यवहारमे उच्च आदर्शके अनुसार देह-इन्द्रियादिकी प्रवृत्ति बनानेकी चेष्टा होती है, पर कभी-कभी बाह्य प्रवृत्तियाँ वहाँतक नहीं पहुँच पातीं । उन्हीं उच्च आदर्शोंको भौतिकवादी मृगमरीचिकातुल्य समझने लगते हैं । “आदर्शवादी मृगमरीचिकाओं; स्वप्नोंका उद्गम है समाजके उत्पादन- सम्बन्धोंसे, परन्तु वे इस उद्गम या स्रोतसे विदितरूपमें उद्भूत नहीं होतीं, परन्तु अविदित या अप्रतिभातरूपमें अनजाने या सहजरूपमें ही उद्भूत हो आती हैं । आदर्शवादियोंको यह ज्ञात ( पता ) तो रहता नहीं कि उनकी इन भ्रान्त स्वाप्निक धारणाओंका वास्तविक मूलस्रोत क्या है; वे सोचते हैं कि ‘हमने शुद्ध विचारकी पद्धतिसे इन्हें जन्म दिया ।’ और इसलिये आदर्शवादमें प्रतीपन ( उलट देने ) की प्रक्रियाका आगमन होता है, जिसके द्वारा वास्तविक सामाजिक सम्बन्धोंको काल्पनिक धारणाओंके प्रतिनिधि- रूपमें दिखलाया जाता है । अन्तमें, आदर्शवादी स्वप्न एक वर्गविशेषलक्षित प्रवञ्चनापद्धति ( धोखेकी पद्धति ) का निर्माण करते हैं ।” यह भी ‘अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते’ का ही उदाहरण है । सदा ही आत्मचालित स्थूल-सूक्ष्म देहके समान ही सम्पूर्ण जड़- जगत्की चेष्टाएँ अध्यात्मनियन्त्रित होती हैं—यही तथ्य है । सुतरा इनकी प्रवृत्तिका निर्धारण भी ज्ञान-विज्ञानके आधारपर ही होता है । “आदर्शवादी मृगमरीचिकाओंके ठीक विपरीत, लोग अपने व्यावहारिक प्रत्यक्ष क्रियाकलापों या प्रवृत्तियोंकी शृंखलामे सत्यकी खोज करते हैं । ऐसी खोजका प्रथम मूलस्रोत सामाजिक उत्पादनमें निहित है । उत्पादन-विषयकी प्रक्रियासे आविष्कृत धारणाओंसे प्राकृतिक विज्ञान ( नेचुरल साइंस ) उत्पन्न होते हैं, जो कि उत्पादनसे पृथक्कृत, विशिष्ट
६१४ मार्क्सवाद और रामराज्य गवेषणाका रूप ग्रहण करते हैं। यह कार्य कुछ विशिष्ट वर्गोंद्वारा किया जाता है और ये वर्ग अपने वर्ग-विशेषके आदर्शोंको विज्ञानोंमें घुसेड़ देते हैं । इसीके साथ सामाजिक विज्ञानोंका विकास होता है, जिसका मूल वर्ग-संघर्षमें प्राप्त अनुभवोंमें होता है और जो सामाजिक मामलोंके सामान्य व्यवस्थापन एवं नियन्त्रणके अन्तका काम देते हैं । परंतु शोषक-वर्गोंके हाथोंमें रहकर सामाजिक विज्ञान कभी भी प्राकृतिक विज्ञानोंके वैज्ञानिक स्तरको नहीं प्राप्त कर सकते ।” मार्क्सवादी सत्यकी खोजमें भी अपने वर्ग-संघर्षको ही घुसेड़नेका प्रयत्न करते हैं। वस्तुतः सत्यकी खोज-प्रमाणोंपर ही निर्भर होती है । प्रत्यक्ष प्रमाण नेत्र-श्रोत्रादि एव उनके सहायक सूक्ष्म-दूरवीक्षणयन्त्र काच आदिके द्वारा जैसे सत्यका पता लगता है, वैसा वर्णन करना विज्ञानका काम है । वस्तुस्थिति किसी आवश्यक क्रिया एव सघर्ष-विशेषसे सम्बन्ध रखनेके लिये बाध्य नहीं हो सकती । इसके अतिरिक्त जैसे नेत्रगम्य रूपकी खोज कानसे करनी व्यर्थ है, वैसे अनुमान या आगमगम्य बातोंकी खोज आँख-कानसे करनी व्यर्थ है । विज्ञान एवं समाजवाद “बोर्जुआई विज्ञानने जहाँ महान् वैज्ञानिक उन्नतियाँ प्राप्त की हैं, वहीं पूँजीवादी सम्बन्धोंने विज्ञानोंके विकासपर बन्धन (सीमाएँ) लगा दिये। समाजवादके अधीन जहाँ विज्ञानका जनताकी सेवाके लिये विकास किया जाता है, ये बन्धन दूर कर दिये जाते हैं । विशेषतः समाजवादके लिये मजदूर- वर्गके संघर्षके उदयके साथ समाजविज्ञान स्थापित हुआ है। समाजवादी समाजमे पुरानी आदर्शवादी मृगमरीचिकाएँ या स्वप्न नष्टमूल हो जाती हैं और एक विश्वव्यापी वैज्ञानिक आदर्शवाद अस्तित्वमें आने लगता है ।” यदि पूँजीपति अपने स्वार्थ-साधनके लिये विज्ञानका विकास करना चाहते हैं तो मार्क्सवादी भौतिकवादतक ही उसे सीमित रखना चाहते हैं । अपने मतके विरुद्ध तथ्य निकालनेवाले वैज्ञानिकोको फाँसीतककी सजा रूसमे दी गयी है, अगर सत्यकी खोज विज्ञानका लक्ष्य है, तो भी जैसा भी सत्य हो और जैसे उपलब्ध होता हो, वैसा ही प्रयत्न वैज्ञानिक प्रयत्न है । सत्य “सत्यका अर्थ होता है धारणाओ एवं वस्तुगत सच्चाईकी समन्विति । ऐसी समन्विति बहुधा केवल आंशिक एवं प्रायिक (लगभग) ही होती है । हम जिस सत्यताको स्थापित कर सकते हैं, वह सर्वदा सत्यके अन्वेषण एव अभिव्यञ्जनके हमारे साधनोंपर अवलम्बित रहती है, परंतु इसीके साथ धारणाओं- की सत्यता, यहाँके अर्थमें आपेक्षिक ही सही, उन वस्तुगत तथ्योंपर आधारित रहती है जिनके साथ धारणाओंकी समन्विति है । हम कभी भी सम्पूर्ण, समग्र विशुद्ध सत्यताको प्राप्त कर ही नही सकते, परंतु सदा उस ओर बढ़ते जा रहे हैं ।”
मार्क्स और ज्ञान ६१५ ठीक है, जिसके मतमें मनुष्य एव उसका ज्ञान-विज्ञान सब जडभूत- का ही परिणाम है और अभी विकास ही हो रहा है, वह परम सत्यके सम्बन्धमें इससे अधिक कह ही क्या सकता है ? परंतु अध्यात्मवादी इससे सहमत नहीं होता; क्योंकि वह तो सर्वदा सर्वशक्तिमान् परमेश्वरसे विश्वका निर्माण मानता है । उसीके द्वारा विश्वका निर्धारण एवं संचालन होता है । उस दृष्टिसे सत्य त्रिकालाबाध्य है, पर मार्क्सवादी किसी भी सर्वसम्मत तर्क या सिद्धान्त तथा सत्यको नहीं मानते; इसलिये सब सत्योंको भी अपूर्ण ही कहते हैं । ज्ञानका मूल "ज्ञान वस्तुगत सत्यताकी यथासम्भव निर्दुष्ट प्रतिच्छायाओके रूपमें प्रतिष्ठापित एवं परीक्षित मान्यताओं, दृष्टियो एव प्रस्तावनाओंका योग है । यह निश्चितरूपसे एक सामाजिक उपज है, जिसकी जड़ें सामाजिक व्यवहारोंमें हैं, जिन्हें व्यावहारिक आशाओ एवं अपेक्षाओंकी पूर्तिद्वारा परीक्षित एवं संशोधित कर लिया जाता है । सभी ज्ञानोका प्रारम्भ उन इन्द्रियानु- भूतियोमें निहित है, जिनकी विश्वसनीयता मनुष्यके व्यवहारोंमें सिद्ध है । ज्ञान कभी भी सम्पूर्ण या अन्तिम नहीं हो सकता, परंतु उसका सर्वदा विस्तृत एवं आलोचित होते रहना आवश्यक है ।" वस्तुतः नित्य ज्ञान ही सबका मूल है, उसका मूल कोई नहीं । अनित्य-ज्ञान विषयों एव इन्द्रियोंके सन्निकर्षसे अन्तःकरण-वृत्तिरूप ज्ञान उत्पन्न होता है । वह भी ज्ञान तभी बनता है, जब उसमें नित्य-बोधका प्रतिबिम्ब पड़ता है । सामान्यतया क्रियाएँ ज्ञानके प्रतिफल भले ही हों, परंतु ज्ञान क्रियाओका फल नहीं हो सकता । जड वायु, जल एवं अग्निमें अनेक प्रकारकी क्रियाएँ होती हैं, उन्हें अन्तर्यामी चेतनसे प्रेरित तो कहा जा सकता है, परंतु उन क्रियाओंके द्वारा उनमें कोई ज्ञान नहीं उत्पन्न होता । 'ज्ञायते अनेनेति ज्ञानम्' इस व्युत्पत्तिसे ज्ञान शब्दका अन्तःकरण-वृत्ति अर्थ है । परंतु 'ज्ञप्तिर्ज्ञानम्' इस व्युत्पत्तिसे स्फुरणमात्र ही ज्ञानपदार्थ है । ज्ञानमें क्रिया और स्फुरण दो अंश हैं । जानातिके 'तिङ्'का अर्थ चिदाभास है, धात्वर्थ क्रिया है । दोनोंको मिलाकर ही 'जानाति'का व्यवहार होता है । चैतन्य प्रतिबिम्बयुक्त बुद्धिकी घटादिवृत्ति चैतन्यसे व्याप्त होती है; इसीलिये बुद्धिवृत्तिमें ही ज्ञानकी भ्रान्ति होती है। आरोपित सर्वदृश्यका भासक होनेसे ब्रह्ममें ही ज्ञानता मुख्य है। प्रत्ययकारिता बुद्धिके साक्षीमे अध्यस्त होनेसे साक्षीमें भी भासकत्वकी कल्पना होती है, वस्तुतः है वह भानस्वरूप ही । बुद्धिकर्तृक सभी प्रत्यय चैतन्यखचित ही उत्पन्न होते हैं, इसी आधारपर 'ज्ञानं क्रियते' (ज्ञान किया जाता है) यह व्यवहार होता है। जैसे बुद्धिके पहले अनवच्छिन्नबोध कूटस्थ है, वैसे ही बुद्धि उत्पन्न होनेपर भी वह बोध निष्किय
६१६ मार्क्सवाद और रामराज्य
ही रहता है; इसीलिये श्रुतियाँ द्रष्टाकी स्वरूपभूता दृष्टिका सर्वथा अविपरिलोप ही बतलाती हैं— न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते । (बृहदारण्यकोपनिषद् ४।३।२३) आलोचन-सङ्कल्प-अभिमानादिकरण व्यापार बुद्धिमे उपसंक्रान्त होकर बुद्धिके अध्यवसायरूप व्यापारके साथ उसी तरह एक व्यापारवान् हो जाते हैं, जैसे अपनी सेनाके साथ ग्रामाध्यक्षादिकी सेना सर्वाध्यक्षकी ही हो जाती है । वेदान्त-मतानुसार सूक्ष्म पञ्चभूतोंके समष्टि सात्त्विक अंशोंसे मन या अन्तःकरण उत्पन्न होता है । व्यष्टि सात्त्विक अंगोसे श्रोत्रादि पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ- उत्पन्न होती हैं और चित्त, अहङ्कार, बुद्धि सब उसी मन या अन्तः करणकी ही वृत्तियाँ हैं, जैसे लोहपिण्डमें स्वतः दाहकत्व न होनेपर भी वह्निके साथ तादात्म्यसम्बन्ध होनेसे लोहपिण्डमें दाहकत्व होता है, उसी तरह भौतिक अन्तः- करण यद्यपि जड है, उसमें प्रकाशकत्व नहीं है, फिर भी स्वप्रकाश आत्मचैतन्यके तादात्म्याध्यास-सम्बन्धसे उसमें भी चैतन्यका उपलब्ध होने लगता है । स्वप्रकाश अखण्डबोध आत्मा ही मुख्य-ज्ञान है, उसीके प्रकाशसे मन अन्तःकरण आदिमें भी प्रकाश व्यक्त होता है । अनन्त आकाशस्वरूप बोधात्मक ब्रह्म ही उपाधिभेदसे विभिन्न ज्ञानोंके रूपमे भासित होताहै, जैसे घटादि उपाधि-भेदसे घटाकाश आदिका भेद प्रतीत होता है । जहाँ विषयावच्छिन्न चैतन्यका प्रमातृचैतन्यके साथ अभेद होता है, वहाँ अपरोक्ष-ज्ञान होता है । जहाँ प्रमातृचैतन्यसे विषयचैतन्यका भेद विद्यमान रहता है, वहाँ प्रमाणके बलसे केवल परोक्ष ज्ञान होता है । इसलिये अनुव्यवसायको विशिष्ट विषय बनानेके लिये सामान्य-विशेषविषयक ही इन्द्रियोको मानना चाहिये । ‘योगभाष्यकार’का भी यही कहना है— न च तत्सामान्यमात्रग्रहणाकारम्, कथमनालोचितः, विषयविशेष इन्द्रियेण मनसानुव्यवसीयेत । (योगभाष्य ३।४७) कुछ लोग कहते हैं आलोचन-ज्ञान सामान्यज्ञान विषयको ग्रहण करता है; किंतु मन विशिष्टविषयको ग्रहण करता है । परंतु यह ठीक नहीं, वस्तुतः इन्द्रिय- जन्य आलोचन अविविक्त सामान्यविशेषको ग्रहण करता और अनुव्यवसाय-ज्ञान विविक्त सामान्यविशेषको ही ग्रहण करता है इसीलिये ‘योगवार्तिक’में कहा गया है— निर्विकल्पकबोधेऽपि द्वयात्मकस्यापि वस्तुनः । ग्रहणं लक्षणाख्येयं ज्ञात्रा शुद्धं तु गृह्यते ॥ निर्विकल्पकज्ञान सामान्यमात्रको ही नहीं ग्रहण करता; क्योकि उसमें विशेष- का भी प्रतिभास होता है । इसी तरह विशेषमात्रका ही ग्रहण होता है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि उसमें सामान्याकारका भी भान होता है, किंतु सामान्य- विशेष—दोनोंहीका ग्रहण करता है,परंतु ‘यह सामान्य है, यह विशेष’ इस तरह विवेचन-
पूर्वक ग्रहण नहीं होता है; क्योंकि कालान्तरका अनुसंधान नहीं होता । जैसे ग्रामाध्यक्ष कुटुम्बियोंसे कर लेकर विषयाध्यक्षको अर्पण करता है, विषयाध्यक्ष सर्वा- ध्यक्षको, सर्वाध्यक्ष भूपतिको कर समर्पण करता है; इसी तरह बाह्येन्द्रिय विषयोंका आलोचन करके मनको अर्पण करती है, मन संकल्प करके अहंकारको अर्पण करता है, अहंकार उसका अभिमान करके अर्थात् संवेदन और स्मृतियोंके समूहको आत्मीयत्वेन ग्रहण करके अर्थात् बाह्येन्द्रियोपलब्ध क्षणिक संवेदन एवं स्मृतियोंको संग्रथित करके सर्वाध्यक्षभूता बुद्धिको समर्पण करता है; इस तरह सभी करण बुद्धिमें अर्थ समर्पण करके पुरुषको अर्थ-प्रकाश कराते हैं। विकास "ज्ञान, जब हम वस्तुओंके साथ सक्रिय सम्बन्धोंमें आते हैं, तब प्राप्त होता है और प्रतीतिसे निर्णयकी ओर विकसित होता है । ज्ञानका विकास प्रत्ययात्मकसे उपपत्त्यात्मक ( युक्तिपूर्ण सिद्धि ) तक, वस्तुओंके रूप-रङ्ग आदिके केवल बहिरङ्ग (ऊपरी-ऊपरी) निर्णयोंसे उनके आवश्यक गुण-धर्मों, पारस्परिक संयोगों तथा नियमोंके विषयमें तर्कपूर्ण निष्कर्षोंतकके मार्गपर होता है । इस प्रकार हम बाह्य ( वस्तुमय ) संसारका उत्तरोत्तर अधिक पूर्ण एवं गम्भीर ज्ञान प्राप्त करते चलते हैं । प्रत्येक अवस्थामें हमारा ज्ञान सीमित है । पर वह इन सीमाओंको जीतता हुआ प्रगति कर रहा है, करता जा रहा है ।" बुद्धिवृत्तिरूप ज्ञानोंका विकास ही नहीं, किंतु ह्रास भी होता है। कोई प्राणी ज्ञान- साधनोंसे ज्ञानार्जन, ज्ञान विकास करता है, किंतु प्रमादसे वह उत्पन्न ज्ञान भी नष्ट हो जाता है । आजके पुरातत्त्ववेत्ता तो यह भी कहते हैं- 'प्रथम ज्ञान अत्यन्त विकसित था, परन्तु अब वह संकुचित हो गया है।' पर वेदों, पुराणों, भारतादि ग्रन्थोंको पढ़नेसे मालूम होगा कि आज पहलेकी अपेक्षा सभी क्षेत्रोंमें ज्ञानका संकोच हो गया है । नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा तो चित् नित्य स्वप्रकाश ही है । उसके विकासका प्रश्न ही नहीं उठता । आवश्यकता एवं स्वतन्त्रता "युक्तिपूर्ण या उपपत्त्यात्मक ज्ञान वस्तुओंकी 'आवश्यकताओं' का उद्घाटन करता है और यह भी बतलाता है कि आवश्यकताका महत्त्व सर्वदा काकतालीय ( ऐक्सिडेण्टल ) से ही विदित होता है । ज्ञानकी प्राप्ति ( Acquisition ) से हमें स्वतन्त्रता मिलती है, जो आवश्यकता- के ज्ञानपर आधारित आत्मनियन्त्रण एवं बाह्यप्रकृति-नियन्त्रणके ही रूपमें है । हम उस समय स्वतन्त्र हैं, जब ज्ञानके आधारपर निश्चित करते हैं कि 'क्या करें' और अपने उद्देश्यकी पूर्तिको प्रभावित करनेवाले विदित विषयोंपर जान-बूझकर नियन्त्रण करनेका प्रयत्न करते हैं ।"
६१८ मार्क्सवाद और रामराज्य भौतिक, औपपत्तिक, आगमिक, आनुमानिक, प्रत्यक्षात्मक, संशयात्मक या विपर्ययात्मक—ये सभी ज्ञान बुद्धि अथवा मनके तत्तत्साधनोंसे होनेवाले परिणामविशेष हैं। इन सभीमें स्फुरण, स्फूर्त्ति या बोध समानरूपसे होता है। ज्ञानके अनुसार क्रिया होती है, ज्ञानसे भ्रमात्मक बन्धन भी कटते हैं तभी स्वतन्त्रता मिलती है। वैसे पूर्ण स्वतन्त्रता तो नित्य ज्ञानसे ही होती है। आवश्यकताकी प्रतीतिके साथ असाधारण सम्बन्ध रहता है । आत्मनियन्त्रण या बाह्य प्रकृतिपर नियन्त्रण स्वतन्त्रताकी मंजिल है, सम्पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं। अन्योपर नियन्त्रण शासन कहलाता है, आत्मगत स्वतन्त्र नियन्त्रणादि ही स्वतन्त्रता है । यह भौतिक- वादीके लिये आकाशकुसुम-तुल्य ही है । स्वतन्त्रताका अवबोध मार्क्सवादी कहते हैं कि “जनता जन्मतः ही स्वतन्त्र नहीं उत्पन्न होती, परंतु शनैः-शनैः स्वतन्त्रता उपार्जित कर लेती है । स्वतन्त्रता प्रकृतिपर प्रभुत्व प्राप्त करनेके लिये किये जानेवाले संघर्ष एव वर्गसंघर्षद्वारा उपार्जित एव विकसित की जाती है । समाजमें विभिन्न वर्गोंद्वारा वस्तुतः उपार्जित एव अधिकृत स्वतन्त्रता एव उस स्वतन्त्रताके बन्धन तत्तद्वर्गोंकी स्थिति एव उद्देश्योके अनुसार स्थूलतः एवं स्पष्टतः विभिन्न होते हैं । साररूपमें, स्वतन्त्रताका संघर्ष जनताका अपनी निजी आवश्यकताओकी पूर्ति या संतुष्टि करनेमें समर्थ हो जानेका संघर्ष है । मनुष्यजाति पशुस्थितिसे उठकर स्वतन्त्रताके अवबोधकी उस राजमार्गपर अनवरत गतिसे प्रगति कर रही है जो कि वर्गवादी समाजकी ओर ले जाता है । स्वतन्त्रताके विकासकी सीढियाँ नैतिकता ( चरित्र या सदाचार ) के विकासकी भी सीढियाँ हैं ।” पर स्वतन्त्रताका अवबोध भौतिकवादमें सम्भव ही नहीं । मनुष्य स्वतन्त्रताका उपार्जन करता है, फिर भी प्रभुत्व प्राप्त करना चाहता है, शासन- शक्ति प्राप्त करना चाहता है । पराधीनताराहित्य ही स्वतन्त्रता है । यह देहधारी पराधीन जीवके लिये सापेक्ष ही होती है । यो तो बकरीके गलेसे रस्सी खुल जानेपर बकरी भी स्वतन्त्र कही जा सकती है । परंतु यह स्वतन्त्रता कितनी है ? बहुत छोटी-सी मंजिल है । वस्तुतः देह-इन्द्रिय-मन-बुद्धि आदि कार्यकारण-संघटन- सम्पर्कजनित आत्मनिष्ठ पारतन्त्र्यकी निवृत्ति ही स्वतन्त्रता है । तदर्थ ही विविध क्रियाओ एव ज्ञानोकी आवश्यकता होती है । आत्मा नित्य अखण्ड बोधरूप है । उसमें ही अनात्माका अध्यास एव तन्मूलक ही भ्रमात्मक बन्धन होता है । क्रियाओ, ज्ञानो एवं अन्तिम परम तत्त्व-विज्ञानसे इस बन्धनकी पूर्णतया निवृत्ति होती है, उसे ही मोक्ष कहा जाता है । उसके पहले भी जिसमे जितना अधिकाधिक ज्ञान-क्रिया-शक्ति व्यक्त होती है, उतनी ही उसमें स्वतन्त्रता एवं
शासनशक्ति व्यक्त होती है। सङ्घर्ष जब विजयका जनक होता है, तब स्वतन्त्रता एव शासन-शक्तिका कारण बनता है। जब पराजयका कारण होता है, तब परतन्त्रताका भी कारण होता है। मार्क्सवादका 'वर्गसङ्घर्ष' तो काकतालीयन्यायसे कहीं ही स्वतन्त्रताका कारण हो सकता है। अन्यथा तो अनर्थका ही कारण होता है, वस्तुतः वर्गसङ्घर्ष मिटाकर वर्गप्रेम फैलाकर एक वर्गको दूसरे वर्गका पोषक बनानेसे ही अधिकांशमें अनर्थ-निवृत्ति एवं स्वतन्त्रता-प्राप्ति होती है। समन्वय- सामञ्जस्यकी स्थापनासे ही निराकुल समाज स्वधर्मनिष्ठा तथा उपासनाके द्वारा मनकी एकाग्रताका सम्पादन करके श्रवण-मनन-निदिध्यासन-क्रमसे परम तत्त्वका साक्षात्कार करके सर्वबन्धनविमुक्त होकर पूर्ण स्वतन्त्रता भी प्राप्त कर सकता है। आवश्यकताओकी पूत्ति एव सतुष्टि भी विचार एव सयमसे ही हो सकती है, केवल सङ्घर्षसे नहीं। जैसे घृतकी आहुतिसे अग्निका प्रज्वलन बढता ही जाता है, उसी तरह वस्तुओंकी प्राप्ति एवं संघर्षसे भी उत्तरोत्तर असंतुष्टि बढती जाती है। तृष्णा—कामनाका कभी अन्त नहीं होता। 'जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई' के अनुसार जैसे-जैसे लाभ बढता है, वैसे-वैसे तृष्णा भी बढती है— न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्धते ॥ (मनु० २। ९४, विष्णुपु० ४। १०। २३; लिङ्गपु० ६७। १७, महा० १। ७५।५७) अभीष्ट पदार्थोंके उपभोगसे काम कभी भी प्रशान्त नहीं होता; किंतु घृताहुतिसे अग्नि-ज्वालाके समान वह उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता है। रामराज्यके अनुसार सङ्घर्षके स्थानपर समन्वय अपनानेसे ही सर्वत्र सुख-शान्ति सम्भव होती है— सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥ भारतीय दर्शनमें ज्ञान-सिद्धान्त 'कांट'के भी अनुभव और ज्ञान—दोनोंका भेद सिद्ध नहीं हो सकता। भारतीय दर्शनोंके अनुसार अनुभवके ही भ्रम और प्रमा—ये दो भेद होते हैं। उसे ही ज्ञान भी कहते हैं। 'सर्वव्यवहारहेतुर्गुणो बुद्धिर्ज्ञानम्' अर्थात् आहार-विहार, शब्द- प्रयोगादि सभी व्यवहारोका असाधारण कारण गुण ही बुद्धि है, वही ज्ञान भी है। ज्ञानके बिना कोई भी व्यवहार नहीं बन सकता, यह स्पष्ट ही है। शब्द-वाक्यादि प्रयोग भी बिना ज्ञानके नहीं बनता। घटादिका दण्डादि कारण सर्वव्यवहारका कारण नही है। कालादि सर्वकारण होते हुए भी असाधारण कारण नहीं है। इसीलिये बुद्धि या ज्ञानका यह लक्षण दण्डादि एव कालादिमें अतिव्याप्त नहीं है। वह बुद्धि या ज्ञान दो प्रकारका है—एक स्मृति और दूसरा अनुभव। इनमें संस्कारमात्र- जन्य ज्ञान 'स्मृति' कही जाती है और स्मृतिभिन्न ज्ञान अनुभव है। अनुभव भी
६२० मार्क्सवाद और रामराज्य
यथार्थ एव अयथार्थ—इस तरह दो प्रकारका होता है। तद्वान्में तत्प्रकारक ज्ञान 'यथार्थ' ज्ञान है। जैसे रजतमें रजतज्ञान और अतद्वान्में तत्प्रकारक ज्ञान 'अयथार्थ' है। जैसे शुक्तिमें रजत-ज्ञान यथार्थानुभव या प्रमा, प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्दादि- भेदसे अनेक मतोके अनुसार अनेक प्रकारका होता है। यथार्थानुभव या प्रमाके व्यापारवान् असाधारण कारणोको 'प्रमाण' कहा जाता है। अयथार्थानुभव भी संशय, विपर्यय एवं तर्कभेदसे तीन प्रकारका होता है—एक धर्मीमें विरुद्ध नानाधर्म- वैशिष्ट्यबोधक ज्ञान 'संशय' है, जैसे कि 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' अर्थात् वह स्थाणु है या पुरुष । मिथ्याज्ञान 'विपर्यय' है, जैसे कि शुक्तिमें रजत-ज्ञान । व्याप्यके आरोपसे व्यापकका आरोप तर्क है, जैसे कि यदि वह्नि न होगा तो धूम भी नहीं होगा। यहाँ वह्निके अभावरूप व्याप्यके आरोपसे धूमाभावरूप व्यापकका आरोप किया जाता है। स्मृति भी प्रमाजन्य यथार्थ और अप्रमाजन्य अयथार्थ होती है। सांख्यमतानुसार प्रकृतिका परिणाम बुद्धि स्वतन्त्र पदार्थ है। महत्तत्त्व या बुद्धि अव्यक्ततत्त्वसे उत्पन्न होती है। महत्तत्त्व अर्थात् बुद्धिसे अहंकारकी उत्पत्ति होती है, बुद्धिद्वारा अध्यवसित निश्चित विषयमें 'मै अधिकृत हूँ' इस प्रकारका अभिमान करनेवाला अहंकार है । उसी तरह अहकारसे मन उत्पन्न होता है। इन्द्रियके द्वारा सम्बुद्धाकार पदार्थका संकल्प-विकल्प करना मनका काम है। पहले आलोचनात्मक ज्ञान होता है, उसके बाद सविकल्प ज्ञान होता है। इन्द्रियोके द्वारा मनोव्यापारके पहले प्रतिपत्ताको प्रथम अविकल्पित वस्तुमात्रका ही ग्रहण होता है। उस समय सामान्य-विशेषरूपसे अनाकलित और अविविक्त विषयका ही ग्रहण होता है। प्रतिपत्ता मनके व्यापारसे फिर सामान्य-विशेषरूपसे वस्तुकी विकल्पना करता है। यह सांख्यो तथा भट्टपाद कुमारिल आदिकोको सम्मत है। 'प्रथमं सविकल्पकप्रत्ययात् पुरा यद्वस्तुमात्रगोचरं बालमूकादिविज्ञान- समानं निर्विकल्पज्ञानमस्ति, तत्प्रतीति सिद्धमालोचनात्मकं ज्ञानमभ्युपेयम्, तदभावे सविकल्पज्ञानानुपत्तेः ।' निर्विकल्पक ज्ञानके उपरान्त बुद्धिके द्वारा नीलत्व घटत्वादिरूपसे विविक्त होकर जो गृहीत होता है, वही सविकल्पक ज्ञान है। एतावता केवल इन्द्रियसे उत्पन्न ज्ञान निर्विकल्पक एवं इन्द्रियसहकृत मनसे उत्पन्न ज्ञान सविकल्पकज्ञान है। प्रभाकरके मतानुसार स्वप्रकाशज्ञान विषयरूपसे घटादिका प्रकाश करता है और आश्रयत्वेन आत्माका प्रकाशक होता है। अतः 'अहं जानामि' इस अंशमे अहं रूपसे आत्मा ही भासमान होता है। 'अहं' यह अनात्मा नहीं है। कहा जाता है कि "जैसे 'अयो दहति' (लोहपिण्ड दहन करता है) यहाँ वस्तुतः लौहपिण्डमें जैसे स्वतः दाहकत्व नहीं होता, वैसे ही 'अहं' में भी स्वतः ज्ञातृत्व नही हो सकता ।" परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योकि शीतल लौहपिण्ड और दीप-ज्वालात्मक
दग्धा—दोनो जिस प्रकार विविक्तरूपसे उपलब्ध होते हैं, उस प्रकार अहकार और ज्ञाताका कही भी विवेकेन उपलब्ध नहीं हो सकता । इसलिये आत्मा अहकारास्पद है । वही सवित्का आश्रय होनेसे अपरोक्ष है । सांख्यवादी जड अन्तःकरणमें चित् प्रतिबिम्बको देखकर उसके कारणभूत तादृशबिम्बकी कल्पना वैसे ही करते हैं, जैसे दर्पणस्थ प्रतिबिम्बके आधारपर मुखका अनु- मान किया जाता है । परंतु इन पक्षोमें यदि आत्मा नित्यानुमेय है तो अपरोक्षाव- भास विरुद्ध है । नैयायिक आत्माको मानस प्रत्यक्षका विषय मानते हैं । मनका अन्वय-व्यतिरेक विषयानुभवसे ही गतार्थ हो जाता है । वस्तुतः विषयानुभवके आश्रयरूपसे जब आत्माकी सिद्धि हो सकती है, तब पृथक् आत्म विषयक ज्ञान मानना व्यर्थ ही है । भट्टपादके मतानुसार आत्मा प्रत्यक्ष होनेसे घटवत् ज्ञानका विषय है । एक- हीमें कर्म कर्तृविरोध होता है । परंतु यहाँ तो द्रव्यांशमें प्रमेयता और बोधांशमें प्रमातृत्ता है । उसमें भी प्रमेय-अंशमें प्रधानता और प्रमाता-अंशमें अप्रधानता रहती है । प्रभाकर इस पक्षका भी विरोध करते हैं । उनके मतानुसार अचेतन द्रव्याशको आत्मा नही कहा जा सकता । यदि बोधाशको ही कर्म कहा जाय तो कर्म-कर्तृविरोध होगा । बोध समकालमें ही प्रमेयरूपसे और प्रमातारूपसे परिणत हो नहीं सकता; क्योकि वह नित्य है। यदि प्रधान आदिके समान वह परिणत हो, तो भी प्रमातृभागके स्वप्रकाश होनेसे सवित्के आश्रयरूपसे वह प्रतीत न हो सकेगा । ऐसी स्थितिमे अपसिद्धान्त भी होगा । विषयरूपसे प्रतीत होनेपर घटादिके समान प्रमातामे भी अनात्मताकी प्रसक्ति होगी । इसलिये सवित् आश्रयरूपसे ही आत्माका एव सवित्के विषयरूपसे घटादिका प्रत्यक्ष मानना चाहिये । प्रमिति स्वसत्तामें कभी भी अवेद्य होकर नहीं रहती । उपर्युक्त प्रकारसे प्रभाकरका ज्ञान या सवित् स्वप्रकाश है । भट्टपादके अनुसार विषय प्राकट्यरूप ही बोध उत्पन्न होता है। बौद्धोका क्षणिक विज्ञान स्वतन्त्र है। उनमें सौत्रान्तिक ज्ञानमें विषयप्रतिबिम्ब देखकर उसके आधारपर और प्रति- विम्ब बिम्बपूर्वक होता है, इस आधारपर ज्ञाननिष्ठ विषय प्रतिबिम्बके बलपर बिम्ब- रूप सत्य-विषयका अनुमान करते हैं । विज्ञानवादी 'विज्ञानरूप ही विषय है', यह मानकर विषयोकी अपरोक्षता मानते हैं । नैयायिकलोग मनःसंयुक्त आत्मामें प्रमितिरूप ज्ञानकी उत्पत्ति कहते हैं। वे ज्ञानविषयक ज्ञान मानते हैं । 'अय घटः' यह ज्ञान व्यवसायात्मक होता है और 'ज्ञातो मया घटः' अथवा 'घटमह जानामि' इस आकारका ज्ञान अनुव्यवसायात्मक कहा जाता है । उत्तरोत्तर ज्ञानोसे पूर्व-पूर्व- ज्ञानोंका प्रामाण्य भी कहा जाता है। परंतु इस स्थितिमें पूर्व पूर्व ज्ञानोंका अज्ञान भी मानना पडेगा, तभी अज्ञान-निवर्त्तकरूपमे उत्तरोत्तर ज्ञानोकी सार्थकता हो सकती
६२२ मार्क्सवाद और रामराज्य है। कोई भी प्रतीति स्वसत्ताकालमें प्रकाशहीन नहीं होती, अतएव घटादिके तुल्य उसे अवेद्य नहीं कहा जा सकता । कुछ लोगोंका कहना है कि 'जैसे घटादिरूप वेद्य होता है, वैसे ही प्रमाण- रूप आत्मव्यापारसे जायमान घटादिनिष्ठ प्राकट्य भी वेद्य हो सकता है।' यहाँ भी प्रश्न होता है कि 'वह आत्मव्यापार क्या है, परिस्पन्द या परिणाम ?' प्रथम पक्ष इसलिये मान्य नहीं कि सर्वगत आत्मामें परिस्पन्द नहीं हो सकता । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि मृत्तिकाका परिणामभूत घट जैसे मृत्तिकामें ही रहता है, वैसे ही आत्म-परिणामभूत ज्ञान आत्मामें ही रहना चाहिये, उसकी विषय- निष्ठता नहीं हो सकती । कहा जाता है कि 'बालोंके पकने (श्वेत होने) रूप परिणामसे जैसे शरीरमें वार्धक्य होता है, वैसे ही आत्मपरिणामसे विषयमें ज्ञानका प्राकट्य होता है।' इसपर भी विचारणीय यह है कि 'प्राकट्यका जो आश्रय है वह चेतन है या प्राकट्यका जो जनक है, वह चेतन है, अथवा प्राकट्यजनक ज्ञानाख्य व्यापारका आधार ही चेतन है ?' यदि पहला पक्ष है, तब तो घटादि विषयको चेतन होना चाहिये; क्योंकि विषय ही प्राकट्यका आश्रय है। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि चक्षुरादि भी प्राकट्यके जनक हैं; अतः वे ही चेतन कहे जायँगे । तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि 'भोजनक्रियाजन्य तृप्ति-फल-सम्बन्धी देवदत्तके समान आत्मा ज्ञानक्रियाजन्य-फल- सम्बन्धी होनेसे ज्ञानक्रियावान् है', इत्यादि अनुमानके आधारपर आत्माकी ज्ञाना- धारताका अनुमान करना पड़ेगा । परंतु आत्मामें फल-सम्बन्धका अभाव होनेसे हेतु असिद्ध है; क्योंकि प्राकट्यरूप फल विषयमें ही रहता है, आत्मामें नहीं । अतएव तार्किकों और भाट्टोंका मत ग्रहण न करके प्रमातृव्यापारप्रमाण एव प्रमाणफल-प्रमितिको स्वप्रकाश ही मानना उचित है । बौद्ध संवेदन (अनुभव) को ही प्रमाण और उसे ही प्रमाणफल मानते हैं । परंतु इस पक्षमे वही प्रमाण और वही प्रमाणफल होनेसे कर्म-कर्त्तृ-विरोध स्पष्ट ही है। कहा जाता है कि 'यद्यपि प्रमाता आत्माका कोई व्यापार नहीं है, तथापि आत्मा, मन, चक्षु एवं विषयोंका संनिकर्ष ही प्रमाणरूप होकर प्रमातृव्यापार- रूपसे उपचरित होता है । प्रमाणफल तो अव्यभिचारतरूपसे प्रमिति ही है। हान, उपादान, उपेक्षा व्यभिचरित होनेवाले हैं, अतः उन्हें प्रमाणफल नहीं कहा जा सकता।' इस तरह प्रभाकरका मत है कि 'स्वप्रकाश विषयसंवेदनके आश्रयरूपसे प्रदीपाश्रय-वर्त्तिकाके तुल्य प्रकाशमान अहंकार आत्मा है, दृग् दृश्यका अन्योन्या- ध्यासरूप अहंकार नहीं।' परंतु वेदान्ती आत्माको अनुभवरूप ही मानते हैं। यहाँ विचारणीय यह है कि 'क्या आत्मा ही चित्प्रकाश है अथवा आत्मा और अनुभव—दोनों ही चित्प्रकाश हैं, अथवा केवल अनुभव ही चित्प्रकाश है और आत्मा जड ही है ?' यदि आत्मा ही चित्प्रकाश है, तो 'क्या अनुभव चक्षुरादिके तुल्य
मार्क्स और ज्ञान ६२३
स्वयं अप्रकाशित रहकर ही विश्वको प्रकाशित करेगा या आलोकादिके तुल्य सजातीय प्रकाशान्तर निरपेक्ष प्रकाशमान होकर विषयका प्रकाशक होगा ?” पहला पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि चक्षु तो स्वातिरिक्त अनुभवका जनक होता है। इस तरह अनुभव स्वातिरिक्त अनुभवका जनक नहीं है । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभव सजातीय अनुभवान्तरकी अपेक्षा न करके ही प्रकाशमान होता है । इस तरह स्फुरण लक्षणयुक्त होनेसे अनुभव ही चित्प्रकाश सिद्ध हो जाता है । यद्यपि अनुभव, चक्षु तथा आलोक—तीनो ही घटादिके व्यञ्जक हैं तथापि अनुभव विषयाज्ञानका विरोधी होनेसे चित्प्रकाशरूप है । आलोक विषयगत तमका विरोधी होनेसे जड़ प्रकाशस्वरूप है और चक्षु अपरोक्ष अनुभवका साक्षात् साधन होनेसे अज्ञात कारण है । इसपर भी कहा जाता है कि 'आलोकके तुल्य अनुभव सजातीय प्रकाशानपेक्ष है।' परंतु यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि आलोक भी अपने प्रकाशके लिये सजातीय चक्षुकी अपेक्षा रखता ही है, कारण आलोक स्वतः तमसे रहित है, अतः चक्षुका तमके निवारणमे उपयोग नहीं है । हाँ, चक्षुर्जिन्य अनुभवके द्वारा आलोकका प्रकाश होता है । परंतु वह आलोकका विजातीय ही है, अतः आलोककी तरह सजातीयानपेक्ष अनुभवका चित्प्रकाशरूप होना ठीक है । यदि इस प्रकाशको जड़ माना जाय, तो जगत्में अन्धता-प्रसक्ति हो जायगी । प्रमातृ-चैतन्य ही जडानुभवबलसे सबका अवभासन करता है । यदि आत्म-चैतन्यका विषयके साथ सम्बन्धमात्रके लिये जडानुभवका उपयोग है, तब तो यह वेदान्तका ही मत है । वृत्तिरूप अनुभव सम्बन्धार्थ या आवरणाभिभवार्थ ही होता है । कुछ लोग आत्म-चैतन्यसे पृथक् ही विषयकी अभिव्यक्तिके लिये जडा- नुभवजन्य अनुभवान्तर मानते हैं; परंतु वह अनुभव भी यदि जड़ है तो उसे भी अन्य अनुभव अपेक्षित होगा । इस तरह अनवस्था होगी । 'आत्मा और अनुभव दोनों ही चित्प्रकाश हैं' यह पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस तरह आत्मा और अनुभव दोनों ही अन्योन्य-निरपेक्ष सिद्ध होंगे, फिर उनका सम्बन्ध किसके द्वारा विदित होगा ? दोनोंके ही अन्योन्यवार्ता- नभिज्ञ होनेके कारण दोनोंमेंसे कोई भी सम्बन्धग्राही नहीं हो सकता । कहा जा सकता है कि 'जैसे पुरुषान्तरका ज्ञान चिद्रूप होनेपर भी दूसरेको विदित नहीं होता, वैसे ही चिद्रूप होनेपर भी आत्मा स्वयं प्रकाशित नहीं होगा । इसलिये अनुभवाधीन ही आत्माकी सिद्धि होती है।' परंतु यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि तब तो यही आपत्ति अनुभवके सम्बन्धमें भी हो सकती है । यदि कहा जाय कि 'पुरुषान्तर संवेदनव्यवहित होता है, किंतु अपना अनुभव अव्यवहित है, अतः स्वप्रकाश है,' तो आत्माके सम्बन्धमें भी यही कहा जा सकता है । आत्मा चिद्रूप एव अव्यवहित होनेसे अपने अनुभवके समान स्वयं ही प्रकाशित होता है।
६२४ मार्क्सवाद और रामराज्य
'अनुभव ही चित्प्रकाश है' यह तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योकि 'आत्मा ही चित्प्रकाश है' यह पक्ष मानना अनिवार्य है। कारण, आत्मा और अनुभवका अभेद ही है। 'यह अनुभव आत्माका गुण है' ऐसा तार्किक और प्रभाकर मानते हैं। 'आत्मस्वरूप होनेसे द्रव्य ही अनुभव है' यह सांख्यमत है। 'ज्ञान- परिणाम क्रियाका फल है तथा च क्रिया और फलमें अभेदकी विवक्षासे कर्म ही ज्ञान है' यह भाट्टमत है। परन्तु ज्ञानको कर्मरूप माननेसे गमनादि क्रियाके तुल्य ही उसमें प्रकाशरूपता और फलता नहीं बन सकती। द्रव्य होनेपर भी अनुभव यदि अणुपरिणाम हो, तब तो खद्योतके समान परिमित वस्तुके एक देशका ही प्रकाशक होगा, सम्पूर्ण वस्तुका प्रकाशक ज्ञान नहीं होगा। यदि अनुभव महत्परिमाण द्रव्य माना जाय, तब तो अनुभवस्वरूप आत्माका सर्वत्र अवभास होना चाहिये। यदि आत्मा महत्परिमाण अनुभवका आश्रय हो तो भी वही प्रसङ्ग रहेगा। यदि अनुभवको मध्यम परिमाण माना जाय तो उसे सावयव कहना पड़ेगा और फिर अनुभव अवयवोंके परतन्त्र होगा, आत्माधीन न रहेगा। यदि कहा जाय कि 'जैसे भूतलपरिणाम घट भूतलाधीन होता है, वैसे ही आत्मपरिणाम अनुभव आत्मपराधीन होगा,' तब भी प्रदीप एवं प्रकाशके समान आत्मा और अनुभवका अभेद ही कहना पड़ेगा। जैसे प्रदीपसे घटादि प्रकाशित होते हैं, वैसे ही 'घटो मयावगतः' ( मैने घट जाना ) इत्यादि व्यवहार होता है। यदि आत्मा और चैतन्य या ज्ञानका भेद होगा तब तो 'काष्ठेन प्रकाशितः' ( काष्ठके द्वारा प्रकाशित होता है ) के समान 'मयावगतम्' यह प्रयोग भी औपचारिक ही समझा जायगा। 'ज्ञान गुण है' इस पक्षमें जैसे प्रदीपमें रहनेवाले भास्वररूपकी उत्पत्ति आश्रयकी उत्पत्तिसे भिन्न नही होती, वैसे ही अनुभवकी भी उत्पत्ति उसके आश्रय- की उत्पत्तिसे भिन्न नहीं होगी। ऐसी स्थितिमें आत्मा नित्य है, उसमें अनुभवका व्यभिचार कभी नहीं होता, अतः अनुभव और आत्मा दोनोंमें भेद नहीं है, किंतु अनुभवस्वरूप ही आत्मा है। यदि आत्माकी सिद्धि अनुभवके अधीन हो, तब तो घटादिके समान ही आत्मा भी अनात्मा ही ठहरेगा। कहा जा सकता है कि 'नील-पीतादि अनुभव अनेक हैं, वे आत्म स्वरूप कैसे हो सकते हैं ?' परन्तु अनुभवमें स्वरूपतः कोई भी भेद नहीं है। जैसे एक अनन्त आकाशमें घटादि उपाधिके भेदसे भेद प्रतीत होता है, वैसे ही नील-पीतादि विषय एवं तदाकार बुद्धिवृत्ति आदि उपाधिसे आकाशवत् अनन्त अखण्ड एक अनुभवमें औपाधिक भेद प्रतिभासित होते हैं। अनुभवके भेदमें कोई प्रमाण नहीं है। अनुभवका जन्म और विनाश भी अप्रामाणिक है, अतः 'घटमें पाकके अनन्तर रक्तरूप उत्पन्न होनेपर रक्तानुभव उत्पन्न होता है। रक्तानुभवके पहले श्यामरूपका अनुभव था, अब वह नहीं है,' इत्यादि कथन ठीक नहीं हैं, क्योकि भेदसिद्धि होनेपर जन्म-विनाश सिद्ध होगा और जन्म-विनाश सिद्ध होनेपर भेद-सिद्धि होगी। इस तरह अन्योन्याश्रय
दोषकी प्रसक्ति होती है। कुछ लोगोंका कहना है कि 'चक्षुरादि साधनोंकी अर्थ- वत्ताके लिये उत्तर संवित्का जन्म मानना आवश्यक है और एक कालमें दो संवित् नहीं रह सकतीं, अतः पूर्व संवित्का विनाश भी मानना चाहिये।' परंतु यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि एक ही संवित्के भिन्न-भिन्न विषयोंके साथ होनेवाले सम्बन्धोंके ही उत्पत्ति-विनाशसे साधनोंकी सार्थकता एवं यौगपद्य (एककालिकता) की निवृत्ति बन जायगी। बौद्धोंका कहना है कि 'संविदोंमें भेद रहता हुआ भी सादृश्यके कारण प्रतीत नहीं होता। नील-पीतादि विषयरूप उपाधिके संसर्गसे ही वह भेद प्रतीत होता है।' परंतु यह कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि ज्वालाएँ अन्यवेद्य हैं, उनमें भेदकी अप्रतीति हो सकती है, परंतु स्वप्रकाश संवित्में होनेवाले भेदकी अप्रतीति नहीं बन सकती। कहा जा सकता है कि 'जैसे वेदान्तियोंका स्वप्रकाश भी ब्रह्म अज्ञात रह सकता है, वैसे ही संवित्का भेद भी अप्रतीत रह सकता है।' परंतु यह भी ठीक नहीं है। ब्रह्ममें अविद्याका आवरण प्रमाणसिद्ध है, अतः एक ही संवित् अनादि है, क्योंकि उसका प्रागभाव नहीं है। सुरेश्वराचार्यका कहना है कि प्रत्येक कार्य प्रागभावपूर्वक ही होता है। उस प्रागभावकी भी सिद्धि संवित्से ही होती है, अतः संवित्का प्रागभाव नहीं है। यदि संवित् न हो तो प्रागभाव ही सिद्ध नहीं हो सकता और जब संवित् है ही, तब उसका प्रागभाव कैसे कहा जा सकता है? 'कार्यं सर्वैरयतो दृष्टं प्रागभावपुरस्सरम् । तस्यापि संवित्साक्षित्वात् प्रागभावो न संविदः ॥' इस तरह स्वप्रकाशानुभव नित्य है, वही आत्मा भी है। आत्मा ही विषयोपाधिक होकर अनुभव कहलाता है। विषयोपाधिकी विवक्षा न होनेसे वही अनुभव आत्मा कहलाता है। जैसे वृक्ष ही समूहरूप उपाधिके कारण वन कहलाते हैं और उपाधि-विवक्षा न होनेसे वे ही वृक्ष कहलाते हैं। अतः प्रभाकरका यह कहना ठीक नहीं है कि 'अनुभवके आश्रयरूपसे आत्माका प्रकाश होता है।' कहा जाता है कि 'घटमहं पश्यामि' यहाँ अहंकार ही घटका द्रष्टा है वही आत्मा है।' परंतु यह ठीक नहीं है। यदि 'अहं' ही आत्मा है, तब तो सुषुप्तिमें भी उसका स्फुरण होना चाहिये। परंतु सुषुप्तिमें अहंकी प्रतीति नहीं होती, अतः अहंकार आत्मा नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि 'सुषुप्तिमें विषयानुभव नहीं होता, अतः अहंकारकी भी प्रतीति नहीं होती।' यह कहना भी ठीक नहीं है। यहाँ यह विचारणीय है कि 'क्या सुषुप्तिमें अनुभव ही नहीं है अथवा विषय- सम्बन्धका ही अभाव है?' पहला पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभव नित्य है, अतः उसका अभाव नहीं कहा जा सकता। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि विषय सम्बन्ध आत्मप्रतीतिका कारण नहीं है । कहा जाता है कि 'आत्मा का द्रष्टृत्वरूप आकार ही अहंकार है, द्रष्टृत्वकी प्रतीतिमें विषय सम्बन्ध आवश्यक मा० रा० ४०—
है ।' परंतु यह कहना भी ठीक नहीं है । यहाँ विचारणीय यह है कि 'द्रष्टृत्व क्या है ? क्या दृश्यका अवभासकत्व ही द्रष्टृत्व है अथवा दृश्यभिन्नता द्रष्टृता है किंवा चिन्मात्र ही द्रष्टृत्व है ? पहले और दूसरे पक्षमें दृश्यके ही द्वारा द्रष्टाका निरूपण होता है । दृश्यके आगन्तुक होनेसे द्रष्टा भी आगन्तुक ही होगा । तब वह आत्मा कैसे होगा ? अतः अहंकार आत्मा नहीं हो सकता । तीसरे पक्षमें तो दृश्य- की अपेक्षा ही नहीं रहती, अतः सुषुप्तिमें विषय न रहनेपर भी अहंकारका उपलम्भ होना चाहिये । 'सुषुप्तिमें अहंकी प्रतीति होती है' यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि जैसे पूर्व दिनके अहंका स्मरण होता है, वैसे ही सुषुप्तिके भी अहंका उल्लेख होना चाहिये । यद्यपि जिसका अनुभव होता है उसका स्मरण होना अनिवार्य नहीं है । फिर भी जब आत्माका स्मरण होता ही है, तब चिद्रूप अहंकारका स्मरण होना ही चाहिये । कहा जा सकता है कि 'सुषुप्तिके अहंकारका भासक नित्य चैतन्यरूप अनुभव है । उसका विनाश न होनेसे सस्कार उत्पन्न नहीं होता, अतः स्मृति नहीं होती ।' परंतु तब तो पूर्व दिनके अङ्कारका भी स्मरण न होना चाहिये । वेदान्तमतमें तो अहकारावच्छिन्न चैतन्यसे ही अहकारकी प्रतीति होती है । वह अनित्य ही है, अतः संस्कारोत्पत्ति तथा स्मरण बननेमें कोई आपत्ति नहीं । यदि कहा जाय कि 'सुषुप्तिके भी अहकारका स्मरण होता ही है, अतएव 'सुखमहम- स्वाप्सम्' ( मैं सुखपूर्वक सोया था ) इस सुप्तोत्थितके स्मरणमें अहंकी प्रतीति होती है ।' इसपर तार्किकका कहना है कि 'यह स्मरण है ही नहीं, किन्तु उत्थान- कालमें प्रतीत होनेवाले आत्मामें सुखोपलक्षित दुःखाभावका अनुमान किया जाता है । मैं स्वप्न एव जागरितके बीचमे दुःखरहित था, क्योकि उस बीचके दुःखका घटादिके समान कभी स्मरण नहीं होता ।' मुख्य सुख सुषुप्तिमे हो नहीं सकता, अतः जैसे सिरका भार हटनेपर प्राणीको सुखका अनुभव होता है, वैसे ही सुषुप्तिमे दुःख न होनेसे सुखका व्यवहार होता है । कहा जा सकता है कि 'सुखका स्मरण होनेसे सुषुप्तिमें मुख्य ही सुख मानना ठीक है ।' परंतु फिर तो सामान्य विशेषनिष्ठ होता है, अतः भोजनसुख, पान- सुख आदि रूपसे विशिष्ट सुखका भी स्मरण होना चाहिये। यदि कहा जाय कि 'उस विषयमे सस्कारका उद्बोध नहीं हुआ' तब भी 'सुखमहमस्वाप्सम्' के साथ 'नाहं किंचिदवेदिषम्' ( मैं कुछ भी नहीं जानता था ) यह ज्ञानाभावका परामर्श सुखानुभवका विरोधी है, अतः दुःखाभावमें ही सुखका व्यवहार मानना ठीक है। जो कहा जाता है कि 'सुप्तोत्थितमात्रका अङ्गलाघव, प्रसन्नवदनत्वादिसे पूर्वकालमें सुखानुभवका अनुमान होता है,' तो वह भी ठीक नहीं है । अनुभवके अनन्तर क्षणमें स्मरण ही हो सकता है फिर अनुमान व्यर्थ है । यह भी कहा जाता है कि 'तारतम्यरूपसे दृश्यमान अङ्गलाघवादि सातिशय स्वापसुखानुभवके बिना उपपन्न नहीं हो सकते । दुःखाभाव तो एक रूप ही होता है, अतः उस आधार-