मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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चाहिये।' परंतु यह ठीक नहीं है, क्योकि यहाँ भी यही कहा जा सकता है कि संवेदनके अनित्य होनेसे ब्रह्म आदि भी अनित्य क्यो न हो ? अतः स्वविषयके नित्यत्व एव अनित्यत्वसे प्रत्यक्षका नित्यत्व या अनित्यत्व नहीं कहा जा सकता । घटसंवेदनके क्षणिक या त्रिचतुःक्षणस्थायी होनेपर भी तद्विषय घटादिको महीनों एवं वर्षोतक स्थिर देखा ही जाता है । अतः घटादिको संवेदनके समकालिक नहीं 'कहा जा सकता । यदि घटसंवेदनके असमकाल हो सकता है, तो संवेदन भी घटके असमकाल हो ही सकता है । फिर तो संवेदनके नित्य होनेपर भी घटादिकी नित्यताका कोई प्रसङ्ग नही आता ।
यह भी विचारणीय है कि 'संवेदन अपने पूर्वोत्तरकालमें घटाभावका बोधन करता है अथवा घटका पूर्वोत्तरकाल घटाभावका बोधन करता है।' पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योकि संवेदनके पूर्वोत्तरकालमें घटका सत्त्व रहता ही है । व्यावहारिक घटकी अज्ञात सत्ता भी मान्य है ही। सामान्यतया कोई भी यह नहीं समझता कि 'इसी समय मुझे घटज्ञान हुआ, अभी ही घट भी हुआ, पूर्वोत्तरकालमें घट नहीं था।' अद्वैतीका जो कहना है कि 'जब घट- प्रतीति होती है, तभी घट है । घटप्रतीति नहीं तो घट भी नहीं ।' उसका आशय केवल इतना ही है कि प्रतीतिमें घट अध्यस्त होता है, अतः प्रतीतिसे अतिरिक्त घटकी सत्ता नहीं होती और दृष्टिसृष्टिवादकी व्यवस्था अत्युच्च अधिकारियोके लिये ही है। इन्द्रियार्थ-संनिकर्षजन्य घटादिज्ञान क्षणिक त्रिचतुरक्षणस्थायी होता है अथवा स्वविरोधिद्वृत्त्यन्तरोत्पत्तिपर्यन्त स्थायी होता है। अतः उसकी अनित्यता वेदान्तीको भी अभीष्ट ही है। जो अजन्य ज्ञान है, वही नित्य है। कुछ लोग कहते हैं कि 'अजन्य ज्ञान है ही नहीं।' परंतु उन्हे वृत्तिरूप ज्ञानकी उत्पत्तिसे ही तदुपाधिकज्ञानकी जन्यताकी भ्रान्ति होती है । वृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्यरूप ज्ञान तो अजन्य ही है। उसकी जन्यतामें कोई प्रमाण नही है। वृत्ति एवं चैतन्यका विवेचन अतिदुष्कर है। जैसे मिले हुए क्षीर-नीरका विवेचन हंस ही कर सकता है, वैसे ही वृत्ति एवं चैतन्यका विवेचन अन्तर्मुख परमहंस ही कर सकता है।
जो कहते हैं कि 'संविद्की अपेक्षासे ही विषयकी अतीतता एवं अनागतता होती है', उन्हें यह भी बतलाना चाहिये कि फिर संविद्की अतीतता आदि किसकी अपेक्षासे होगी ? यदि संविद्का अतीततानागतत्व स्वापेक्षासे ही मान्य है, तब तो विषयका भी अतीतत्वादि स्वापेक्षासे ही हो सकेगा । फिर संविद्की अपेक्षा क्यो होगी ? यदि संविद्की अतीतता, अनागतता विषयकी अपेक्षासे मानी जाय, तब तो अन्योन्याश्रय-दोष अनिवार्य होगा । एक संविद्का अतीतत्वादि अन्य संविद्की अपेक्षा मान्य हो, तब तो उस संविद्की अतीतता आदिमें अन्य संविद्की अपेक्षा होगी. उसको अन्य संविद्की अपेक्षा होगी, इस तरह अनवस्था-प्रसङ्ग होगा ।