मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 420, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंअतः कालकी अपेक्षा ही विषयकी अतीतता आदिका होना उचित है । वर्तमान- कालावच्छिन्न घट वर्तमान है, अतीतकालावच्छिन्न घट अतीत होगा । आगामि कालावच्छिन्न घट अनागत कहलाता है । कहा जा सकता है कि 'काल तो नित्य है, फिर उसमें अतीतत्वादि-व्यवहार कैसे होगा ?' परंतु यह ठीक नहीं है । दिन-मासादिलक्षण कालमें अतीतत्वादि दृष्ट ही है । 'संविद्की अपेक्षासे कालमें अतीतत्वादि माना जाय' यह भी ठीक नहीं; क्योकि वस्तुतः कालकी अपेक्षासे ही संविद्में अतीतत्वादिका व्यवहार होता है । 'इस समय घटज्ञान वर्तमान है, पूर्वक्षणमें घटज्ञान वर्तमान था, उत्तरक्षणमें घटज्ञान होगा' इस व्यवहारसे संविद्मे कालावच्छिन्नताकी प्रतीति होती है । यह भी कहा जाता है कि 'संविद्से ही कालका अतीतत्वादि विदित होता है ।' परंतु इसमें किसीको विवाद ही नहीं है । संविद्से कालका वेदन होनेमें कोई आपत्ति नहीं । आपत्ति तो है घटसंविद्से कालवेदनमें । संविद्से भिन्न सभी वस्तुएँ संविद्के अधीन ही स्थितिवाली हैं । एकमात्र संविद् ही स्वतःसिद्ध है । 'कालका अतीत- त्वादि एवं कालपूर्वक विषयका अतीतत्वादि संविद्से ही ज्ञात होता है' इस कथनसे संविद्का अतीतत्वादि सिद्ध नहीं होता । यह आवश्यक नहीं है कि अतीत संविद्से अतीत विषयका एव वर्तमान तथा आगामी संविद्से वर्तमान तथा आगामी विषयका ग्रहण हो; क्योंकि संविदवच्छेदक कालके अतीतत्वादिसे ही विषयोका अतीतत्वादि सिद्ध हो जाता है । जैसे एतद्दिनस्थित सूर्यप्रकाशभास्य घट भी पूर्वदिनस्थित सूर्य प्रकाशसे ही भास्य होता है; क्योकि कालके भेदसे सूर्यप्रकाशमे भेद नहीं होता । इसी तरह एतद्दिनसंविद्भास्य घटादि भी पूर्वदिनस्थित संविद्से ही भास्य होता है। दिनभेदसे संविद्में भेदसिद्ध नही हो सकता है । अतः घटज्ञान नित्य एव स्वप्रकाश है । उसका विषयभूत घटादि अनित्य एवं जड है । घटकी अनित्यतासे ही ज्ञानमें अनित्यताका व्यवहार होता है । कुछ लोग कहते हैं कि 'निर्विषय अनुभव ही नहीं होता, क्योंकि उसकी उपलब्धि नहीं होती ।' परंतु यह ठीक नहीं है, क्योकि यहाँ विचारणीय यह है कि 'यह निर्विषय संविद्का अनुपलम्भ कहनेवालेको है या अन्यको ?' पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योकि जिसको निर्विषय संविद्का उपलम्भ नहीं है, वह अज्ञानी होनेके कारण 'नहीं जानता' यही कहा जा सकता है । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि दूसरेका हृदय दूसरेको प्रत्यक्ष नहीं होता । 'दूसरेको भी निर्विषय संविद्का उपलम्भ नहीं होता' यह कैसे कहा जा सकता है ? यदि कहा जाय कि 'निर्विषय संविद् सम्भव ही नहीं है', तो इसमें कोई-न-कोई हेतु होना चाहिये । 'अनुपल- भ्यमानत्व हेतु है' यह भी नहीं कहा जा सकता । यह हेतु तो सविषय ज्ञानमे भी अतिव्याप्त है; क्योकि सविषय ज्ञान भी तो स्वप्रकाश होनेसे उसमे भी उपलब्धि-