मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६२ मार्क्सवाद और रामराज्य विषयतारूप उपलभ्यमानता नहीं है । फिर तो अनुपलभ्यमानत्वरूप हेतुसे सविषय ज्ञानका भी अभाव ही सिद्ध हो जायगा । 'ज्ञानमें ज्ञेयत्व नहीं हो सकता' यह कहा जा चुका है । 'निर्विषय ज्ञान नहीं है' यह कथन निर्विषयज्ञानाभावको जानकर कहा जाता है अथवा बिना उपलम्भके ही ? पहला पक्ष ठीक नहीं, क्योंकि अभाव प्रतियोगिपूर्वक ही होता है । जो घट नहीं जानता, उसे घटाभावका भी ज्ञान कैसे हो सकता है ? जो निर्विषय-ज्ञान नहीं जानता, वह निर्विषय ज्ञानाभाव भी कैसे जान सकेगा ? दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं, क्योंकि यदि निर्विषय-ज्ञानाभावकी उपलब्धि नहीं है, तब तो निर्विषय-ज्ञानकी सिद्धिमें कोई बाधा है ही नहीं । फिर भी कहा जाता है कि 'ज्ञायते अनेन घटादिविषयजातमिति ज्ञानम्' इस व्युत्पत्तिसे ज्ञान विषयप्रकाशनस्वभाववाला ही प्रतीत होता है । विषयप्रकाशक ही ज्ञान है । जो विषयप्रकाशक नहीं, वह ज्ञान कैसे कहा जा सकता है ? वह विषयप्रकाशकत्व ही ज्ञानका स्वयंप्रकाशत्व भी है । यदि ज्ञान निर्विषय होगा, तब तो स्वप्रकाश-ज्ञानत्व ही उसमे नहीं रहेगा ।' परंतु यह ठीक नहीं है, क्योकि यदि विषयप्रकाशकत्व ज्ञानत्व हो, तब तो घटादिप्रकाशक सूर्यादिप्रकाशको भी ज्ञान नहीं कहना चाहिये; क्योकि उसीसे घटादिका प्रकाश होता है, अन्धकारस्थ घट भासित नहीं होता है । यदि सूर्यादिप्रकाशसे अतिव्याप्ति हटानेके लिये विषय- ज्ञानजनक ज्ञानको ज्ञान कहा जाय, तो इस वाक्यमें दो ज्ञान शब्द आते हैं । दोनोंका अर्थ-भेद है या नहीं ? यदि भेद है, तो क्या भेद है ? यदि कहा जाय कि 'जन्य ज्ञान फल है, जनक ज्ञान उसका करण है, तो भी विचारणीय यह है कि फलभूत ज्ञान स्वप्रकाश है अथवा पर प्रकाश ?' पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योकि जो विषयज्ञानका जनक नहीं, वह तो आपके मतमें स्वप्रकाश हो ही नहीं सकता । दूसरा भी पक्ष ठीक नहीं, क्योकि फलभूतजन्य ज्ञानका प्रकाशक कोई है ही नहीं । यदि अन्य प्रकाशक ज्ञान माना जाय, तब तो अन्यमें होनेवाला प्रकृत फलज्ञानप्रकाशकत्व फलज्ञान ज्ञानजनकत्व ही होगा । फिर इस तरह अनवस्था प्रसक्त होगी । यदि दोनो ज्ञानशब्दोका एक ही अर्थ है, तो व्याघातदोष होगा अर्थात् वही ज्ञान अपने-आप ही जन्य और अपने-आप ही जनक कैसे होगा ? अतः यदि विषयावबोधजनकत्व ही स्वप्रकाशत्व कहा जायगा; तो विषयावबोध- जनक करणभूत बोध ही स्वप्रकाश होगा, फलभूत बोध स्वप्रकाश ही न होगा । यदि करणभूतको ही स्वप्रकाश माना जायगा, तो कर्त्ता आत्मा भी स्वप्रकाश सिद्ध न हो सकेगा । इसी तरह ब्रह्ममें भी स्वप्रकाशता न रहेगी, अतः 'अनन्याव- भास्यत्वे सति स्वेतरसर्वावभासकत्व' को ही स्वप्रकाशत्व कहना उचित है । करण- ज्ञान तो जड होनेसे चैतन्यावभास्य है, अतः वह स्वप्रकाश नहीं कहा जा सकता । यह भी कहा जा सकता है कि 'अस्तित्वे सत्यनन्यावभास्यत्व' ही स्वप्रकाशत्व है अर्थात् जो दूसरोसे प्रकाशित न होकर भी स्वतः सत्तावाला है, वही