मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसविशेष ही ज्ञान की सिद्धि होती है, निर्विशेषकी नहीं । फिर भी कहा जा सकता है कि “ 'सुप्ति', स्वप्न', 'जागर' तथा 'समाधि'में भी जब निर्विषय ज्ञान नहीं होता, तब तो 'सर्वदा सविषय ही ज्ञान होता है' यही मानना ठीक है । तब तो फिर 'ज्ञानवान् ही आत्मा है, ज्ञानरूप नहीं' यही मानना उचित है ।” पर यह भी ठीक नहीं । व्यवहारतः यद्यपि आत्मा वृत्तिरूप ज्ञानवान् ही है; तथापि परमार्थतः ज्ञानवान् नहीं है, क्योकि वस्तुतः वृत्तिके भासक आत्माका वृत्तिके साथ आध्यासिक सम्बन्धके अतिरिक्त कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं है । अतः आत्मा चैतन्यज्ञानरूप 'ही है । प्रश्न होता है कि 'आत्माका स्फुरण होता है या नहीं ? यदि होता है, तब तो स्फुरण होनेवाले आत्माका स्फुरण धर्म हो गया । इस तरह धर्मी आत्माका धर्मभूत ज्ञान सिद्ध होता है । जैसे प्रकाशमान सूर्यका प्रकाश धर्म है, वैसे ही यदि आत्माका स्फुरण न हो, तब तो बन्ध और मुक्तिमें कोई भेद ही न रहेगा । जैसे संसारमे आत्माका स्फुरण नहीं है, वैसे ही मुक्तिमें भी स्फुरण न हो, तो बन्ध-मुक्ति समान ही ठहरेंगे । इसके अतिरिक्त घटके समान ही यदि आत्माका भी स्वतः स्फुरण न होगा, तो घटवत् आत्मामें भी जडताकी ही प्रसक्ति होगी । मुक्तिमे अन्य है नही, जिससे कि परप्रकाश्यता भी सम्भव होती । परप्रकाश्यता माननेपर स्वयञ्ज्योतिष्ट्व-श्रुतिका भी विरोध होगा ।' परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि इसी प्रकारका विकल्प आपके धर्मभूत कल्पित ज्ञानमें भी होगा । उसकी स्फूर्ति होती है या नहीं ? प्रथम पक्षमें स्फूर्तिवाले धर्मभूत ज्ञानमें स्फुरणरूप धर्म मानना पड़ेगा, तथाच वह धर्मान्तर होगा । इस तरह अनवस्था होगी । द्वितीय पक्षमें घटवत् जडत्वापत्ति होगी । फिर उसे ज्ञान भी कैसे कहा जायगा ? कुछ लोग कहते हैं कि 'धर्मभूत ज्ञानका स्फुरण नित्य है, वह भासमानता व्यवहारके अनुगुण होता है । धर्मभूत ज्ञानका स्फुरण विषयसम्बन्धजन्य होता है । वह विषयसम्बन्धके समय ही होता है, अन्यत्र नहीं । सुप्तिमें उसकी सर्वविषय- सम्बन्धार्हता वह्निशक्तिके समान प्रतिवद्ध होती है, अतः उस समय स्फुरण नहीं होता ।' परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वस्तुतः स्फुरमाण वस्तुका स्फुरण ही स्वरूप है। जैसे भासमान सूर्यका भास ही स्वरूप है, प्रकाशातिरिक्त सूर्य नहीं होता । फिर भी 'सूर्यका प्रकाश', यह व्यवहार 'राहुका सिर'के समान औपचारिक होता है । इसलिये 'प्रकाश भासित होता है या नही' इस विकल्पके समान ही 'आत्मा स्फुरित होता है या नहीं' यह विकल्प भी अयुक्त ही है । आत्मा स्फुरणरूप ही है । 'स्फुरण स्फुरित होता है या नहीं' यह विकल्प कोई भी अनुन्मत्त नहीं कर सकता । फिर भी कुछ लोग कहते ह कि "स्फुरण स्फुरमाणका धर्म ही है, स्वरूप नहीं; क्योकि क्रिया कर्ताका स्वरूप नहीं होता । छेदनक्रिया छेत्ताका स्वरूप नहीं होती ।' परंतु, यह पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि कहा जा चुका है कि प्रकाशस्वरूप सूर्यका प्रकाश क्रिया नहीं है, किंतु उसका स्वरूप ही है । जो