मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआत्माको धर्मज्ञानस्वरूप मानता है, उसके मतमें भी जब ज्ञान क्रिया नहीं है, तब स्फुरण-स्फुरमाणका स्वरूप क्यों नहीं ? जो लोग ज्ञानसामान्यको मृत्तिकादिकी तरह नित्य द्रव्य मानते हैं, स्मृतित्वादि अवस्थाविशेषरूप ज्ञानोको घटादिकी तरह अनित्य मानते हैं, उनका यह कहना नितान्त असङ्गत है कि 'सुप्तोत्थित पुरुषके इतने समयतक मैने कुछ नहीं जाना इत्याकारक ज्ञानसामान्याभावबोधक स्मरणसे अनुभवका प्रागभाव सिद्ध होता है,' क्योकि यदि ज्ञानसामान्य नित्य है, तो उसका प्रागभाव कैसे सिद्ध हो सकता है ? कोई नित्य वस्तु अभावका प्रतियोगी नहीं होती । यदि ज्ञानसामान्य भी न हो, तब तो 'मैने कुछ नहीं जाना' यह स्मरण भी असम्भव ही होगा, क्योकि यत्किञ्चित् ज्ञानाभावका ज्ञान होनेपर ही स्मरण हो सकता है । जागरकालमें भी 'तुम्हारी बात मै नहीं समझता' इस प्रकार जो बोलता है, उसे विशेष ज्ञान न रहनेपर भी सामान्य ज्ञान है ही, अन्यथा यदि उच्यमान अर्थज्ञानाभाव- का ज्ञान न हो, तो वाक्य-प्रयोग भी सम्भव नहीं । अतः सामान्य ज्ञान ही विशेषज्ञानाभावको ग्रहण करता है, सामान्यज्ञानाभावका ग्रहण नहीं हो सकता । कहा जाता है कि 'यदि अनुभव नित्य है, तो 'मुझे यह अनुभव हुआ, यह अनुभव नष्ट हो गया' इत्यादि व्यवहार कैसे सम्पन्न होगे ?' परन्तु इसका समाधान किया जा चुका है । विषयसम्बन्धके उत्पत्ति-विनाशसे अनुभवमें उत्पत्ति- विनाशका व्यवहार उपपन्न होता है । घटोत्पत्तिसे घटाकाशकी उत्पत्तिका जैसा व्यवहार होता है, वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये । घटादि स्वाभाविक जन्मा- दिविकारवान् हैं, किंतु अनुभूति औपाधिकरूपसे ही जन्मादिविकारवती है तथा जन्मादिविकारहीन स्वप्रकाश नित्य एक संविद् है । कुछ लोग कहते हैं कि 'संविद् एक नही, किंतु अनेक हैं । जैसे अज आत्मा देहादिसे भिन्न है, अनादि भी अविद्या आत्मासे भिन्न है, वैसे अनादि एव नित्य भी संविद् परस्पर भिन्न हो सकती है । यदि अविद्याका और आत्माका विभाग न होगा, तो अविद्यारूप ही आत्मा ठहरेगा ।' परंतु यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि 'संविद् अज होनेसे व्यतिरेकेण घटादिके तुल्य अविभक्त है, इस अनुमानसे सविद्की एकता ही सिद्ध होती है । संविद् ही आत्मा है, अतः आत्मासे देहादिका विभक्तत्व- दृष्टान्त असङ्गत है । अविद्या भी प्रपञ्चरूपसे जायमान होनेसे अज नहीं है । घटादिके समान अन्यसे उसकी उत्पत्ति नहीं होती, इसी दृष्टिसे वह 'अजा' कहलाती है । अजा (बकरी) के रूपकसे भी वह अजा कहलाती है । जैसे लोहित-शुक्ल-कृष्ण रंगवाली, अपने समान ही बहुत-से बच्चोको उत्पन्न करनेवाली अजाका कोई अज भोग करता हुआ अनुमरण करता है, कोई भुक्तभोगा अजाको छोड़कर उदासीन हो जाता है, तद्वत् कोई जीव प्रकृतिका अनुसरण करता है,