मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमार्क्स और ज्ञान ६६७ कोई उससे भोग-अपवर्गरूप प्रयोजन सम्पन्न करके उसे छोड़ देता है— 'अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥' ( श्वेताश्व० उप० ४ । ५ ) जैसे घटादि मृत्तिकासे भिन्न नहीं ठहरते, वैसे ही देहादि प्रपञ्च भी संविद्रूप आत्माका ही विवर्त्त या कार्य है, अतः वह भी संविद्से भिन्न नहीं है । आत्मशक्ति होनेसे अविद्या भी आत्मासे अभिन्न ही है । जैसे वह्निशक्ति वह्निसे भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मशक्ति आत्मासे भिन्न नहीं है । कहा जा सकता है कि 'यद्यपि कार्य कारणसे अभिन्न है, फिर भी कारण कार्यसे भिन्न होता है । शक्ति शक्तिमान्से भिन्न न होनेपर भी शक्तिमान् शक्तिसे भिन्न ही है । उसी तरह यहाँ भी संविद्को देहादिसे विभक्त कहना उचित है ।' परंतु यह भी ठीक नहीं, क्योंकि देहादि एवं अविद्यादि परमार्थतः यदि असत् हैं, तो फिर संविद्में तत्प्रयुक्त भेद कैसे रह सकता है ? एतावता 'आत्मा अविद्या- रूप ही ठहरेगा' यह आपत्ति भी निर्मूल ही है; क्योंकि वस्तुतः अविद्या है ही नहीं । यदि व्यावहारिक भेद कहा जाय, तो यह तो मान्य ही है । यावद्व्यवहार आत्मा और देहादिका भेद है ही, अतः अज होनेसे संविद् अविभक्त ही है । कहा जाता है कि 'निर्विकार होनेसे भले ही संविद्में स्वगत भेद न हो, परंतु देहादिसे तो संविद्में विजातीय भेद एवं संविदोंके नानात्वसे सजातीय भेद मानना उचित ही है । अबाधित बोधसिद्ध दृश्यके नानात्वसे दर्शनका भी नानात्व सिद्ध होता ही है । जैसे छेद्यके भेदसे छेदनका भेद सिद्ध होता है, वैसे ही दृश्यके भेदसे दर्शनका भी नानात्व सिद्ध होता है ।' परंतु यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि जैसे प्रकाश्य पटादिके भेद होनेपर भी प्रकाशका भेद नहीं होता, वैसे ही दृश्यके नानात्व होने- पर भी दर्शनका नानात्व सिद्ध नहीं हो सकता । घटादि विषयके भेदसे घटादि- वृत्तिरूप ज्ञानका भले ही भेद हो, परंतु नित्य संविद् प्रकाशके समान अभिन्न ही है । संविद् न तो छेदनके समान क्रिया है और न तो वह जन्य ही है । वृत्ति अवश्य जन्य एवं क्रिया है । संविद् ही जब आत्मा है, तब आत्माका नानात्व भी इसी तरह खण्डित है । अतः जैसे गगनमें घटादि-उपाधिसे औपाधिक ही भेद होता है, स्वाभाविक नहीं, वैसे ही संविद्में घटादि एवं वृत्तिके भेदसे ही औपाधिक भेद प्रतीत होता है, स्वाभाविक भेद नहीं । कहा जाता है कि 'गगन तो घट-करकादि व्यतिरेकेण सिद्ध हैं, अतः उसमें औपाधिक भेद ठीक है, परंतु ज्ञान तो ज्ञेय एवं ज्ञाताके बिना कहीं उपलब्ध ही नहीं होता, फिर ज्ञानका औपाधिक भेद कैसे माना जाय ? अतः ज्ञानका स्वाभाविक ही भेद मानना ठीक है ।' परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि सबकी सत्ता अनुभवके अधीन होती है । फिर अनुभवकी सत्ता ज्ञेय एवं ज्ञाताके