मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 429, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें६७० मार्क्सवाद और रामराज्य त्वादिका अनुभव नहीं कहा जा सकता । इस तरह यदि नित्यत्वादि अनुभूतिके धर्म होंगे, तो वेदिता न होनेसे वे अवेद्य ही ठहरेंगे । यदि अवेद्य हैं, तो धर्म ही कैसे होंगे ? अतः वस्तुतः अनुभूतिके कोई भी धर्म नहीं होते । जो नित्यत्वादि धर्म अनुभवसे विदित होते हैं, वे अनुभूतिके धर्म नहीं हैं, किंतु माया एवं मायाकार्य मूर्त्त वस्तुके ही धर्म हैं । मायाके द्वारा ही नित्यत्वादि अनुभूति-धर्म- त्वेन कल्पित हैं । कहा जा सकता है कि 'नित्यत्व, स्वयम्प्रकाशत्वादि यदि अनुभूतिके धर्म नहीं हैं, तब तो अनुभूति नित्य, स्वप्रकाश, एक सिद्ध नहीं होगी । फिर तो वह अनित्य, जड, अनेक ही ठहरेगी ।' परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योकि अनुभूतिमें जैसे पारमार्थिक नित्यत्वादि नहीं हैं, वैसे ही अनित्यत्वादि भी नहीं हो सकते । अतः अनुभूति निर्धर्मक ही है; क्योकि यदि परमार्थतः कोई भी भास्य वस्तु होती, तभी वह भासक होती । यदि परमार्थतः कालत्रय होता, तभी कालत्रयाबाध्यत्व- रूप नित्यत्व भी होता । इस तरह यदि एकत्वादि संख्या होती, तभी अनुभूतिमें एकत्व भी होता । अतः व्यावहारिक भास्य आदि पदार्थोंको लेकर ही स्वयम्प्रका- शत्वादिका व्यवहार अनुभूतिमें होता है। इसलिये अनुभूतिमें कोई भी दृश्यधर्म नही रह सकता । फिर भी कहा जाता है कि 'यदि दृशिमें दृशित्वधर्म है, तब तो दृशि निर्धर्मक न हुई, उसमे दृशित्वधर्म है ही। यदि दृशिमे दृशित्व नहीं है तो दृशित्वरहित दृशि ही कैसी ?' परंतु यह भी शङ्का ठीक नहीं है; क्योकि व्यवहारभूमिमें धर्म और धर्मी दो पदार्थ हैं या नहीं ? यदि हैं, तो धर्मको निर्धर्मक मानना ही पड़ेगा; क्योंकि धर्ममें धर्म नहीं माना जाता । यदि धर्ममें भी धर्मान्तर होगा, तब तो वह भी धर्मी ही होगा, धर्म न रहेगा । इस तरह धर्म जैसे धर्मत्वरूप धर्मरहित सिद्ध होता है, वैसे ही दृशि भी दृशित्वधर्मरहित सिद्ध होगी । यदि धर्म-धर्मी ये दो पदार्थ मान्य नहीं हैं, तब तो 'यह धर्म है, यह धर्मी है' इस प्रकारका व्यवहार ही लुप्त हो जायगा । इसलिये निर्धर्मक दृशिमें कोई भी धर्म नहीं है । ज्ञान और आनन्द ज्ञानके सम्बन्धमें अनेक प्रकारोकी विप्रतिपत्तियोंके रहते हुए भी 'अर्थ- प्रकाश' को ही 'ज्ञान' कहा जा सकता है । मुक्तिमें यद्यपि अर्थ नहीं होता तथापि जब अर्थ-ससर्ग सम्भव हो तभी अर्थका प्रकाशक अर्थ ही ज्ञान है । अतएव 'ज्ञानत्व जाति-विशेष है, साक्षात् व्यवहारजनकत्व ही ज्ञानत्व है, जड- विरोधित्व ही ज्ञानत्व है, जडसे भिन्नत्व ही ज्ञानत्व है, अज्ञानविरोधित्व ही ज्ञानत्व है' आदि भी ज्ञानके लक्षण हैं । इनमेंसे कोई लक्षण वृत्तिप्रतिबिम्बित चिदाभासमें सङ्गत होता है, तो कोई अखण्ड ब्रह्मरूप ज्ञानमें जाता है, किंतु अर्थप्रकाशत्व वृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्यरूप ज्ञान एव ब्रह्मरूप ज्ञान दोनोंमें ही अनुगत है ।