भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 430

मार्क्स और ज्ञान ६७१ सर्वावभासक ज्ञान ही ब्रह्म है, क्योंकि यह श्रुति प्रमाण है—'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ।' (कठोप० २ । २ । १५) सर्वप्रेमास्पदत्व, सर्वानन्दयितृत्वही आनन्द है । 'एष ह्येवानन्दयति' (तैत्ति० उप० २ । ७) । यह ब्रह्म ही आनन्दित करता है । यह सर्वावभासक ज्ञान स्वतः भासमान होता है । यदि उसका भी कोई अन्य भासक माना जायगा, तो उसका भी भासक कोई अन्य मानना पड़ेगा ? इस तरह अनवस्था-दोष अनिवार्य हो जायगा । इसपर कहा जाता है कि 'यदि ज्ञानस्वरूप ब्रह्म सर्वदा भासमान है, तो उसमें जगत्का अध्यास किस तरह बन सकेगा ? क्योकि भासमान शुक्तिकामें रजतका अध्यास नहीं होता-- जैसे शुक्तिकाभान रजताध्यासका विरोधी होता है, वैसे ही ज्ञानस्वरूप ब्रह्मका भासमान होना भी प्रपञ्चाध्यासका विरोधी होगा।' किन्तु यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि सर्वथा अभासमान शुक्तिकामें भी तो रजताध्यास कभी भी नहीं होता, सामान्यतया भासमान शुक्त्यादि अधिष्ठानमें ही रजतादिका अध्यास होता है । अभासमान एव विशेषाकारेण भासमान अधिष्ठानमें अध्यास नहीं होता । इस तरह सामान्यतया भासमान ज्ञानस्वरूप ब्रह्मसे प्रपञ्चाध्यास बन सकता है । इसपर पुनः कहा जा सकता है कि 'निर्विशेष ब्रह्ममें सामान्य-विशेष- व्यवहार नहीं बन सकता ।' पर यह भी ठीक नहीं; क्योकि जबतक अविद्या है, तबतक निर्विशेष ब्रह्ममें भी कल्पित विशेष मान्य होता ही है । निर्विशेष ब्रह्ममें प्रपञ्चाध्यास माना भी नहीं जाता, किंतु अज्ञानावच्छिन्न सविशेषमें ही प्रपञ्चका अध्यास होता है । तथाच प्रपञ्चाध्यासका अधिष्ठानभूत ब्रह्मका सामान्याकार सन्मात्र है और विशेषाकार ज्ञान एव आनन्द है । भ्रमकालमें विशेषाकारकी प्रतीति नहीं होती, सामान्याकार-प्रतीति भ्रमकालमें भी होती है । 'इदं रजतम्' के समान ही 'सज्जगत्' यह भ्रम-प्रत्यक्ष होता है । जैसे वहाँ 'इदमंश' अधिष्ठान सामान्यांश है, वैसे ही यहाँ सदंश अधिष्ठान सामान्यांश है । जैसे 'शुक्तौ रजतम्' इस प्रकार भ्रम नहीं होता, वैसे ही 'ज्ञानमानन्दो वा जगत्' ऐसा भ्रम नहीं होता । जैसे नीलपृष्ठ, त्रिकोण शुक्तिके साक्षात्कारसे रजतभ्रम दूर हो जाता है, उसी तरह सत्यज्ञानानन्दस्वरूप ब्रह्मके साक्षात्कारसे जगद्भ्रम मिट जाता है । ज्ञानानन्दरूपसे अभासमान और सद्रूपसे भासमान ब्रह्ममें जगत्का अध्यास होता है । अघटित- घटना-पटीयसी मायाके कारण ही ब्रह्ममें जगत्का अध्यास होता है । 'सेयं भगवतो माया यन्नयेन विरुद्धयते' (श्रीमद्भा० ३।७।९)--भगवान्की माया नयसे विरुद्ध होनेपर भी प्रत्यक्ष ही प्रपञ्चाध्यास मायाके द्वारा सम्पन्न हो जाता है । आनन्दके सम्बन्धमे भी इसी प्रकार कहा जा सकता है—( १ ) आनन्दत्व जाति आनन्द है या ( २ ) अनुकूलतया वेदनीयत्व आनन्द है या ( ३ ) अनुकूलत्व मात्र आनन्द है या ( ४ ) ज्ञानस्वरूपता ही आनन्द है अथवा ( ५ ) निरुपाधि-इष्टता ही आनन्द है अथवा (६) दुःखनिरोधित्व ही आनन्द है या ( ७ )