मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 431, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें६७२ मार्क्सवाद और रामराज्य दुःखाभावोपलक्षितत्व आनन्द है ? पहला पक्ष इसलिये ठीक नहीं कि वह लक्षण अखण्डस्वरूप ब्रह्मानन्दमें नहीं जाता । दूसरा भी ठीक नहीं; क्योकि मोक्षमें तो आनन्दस्वरूप ब्रह्म ही रहता है, उसे जाननेवाला कोई वेदिता रहता ही नहीं । आनन्दरवरूप आत्मा वेद्य है भी नही, अतः वह वेदनीय भी हो नहीं सकता, तब उसमें द्वितीय लक्षण कैसे सङ्गत होगा ? अनुकूलता भी सापेक्ष होती है और वह भी अन्यके प्रति न होकर अपने प्रति ही कहनी पड़ेगी । तथा च, सविशेषता अनिवार्य होगी, निर्विशेषमें अपने प्रति अपनेमे अनुकूलवेदनीयता कथमपि उपपन्न नहीं हो सकती । इसीलिये तीसरा भी पक्ष ठीक नहीं । यदि वेदनस्वभावसे अधिक अनुकूलता स्वाभाविक है, तब भी सखण्डतापत्ति होगी । यदि अनुकूलता औपाधिक है, तब तो उस आनन्दकी कभी निवृत्ति भी हो सकती है । चतुर्थ पक्ष भी ठीक नहीं; क्योकि उक्त रीतिसे अनुकूलता सम्भव नहीं । इस तरह तो दुःखज्ञानको आनन्द कहना पड़ेगा । निर्विषय ज्ञान अतएव निरुपाधि-इष्टता ही आनन्द है, यह पाँचवाँ पक्ष भी ठीक नहीं । सुख है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ज्ञान सविषय ही होता है, विषयानुल्लेखि ज्ञान होता ही नहीं । छठा पक्ष भी नही कहा जा सकता; क्योकि यदि विरोधनिवर्त्तन ही है, तब तो आनन्दरूप आत्मामें सदा ही दुःख-निवृत्ति होनी चाहिये । यदि दुःखतादात्म्यकी अयोग्यता ही दुःखविरोधिता है तब तो घटादि भी दुःखतादात्म्यके अयोग्य हैं, उन्हे भी आनन्द कहा जाना चाहिये । सप्तम पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि दुःखाभावरूप वैशेषिकके मोक्षमें -आनन्द न होनेपर भी दुःखाभावोपलक्षितत्वरूप वेदान्तीके आनन्दका लक्षण चला जायगा । इस तरह उपर्युक्त लक्षणोंमें दोष होनेपर भी निरुपाधि-इष्टता अर्थात् निरुपाधिक निरतिशय प्रेम या इच्छाकी विषयता ही आनन्द है, यह लक्षण निर्दोष है । इसपर कहा जा सकता है कि 'दुःखाभाव भी निरुपाधि-इच्छाका विषय होता है, अतः लक्षण अतिव्याप्त है।' किंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि दुःखाभाव भी एक प्रकारके सुखका शेष ही है, अतः वह लक्ष्य ही है, वहाँ लक्षण जाना अतिव्याप्ति नहीं । अभाव भी विरोधि-भावान्तर ही है, अतः दुःखाभाव सुखरूप ही है। कहा जा सकता है कि 'मुक्तिमें तो इच्छा नहीं रहती, परंतु वहाँ भी आनन्द तो रहता है, अतः अव्याप्ति हुई।' पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वहाँ भी इष्टत्वोपलक्षितत्व तो है ही । जब भी इच्छा थी तब उसका विषय आनन्द था । इच्छाके विषय यद्यपि शब्दादि विषय भी होते हैं, तथापि वे सुखसाधन होनेसे इच्छाके विषय होते हैं, स्वतः नहीं । वे ही जब दुःखकारक होते हैं, तब उनमें द्वेष होने लगता है । अतः वे सोपाधिक इच्छाके ही विषय होते हैं, निरुपाधिक इच्छाके नहीं । उपलक्ष्यमें व्यावर्तक अवच्छेदकता