मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७८ मार्क्सवाद और रामराज्य “अनुभव ही इस अध्यात्मवादी युक्तिका अन्तिम उत्तर है । शरीरविहीन चेतनाका कोई अस्तित्व नहीं। बर्बरके प्रेतकी तरह मानव-कल्पनाका यह प्रतिबिम्ब है । मार्क्सवाद इसीलिये इतिहासके ऊपर जोर देता है। इस इतिहासका अर्थ राजाओंका युद्ध नहीं । यह समग्र मानव-समाज और सारे विश्वका इतिहास है । इतिहास ही चेतनाके ऐतिहासिक जन्मका प्रमाण है । यह चेतना देश और कालसे सीमित है । अध्यात्मवादी क्या करते हैं, वे मनुष्यकी किसी एक मानसिक क्रियाको मूल सत्य मानकर इसीको भूतजगत्के मूलमें पहुँचा देते हैं । कोई कहता है कि भूतके मूलमें प्रज्ञा ( रीजन ) है, कोई कहता है इच्छाशक्ति ( विल ) है और कोई कहता है प्राणशक्ति ( वाइटल एयर्स ) है । जहाँतक जान पडता है, जीवजगत्में मनुष्यको ही केवल अमूर्त-भावनाकी क्षमता प्राप्त है । मानव-मस्तिष्क और शरीरके सगठनकी विशिष्टतासे ही इस क्षमताकी उत्पत्ति है । असंख्य मनुष्योंकी अभिज्ञतासे ही 'मनुष्य' नामकी साधारण संज्ञा बनती है । लेकिन इन असंख्य मनुष्योंको छोड़कर इस साधारण सज्ञाका स्वतन्त्र अस्तित्व कहाँ रह जाता है ? साधारण संज्ञा मनुष्यकी विचारक्रियाकी एक पद्धति है, यह मनुष्यके जीवनधारणके काम आती है । अन्यान्य जीव बाहरी जगत्की प्रेरणाओको मिलाकर अमूर्त- भावनाकी सृष्टि नहीं कर सकते और इसीलिये प्रकृतिके सामने उनकी अक्षमता अधिक है । साधारण संज्ञाकी सृष्टिकी क्षमताने मनुष्यको प्रकृतिके रहस्यको समझनेमें काफी सहायता पहुँचायी है, लेकिन यही क्षमता मनुष्यके मनमें भ्रान्तिकी सृष्टि कर सकती है और करती है । साधारण संज्ञा वास्तवकी अभिज्ञतासे ही बनती है, लेकिन मनुष्यका मन इसको वास्तवसे हटाकर इसके एक स्वतन्त्र अस्तित्वकी सृष्टि कर सकता है, और करता है, इसीलिये मनुष्यकी विचारधाराको 'चेतना', 'प्रज्ञा' आदि अनेकों साधारण संज्ञाओमें परिवर्तित किया जा सकता है । आदर्शवादी यह भूलकर कि 'चेतना', 'प्रज्ञा' आदि साधारण संज्ञाएँ असंख्य जीवोंकी विशेष अवस्थापर निर्भर हैं, इनको एक स्वतन्त्र शक्तिके रूपमें देखते हैं ।” परंतु यह सारी कल्पना निरर्थक है । आयुर्वेद, योगशास्त्र तथा आध्यात्मिक दृष्टिके आधारपर शरीरसम्बन्धी ज्ञान लाखों वर्षोंका पुराना है । उपनिषदोने लाखो वर्ष पहले घोषित कर दिया है—'अविनाशी वा अरे अयमात्मा' । ( बृहदा० ) यह आत्मा अविनाशी है । शरीरके विनाशसे आत्माका भी विनाश होता है' यह भ्रम पहले भी लोगोको था । श्रुतिने भी कहा—"एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति ( बृहदा० २।४। १२) ।" अर्थात् शरीरादि संघातरूपमें परिणत भूतोंसे समुत्थित होकर उनके विनाशके पश्चात् ही विनष्ट हो जाता है, अर्थात् देहादिका नाश होते ही उसके साथ तादात्म्या- भिमानमूलक जो औपाधिकरूप है, वह नष्ट हो जाता है । जैसे विशिष्ट तेज