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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

६७८ मार्क्सवाद और रामराज्य “अनुभव ही इस अध्यात्मवादी युक्तिका अन्तिम उत्तर है । शरीरविहीन चेतनाका कोई अस्तित्व नहीं। बर्बरके प्रेतकी तरह मानव-कल्पनाका यह प्रतिबिम्ब है । मार्क्सवाद इसीलिये इतिहासके ऊपर जोर देता है। इस इतिहासका अर्थ राजाओंका युद्ध नहीं । यह समग्र मानव-समाज और सारे विश्वका इतिहास है । इतिहास ही चेतनाके ऐतिहासिक जन्मका प्रमाण है । यह चेतना देश और कालसे सीमित है । अध्यात्मवादी क्या करते हैं, वे मनुष्यकी किसी एक मानसिक क्रियाको मूल सत्य मानकर इसीको भूतजगत्के मूलमें पहुँचा देते हैं । कोई कहता है कि भूतके मूलमें प्रज्ञा ( रीजन ) है, कोई कहता है इच्छाशक्ति ( विल ) है और कोई कहता है प्राणशक्ति ( वाइटल एयर्स ) है । जहाँतक जान पडता है, जीवजगत्में मनुष्यको ही केवल अमूर्त-भावनाकी क्षमता प्राप्त है । मानव-मस्तिष्क और शरीरके सगठनकी विशिष्टतासे ही इस क्षमताकी उत्पत्ति है । असंख्य मनुष्योंकी अभिज्ञतासे ही 'मनुष्य' नामकी साधारण संज्ञा बनती है । लेकिन इन असंख्य मनुष्योंको छोड़कर इस साधारण सज्ञाका स्वतन्त्र अस्तित्व कहाँ रह जाता है ? साधारण संज्ञा मनुष्यकी विचारक्रियाकी एक पद्धति है, यह मनुष्यके जीवनधारणके काम आती है । अन्यान्य जीव बाहरी जगत्की प्रेरणाओको मिलाकर अमूर्त- भावनाकी सृष्टि नहीं कर सकते और इसीलिये प्रकृतिके सामने उनकी अक्षमता अधिक है । साधारण संज्ञाकी सृष्टिकी क्षमताने मनुष्यको प्रकृतिके रहस्यको समझनेमें काफी सहायता पहुँचायी है, लेकिन यही क्षमता मनुष्यके मनमें भ्रान्तिकी सृष्टि कर सकती है और करती है । साधारण संज्ञा वास्तवकी अभिज्ञतासे ही बनती है, लेकिन मनुष्यका मन इसको वास्तवसे हटाकर इसके एक स्वतन्त्र अस्तित्वकी सृष्टि कर सकता है, और करता है, इसीलिये मनुष्यकी विचारधाराको 'चेतना', 'प्रज्ञा' आदि अनेकों साधारण संज्ञाओमें परिवर्तित किया जा सकता है । आदर्शवादी यह भूलकर कि 'चेतना', 'प्रज्ञा' आदि साधारण संज्ञाएँ असंख्य जीवोंकी विशेष अवस्थापर निर्भर हैं, इनको एक स्वतन्त्र शक्तिके रूपमें देखते हैं ।” परंतु यह सारी कल्पना निरर्थक है । आयुर्वेद, योगशास्त्र तथा आध्यात्मिक दृष्टिके आधारपर शरीरसम्बन्धी ज्ञान लाखों वर्षोंका पुराना है । उपनिषदोने लाखो वर्ष पहले घोषित कर दिया है—'अविनाशी वा अरे अयमात्मा' । ( बृहदा० ) यह आत्मा अविनाशी है । शरीरके विनाशसे आत्माका भी विनाश होता है' यह भ्रम पहले भी लोगोको था । श्रुतिने भी कहा—"एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति ( बृहदा० २।४। १२) ।" अर्थात् शरीरादि संघातरूपमें परिणत भूतोंसे समुत्थित होकर उनके विनाशके पश्चात् ही विनष्ट हो जाता है, अर्थात् देहादिका नाश होते ही उसके साथ तादात्म्या- भिमानमूलक जो औपाधिकरूप है, वह नष्ट हो जाता है । जैसे विशिष्ट तेज

मार्क्स और ज्ञान ६७९ आदिके कारण सामुद्रिक जलमें लवण-कणका रूप बनता है, उपाधिके वियुक्त होनेपर वह औपाधिकरूप नष्ट हो जाता है। परंतु जैसे लवण कण नष्ट होनेपर भी सिन्धुजल नहीं मिटता, वैसे ही देहादि उपाधिमूलक औपाधिकरूप नष्ट होनेपर भी वास्तविक अनौपाधिकरूप बना ही रहता है। जैसे महाकाशका अंश ही घटा- काश होता है, वैसे ही परमात्माका अंश ही क्षेत्रज्ञ आत्मा है। जीवात्माके औपाधिक रूपके नश्वर होनेपर भी उसका वास्तविकरूप कभी नश्वर नहीं है। प्रेतात्माकी कल्पना न केवल शास्त्रीय ही है, अपितु उसके प्रत्यक्ष चमत्कार आज भी उपलब्ध होते हैं। प्रेत-विद्याके आधारपर ही अन्य लोगोंको अविज्ञात गुप्त-से-गुप्त रहस्योंका ज्ञान परलोकविद्यावाले बतलाते हैं। अनेक स्थानोंमें सबके सामने किसी गृह-प्राङ्गणमें ईंट, पत्थर एवं अपवित्र वस्तुओंकी वर्षा होना, घरकी वस्तुओं, वस्त्रों आदिका देखते-देखते लुप्त होना आदि घटनाएँ ऐसी हैं कि पुलिसकी छान-बीन भी वहाँ व्यर्थ होती है, केवल साहस- मात्रसे ऐसी वस्तुओंका अपलाप नहीं किया जा सकता। युक्तिकी दृष्टिसे भी उत्कट कामनायुक्त मनःप्रधान सूक्ष्म शरीरविशिष्ट प्राणी अपने प्राक्तन कर्मोंके अनुसार अन्य योनियोंके समान ही प्रेतयोनिमें भी प्राप्त होता है। कर्मोंके उत्कर्ष- अपकर्षके अनुसार ही उनमें भी ऐश्वर्यका तारतम्य होता है। आस्तिक प्रत्यक्षानुमानके अतिरिक्त आगम-प्रमाण भी मानते हैं। तदनुसार पूजा-पाठ, मन्त्र-तन्त्र—सभीका अस्तित्व है। ईश्वर न माननेवाले मीमांसकों एवं सांख्योंने भी मन्त्रोंका महत्त्व माना है। निरीश्वरवादी बौद्धो एवं जैनियोंमें भी मन्त्रों- का अस्तित्व मान्य है। सबके ही यहाँ प्रणवादि मन्त्रका जप चलता है। आजके वैज्ञानिक युगमें भी अधिकांश मनुष्य मन्त्रोंमें विश्वास रखते हैं। जैसे तृण, वीरुध, ओषधियोंमें भिन्न विचित्र गुण होते हैं, उनके परस्पर संश्लेष-विश्लेषसे उन गुणोंमें ह्रास-विकास एव उद्गम-अभिभव होता रहता है, वैसे ही मन्त्रोंसे भी। अगणित ओषधियों .एव उनके अगणित संश्लेष-विश्लेषोंसे उद्भूत एवं अभिभूत होनेवाले गुणोंको केवल अन्वय-व्यतिरेकसे नहीं समझा जा सकता। अन्वयव्यतिरेकसे एक संखियाका ही गुण, रस, स्वाद आदि लाखों प्राणियोंके भी बलिदानसे लाखों वर्षोंमें भी जान सकना असम्भव है। अतएव महातपा महर्षियोंने योगज प्रत्यक्ष- से ही सब वस्तुओंके गुण जाने हैं। इसी तरह वर्णोंके भी विचित्र संश्लेष- विश्लेषमें भी विलक्षण प्रकारकी शक्तियाँ निहित होती हैं। वर्णविन्यासोंके चमत्कार लोकमें भी प्रत्यक्ष हैं ही। राजा-जारा, नदी-दीन, कपि-पिक आदि वर्णोंके व्यत्यास- मात्रसे अर्थ और प्रभावमें कितना भेद होता है ? कोई वर्णविन्यासज्ञ पाँच मिनटके लिये सुप्रीमकोर्टमें खडा होकर वर्णविन्यासकी महिमासे दूसरोंका और अपना महान् लाभ कर लेता है। कोई अननुरूप वर्णविन्यासके कारण कलहका

६८० मार्क्सवाद और रामराज्य कारण बन अपना और दूसरोका नुकसान कर लेता है । इसीलिये योगियों, तार्किकों एवं नैयायिकोने भी मन्त्रशक्ति मानी है । कोई भी विधिपूर्वक मन्त्रानुष्ठान करके आज भी मन्त्रका महत्त्व अनुभव कर सकता है । कुछ वैज्ञानिक भी अलौकिक शक्ति मानने लगे हैं । दर्शन वैज्ञानिकोंके विज्ञानकी परवा न करके ही अपने सत्य सिद्धान्तको वैज्ञानिको एव विज्ञानकी उत्पत्तिके पहलेहीसे बतला रहा है । लाखो वर्ष पहलेसे ही, जब आधुनिक वैज्ञानिक गर्भमें भी नहीं आयेथे, उपनिषदें आत्मा- को मनोवचनातीत कहती आ रही हैं। वह इसलिये कि आन्तर वस्तुसे बाह्य वस्तुका ग्रहण होता है, बाह्यसे आन्तरका नहीं। बाह्य प्रकाशका परिज्ञान नेत्रसे होता है, परतु सूक्ष्म नेत्र-इन्द्रियका बोध बाह्य प्रकाशसे नहीं होता । इन्द्रियोका व्यापार मनसे विदित होता है, परंतु इन्द्रियोसे मनका व्यापार विदित नहीं होता । मन, बुद्धि आदिका बोध सर्वभासक साक्षीसे होता है, परतु स्वप्रकाश साक्षीका मन आदिके द्वारा बोध नहीं होता । इसी तरह जाति, गुण, क्रिया, सम्बन्धसे रहित होनेके कारण शब्दकी अभिधावृत्तिका गोचर अद्वितीय ब्रह्म नहीं होता । वराक (वेचारे ) विज्ञानके भयसे दार्शनिकोने ब्रह्मको मनोवचनातीत नहीबनाया है । आत्मा एवं भूत मार्क्सवादी 'आत्माकी अपेक्षा प्रकृति या भूतको ही मूल मानते हैं । भौतिक चिन्त्य वस्तुसे भिन्न चिन्तन या विचार पृथक् नहीं किया जा सकता है । चेतना या विचार चाहे कितने ही सूक्ष्म क्यो न प्रतीत हों, परंतु हैं वे मस्तिष्क- की उपज ही । मस्तिष्क एक भौतिक दैहिक इन्द्रिय ही है । यह भौतिक जगत्‌का सर्वश्रेष्ठ इन्द्रिय है । मार्क्सके शब्दोमें 'पदार्थ मनसे उत्पन्न नही हुआ, किंतु मन पदार्थकी सर्वोत्कृष्ट सृष्टि है ।' लेनिनने कहा है कि 'सृष्टि-ज्ञानका अर्थ है—पदार्थकी गति और उसकी चिन्तनशीलताका ज्ञान ।' इस तरह भौतिक पदार्थ या प्रकृति ही मूल है । विचार या चेतना उसका प्रतिबिम्ब है। व्यक्तिके विचार उसकी सामाजिक सत्ता या परिस्थितिसे स्वतन्त्र नहीं होते। कहा जाता है कि 'एक दार्शनिक अपने युगका कीचड़ अपने पैरोके साथ लिये जाता है । उसके दर्शनपर उसके समाजकी छाप अवश्य ही रहती है ।' लास्कीके शब्दोमें 'जो जैसा रहता है, वैसा ही सोचता है ।' एमिल वर्नसके शब्दोमें 'वस्तु अर्थात् वह वास्तविकता, जो अचेतन है, पहले थी । मन जो सचेतन है, बादमें आया । वस्तु अर्थात् बाह्य पदार्थ मनसे स्वतन्त्र है ।' यद्यपि पाश्चात्य आदर्शवादी दार्शनिकोने मनस् या सर्वमनस् तत्त्वको ही मूल माना है । उसीसे अचेतनकी उत्पत्ति माना है । काट, फिक्टे, हीगेल आदि इसी विचारके हैं । अद्वैतवादी वेदान्ती भी एक हदतक कहते हैं कि सम्पूर्ण विश्वप्रपञ्च मनका विस्तार है । यह द्वैत मनोमात्र ही है—'मनोमात्रमिदं द्वैतम् ।' मनके

अमनी भाव होनेपर द्वैत कुछ भी नहीं रह जाता- 'मनसो ह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते' (माण्डूक्यकारिका ३। ३१) बौद्धोका क्षणिक विज्ञान ही बाह्य अर्थके आकारसे परिणत होता है । यह भी इन्हीं मतोसे मिलता-जुलता मत है । तथापि क्षणिक विज्ञान या व्यावहारिक स्थायी मन या अन्तःकरण तथा उसकी इच्छा-द्वेष, सुख-दुःख आदि सब विकृतियोकी स्थिति, गति, अपचिति ( लय ) जिस नित्य अखण्ड बोधसे भासित होती हैं, वह अनन्त सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन ब्रह्मात्मा ही वेदान्तमतमें सर्वमूल है । मन भी उसी अखण्ड बोधका विवर्त्त है । अन्वय-व्यतिरेकसे जैसे मृत्तिकाके होनेपर ही मृद्विकार घटादि उपलब्ध होते हैं, मृत्तिकाके बिना वे उपलब्ध नहीं होते, जैसे जलके रहनेपर ही तरङ्गादि प्रतीत होते हैं, जलके बिना वे प्रतीत नहीं होते, वैसे ही मनके होनेपर ही बाह्य एव आभ्यन्तर भौतिक दृश्यमात्र प्रतीत होते हैं, मनके बिना कुछ भी भासित नहीं होते हैं । इसी प्रकार सर्वान्तर्द्रष्टाका अस्तित्व ही सम्पूर्ण दृश्यके अस्तित्वका मूल है । अखण्ड बोधके बिना तो मन, अन्तःकरण या विज्ञान भी भासित नहीं होते । अतएव मूल पदार्थ अखण्ड बोध सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है । मनसे भिन्न मस्तिष्क भी कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है । मनको श्रोत्र, त्वक्, चक्षु आदि दस बाह्य इन्द्रियोसे भिन्न ग्यारहवी आन्तर इन्द्रिय माननेमें भी कोई आपत्ति नहीं है। उसी मनमें बुद्धि, चित्त, मन, अहङ्कार- ये चार भेद होते हैं। उसमें इच्छा, द्वेष, सुख-दुःखादि गुण व्यक्त हुआ करते हैं। भले ही मस्तिष्कके तन्तुविशेषोके निघर्षसे इसकी व्यञ्जना होती हो, परंतु यह मस्तिष्क एव उसके तन्तु या तन्तुका निघर्षमात्र नहीं है। जैसे ठंडे और गरम दो तार या दो तारोका सघर्ष ही विद्युत् नहीं है, किंतु उनसे व्यक्त होनेवाली विद्युत् उनसे भिन्न स्वतन्त्र वस्तु है, वैसे ही मन इन मस्तिष्क, तन्तु एव उनके निघर्षसे भिन्न वस्तु है । शुद्ध स्फुरण, अखण्ड बोध तो विचारोसे भी भिन्न स्वतन्त्र वस्तु है । मार्क्सवादी कहते हैं कि "विचारोका जन्म बाह्यजगत्से ही होता है। फिर भी सभी विचार सत्य नहीं होते । वास्तविकताका ठोस अनुभव ही बतलाता है कि विचार सही है या नहीं । विचार करनेपर यह भी असङ्गत ही प्रतीत होता है। फिर भी वास्तविकताके जिस ठोस अनुभवसे ही विचारकी सत्यताका निश्चय होता है, वह अनुभव क्या है ? क्या वह भी जड, बाह्य वस्तु है ? अतः हर दृष्टिसे यह मानना पड़ेगा कि विचार हो या अनुभव, ठोस हो या पोला, किसी भी वस्तु- का अस्तित्व निर्दोष अनुभव या विचारके बिना सिद्ध नहीं होता ।” इससे इतना ही कहा जा सकता है कि पूर्वानुभवका बाधक अनुभवान्तर होनेसे पूर्वानुभवको भ्रम समझा जाता है । बाधक अनुभव न होनेसे पूर्वानुभवको स्वतः ही सत्य माना जाता है । सर्वथा अपि अनुभवके बिना बाह्य पदार्थकी सत्ता ही सिद्ध नहीं होती है। साधारण विचार, साहित्य आदिपर अवश्य समाजकी छाप होती है । उसमें

६८२ मार्क्सवाद और रामराज्य भी उच्च श्रेणीके विचारको, लेखकोंके ग्रन्थोंमें उच्च सामाजिक स्थितियोका अङ्कन होता है। निम्न विचारके ग्रन्थोपर निम्नश्रेणीका ही प्रभाव अङ्कित होता है। इसी अंशमें लास्कीका कथन सङ्गत है । परंतु प्रामाणिक दर्शनके लिये तो देश, काल, परिस्थितियोके आवरणोको भेदन करनेसे ही तत्त्वानुभूति होती है। बिना रंगीन चश्मा उतारे वस्तुका वास्तविक रूप-ज्ञान सर्वथा ही दुर्घट होता है। देहके समान ही इन्द्रियाँ भी आत्मा नहीं हैं । यदि सम्मिलित होकर इन्द्रियाँ आत्मा है तब तो एक इन्द्रिय नष्ट होनेपर आत्मनाश-प्रसङ्ग होगा, क्योंकि एकके नष्ट होनेपर भी समस्तता विनष्ट हो गयी । यदि प्रत्येक इन्द्रियाँ आत्मा हैं, तो परस्पर विरुद्ध दिक्क्रिया होनेसे शरीर ही उन्मथित हो जायगा । ‘योऽहं चक्षुषा घटमद्राक्षं सोऽहं घटं त्वचा स्पृशामि’ जिस मैने चक्षुसे घट देखा था, वही मैं त्वक्से घटका स्पर्श करता हूँ' इस अनुभवसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि नेत्र, श्रोत्र, त्वक्से काम लेनेवाला आत्मा इनसे भिन्न है । चक्षु यदि आत्मा है, तो वह स्पर्शका कर्त्ता क्यों नहीं हो सकता । त्वक् आत्मा है तो वह दर्शन-क्रियाका कर्त्ता क्यों नहीं हो सकता ? अतः यहाँ कोई इन्द्रियोसे भिन्न ही आत्मा है जो कि दर्शन, घ्राण, स्पर्श, श्रवण आदि सभी क्रियाओंका कर्त्ता है, उसी एक आत्माकी विभिन्न क्रियाओके कर्त्तारूपसे प्रसिद्धि है । क्षणिक विज्ञान भी आत्मा नहीं; क्योकि अनुभव एवं स्मृतिका एक ही कर्ता होता है । अन्यद्वारा अनुभूतका अन्य स्मरण नही करता । मैंने उसे देखा था और मै इसे देख रहा हूँ । इस तरह अनेक काल-सम्बन्धी आत्मा क्षणिक नहीं हो सकता है । पूर्वोत्तरदर्शी एक प्रत्ययी न हो तो स्मृति नही हो सकती है । ‘सोऽहं’ यह प्रत्यभिज्ञा भी स्थायी आत्माके बिना नही बन सकती । यदि स्मरण एवं अनुभवके कर्ता भिन्न हों तो मैने देखा, अन्यने स्मरण किया, यह व्यवहार होना चाहिये । कुछ लोग कहते हैं कि सादृश्यके कारण एकताकी प्रतीति होती है । जैसे नदी-प्रवाह, दीप, केश आदिमें तत्सदृश होनेसे ‘त एवेमे केशाः, सैवेयं दीपकलिका’ वे ही ये बाल हैं, वही यह दीपशिखा है— यह प्रत्यभिज्ञा होती है, परंतु यह भी ठीक नहीं है । ‘तेनेदं सदृशम्’ यह उसके सदृश है, इस प्रकार सादृश्यग्रहणके लिये भी तो पूर्वकालवर्ती तत्का, वर्तमानकालवर्ती इदंका तथा तदुत्तरवर्ती सादृश्यका ग्राहक एक स्थायी आत्मा हो तभी सादृश्यबोध भी हो सकता है । कुछ लोग कहते हैं कि सादृश्यप्रत्यय भी स्वतन्त्र ही है, परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योकि ऐसी स्थितिमें ‘तेनेदं सदृशम्’ इत्यादि प्रतीति न होनी चाहिये । बाह्य विषयमें भले ही कभी सादृश्यमूलक-एकत्वका भ्रम भी हो तथापि उपलब्धि या .अनुभवितामें तो संदेह ही नही होता । मैं वही हूँ या तत्सदृश अन्य हूँ, किंतु यहाँ तो स्पष्ट ही निश्चित प्रत्यभिज्ञान होता है, जो मैंने कल देखा था, वही मै आज स्मरण कर रहा हूँ।

एकादश परिच्छेद मार्क्स और आत्मा शास्त्र-संस्कारवर्जित जनसाधारण तथा भूतसंघातवादी चार्वाक और आधुनिक मार्क्सवादी जीवित देहको ही आत्मा कहते हैं, क्योंकि 'मनुष्योऽहं जानामि' मैं मनुष्य हूँ, जानता हूँ, इस रूपसे ही शरीर ही 'अहं' प्रत्ययका आलम्बन और ज्ञानके आश्रयरूपसे आत्मा प्रतीत होता है । दूसरे लोग इन्द्रियोंको ही आत्मा कहते हैं । उनके मतसे चक्षु, श्रोत्रादि इन्द्रियोंके बिना रूपादि-ज्ञान नहीं होता, अतः वे ही आत्मा हैं ।' अन्य लोग 'स्वप्नमें चक्षुरादि न होनेपर भी ज्ञान होता है, अतः 'अहं' प्रत्यय और विज्ञानका आश्रय होनेसे मनको ही आत्मा मानते हैं ।' विज्ञानवादी क्षणिक विज्ञानको और माध्यमिक शून्यको ही आत्मा कहता है । यहाँ जीवित देहको ही आत्मा माननेवाले मार्क्सवादियोंसे प्रश्न हो सकता है कि क्या भोक्तृत्व और चैतन्य व्यस्त ( अर्थात् प्रत्येक ) भूतोंका धर्म है अथवा समस्त ( सम्मिलित ) भूतोंका ? पहले पक्षमें भी क्या सभी भूत समानकालमें ही भोक्ता हैं ? यदि हाँ, तो स्वार्थके लिये प्रवृत्त सभी चैतन्य गुणयुक्त भूतोंका परस्पर अङ्गाङ्गिभाव नहीं हो सकेगा, अङ्गाङ्गिभाव बिना बने संघात नहीं बन सकता । लोकमें देखते ही हैं कि मुञ्ज आदि तृणोंका अङ्गाङ्गी भाव होनेसे रज्जुरूप संघात निष्पन्न होता है । यदि संघातके बिना ही पृथक्-पृथक् भूतोंका स्वतन्त्र भोक्तृत्व मान लिया जाय तो देहसे बाहर भी एक-एक भूतमें भी भोक्ताकी उपलब्धि होनी चाहिये जो कि अदृष्ट ही है । यदि व्यस्त भूतोंका समानकालमें ही भोक्तृत्व न होकर क्रमेण भोक्तृत्व हो तो भी संघातकी अनिष्पत्ति बनी ही रहेगी । यदि वर-विवाहादि न्यायसे जैसे प्रतिविवाहमें एक-एक पुरुष प्रधान और अन्य वरयात्रिक अप्रधान होते हैं, उसी तरह एक-एक भोगमें एक-एक भूत प्रधान होगा । दूसरे उसके गुण भूत होंगे, परन्तु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि जैसे एक-एक वरके लिये असाधारणरूपसे एक-एक कन्या भोग्य वस्तु है, वैसे ही भोग करनेवाले पृथिवी, जल, तेज, वायुके लिये एक-एक गन्ध, रस, रूप, स्पर्शादि भोग्यवस्तु व्यवस्थित नहीं हैं, अतएव पृथिवीमें रूप-रसादिकी भी उपलब्धि होती है । यदि किसी तरह व्यवस्था मान भी ली जाय कि तेजका रूप ही, वायुका स्पर्श ही, जलका रस ही भोग्य है तो भी एक कालमें शब्द-स्पर्शादि सभी विषयोंका सन्निधान होनेपर भोगमें क्रम अर्थात् ( अयौगपद्य ) उपपन्न नहीं हो सकेगा । जैसे एक ही मुहूर्तमें प्रत्येक भोग्य कन्याके उपस्थित होनेपर वरोंका क्रम

६८४ मार्क्सवाद और रामराज्य विवाह और गुण-प्रधानभावेन सघात नही बन सकता, अर्थात् भोग्यकी उपस्थितिमे भोक्ता क्रमकी अपेक्षा न करके ही भोगमें प्रवृत्त होगा । उसी तरह प्रत्येक भोक्ता भूत, भोग्य शब्दादिके उपस्थित होनेपर क्रमकी अपेक्षा न करके ही भोगमें संलग्न होगा । अतः इनका भी अङ्गाङ्गी-भावरूपसे संघात नहीं बन सकेगा । इसी तरह समस्त ( सम्मिलित ) भूतोका भी भोक्तृत्व नही बन सकता; क्योंकि यदि प्रत्येक भूतोमें चैतन्य नहीं है तो वह संघातमें भी नहीं हो सकता । अतएव सघातमें भी भोक्तृत्व नही बन सकता । यदि कहा जाय कि अग्निमें डाले हुए एक-एक तिल ज्वालाके जनक न होनेपर भी तिलसमूह ज्वालाका जनक होता है, उसी तरह भूतोंका समूह भी चैतन्यका जनक होगा, परतु यह कहना ठीक नही; क्योकि संघातकी उत्पत्तिमे कोई स्पष्ट हेतु नही दिखायी देता । कारण, मार्क्सवादीके मतमें संघातात्मक शरीरसे भिन्न कोई चेतन पदार्थ है ही नहीं, जो कि प्रत्येक अचेतन भूतका चेतनात्मक संघात उत्पन्न कर सके । यदि भावी भोगको ही संघातका कारण कहा जाय तो वह भी ठीक नहीं, कारण यदि भोगको अप्रधान माना जाय तो परस्पर गुणप्रधानभावशून्य भूतोंका संघात कैसे बनेगा ? अर्थात् गुणभूत भोगके द्वारा प्रधानभूत भूतोका संघात सम्पादन असङ्गत है । यदि भोगको ही प्रधान माना जाय तो यह भी ठीक नही; क्योंकि भोग सर्वथा ही भोक्ताका शेष ( अङ्ग ) हुआ करता है । कहा जा सकता है कि शेषी (अङ्गी) अर्थात् प्रधानभूत भोगके प्रति शेषभूत ( अर्थात् अङ्गभूत ) स्त्री-पुरुष शरीर भोक्ताओका संहत ( सम्मिलित ) होना देखा गया है । पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सिद्धान्तमे वहाँ भी स्त्री-पुरुष शरीरोमे भोक्तृत्व सम्प्रतिपन्न नहीं, किंतु वहाँ शरीर-भिन्न दोनोंके भोक्ता आत्मा ही भोगके लिये दोनों शरीरोंको सम्मिलित करते हैं । और ज्वालाके प्रति तिलोंकी संघातापत्तिका दृष्टान्त भी जडवादीके मतमें असिद्ध है; क्योकि उसके मतमें संघात नामकी कोई चीज सिद्ध नही होती । वादी-प्रतिवादी उभयसम्मत होनेसे ही कोई दृष्टान्त किसी सिद्धान्तका साधक हो सकता है । संघात क्या है ? यह भी विचारणीय है । 'जैसे अनेक वृक्षोका एक देशमें आना ही उनका सघातभूत 'वन' कहा जाता है, वैसे ही भोग और भोक्ताका समानाधिकरणत्व अर्थात् एक देशस्थता सघात है,' यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि इस तरह तो सर्वव्यापी सभी भूत सर्वत्र हैं । अतएव चैतन्य और भोग भी सार्वत्रिक ठहरेगा तथा शरीरमे ही भोगका नियम बाधित होगा । 'उन भूतोंसे आरब्ध अवयवी सघात है', यह भी नही कहा जा सकता; क्योंकि यदि वह अवयवी चार भूतोंसे भिन्न है, तो उसे पाँचवाँ तत्त्व मानना होगा,

जो भौतिकवादियोंको अस्वीकृत ही है । यदि अवयवी अवयवोंसे अभिन्न है तब तो भूतमात्र ही होगा। भेद एव अभेद दोनोंका होना असङ्गत ही है । यदि कहा जाय कि अवयवी अवयवोंके परतन्त्र है, अतः पञ्चमतत्त्वापत्ति नहीं होगी, तो यह भी ठीक नहीं, कारण, इस तरह जल आदि भी पृथ्वी आदिके परतन्त्र होनेसे जलादिमे भी स्वतन्त्र तत्त्वका व्यवहार होता है । फिर तो पृथिव्यादि भूतचतुष्टय तत्त्व हैं, यह सिद्धान्त बाधित हो गया । कुछ लोग कहते हैं कि 'एकद्रव्य-बुद्धिका अवलम्बन योग्य होना ही सङ्घात है । देहमें एकबुद्धि- अवलम्बन-योग्यता है ही', परंतु यह भी ठीक नहीं, क्योंकि वस्तुतः अनेकोंमें एकत्वबुद्धि विभ्रम ही है । 'एकार्थक्रियामे युगपत् (एक कालमे ) अन्वय ही सङ्घात है, जैसे प्रमातृत्व आदि व्यवहाररूप एक कार्यके लिये पृथिव्यादि चारों भूतोंका अन्वय होता है।' पर यह भी ठीक नहीं, कारण, ऐसा माननेपर वायुजन्य वेणुसङ्घर्ष- जनित काष्ठाश्रित वह्निसे संतप्त जलमें चारों भूतोंका समन्वय है ही, फिर उस जलमें भोक्तृत्व होना चाहिये । परंतु यह है नहीं। जो कहा जाता है कि 'जैसे अग्निका लोह-पिण्डके साथ सम्बन्ध होता है, वैसे सम्बन्धको ही संघात कहा जाता है', वह भी ठीक नहीं । कारण, शरीरमें वायुका सम्बन्ध उस प्रकारका न होनेसे शरीरमे भोक्तृत्व नहीं बन सकेगा । इसके अतिरिक्त वह्निव्याप्त लोहपिण्डमें उसके ही द्वारा उसमे जल शुष्क होता है और वायुका भी उसमें सम्पर्क रहता है। अतः उस लोहपिण्डमें ही भोक्तृत्व एव चैतन्यका उपलब्ध होना चाहिये । यदि इन सब दोषोंके परिहारके लिये एक-एक भूतको भोक्ता माना जाय तो यह भी ठीक नहीं; क्योकि सब भूतोंका शब्दादि विषय-संनिधान होनेपर फिर किसका भोग या चैतन्य है ? इसका निश्चय असम्भव होगा । अतः चारोंको भोक्ता मानना पडेगा । और उनका संघात बन नहीं सकता, अतः संघात- भावापन्न भूतोको भोक्ता या चेतन माननेका पक्ष युक्तिहीन है । कहा जाता है कि 'शक्तिमद्द्रव्यान्तरकी कल्पनाकी अपेक्षा उन गोलकोंमें शक्तिमात्रकी कल्पनामें लाघव है', परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि फिर तो आत्मामें ही क्रमयुक्त सर्वविज्ञानसामर्थ्य माननेमें अत्यन्त लाघव है । कुछ लोग 'रूपादिकी उपलब्धि करणपूर्वक होनी चाहिये, कर्ताका व्यापार होनेसे छिदि क्रियाके तुल्य, अर्थात् जैसे कर्ता कुठारादि करणके द्वारा काष्ठछेदन करता है, उसी तरह आत्मा चक्षुरादि करणोंके द्वारा रूपादिकी उपलब्धि करता है', इस अनुमानसे देहभिन्न इन्द्रियाँ सिद्ध करते हैं। और यह भी कहा जाता है कि 'वे इन्द्रियाँ भौतिक हैं। चक्षु तैजस है, क्योकि तैजसरूपका ही ग्राहक है । श्रोत्र आकाशीय है, क्योंकि आकाशीय शब्दका ग्राहक है । मन शब्द-स्पर्शादि सभीका व्यञ्जक है, अतः वह पञ्चभूतोंका ही कार्य है । इस तरह इन्द्रियाँ भी भोक्ता नहीं हो सकतीं ।'

६८६ मार्क्सवाद और रामराज्य बौद्धोके अनुसार ‘दिखायी देनेवाले आँख, नाक, कान आदि गोलक ही इन्द्रियाँ हैं।’ ‘उन गोलकोंमें देखने-सुनने आदिकी शक्ति ही इन्द्रियाँ हैं’ यह मीमांसकोंका मत है। ‘गोलक भिन्न द्रव्य ही इन्द्रियाँ है’ यह अन्य लोग मानते हैं। उनमें बौद्धमत इसलिये ठीक नहीं है कि कानरूपी गोलक न रहनेपर भी सर्पको शब्दका बोध होता है। वृक्षोंमें कोई गोलक नहीं होता, तो भी उन्हें शब्दादिका बोध होता है। यह आगमवेद्य है। आधुनिक वैज्ञानिकोंने भी उनका चेतन होना -स्वीकार किया है। शास्त्रोंने भी उनकी हिंसा मना की है। उपर्युक्त दोषोंके कारण ही ‘गोलकोंकी शक्ति इन्द्रियाँ हैं’ यह पक्ष भी ठीक नहीं। कुछ लोग इन्द्रियोंको आहङ्कारिक एवं सर्वगत मानते हैं, अन्य मध्यम परिमाण ही मानते हैं। बौद्ध अप्राप्यकारी कहते हैं, अर्थात् विषय-देशपर बिना गये ही इन्द्रियाँ विषयोंका प्रकाशन करती हैं। परंतु दूरसे स्पर्श, रस, गन्धका उपलम्भ नहीं होता। अतः त्वक्, रसना, घ्राणको अप्राप्यकारी नहीं कहा जा सकता। चक्षु भी दूरदेश जाकर ही दूरस्थ वस्तुका ग्रहण करता है। तेज शीघ्र ही दूरगामी देखा जाता है। शब्द भी वीचि-तरङ्गन्यायसे श्रोत्र-देशपर आता है तभी उसका ग्रहण होता है। रेडियो आदिद्वारा शब्दका विस्तार और अधिक हो जाता है। अतः श्रोत्र भी अप्राप्यकारी नहीं। मनको भी नैयायिक नित्य कहते हैं। परंतु वेदान्त मतमें उसकी उत्पत्ति मान्य है—‘तन्मनोऽसृजत्’ (ऐतरेय०) नैयायिक मनको अणु-परिमाण और वेदान्ती मध्यम-परिमाण कहते हैं। ‘मन, अन्तःकरण, बुद्धि, अहङ्कार एक ही वस्तुकी अवस्थाएँ हैं, आत्मा इन सभी साधनोंके द्वारा भोगके लिये प्रवृत्त होता है। वह सर्वगत एवं कर्ता है, यह नैयायिकोंका मत है। वेदान्त-मतमे ‘आत्मा स्वप्रकाश है।’ निद्राकालमें सुखपूर्वक सोया, इस प्रकार सौषुप्त प्रत्यक्षानुभवके कारण ही प्रबुद्धको स्मरण होता है। आत्मा स्वप्रकाश है, क्योकि स्वसत्तामें प्रकाशविहीन नहीं रहता, जैसे प्रदीप और ज्ञान। ये अपनी सत्तामें प्रकाशरहित नहीं होते, अतएव स्वप्रकाश हैं। इसी तरह आत्मा भी स्वसत्तामें प्रकाशशून्य नहीं होता, अतः स्वप्रकाश है। इसी तरह आत्मा प्रदीपके समान विषयका प्रकाशक एव आलोकके तुल्य विषय- प्रकाशका आश्रय है। इसलिये भी स्वप्रकाश है, इसी तरह ज्ञानके समान इन्द्रिय-गोचर न होकर अपरोक्ष होनेसे भी आत्मा स्वप्रकाश है। जैसे ज्ञान चक्षुरादिका विषय न होकर भी अपरोक्ष है, वैसे ही आत्मा भी। इसी तरह आत्मा धर्मी होते हुए भी अजन्य प्रकाश-गुणवाला है; क्योकि वह प्रकाश-गुण- वाला है जैसे आदित्य। अर्थात् जैसे आदित्य प्रकाश-गुणवाला होनेसे अजन्य प्रकाश गुणवाला है, वैसे ही आत्मा भी प्रकाश-गुणवाला होनेसे अजन्य प्रकाश- गुणवाला है। यह बात दूसरी है कि आदित्यका प्रकाशरूपी प्रकाश है, आत्माका ज्ञान-

रूप नीरूप प्रकाश है । 'अत्रायं पुरुष. स्वय ज्योति.' इत्यादि आगम भी आत्माको स्वप्रकाश कहते हैं । नैयायिक एव पूर्वमीमासक आत्माको कर्ता मानते हैं, किंतु साख्य निरवयवमें परिस्पन्द एव परिणामलक्षण क्रियाको असम्भव समझकर उसे असङ्ग एव अकर्ता ही कहते हैं । वैशेषिक, योगी, नैयायिक आदि भोक्ता जीवसे भिन्न सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् विश्वकर्ता ईश्वर मानते हैं । जाग्रत्कालमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धादि विषयवेद्य हैं । उनमें गो- अश्वादिवत् परस्पर विचित्रताके कारण उनकी भिन्नता भी माननी चाहिये । उन शब्दादिका बोध या संवित् उनसे भिन्न है । वेद्य और वेदिताका भेद प्रसिद्ध ही है । प्रकाश्य, प्रकाशका भेद भी लोकमें प्रसिद्ध है । रूप और उसके प्रकाशक सौरालोकमें भेद स्पष्ट ही है । इसी तरह वेद्य शब्दादि एव आकाशादिसे उनका भासक बोध और अनुभव भिन्न है । जैसे शब्दादिकी परस्पर विचित्रता होनेसे भिन्नता है, उस तरह उनके बोधोंमें विचित्रता नहीं है । अतः उनका भेद भी नही है । अतएव बोध-बोध सब एक ही है । अनुमान भी किया जा सकता है । विवादास्पद शब्दादि-बोध स्वाभाविकभेदशून्य हैं, क्योकि उपाधिको बिना ग्रहण किये हुए उनका भेद गृहीत नहीं होता, जैसे आकाशमें घटादि उपाधिके बिना भेद नहीं गृहीत होता, अतः वह भी स्वाभाविक भेदशून्य है, तद्वत् प्रकृतमे भी समझना चाहिये । संवित् होनेसे शब्दसंवित् स्पर्शसंवित्से भिन्न नहीं है, जैसे स्पर्शसंवित् अपनेसे भिन्न नहीं है । जैसे एक ही आकाशमें घटादि उपाधिके भेदसे भेद- व्यवहार हो जाता है, उसी तरह आकाशवत् व्यापक एक ही संवित्मे शब्दादि विषयरूप उपाधिके भेदसे भेद-व्यवहार बन ही जायगा । उसी प्रकार स्वप्नमें भी विषयोंमें भेद और संवित्में अभेद है । स्वप्न और जागरमे भेद इतना ही है कि जागरमें विषय स्थिर है और स्वप्नमें अस्थिर । स्वप्न-जागर अवस्थाएँ और उनके विषय भी विचित्रताके कारण पृथक् पृथक् हो सकते हैं, परंतु दोनों अवस्थाओके बोध एकरूप होनेसे अभिन्न ही हैं । इसी तरह सुषुप्ति-अवस्थाकी संवित् भी सुषुप्ति-अवस्थासे भिन्न है । सुषुप्ति और जाग्रदादि परस्पर विलक्षण होनेसे भिन्न हैं, परंतु उनकी संवित् एकरूप होनेसे परस्पर अभिन्न ही है । सोकर जगनेके पश्चात् सुप्तोत्थित प्राणीको सुषुप्ति-अवस्थाके अज्ञान या तमका स्मरण होता है, 'मैं सुखपूर्वक सोता था और कुछ भी नही जानता था ।' प्रत्यक्ष-साधन विषये- न्द्रिय-सन्निकर्ष एव अनुमान साधन व्याप्ति-लिङ्गादि न होनेसे ऐसे ज्ञानको स्मृति ही मानना उचित है । स्मृति अनुभवपूर्वक ही होती है, अतः सुषुप्तिकालमे सुख एवं तमोरूप अज्ञानका अनुभव मानना उचित है । यह अज्ञान अन्धकारके तुल्य वस्तुतत्त्वको ढकनेवाला भावरूप है । इसीलिये इसके द्वारा ज्ञानरूप ब्रह्मका

६८८ मार्क्सवाद और रामराज्य आवरण होता है । 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्' (गीता ५।१५) यह ज्ञानाभाव नहीं है; क्योकि ज्ञानाभाव जाननेके लिये उसके अनुयोगी (आधार) प्रतियोगी (ज्ञान) का ज्ञान होना चाहिये । जैसे घटाभाव जाननेके लिये अनुयोगी ( भूतलादि ) और प्रतियोगी ( घट ) का ज्ञान आवश्यक होता है । परंतु यहाँ यदि इसी तरह अनुयोगी- प्रतियोगीका ज्ञान हो तब ज्ञानाभाव कैसा ? और यदि उनका ज्ञान नहीं तो ज्ञानाभावका ज्ञान ही नही हो सकता । अतः भावरूप अज्ञान ही साक्षीके द्वारा प्रकाशित होता है । अज्ञानका उपलब्ध होनेसे ही तद्विरुद्ध ज्ञानका अभाव विदित हो जाता है । इसलिये इस अज्ञानको तम भी कहा जाता है । इसी तरह दिनो, पक्षो, मासो, वर्षो, युगो, कल्पो, अतीतो, अनागतोमें भेद है, परंतु उनके बोधोमें कोई भी भेद नहीं । एक अनन्त आकाशके तुल्य ही यह बोध भी अनन्त एवं एक ही है । अतः इसका न उदय होता है न अन्त । क्योकि उस बोधका प्रागभाव या उत्पत्ति अथवा विनाश भी बोधके बिना सिद्ध नहीं होता । यदि प्रागभाव-साधक बोध है, तो बोधका प्रागभाव ही कैसे कहा जा सकता है ? यदि बोध नहीं तो प्रागभाव सिद्ध ही कैसे होगा ? बोधोमें भेद नहीं होता, अतः अन्य बोधका प्रागभाव अन्य बोधसे सिद्ध होगा, यह भी नहीं कहा जा सकता । इस तरह अत्यन्ताबाध्य होनेके कारण वही बोधस्वरूप भी है । यही संवित् आत्मस्वरूप भी है; क्योकि नित्य होकर स्वप्रकाश है । जो नित्य स्वप्रकाश नही वह आत्मा नहीं, जैसे घटादि । बोध नित्य एवं स्वप्रकाश है, अतः वही बोध, संवित्, अनुभव या ज्ञान आत्मा है । आत्मा परप्रेमास्पद है, अतः आनन्दस्वरूप भी है । ससारमें सर्वत्र ही प्रेम आत्माके लिये होता है, आत्मामें प्रेम अन्यके लिये नहीं होता । जैसे शर्कराके सम्बन्धसे अन्यत्र मिठास होती है, किंतु शर्करामें मिठास स्वतः होती है । उसी तरह आत्मामें प्रेम स्वतः होता है । अन्यत्र प्रेम आत्मसम्बन्धसे होता है । निद्रादि सब जिनसे अनुभूत होते हैं, उस अनुभवका अपलाप नहीं किया जा सकता । अनुभूतिको अनुभाव्य माननेसे अनवस्था-दोष होता है, अतः अनुभूति अनुभाव्य हुए बिना ही स्वप्रकाश है । ज्ञाता और ज्ञानका दूसरा ज्ञान न होनेसे वे ज्ञेय नहीं होते । असत् होनेसे उन्हें अज्ञेय नहीं कहा जा सकता । निद्रा आनन्दादि साक्षी होनेसे उसे असत् नहीं कहा जा सकता ।

उपलब्ध होती .है, शून्य बुद्धि नहीं होती । इसलिये तूष्णींस्थितिमें शून्य नहीं कहा जा सकता । 'उस समय सद्बुद्धि भी न होनेसे सत् भी नहीं रहता', यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सद्बुद्धि होनेपर भी स्वप्रकाश होनेसे सत् सिद्ध होता है । निर्मनस्कताका साक्षी स्वप्रकाश होता ही है, जैसे मनकी चञ्चलता मिटनेपर साक्षी स्वच्छ होता है, उसी प्रकार मायाका विजृम्भण या विकास रुकने- पर स्वप्रकाश सत् भी स्फुट हो जाता है । कुछ लोग आकाशादिसे भिन्न सत् नहीं मानते, परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि 'आकाशः सत् घटः सत्' इत्यादि व्यवहारोंमें जैसे घटादि शब्द एवं घटादि बुद्धि होती है उसी तरह सत् शब्द एवं सद्बुद्धि होनेसे आकाश और सत्— दोनों ही पृथक् पदार्थ हैं । जैसे 'मृद् घटः' इस व्यवहारमें शब्द एवं बुद्धिके कारण ही मृत्तिका और घट दो पदार्थ सिद्ध होते हैं । उनमें मृद्बुद्धिके अनुवृत्त होनेसे और घट-शरावादि बुद्धिके व्यावृत्त होनेसे मृत्तिका कारण और घटादि कार्य समझे जाते हैं । उसी तरह सत् अनुवृत्त होनेसे कारण तथा आकाश घटादि व्यावृत्त होनेसे कार्य सिद्ध होते हैं । अधिक वृत्ति होनेसे सत् धर्मी है, अल्पवृत्ति होनेसे आकाशादि धर्म हैं । बुद्धिसे यदि आकाशसे सत्‌को पृथक् कर दें तब तो आकाश असत् ही हो जाता है । जैसे जाति-व्यक्ति और देह-देहीका भेद होता है, वैसे ही आकाशादि प्रपञ्च एवं सत्‌का भी भेद सिद्ध होता है । सावधानी एवं एकाग्रतासे विचार करनेपर भेद-ज्ञान स्थिर हो जाता है । विवेचन करनेपर सत् शून्य अवकाशात्मक आकाश रह जाता है एवं निरवकाशात्मक सत् रह जाता है— येनेक्षते शृणोतीदं जिघ्रति व्याकरोति च । स्वाद्वस्वादू विजानाति तत्प्रज्ञानमुदीरितम् ॥ ( पञ्चदशी, महावाक्यविवेकप्र० १ ) जिस नेत्रजन्यवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे पुरुष रूपको देखता है, श्रोत्रजन्य शब्दाकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे शब्द ग्रहण करता है, गन्धाकारवृत्तिव्यक्त चैतन्यसे गन्ध ग्रहण होता है, वही बोधस्वरूप चैतन्य प्रज्ञान है—'न हि द्रष्टु- र्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।' ( बृहदा० उप० ४ । ३ । २३ ) द्रष्टाकी स्वरूपभूत दृष्टिका कभी भी विलोप नहीं होता । जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिकी सभी वस्तुएँ अपने-अपने स्थानपर ही रहती हैं; किंतु द्रष्टा तीनों ही अवस्थामें रहता है । जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिके प्रपञ्चका जो प्रकाशक भान है, वही ब्रह्म है । तीनो अवस्थाओका भासक साक्षी भोग्य-भोक्ता और भोग— तीनोंसे ही विलक्षण होता है । वह चिन्मात्र ही है । चिदाभास एव अहंका भी सुषुप्तिमें विलय होता है उसका भी साक्षीसे ही प्रकाश होता है । मा० रा० ४४—

६९० मार्क्सवाद और रामराज्य जैसे आकाशीय सूर्यद्वारा प्रकाशित घट-कुड्यादि दर्पणदित्यदीप्तिसे प्रकाशित होता है अर्थात् दर्पणप्रतिबिम्बित आदित्यद्वारा प्रकाशित होता है। यदि कुड्यपर अनेक दर्पण-प्रतिबिम्बित आदित्यकी दीप्तियाँ प्रकट हों, तो उनके बीच-बीचमें स्वाभाविक निरुपाधिक आकाशीय आदित्यकी दीप्तियाँ परिलक्षित होती हैं और दर्पणजन्य विशेष प्रभावोंके न होनेपर भी वह सामान्य आदित्य- प्रकाश रहता ही है। ठीक इसी तरह स्वप्रकाश बोध सामान्य चेतनद्वारा प्रकाशित देह भी बुद्धि-प्रतिबिम्बित चिदाभासके द्वारा प्रकाशित होता है। चिदाभासविशिष्ट बुद्धि-वृत्तियोंके बीच-बीचमें सामान्य-चेतन या शुद्ध नित्यबोध परिलक्षित होता है। बुद्धिवृत्तिप्रतिबिम्बित चिदाभासोंके बिना भी वह स्वप्रकाश बोध रहता ही है। घट-ज्ञानादि शब्दवाच्य चिदाभासविशिष्ट बुद्धिवृत्तियोंकी संधियो एवं सुषुप्तिमें उन बुद्धिवृत्तियोंके अभावका प्रकाशक नित्य-बोध रहता है। घटाकार-बुद्धिस्थ चित् घटमात्रका प्रकाश करती है, परंतु घटगत ज्ञातताका प्रबोध नित्य-चैतन्यसे ही होता है। घटाकार-बुद्धिके प्रथम 'घटो मया न ज्ञातः' इस प्रकार घटकी अज्ञातता भी व्यापक अखण्ड बोधसे ही गृहीत होती है। जैसे अज्ञातत्वेन घट ब्रह्मबोधित था, उसी तरह बुद्धि उत्पन्न होनेपर घट ज्ञातत्वेन भी ब्रह्म-चैतन्यसे ही प्रकाशित होता है। कोई भी घटादि विषय चित्प्रतिबिम्बयुक्त बुद्धिवृत्ति एवं अज्ञान दोनोंसे ही व्याप्त होते हैं। जब वह चिदाभासयुक्त वृत्तिसे व्याप्त होता है तब ज्ञात कहलाता है, जन अज्ञानसे व्याप्त होता है तब अज्ञात कहलाता है। अज्ञातरूपसे घटादि ब्रह्म अर्थात् व्यापक नित्य बोधसे प्रकाशित होता है। यह शङ्का हो सकती है कि 'चिदाभासयुक्त वृत्तिसे ही घटका प्रकाश हो सकता है फिर ब्रह्म-प्रकाशकी क्या आवश्यकता ?' परंतु यह ठीक नहीं; क्योकि जैसे अज्ञानने घटमें अज्ञातता पैदा की है, उसी तरह चिदाभासके द्वारा घटमें ज्ञातता उत्पन्न होती है। कहा जा सकता है कि 'ज्ञातता तो घटमें वृत्तिमात्रसे उत्पन्न हो सकती है,' परंतु यह ठीक नहीं। चिदाभासहीन बुद्धिसे घटादिमें ज्ञातता उत्पन्न नहीं हो सकती; क्योकि मृत्तिकादिके तुल्य चिदाभासरहित बुद्धि या वृत्ति जड ही है। अतः जैसे काली-पीली मिट्टीसे लिप्त घट ज्ञात नहीं कहा जा सकता, उसी तरह बुद्धिवृत्तिव्याप्त घट भी ज्ञात नहीं कहा जा सकता। अतः वृत्ति-व्याप्त घटमें चित्प्रतिबिम्बका उदय होनेसे ही घटमें ज्ञातताका व्यवहार बनता है। कहा जा सकता है कि आकाशीय सौरालोक-तुल्य सामान्य नित्य-बोधरूप ब्रह्मसे ही घटादिकी ज्ञातता बन सकती है फिर दर्पणादित्यदीप्तिके तुल्य वृत्तिपर चित्प्रति- बिम्ब या चिदाभास क्यों माना जाय ? परंतु यह कहना ठीक नहीं। कारण, नित्य बोधरूप ब्रह्म तो प्रमाण-प्रवृत्तिके पहले भी था ही। यहाँ तो प्रमाण प्रवृत्तिके पश्चात् घटादिमें ज्ञातताका व्यवहार होता है, यह चिदाभासमूलक ही है। अतः वृत्तिगत व्यक्त चित्प्रतिबिम्ब घटमें ज्ञातता उत्पन्न करता है। वह ज्ञातता,

अज्ञातताके तुल्य ही ब्रह्मसे भास्य होती है। बुद्धिवृत्ति, चिदाभास एव घटादि सभी सामान्य सौरालोक-तुल्य नित्यवोधसे भासित होते हैं, फिर भी घटव्याप्त वृत्तिपर ही चिदाभासरूप फल होता है। अतः एक घटका ही स्फुरण होता है। घटादि विषयपर द्विगुणित चैतन्य व्यक्त होता है। जैसे कुड्यपर एक सामान्य सौरालोक फैला होता है, दूसरे दर्पणादित्यदीप्तिके फैलनेसे द्विगुणित प्रकाश हो जाता है, उसी तरह सामान्य नित्यबोधसे व्याप्त घटादिपर चित्प्रतिविम्बयुक्त वृत्तिकी व्याप्ति होनेसे द्विगुणित चेतन्य हो जाता है। इसीलिये घटादिकी ज्ञातताका भासक ब्रह्म-चैतन्य माना जाता है। नैयायिक आदि उसे ही अनुव्यवसाय (ज्ञानविषय ज्ञान) कहते हैं। 'घटोऽयम्' यह घट है—नैयायिकोंके शब्दोंमें यह व्यवसायात्मक ज्ञान है, यह बुद्धिवृत्तिसे होता है। 'मया घटो ज्ञातः' मैंने घट जान लिया, यह अनुव्यवसायात्मक ज्ञान नित्य बोधरूप ब्रह्मसे होता है। इसी तरह अहंवृत्ति एवं काम क्रोधादि वृत्तियोंमें चिदाभास, उसी तरह व्याप्त होकर रहता है, जैसे लोहपर अग्नि व्याप्त होती है। जैसे अग्नि-व्याप्त लोह केवल अपने-आपको ही प्रकाशता है अन्यको नहीं, उसी तरह आभाससहित वृत्तियाँ अपनेको ही भासित करती हैं। क्रमसे विच्छिन्नविच्छिन्न होकर वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। सुषुप्ति, मूर्च्छा और समाधिमें सभी वृत्तियाँ लीन हो जाती हैं। सभी वृत्तियोंकी संधियाँ और अभाव जिस निर्विकार नित्य-बोधसे प्रकाशित होते हैं, उसे ही वेदान्तमतसे कूटस्थ शब्दसे कहा जाता है। जैसे बाहर वृत्ति-व्याप्त घटमें भासक चिदाभास और घटकी ज्ञातताका भासक ब्रह्मचैतन्य द्विगुण चैतन्य होता है, उसी तरह भीतर भी वृत्तियोंपर संधिकी अपेक्षा द्विगुण चैतन्यव्यक्त होता है। इसीलिये संधियोंकी अपेक्षा वृत्तियोंकी स्पष्टता अधिक होती है। भेद इतना अवश्य है कि बाहर घटादिमें ज्ञातता, अज्ञातता—दोनों ही रहती हैं, वैसे वृत्तियोंमें ज्ञातता, अज्ञा- तता—दोनों नहीं रहतीं। वृत्तियाँ स्वयं अपने-आपको ग्रहण नहीं करतीं, इसलिये ज्ञातता नहीं होती और वृत्तिके उत्पन्न होते ही वृत्तिगोचर अज्ञान नहीं रहता अतः वृत्तियोंकी अज्ञातता भी नहीं होती । वृत्तिगोचर वृत्ति माननेसे अनव- स्थादि दोष आते हैं। अतः वृत्तियाँ साक्षिभास्य कही जाती हैं। चित्प्रतिबिम्बरूप ज्ञानकी उत्पत्ति और विनाश प्रतीत होते हैं, अतः उसे विनश्वर कहा जाता है। अन्तःकरण एव तद्वृत्तियोंका साक्षी अखण्ड नित्यबोध निर्विकार होनेसे कूटस्थ कहलाता है। बुद्धिसे परिच्छिन्न कूटस्थ एव चिदाभासयुक्त बुद्धिके मिश्रणसे ही जीव- व्यवहार होता है। बुद्धि स्वच्छ है, इसलिये उसपर चित्प्रतिविम्ब होता है। प्रतिबिम्ब एव बिम्बमें कुछ तुल्यता ओर कुछ विलक्षणता होती है, इसी तरह

३. तृतीय खण्ड: धर्म, नैतिकता, आत्मा एवं ईश्वर-विषयक साम्यवादी भ्रांतियों का निवारण

६९२ मार्क्सवाद और रामराज्य स्फूर्तिरूपतामें तुल्यता होनेपर भी सङ्गिता विकारितारूप विलक्षणता भी बिम्बकी अपेक्षा प्रतिबिम्बमें रहती है । कहा जा सकता है कि जैसे मृत्तिका रहनेपर ही घट रहता है, वैसे ही बुद्धिके रहनेपर ही चिदाभास रहता है, बुद्धिके न रहनेपर नहीं रहता । फिर उसे बुद्धिसे भिन्न क्यो माना जाय ? यदि शास्त्र प्रमाणसे देहके मरनेपर भी बुद्धिका अस्तित्व माना जा सकता है तो बुद्धिसे भिन्न चिदाभास भी शास्त्रोंसे सिद्ध होता ही है । बुद्धिकी विभिन्न वृत्तियो एव अज्ञानके साक्षीरूपसे सर्वावभासक सर्वाधिष्ठान अखण्ड बोधरूप ब्रह्म सिद्ध होता है । अखण्ड बोध-स्वरूप ब्रह्म ही अहंवृत्तिसे युक्त होकर कर्ता कहलाता है, इदंवृत्तियुक्त हो प्रपञ्चाकार प्रतीत होता है, वही आन्तर-बाह्य सभी विषयोको साक्षीरूपसे प्रकाशित करता है । नृत्यशालास्थित दीप जैसे प्रभु, सभ्य एवं नर्तकी सभीको प्रकाशित करता है, उसी तरह साक्षी आत्मा ही अहंकार बुद्धि एव सभी विषयोको प्रकाशित करता है । जैसे प्रभु, सभ्य आदिके न रहनेपर दीप सबके अभावका भी भासक होता है, उसी तरह अहंकार बुद्धिके सुषुप्ति दशामें न रहनेपर भी साक्षी ही सबके अभावका भी प्रकाशन करता है । अखण्ड बोधरूप आत्मा नित्य ही स्वप्रकाशरूपसे विराजमान रहता है ।'उसीके प्रकाशसे प्रकाशित होकर बुद्धि आदि व्यावृत्त होती हैं । जैसे दीप स्वस्थानस्थित रहकर ही आन्तर-बाह्य सभी वस्तुओको प्रकाशित करता है, उसी तरह कूटस्थसाक्षी आन्तर-बाह्य सभी विषयोको प्रकाशित करता है। देहकी अपेक्षासे ही उसमें आन्तरत्व एवं बाह्यत्व प्रतीत होता है । अन्तःस्थ बुद्धि ही इन्द्रियोंके द्वारा बार-बार बाह्य विषयोकी ओर जाती है । उसीकी चञ्चलता- से तद्भासक साक्षीमें भी चञ्चलता प्रतीत होती है । सर्वदेश, काल, वस्तु बुद्धिकृत ही हैं । सर्वभासक अखण्ड बोधकी दृष्टिसे कुछ भी नही है । जैसे अग्निमें उष्णता एवं प्रकाश रहता है, वैसे ही आत्माका चैतन्य स्वभाव है। शब्दादि अचेतन होनेसे स्वतः सिद्ध नहीं हो सकते, किंतु शब्दाद्याकार- वृत्तियोसे ही उनकी सिद्धि होती है । वह वृत्तियाँ परस्पर भिन्न शब्दादि विषय विशेषणवाली होती हैं, अतः नीलपीताद्याकारवाली वृत्तियो या ज्ञानोंकी भी स्वतः सिद्धि नहीं हो सकती । जबतक नीलपीतादि बाह्याकार न होगे तबतक बाह्याकार- प्रत्यय उत्पन्न ही नहीं हो सकते । इस तरह प्रत्यय भी संहत होनेसे अचेतन ही ठहरते हैं। इस दृष्टिसे स्वरूपभिन्न ग्राहकसे ही प्रत्यय भी ग्राह्य होगे । जो असहत होकर चैतन्यात्मक है, वही स्वार्थ हो सकता है । अन्य संहत अचेतन वस्तु परार्थ ही होते हैं । नील-पीताद्याकार ज्ञानोंका उपलब्ध्वा आत्मा विक्षेपवान् है, ऐसा सशय होता है । परतु इसका समाधान यह है कि परिणामी चित्तादि क्रमसे ही स्वविषयोके ग्राहक होते हैं, परंतु कूटस्थ आत्मा अक्रमेण सभी प्रत्ययोका

मार्क्स और आत्मा ६९३ उपलम्भ करता है । अतएव अपरिणामिता सिद्ध होती है । अशेषचित्त प्रचारकी उपलब्धि कूटस्थताका निश्चायक है । यदि कूटस्थ आत्मा परिणामी होता तो अशेष स्वविषयचित्त प्रचारका साक्षी न होता, जैसे चित्त किंवा इन्द्रियाँ अपने विषयोके एक देशका ही उपलम्भ करते हैं, इस तरह आत्मा अपने विषयोके एक देशका उपलम्भ नही करता, किंतु अशेष प्रत्ययोकी उपलब्धि आत्मासे होती है, अतः वह अपरिणामी ही है । कहा जा सकता है कि उपलब्धि धात्वर्थ क्रिया ही है, फिर उपलब्धि- क्रियाका कर्ता विक्रियावान् ही है । उपपूर्वक लभ धातुसे कर्तामें तृच् प्रत्यय करनेपर उपलब्धा शब्द बनता है । धात्वर्थ सर्वत्र क्रिया ही होता है । क्रिया स्वयं उत्पत्ति-विनाशशील होती है, अतः उपलब्धि भी क्रिया ही है, अतः उत्पत्ति विनाश उसका भी मानना ही चाहिये, फिर वह नित्य कैसे कहा जा सकता है । इसका समाधान यह है कि 'धात्वर्थ सर्वत्र क्रिया ही होता है और कर्ता ही प्रत्ययार्थ होता है, यह नियम सार्वत्रिक नहीं, क्योकि 'गडि वदनैकदेशे' इस गडि धातुसे गण्ड बनता है । जो कि मुखैकदेश कपोलका ही बोधक है । इसी तरह 'सविता प्रकाशते' 'सविता प्रकाशयति' 'सविता प्रकाशमान है या घटादिका प्रकाशक है,' यहाँपर सविता किसी प्रकाश क्रियाका कर्ता नही है, क्योकि प्रकाश उसका स्वरूप ही है । उसके निर्विकार रहते हुए ही उसके सन्निधानमात्रसे अन्य वस्तुओका प्रकाश होता है । बुद्धिजन्य वृत्तिरूप बौद्ध प्रत्यय ही क्रिया या विक्रिया है । वही धात्वर्थ है । आत्माकी स्वरूपभूत नित्य उपलब्धिमें विक्रिया- का उपचार होता है । जैसा कि सूर्यके स्वरूपभूत प्रकाशमें भी विक्रियात्वका उपचार होता है ।' कहा जा सकता है कि 'बुद्धि द्रव्य है, उसका परिणाम वृत्ति भी मृत्तिका- परिणाम घटादिके तुल्य द्रव्य ही है । उसे भी क्रिया नही कहा जा सकता । परंतु मृत्तिकादि अपने पूर्वरूपको तिरोहित करके घटादिके रूपमें परिणत होते हैं ।' पर यहाँ तो तृणजलूका ( जोक ) एव प्रकाशके तुल्य संकोच-विकासरूप ही क्रिया है । ऐसा परिणाम तो परिणामिकी चेष्टारूप ही है । इसी तरह बुद्धिका परिणाम ही वृत्ति है, वही क्रिया है । उस वृत्तिपर अभिव्यक्त बोध प्रतिबिम्ब नित्य बोधरूप बिम्बके तुल्य ही होता है । इसीलिये चिच्छायापन्न वृत्तिके क्रिया होनेसे नित्यबोधमें भी क्रियात्वका आरोप होता है । लोकमे अर्थ-प्रकाश ही उपलब्धि- शब्दार्थ प्रसिद्ध है । वह अर्थ-प्रकाश अर्थका धर्म नहीं हो सकता, क्योकि वह तो जड है, स्वतः स्फूर्तिरहित होना ही जडताका लक्षण है । अन्तःकरणका भी धर्म प्रकाश नही कहा जा सकता, क्योकि वह तो प्रकाशकरण ( असाधारण कारण ) है, अतः वह भी चैतन्यरूप प्रकाशका आश्रय नहीं हो सकता । फिर भी

६९४ मार्क्सवाद और रामराज्य स्वयं प्रकाशमान चैतन्य आत्मामें अहंरूपसे अन्तःकरणका अध्यास होता है। वह कभी भी अप्रकाशित होकर नहीं रहता । वही आत्मचैतन्य व्याप्त अन्तःकरण विषयवृत्तिको उत्पन्न करता हुआ उपलब्धा कहलाता है, वही कर्ता और प्रमाता भी कहलाता है । जैसे लोह पिण्डमें दाहकत्व-प्रकाशकत्वका व्यवहार होता है वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये । अखण्ड बोधस्वरूप आत्माका आकाशवत् अविक्रिय होनेपर भी तादृक् अन्तःकरणगत चिदाभासके अविवेकसे अन्तःकरणके धर्मों एवं उसकी अवस्थाओंसे युक्त होकर प्रतीत होने लगता है । जैसे अग्नि निराकार होनेपर भी काष्ठोंपर प्रकट होती है वैसे ही त्रिकोण-चतुष्कोण मोटा-पतला-सा प्रतीत होता है और अग्निका उत्पन्न होना, नष्ट होना भी उसी काष्ठादि उपाधिसे प्रतीत होता है । इसी तरह विकारी अन्तःकरणमें कर्तृत्व होनेपर भी उपलब्धिमें उत्पद्यमानता नहीं होती । अतः उपलब्धिस्वरूप आत्मा निर्विकार कूटस्थ ही है। कहा जा सकता है कि 'जैसे छिदिक्रियासाध्य द्वैधीभावरूप फल विक्रिया है, उसी तरह उपलब्धिरूप फल भी साध्य ही है, अतः वह भी विक्रिया ही है ।' परंतु वस्तुतः स्वरूपसे उपलब्धि फल ही नहीं है, वृत्तिव्याप्त घटादि विषयोंपर व्यक्त चित्प्रतिबिम्ब ही फल है । नित्यौपलब्धिस्वरूप आत्मामें उसीके अविवेकसे फलत्वका व्यपदेश होता है, अतएव यहाँ उपलब्धि एवं उपलब्धामें भेद नहीं हैं । उपलब्धि-स्वरूप ही आत्मा है। यह उपलब्धि नित्य है, विक्रिया नहीं है । विक्रियारूप उपलब्धि चैतन्यव्याप्त बुद्धिवृत्ति है । उससे अविवेकके कारण ही नित्योपलब्धिमें फलत्वका व्यवहार होता है । इसीलिये उपलब्ध्याभासावसान ही उपलब्धिका धात्वर्थ है । उसी नित्योपलब्धिस्वरूप आत्मामें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति-तीनो ही अवस्थावाला अन्तःकरण भासित होता है । तीनो ही अवस्थाएँ आगन्तुक हैं । उपलब्धिस्वरूप आत्मा सर्वत्र अव्यभिचरितरूपसे विद्यमान रहता है । सुषुप्तिमें भी कुछ नहीं देखा, इस प्रकार सर्वाभावकी उपलब्धि होती ही है। जाग्रदादिमे भी प्रमाता स्वतःसिद्ध होता है । वही स्वयं प्रमाणद्वारा प्रमेयोंको जानता है । प्रमाताका भी भासक अखण्डबोध आत्मा स्वतःसिद्ध है । लोह-जल आदिमें दाहकत्व-प्रकाशकत्व लानेके लिये अग्निकी अपेक्षा होती है, किंतु अग्निमें दाहकत्व-प्रकाशकत्व लानेके लिये अन्य अग्नि आदिकी अपेक्षा नहीं होती । वही स्वतःसिद्ध संवित् आत्मा है। वृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्य प्रमाण है, वृत्तिमदन्तः- करण प्रतिबिम्बित चैतन्य प्रमाता है। प्रमेयप्रकाशकालमें वे दोनों ही प्रकाशित रहते हैं। उनका प्रकाशक कोई अन्य प्रमाता या प्रमाणान्तर माननेमें अनवस्था आदि दोष आते हैं, अतः स्वयंज्योतिः आत्माको ही तीनोंका भासक मानना ठीक है। कहा जा सकता है कि 'संवित् या बोध प्रमाणके फलरूपसे ही प्रसिद्ध है, फिर वह नित्य कैसे हो सकता है ?' परंतु यह ठीक नहीं; कारण, वृत्तिप्रतिबिम्बित

मार्क्स और आत्मा ६९५ अवगति ही अनित्या है, वही प्रमा है, वही प्रमाणफल है, विम्बभूत अवगति नित्य ही है। यदि अवगति नित्य है, तब तो प्रमाण व्यापार व्यर्थ होगा और अनित्य है तो प्रमाण व्यापार आवश्यक होगा । परंतु प्रमाताकी अवगति तो प्रमाण- निरपेक्ष स्वतःसिद्ध है ही। यदि प्रमाताको आत्मसिद्धिमें प्रमाणकी अपेक्षा हो तो किसे प्रमित्सा होगी, यह भी विचारणीय है। जिसे प्रमित्सा होती है, वही प्रमाता होता है। प्रमित्सा प्रमेयविषयक ही होती है, प्रमातृविषया नहीं । प्रमातृविषयक प्रमित्सा होनेसे अनवस्था-दोष भी होता है। प्रमाताकी प्रमित्सा अव्यवहित होनेसे प्रमातृविषया नहीं हो सकती । लोकमें प्रमाताकी इच्छा, स्मृति, प्रयत्न एवं प्रमाणजन्यके अनन्तर प्रमेय सिद्ध होता है। प्रमेय-विषया-अवगति अभीष्ट होती है। स्वयं प्रमाता अपनेसे या अन्य इच्छादिसे व्यवहित नहीं हो सकता । स्मृति भी स्मर्तव्यविषया होती है, स्मर्तृविषया स्मृति नहीं होती । इसी तरह इच्छा भी इष्टविषया होती है, इच्छावद्विषया इच्छा नहीं होती । यदि स्मृति एवं इच्छा स्मर्ता एवं इच्छावान्को विषय करे तब इसमें भी अनवस्था-दोष आयेगा । स्मृति, इच्छा, प्रयत्न एवं प्रमाण जन्मके अनन्तर ही स्मर्तव्य, इष्यमाण, प्रयत्नितव्य एवं प्रमेयका व्यवहार हो सकता है। कहा जा सकता है कि 'प्रमातृविषयक अवगति-उपपत्ति उपपन्न न होनेसे आत्मा अनवगत ही रहेगा', परंतु यह कहना ठीक नहीं। अवगन्ताकी अवगति अवगन्तव्यविषयक होती है, अवगन्तृविषयक अवगति नहीं होती । यदि ऐसा होगा तो अनवस्था-प्रसङ्ग होगा । आत्माकी अवगति स्वरूपभूत ही है अर्थात् अवगन्ताकी अवगति उत्पन्न नहीं होती । अग्निकी उष्णता और प्रकाशके तुल्य ही आत्माका स्वभाव ही अवगति है। 'अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः' 'आत्मैवास्यज्योतिः' 'एषोऽस्य परमो लोकः' 'न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते' (बृहदा० उप० ४।३।३०) इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार आत्माकी स्वरूपभूत ज्योति है। चैतन्यात्मज्योतिकी अवगति अनित्य है ही नहीं । असंहत, स्वप्रकाश एव अपरार्थ ही आत्मा है। यदि आत्मा- की अवगति अनित्य होगी तो उत्पत्तिसे प्रथम एव प्रध्वंससे ऊर्ध्व उसका अभाव कहना पड़ेगा । फिर आत्माकी अपरार्थता आदि सभी बाधित होंगे । अवगति प्रमा है, वह स्मृति इच्छादिपर्णिता अनित्या है, आत्मा स्वरूपभूत नित्य है। जैसे तिष्ठति शब्द अचलत्व-अर्थमें प्रयुक्त होता है, जङ्गम पदार्थ गतिपूर्वक अचल होते हैं; आकाश-पर्वतादि स्थावर पदार्थ सदा ही अचल रहते हैं, दोनोंमें ही तिष्ठति शब्दका प्रयोग होता है । 'तिष्ठन्ति मनुष्याः, तिष्ठन्ति पर्वताः, तिष्ठत्याकाशः' उसी तरह अनित्य अवगति एव नित्य आत्मस्वरूप-अवगतिमें भी प्रमात्व- व्यवहार बन जाता है । फलस्वरूप प्रमामें कोई अन्तर नहीं । प्रमाण फल ही प्रमा है । वह प्रमातृगतचित्स्वरूप प्रकाश ही है । यद्यपि वृत्तिव्याप्त विषयस्य- चित्प्रतिविम्ब ही फल है तथापि 'मयेदं विदितम्' मैंने यह जाना, इस तरह प्रमाण-

६९६ . मार्क्सवाद और रामराज्य प्रमेयसम्बन्ध आत्मामें प्रतीत होता है, अतः प्रमातृगतचित्प्रकाशसे सम्बन्ध मानना ही पड़ता है । जड अन्तःकरण यद्यपि व्यापारका आश्रय हो सकता है तथापि वह चित्‌का आश्रय नहीं हो सकता । चिदात्मा कूटस्थ होता है, अतः वह व्यापारका आश्रय नहीं हो सकता । इसीलिये वह प्रमाके प्रति कर्ता भी नहीं हो सकता और मुख्यवृत्तिसे जड-अजड कोई भी प्रमाता नहीं बन सकता । अतः परस्पराध्याससे ही आत्मा ही बाह्य-विषयका भी प्रमाता बनता है । फिर स्वात्मामें स्वयंप्रकाश होनेसे प्रमातामें कोई शङ्का ही नही । अतएव अनवगत होने या प्रमाणकी अपेक्षा रखनेकी कोई कल्पना ही नही हो सकती । अर्थात् कूटस्थ नित्य आत्मज्योतिमे ही अन्तःकरणादि-उपाधिद्वारा औपाधिक ही प्रमातृत्व होते हैं । प्रमाणसापेक्ष शब्दादि सभी अचेतन, संहत एवं अनात्मा हैं । अवगति स्वयं अन्यानपेक्ष स्वतःसिद्ध है, वही आत्मा है । उसमे भी सोपाधिक अवगति अनित्य है, निरुपाधिक नित्य है । यद्यपि कहा जा सकता है कि ‘मै मनुष्य हूँ, जानता हूँ’ इस व्यवहारमें प्रत्यक्षादि प्रमाणकी अपेक्षा नहीं रहती है, तथापि मृति, सुषुप्ति आदिमें देहसिद्धिके लिये भी प्रमाणकी अपेक्षा होती ही है । उसकी भी अवगति कूटस्थ, स्वयंसिद्ध आत्मज्योति ही है । अवगतिसे भिन्न देहादि, ग्राह्य, ग्राहक, करणादि रूपसे भूत ही परिणत होते हैं । अवगति यद्यपि स्वयं नित्यसिद्ध है तथापि प्रमाणजन्य प्रत्यक्षादि वृत्तिरूप प्रत्ययकी अनित्यतासे ही तदभिव्यक्त अवगतिमें भी अनित्यता एवं प्रमाणफलताका व्यवहार होता है । सभी वृत्तियाँ परस्पर व्यभिचरित होती हैं । बोध, स्फुरण उनमें एक रूपसे ही समान होता है, अतः वही स्फुरण, बोध या अवगति नित्य एकरस हैं । जैसे स्वप्नके नील-पीतादि प्रत्यय-भेद व्यभिचरित होनेसे असत्य हैं, अवगति ही सत्य है, वैसे ही सर्वत्र प्रत्ययोमें भिन्नता होनेसे मिथ्यात्व है । बोधमात्र ही अभिन्न एव एक है । उस अवगतिका अवगन्ता अन्य कोई नहीं है । वह स्वयं नित्य है । उसका हान या उपादान नहीं हो सकता । जैसे शब्दादि, लोष्ठादि ज्ञेय हैं, ज्ञात नही, उसी तरह भूतपरिणाम देहादि भी ज्ञेय ही हैं, ज्ञाता नहीं । जो वस्तु स्वतःसत्तास्फूर्तिवाली नहीं है वह जड है, उसे सत्तास्फूर्ति देनेवाला ही चेतन है । वही ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ है । ज्ञाता आत्मा, ज्ञेय अनात्मा, इदमंश अनात्मा है, द्रष्टा अनिदमंश ही आत्मा है । अहमर्थमें भी दृश्य अहं इदमंश ही है, दृक् आत्मा ब्रह्म है । जैसे सौरालोकमें स्फटिकादि मणियोंपर जपाकुसुमादिकी रक्ताद्याकारता प्रतीत होती है, उसी तरह स्वप्रकाशबोधरूप आत्मप्रकाशमे ही बुद्ध्यादिमें विषयाकारताकी प्रतीति होती है । जैसे सौरालोकसे ही स्फटिक एवं रक्ताद्याकारता दोनों ही भासित होती हैं, वैसे ही नित्य-बोधसे ही बुद्ध्यादि एवं विषयाकारता दोनो ही भासित होती हैं ।

मार्क्स और आत्मा ६९७ बुद्धि होनेपर बुद्ध्यारूढ पदार्थ दृश्य होते हैं । निद्राकालमें बुद्धि विलीन होनेपर दृश्य उपलब्ध नहीं होता, परन्तु द्रष्टा तो सदा एक सा ही रहता है । अविवेकसे बुद्धि सर्वसाक्षीका अभाव समझती है । विवेकसे स्वप्रकाश सर्वसाक्षीसे भिन्न बुद्धि अपने आपको भी नहीं समझती । ब्रह्मादिस्थावरान्त प्राणी अखण्ड- बोधस्वरूप आत्माके पुर ही हैं, फिर भी वह आत्मा सर्वभासक भान सर्वभूतोंसे असम्पृष्ट ही रहता है । जैसे निर्विकार आकाशको बालकलोग नीला समझते हैं, वैसे ही सर्वभासक भान निष्प्रपञ्च होते हुए भी सप्रपञ्च-सा प्रतीत होता है । सर्व- प्राणि-बुद्धियाँ भी उस अखण्डभानके पूर ही हैं । जो भी पदार्थ उत्पत्तिमान् हैं और ज्ञान विक्षेप हैं, वह स्वप्नवत् ही हैं । नित्यनिर्विषय ज्ञान सर्वविनाशसाक्षी स्वतन्त्र ही है । ज्ञाताकी स्वरूपभूता ज्ञप्ति नित्य है, सुषुप्तिमें जो आत्मा शब्दादि- को नहीं जानता वह जानता हुआ ही नहीं जानता । अन्य ज्ञेय नहीं है, इसलिये नहीं जानता है, स्वरूपभूत ज्ञप्ति तो रहती है । विज्ञाताकी विज्ञातिका कभी भी विलोप नहीं होता— 'यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।' (वृहदा० उप० ४।३।२३) जाग्रदादिकालकी जो घटादि-ज्ञप्ति होती है, वह तो भ्रान्ति ही है । फिर भी सभी बुद्धिवृत्तियाँ स्फुरणसे व्याप्त ही होती हैं, अतः सर्ववृत्तियोकी उत्पत्ति, स्थिति, विनाशका साक्षीस्फुरण सर्वत्र एकरस ही रहता है । जागर, स्वप्नमें विषय, समकालमें सुप्ति, समाधि आदिमें विषयाभाव सभी कालमें स्फुरण रहता है, अतः वह शुद्ध है । शुद्ध दृशि ही अमर आत्मा है, जैसे दर्पणादिमें मुखका प्रतिबिम्ब होता है, तब दर्पणादिगत दोषोंका मुखमे आरोप किया जाता है, उसी तरह दृशिका अहङ्कारमें प्रतिबिम्ब होनेसे अहङ्कारगत दोषोका दृशिमें आरोप किया जाता है। श्रुत्यादिसे विज्ञाति अर्थात् अनित्य विज्ञातिका विज्ञाता नित्यबोध नित्यदृशिस्वरूप आत्मा विदित होता है । उस दृशिस्वरूपमें ज्ञान-अज्ञान—दोनों ही कल्पित होते हैं। विज्ञातिका विज्ञाता शुद्ध विज्ञाता ही है, वह विज्ञेय नहीं होता । आत्मा अलुप्तदृक् है । अनित्य बुद्धिवृत्तिरूप दृष्टिके कारण इसमे जन्यताकी प्रतीति होती है । जैसे व्यञ्जक आलोक व्यङ्ग्यकी आकारताको प्राप्त होता है, उसी तरह शुद्ध नित्य ज्ञान- स्वरूप ज्ञाता स्वभास्य प्रत्ययोंके आकारका प्रतीत होता है । जैसे दीप बिना यत्नके ही उपस्थित विषयोंको एव विषयाकारवृत्तियोंको भी प्रकाशित करता है, जैसे ज्योति अन्यका द्योतक होनेपर भी अपना प्रकाशक नहीं होता, वैसे ही ज्ञानस्वरूप आत्मा अन्यका भासक होनेपर भी आत्मभासक नहीं होता । जैसे अग्नि अपना दहन- प्रकाशन नही करता, वैसे ही आत्मा अपना प्रकाशन नहीं करता । फिर भी जैसे रविके स्वात्म-प्रकाशके लिये अन्य ज्योतिकी अपेक्षा नहीं होती, उसी तरह बोध- स्वरूप आत्माको स्वात्मप्रकाशके लिये अन्यबोधकी अपेक्षा नहीं होती । जो