मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८२ मार्क्सवाद और रामराज्य भी उच्च श्रेणीके विचारको, लेखकोंके ग्रन्थोंमें उच्च सामाजिक स्थितियोका अङ्कन होता है। निम्न विचारके ग्रन्थोपर निम्नश्रेणीका ही प्रभाव अङ्कित होता है। इसी अंशमें लास्कीका कथन सङ्गत है । परंतु प्रामाणिक दर्शनके लिये तो देश, काल, परिस्थितियोके आवरणोको भेदन करनेसे ही तत्त्वानुभूति होती है। बिना रंगीन चश्मा उतारे वस्तुका वास्तविक रूप-ज्ञान सर्वथा ही दुर्घट होता है। देहके समान ही इन्द्रियाँ भी आत्मा नहीं हैं । यदि सम्मिलित होकर इन्द्रियाँ आत्मा है तब तो एक इन्द्रिय नष्ट होनेपर आत्मनाश-प्रसङ्ग होगा, क्योंकि एकके नष्ट होनेपर भी समस्तता विनष्ट हो गयी । यदि प्रत्येक इन्द्रियाँ आत्मा हैं, तो परस्पर विरुद्ध दिक्क्रिया होनेसे शरीर ही उन्मथित हो जायगा । ‘योऽहं चक्षुषा घटमद्राक्षं सोऽहं घटं त्वचा स्पृशामि’ जिस मैने चक्षुसे घट देखा था, वही मैं त्वक्से घटका स्पर्श करता हूँ' इस अनुभवसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि नेत्र, श्रोत्र, त्वक्से काम लेनेवाला आत्मा इनसे भिन्न है । चक्षु यदि आत्मा है, तो वह स्पर्शका कर्त्ता क्यों नहीं हो सकता । त्वक् आत्मा है तो वह दर्शन-क्रियाका कर्त्ता क्यों नहीं हो सकता ? अतः यहाँ कोई इन्द्रियोसे भिन्न ही आत्मा है जो कि दर्शन, घ्राण, स्पर्श, श्रवण आदि सभी क्रियाओंका कर्त्ता है, उसी एक आत्माकी विभिन्न क्रियाओके कर्त्तारूपसे प्रसिद्धि है । क्षणिक विज्ञान भी आत्मा नहीं; क्योकि अनुभव एवं स्मृतिका एक ही कर्ता होता है । अन्यद्वारा अनुभूतका अन्य स्मरण नही करता । मैंने उसे देखा था और मै इसे देख रहा हूँ । इस तरह अनेक काल-सम्बन्धी आत्मा क्षणिक नहीं हो सकता है । पूर्वोत्तरदर्शी एक प्रत्ययी न हो तो स्मृति नही हो सकती है । ‘सोऽहं’ यह प्रत्यभिज्ञा भी स्थायी आत्माके बिना नही बन सकती । यदि स्मरण एवं अनुभवके कर्ता भिन्न हों तो मैने देखा, अन्यने स्मरण किया, यह व्यवहार होना चाहिये । कुछ लोग कहते हैं कि सादृश्यके कारण एकताकी प्रतीति होती है । जैसे नदी-प्रवाह, दीप, केश आदिमें तत्सदृश होनेसे ‘त एवेमे केशाः, सैवेयं दीपकलिका’ वे ही ये बाल हैं, वही यह दीपशिखा है— यह प्रत्यभिज्ञा होती है, परंतु यह भी ठीक नहीं है । ‘तेनेदं सदृशम्’ यह उसके सदृश है, इस प्रकार सादृश्यग्रहणके लिये भी तो पूर्वकालवर्ती तत्का, वर्तमानकालवर्ती इदंका तथा तदुत्तरवर्ती सादृश्यका ग्राहक एक स्थायी आत्मा हो तभी सादृश्यबोध भी हो सकता है । कुछ लोग कहते हैं कि सादृश्यप्रत्यय भी स्वतन्त्र ही है, परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योकि ऐसी स्थितिमें ‘तेनेदं सदृशम्’ इत्यादि प्रतीति न होनी चाहिये । बाह्य विषयमें भले ही कभी सादृश्यमूलक-एकत्वका भ्रम भी हो तथापि उपलब्धि या .अनुभवितामें तो संदेह ही नही होता । मैं वही हूँ या तत्सदृश अन्य हूँ, किंतु यहाँ तो स्पष्ट ही निश्चित प्रत्यभिज्ञान होता है, जो मैंने कल देखा था, वही मै आज स्मरण कर रहा हूँ।