मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअमनी भाव होनेपर द्वैत कुछ भी नहीं रह जाता- 'मनसो ह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते' (माण्डूक्यकारिका ३। ३१) बौद्धोका क्षणिक विज्ञान ही बाह्य अर्थके आकारसे परिणत होता है । यह भी इन्हीं मतोसे मिलता-जुलता मत है । तथापि क्षणिक विज्ञान या व्यावहारिक स्थायी मन या अन्तःकरण तथा उसकी इच्छा-द्वेष, सुख-दुःख आदि सब विकृतियोकी स्थिति, गति, अपचिति ( लय ) जिस नित्य अखण्ड बोधसे भासित होती हैं, वह अनन्त सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन ब्रह्मात्मा ही वेदान्तमतमें सर्वमूल है । मन भी उसी अखण्ड बोधका विवर्त्त है । अन्वय-व्यतिरेकसे जैसे मृत्तिकाके होनेपर ही मृद्विकार घटादि उपलब्ध होते हैं, मृत्तिकाके बिना वे उपलब्ध नहीं होते, जैसे जलके रहनेपर ही तरङ्गादि प्रतीत होते हैं, जलके बिना वे प्रतीत नहीं होते, वैसे ही मनके होनेपर ही बाह्य एव आभ्यन्तर भौतिक दृश्यमात्र प्रतीत होते हैं, मनके बिना कुछ भी भासित नहीं होते हैं । इसी प्रकार सर्वान्तर्द्रष्टाका अस्तित्व ही सम्पूर्ण दृश्यके अस्तित्वका मूल है । अखण्ड बोधके बिना तो मन, अन्तःकरण या विज्ञान भी भासित नहीं होते । अतएव मूल पदार्थ अखण्ड बोध सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है । मनसे भिन्न मस्तिष्क भी कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है । मनको श्रोत्र, त्वक्, चक्षु आदि दस बाह्य इन्द्रियोसे भिन्न ग्यारहवी आन्तर इन्द्रिय माननेमें भी कोई आपत्ति नहीं है। उसी मनमें बुद्धि, चित्त, मन, अहङ्कार- ये चार भेद होते हैं। उसमें इच्छा, द्वेष, सुख-दुःखादि गुण व्यक्त हुआ करते हैं। भले ही मस्तिष्कके तन्तुविशेषोके निघर्षसे इसकी व्यञ्जना होती हो, परंतु यह मस्तिष्क एव उसके तन्तु या तन्तुका निघर्षमात्र नहीं है। जैसे ठंडे और गरम दो तार या दो तारोका सघर्ष ही विद्युत् नहीं है, किंतु उनसे व्यक्त होनेवाली विद्युत् उनसे भिन्न स्वतन्त्र वस्तु है, वैसे ही मन इन मस्तिष्क, तन्तु एव उनके निघर्षसे भिन्न वस्तु है । शुद्ध स्फुरण, अखण्ड बोध तो विचारोसे भी भिन्न स्वतन्त्र वस्तु है । मार्क्सवादी कहते हैं कि "विचारोका जन्म बाह्यजगत्से ही होता है। फिर भी सभी विचार सत्य नहीं होते । वास्तविकताका ठोस अनुभव ही बतलाता है कि विचार सही है या नहीं । विचार करनेपर यह भी असङ्गत ही प्रतीत होता है। फिर भी वास्तविकताके जिस ठोस अनुभवसे ही विचारकी सत्यताका निश्चय होता है, वह अनुभव क्या है ? क्या वह भी जड, बाह्य वस्तु है ? अतः हर दृष्टिसे यह मानना पड़ेगा कि विचार हो या अनुभव, ठोस हो या पोला, किसी भी वस्तु- का अस्तित्व निर्दोष अनुभव या विचारके बिना सिद्ध नहीं होता ।” इससे इतना ही कहा जा सकता है कि पूर्वानुभवका बाधक अनुभवान्तर होनेसे पूर्वानुभवको भ्रम समझा जाता है । बाधक अनुभव न होनेसे पूर्वानुभवको स्वतः ही सत्य माना जाता है । सर्वथा अपि अनुभवके बिना बाह्य पदार्थकी सत्ता ही सिद्ध नहीं होती है। साधारण विचार, साहित्य आदिपर अवश्य समाजकी छाप होती है । उसमें