भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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६८० मार्क्सवाद और रामराज्य कारण बन अपना और दूसरोका नुकसान कर लेता है । इसीलिये योगियों, तार्किकों एवं नैयायिकोने भी मन्त्रशक्ति मानी है । कोई भी विधिपूर्वक मन्त्रानुष्ठान करके आज भी मन्त्रका महत्त्व अनुभव कर सकता है । कुछ वैज्ञानिक भी अलौकिक शक्ति मानने लगे हैं । दर्शन वैज्ञानिकोंके विज्ञानकी परवा न करके ही अपने सत्य सिद्धान्तको वैज्ञानिको एव विज्ञानकी उत्पत्तिके पहलेहीसे बतला रहा है । लाखो वर्ष पहलेसे ही, जब आधुनिक वैज्ञानिक गर्भमें भी नहीं आयेथे, उपनिषदें आत्मा- को मनोवचनातीत कहती आ रही हैं। वह इसलिये कि आन्तर वस्तुसे बाह्य वस्तुका ग्रहण होता है, बाह्यसे आन्तरका नहीं। बाह्य प्रकाशका परिज्ञान नेत्रसे होता है, परतु सूक्ष्म नेत्र-इन्द्रियका बोध बाह्य प्रकाशसे नहीं होता । इन्द्रियोका व्यापार मनसे विदित होता है, परंतु इन्द्रियोसे मनका व्यापार विदित नहीं होता । मन, बुद्धि आदिका बोध सर्वभासक साक्षीसे होता है, परतु स्वप्रकाश साक्षीका मन आदिके द्वारा बोध नहीं होता । इसी तरह जाति, गुण, क्रिया, सम्बन्धसे रहित होनेके कारण शब्दकी अभिधावृत्तिका गोचर अद्वितीय ब्रह्म नहीं होता । वराक (वेचारे ) विज्ञानके भयसे दार्शनिकोने ब्रह्मको मनोवचनातीत नहीबनाया है । आत्मा एवं भूत मार्क्सवादी 'आत्माकी अपेक्षा प्रकृति या भूतको ही मूल मानते हैं । भौतिक चिन्त्य वस्तुसे भिन्न चिन्तन या विचार पृथक् नहीं किया जा सकता है । चेतना या विचार चाहे कितने ही सूक्ष्म क्यो न प्रतीत हों, परंतु हैं वे मस्तिष्क- की उपज ही । मस्तिष्क एक भौतिक दैहिक इन्द्रिय ही है । यह भौतिक जगत्‌का सर्वश्रेष्ठ इन्द्रिय है । मार्क्सके शब्दोमें 'पदार्थ मनसे उत्पन्न नही हुआ, किंतु मन पदार्थकी सर्वोत्कृष्ट सृष्टि है ।' लेनिनने कहा है कि 'सृष्टि-ज्ञानका अर्थ है—पदार्थकी गति और उसकी चिन्तनशीलताका ज्ञान ।' इस तरह भौतिक पदार्थ या प्रकृति ही मूल है । विचार या चेतना उसका प्रतिबिम्ब है। व्यक्तिके विचार उसकी सामाजिक सत्ता या परिस्थितिसे स्वतन्त्र नहीं होते। कहा जाता है कि 'एक दार्शनिक अपने युगका कीचड़ अपने पैरोके साथ लिये जाता है । उसके दर्शनपर उसके समाजकी छाप अवश्य ही रहती है ।' लास्कीके शब्दोमें 'जो जैसा रहता है, वैसा ही सोचता है ।' एमिल वर्नसके शब्दोमें 'वस्तु अर्थात् वह वास्तविकता, जो अचेतन है, पहले थी । मन जो सचेतन है, बादमें आया । वस्तु अर्थात् बाह्य पदार्थ मनसे स्वतन्त्र है ।' यद्यपि पाश्चात्य आदर्शवादी दार्शनिकोने मनस् या सर्वमनस् तत्त्वको ही मूल माना है । उसीसे अचेतनकी उत्पत्ति माना है । काट, फिक्टे, हीगेल आदि इसी विचारके हैं । अद्वैतवादी वेदान्ती भी एक हदतक कहते हैं कि सम्पूर्ण विश्वप्रपञ्च मनका विस्तार है । यह द्वैत मनोमात्र ही है—'मनोमात्रमिदं द्वैतम् ।' मनके