भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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जो भौतिकवादियोंको अस्वीकृत ही है । यदि अवयवी अवयवोंसे अभिन्न है तब तो भूतमात्र ही होगा। भेद एव अभेद दोनोंका होना असङ्गत ही है । यदि कहा जाय कि अवयवी अवयवोंके परतन्त्र है, अतः पञ्चमतत्त्वापत्ति नहीं होगी, तो यह भी ठीक नहीं, कारण, इस तरह जल आदि भी पृथ्वी आदिके परतन्त्र होनेसे जलादिमे भी स्वतन्त्र तत्त्वका व्यवहार होता है । फिर तो पृथिव्यादि भूतचतुष्टय तत्त्व हैं, यह सिद्धान्त बाधित हो गया । कुछ लोग कहते हैं कि 'एकद्रव्य-बुद्धिका अवलम्बन योग्य होना ही सङ्घात है । देहमें एकबुद्धि- अवलम्बन-योग्यता है ही', परंतु यह भी ठीक नहीं, क्योंकि वस्तुतः अनेकोंमें एकत्वबुद्धि विभ्रम ही है । 'एकार्थक्रियामे युगपत् (एक कालमे ) अन्वय ही सङ्घात है, जैसे प्रमातृत्व आदि व्यवहाररूप एक कार्यके लिये पृथिव्यादि चारों भूतोंका अन्वय होता है।' पर यह भी ठीक नहीं, कारण, ऐसा माननेपर वायुजन्य वेणुसङ्घर्ष- जनित काष्ठाश्रित वह्निसे संतप्त जलमें चारों भूतोंका समन्वय है ही, फिर उस जलमें भोक्तृत्व होना चाहिये । परंतु यह है नहीं। जो कहा जाता है कि 'जैसे अग्निका लोह-पिण्डके साथ सम्बन्ध होता है, वैसे सम्बन्धको ही संघात कहा जाता है', वह भी ठीक नहीं । कारण, शरीरमें वायुका सम्बन्ध उस प्रकारका न होनेसे शरीरमे भोक्तृत्व नहीं बन सकेगा । इसके अतिरिक्त वह्निव्याप्त लोहपिण्डमें उसके ही द्वारा उसमे जल शुष्क होता है और वायुका भी उसमें सम्पर्क रहता है। अतः उस लोहपिण्डमें ही भोक्तृत्व एव चैतन्यका उपलब्ध होना चाहिये । यदि इन सब दोषोंके परिहारके लिये एक-एक भूतको भोक्ता माना जाय तो यह भी ठीक नहीं; क्योकि सब भूतोंका शब्दादि विषय-संनिधान होनेपर फिर किसका भोग या चैतन्य है ? इसका निश्चय असम्भव होगा । अतः चारोंको भोक्ता मानना पडेगा । और उनका संघात बन नहीं सकता, अतः संघात- भावापन्न भूतोको भोक्ता या चेतन माननेका पक्ष युक्तिहीन है । कहा जाता है कि 'शक्तिमद्द्रव्यान्तरकी कल्पनाकी अपेक्षा उन गोलकोंमें शक्तिमात्रकी कल्पनामें लाघव है', परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि फिर तो आत्मामें ही क्रमयुक्त सर्वविज्ञानसामर्थ्य माननेमें अत्यन्त लाघव है । कुछ लोग 'रूपादिकी उपलब्धि करणपूर्वक होनी चाहिये, कर्ताका व्यापार होनेसे छिदि क्रियाके तुल्य, अर्थात् जैसे कर्ता कुठारादि करणके द्वारा काष्ठछेदन करता है, उसी तरह आत्मा चक्षुरादि करणोंके द्वारा रूपादिकी उपलब्धि करता है', इस अनुमानसे देहभिन्न इन्द्रियाँ सिद्ध करते हैं। और यह भी कहा जाता है कि 'वे इन्द्रियाँ भौतिक हैं। चक्षु तैजस है, क्योकि तैजसरूपका ही ग्राहक है । श्रोत्र आकाशीय है, क्योंकि आकाशीय शब्दका ग्राहक है । मन शब्द-स्पर्शादि सभीका व्यञ्जक है, अतः वह पञ्चभूतोंका ही कार्य है । इस तरह इन्द्रियाँ भी भोक्ता नहीं हो सकतीं ।'