मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 443, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें६८४ मार्क्सवाद और रामराज्य विवाह और गुण-प्रधानभावेन सघात नही बन सकता, अर्थात् भोग्यकी उपस्थितिमे भोक्ता क्रमकी अपेक्षा न करके ही भोगमें प्रवृत्त होगा । उसी तरह प्रत्येक भोक्ता भूत, भोग्य शब्दादिके उपस्थित होनेपर क्रमकी अपेक्षा न करके ही भोगमें संलग्न होगा । अतः इनका भी अङ्गाङ्गी-भावरूपसे संघात नहीं बन सकेगा । इसी तरह समस्त ( सम्मिलित ) भूतोका भी भोक्तृत्व नही बन सकता; क्योंकि यदि प्रत्येक भूतोमें चैतन्य नहीं है तो वह संघातमें भी नहीं हो सकता । अतएव सघातमें भी भोक्तृत्व नही बन सकता । यदि कहा जाय कि अग्निमें डाले हुए एक-एक तिल ज्वालाके जनक न होनेपर भी तिलसमूह ज्वालाका जनक होता है, उसी तरह भूतोंका समूह भी चैतन्यका जनक होगा, परतु यह कहना ठीक नही; क्योकि संघातकी उत्पत्तिमे कोई स्पष्ट हेतु नही दिखायी देता । कारण, मार्क्सवादीके मतमें संघातात्मक शरीरसे भिन्न कोई चेतन पदार्थ है ही नहीं, जो कि प्रत्येक अचेतन भूतका चेतनात्मक संघात उत्पन्न कर सके । यदि भावी भोगको ही संघातका कारण कहा जाय तो वह भी ठीक नहीं, कारण यदि भोगको अप्रधान माना जाय तो परस्पर गुणप्रधानभावशून्य भूतोंका संघात कैसे बनेगा ? अर्थात् गुणभूत भोगके द्वारा प्रधानभूत भूतोका संघात सम्पादन असङ्गत है । यदि भोगको ही प्रधान माना जाय तो यह भी ठीक नही; क्योंकि भोग सर्वथा ही भोक्ताका शेष ( अङ्ग ) हुआ करता है । कहा जा सकता है कि शेषी (अङ्गी) अर्थात् प्रधानभूत भोगके प्रति शेषभूत ( अर्थात् अङ्गभूत ) स्त्री-पुरुष शरीर भोक्ताओका संहत ( सम्मिलित ) होना देखा गया है । पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सिद्धान्तमे वहाँ भी स्त्री-पुरुष शरीरोमे भोक्तृत्व सम्प्रतिपन्न नहीं, किंतु वहाँ शरीर-भिन्न दोनोंके भोक्ता आत्मा ही भोगके लिये दोनों शरीरोंको सम्मिलित करते हैं । और ज्वालाके प्रति तिलोंकी संघातापत्तिका दृष्टान्त भी जडवादीके मतमें असिद्ध है; क्योकि उसके मतमें संघात नामकी कोई चीज सिद्ध नही होती । वादी-प्रतिवादी उभयसम्मत होनेसे ही कोई दृष्टान्त किसी सिद्धान्तका साधक हो सकता है । संघात क्या है ? यह भी विचारणीय है । 'जैसे अनेक वृक्षोका एक देशमें आना ही उनका सघातभूत 'वन' कहा जाता है, वैसे ही भोग और भोक्ताका समानाधिकरणत्व अर्थात् एक देशस्थता सघात है,' यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि इस तरह तो सर्वव्यापी सभी भूत सर्वत्र हैं । अतएव चैतन्य और भोग भी सार्वत्रिक ठहरेगा तथा शरीरमे ही भोगका नियम बाधित होगा । 'उन भूतोंसे आरब्ध अवयवी सघात है', यह भी नही कहा जा सकता; क्योंकि यदि वह अवयवी चार भूतोंसे भिन्न है, तो उसे पाँचवाँ तत्त्व मानना होगा,