मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
जो भौतिकवादियोंको अस्वीकृत ही है । यदि अवयवी अवयवोंसे अभिन्न है तब तो भूतमात्र ही होगा। भेद एव अभेद दोनोंका होना असङ्गत ही है । यदि कहा जाय कि अवयवी अवयवोंके परतन्त्र है, अतः पञ्चमतत्त्वापत्ति नहीं होगी, तो यह भी ठीक नहीं, कारण, इस तरह जल आदि भी पृथ्वी आदिके परतन्त्र होनेसे जलादिमे भी स्वतन्त्र तत्त्वका व्यवहार होता है । फिर तो पृथिव्यादि भूतचतुष्टय तत्त्व हैं, यह सिद्धान्त बाधित हो गया । कुछ लोग कहते हैं कि 'एकद्रव्य-बुद्धिका अवलम्बन योग्य होना ही सङ्घात है । देहमें एकबुद्धि- अवलम्बन-योग्यता है ही', परंतु यह भी ठीक नहीं, क्योंकि वस्तुतः अनेकोंमें एकत्वबुद्धि विभ्रम ही है । 'एकार्थक्रियामे युगपत् (एक कालमे ) अन्वय ही सङ्घात है, जैसे प्रमातृत्व आदि व्यवहाररूप एक कार्यके लिये पृथिव्यादि चारों भूतोंका अन्वय होता है।' पर यह भी ठीक नहीं, कारण, ऐसा माननेपर वायुजन्य वेणुसङ्घर्ष- जनित काष्ठाश्रित वह्निसे संतप्त जलमें चारों भूतोंका समन्वय है ही, फिर उस जलमें भोक्तृत्व होना चाहिये । परंतु यह है नहीं। जो कहा जाता है कि 'जैसे अग्निका लोह-पिण्डके साथ सम्बन्ध होता है, वैसे सम्बन्धको ही संघात कहा जाता है', वह भी ठीक नहीं । कारण, शरीरमें वायुका सम्बन्ध उस प्रकारका न होनेसे शरीरमे भोक्तृत्व नहीं बन सकेगा । इसके अतिरिक्त वह्निव्याप्त लोहपिण्डमें उसके ही द्वारा उसमे जल शुष्क होता है और वायुका भी उसमें सम्पर्क रहता है। अतः उस लोहपिण्डमें ही भोक्तृत्व एव चैतन्यका उपलब्ध होना चाहिये । यदि इन सब दोषोंके परिहारके लिये एक-एक भूतको भोक्ता माना जाय तो यह भी ठीक नहीं; क्योकि सब भूतोंका शब्दादि विषय-संनिधान होनेपर फिर किसका भोग या चैतन्य है ? इसका निश्चय असम्भव होगा । अतः चारोंको भोक्ता मानना पडेगा । और उनका संघात बन नहीं सकता, अतः संघात- भावापन्न भूतोको भोक्ता या चेतन माननेका पक्ष युक्तिहीन है । कहा जाता है कि 'शक्तिमद्द्रव्यान्तरकी कल्पनाकी अपेक्षा उन गोलकोंमें शक्तिमात्रकी कल्पनामें लाघव है', परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि फिर तो आत्मामें ही क्रमयुक्त सर्वविज्ञानसामर्थ्य माननेमें अत्यन्त लाघव है । कुछ लोग 'रूपादिकी उपलब्धि करणपूर्वक होनी चाहिये, कर्ताका व्यापार होनेसे छिदि क्रियाके तुल्य, अर्थात् जैसे कर्ता कुठारादि करणके द्वारा काष्ठछेदन करता है, उसी तरह आत्मा चक्षुरादि करणोंके द्वारा रूपादिकी उपलब्धि करता है', इस अनुमानसे देहभिन्न इन्द्रियाँ सिद्ध करते हैं। और यह भी कहा जाता है कि 'वे इन्द्रियाँ भौतिक हैं। चक्षु तैजस है, क्योकि तैजसरूपका ही ग्राहक है । श्रोत्र आकाशीय है, क्योंकि आकाशीय शब्दका ग्राहक है । मन शब्द-स्पर्शादि सभीका व्यञ्जक है, अतः वह पञ्चभूतोंका ही कार्य है । इस तरह इन्द्रियाँ भी भोक्ता नहीं हो सकतीं ।'
६८६ मार्क्सवाद और रामराज्य बौद्धोके अनुसार ‘दिखायी देनेवाले आँख, नाक, कान आदि गोलक ही इन्द्रियाँ हैं।’ ‘उन गोलकोंमें देखने-सुनने आदिकी शक्ति ही इन्द्रियाँ हैं’ यह मीमांसकोंका मत है। ‘गोलक भिन्न द्रव्य ही इन्द्रियाँ है’ यह अन्य लोग मानते हैं। उनमें बौद्धमत इसलिये ठीक नहीं है कि कानरूपी गोलक न रहनेपर भी सर्पको शब्दका बोध होता है। वृक्षोंमें कोई गोलक नहीं होता, तो भी उन्हें शब्दादिका बोध होता है। यह आगमवेद्य है। आधुनिक वैज्ञानिकोंने भी उनका चेतन होना -स्वीकार किया है। शास्त्रोंने भी उनकी हिंसा मना की है। उपर्युक्त दोषोंके कारण ही ‘गोलकोंकी शक्ति इन्द्रियाँ हैं’ यह पक्ष भी ठीक नहीं। कुछ लोग इन्द्रियोंको आहङ्कारिक एवं सर्वगत मानते हैं, अन्य मध्यम परिमाण ही मानते हैं। बौद्ध अप्राप्यकारी कहते हैं, अर्थात् विषय-देशपर बिना गये ही इन्द्रियाँ विषयोंका प्रकाशन करती हैं। परंतु दूरसे स्पर्श, रस, गन्धका उपलम्भ नहीं होता। अतः त्वक्, रसना, घ्राणको अप्राप्यकारी नहीं कहा जा सकता। चक्षु भी दूरदेश जाकर ही दूरस्थ वस्तुका ग्रहण करता है। तेज शीघ्र ही दूरगामी देखा जाता है। शब्द भी वीचि-तरङ्गन्यायसे श्रोत्र-देशपर आता है तभी उसका ग्रहण होता है। रेडियो आदिद्वारा शब्दका विस्तार और अधिक हो जाता है। अतः श्रोत्र भी अप्राप्यकारी नहीं। मनको भी नैयायिक नित्य कहते हैं। परंतु वेदान्त मतमें उसकी उत्पत्ति मान्य है—‘तन्मनोऽसृजत्’ (ऐतरेय०) नैयायिक मनको अणु-परिमाण और वेदान्ती मध्यम-परिमाण कहते हैं। ‘मन, अन्तःकरण, बुद्धि, अहङ्कार एक ही वस्तुकी अवस्थाएँ हैं, आत्मा इन सभी साधनोंके द्वारा भोगके लिये प्रवृत्त होता है। वह सर्वगत एवं कर्ता है, यह नैयायिकोंका मत है। वेदान्त-मतमे ‘आत्मा स्वप्रकाश है।’ निद्राकालमें सुखपूर्वक सोया, इस प्रकार सौषुप्त प्रत्यक्षानुभवके कारण ही प्रबुद्धको स्मरण होता है। आत्मा स्वप्रकाश है, क्योकि स्वसत्तामें प्रकाशविहीन नहीं रहता, जैसे प्रदीप और ज्ञान। ये अपनी सत्तामें प्रकाशरहित नहीं होते, अतएव स्वप्रकाश हैं। इसी तरह आत्मा भी स्वसत्तामें प्रकाशशून्य नहीं होता, अतः स्वप्रकाश है। इसी तरह आत्मा प्रदीपके समान विषयका प्रकाशक एव आलोकके तुल्य विषय- प्रकाशका आश्रय है। इसलिये भी स्वप्रकाश है, इसी तरह ज्ञानके समान इन्द्रिय-गोचर न होकर अपरोक्ष होनेसे भी आत्मा स्वप्रकाश है। जैसे ज्ञान चक्षुरादिका विषय न होकर भी अपरोक्ष है, वैसे ही आत्मा भी। इसी तरह आत्मा धर्मी होते हुए भी अजन्य प्रकाश-गुणवाला है; क्योकि वह प्रकाश-गुण- वाला है जैसे आदित्य। अर्थात् जैसे आदित्य प्रकाश-गुणवाला होनेसे अजन्य प्रकाश गुणवाला है, वैसे ही आत्मा भी प्रकाश-गुणवाला होनेसे अजन्य प्रकाश- गुणवाला है। यह बात दूसरी है कि आदित्यका प्रकाशरूपी प्रकाश है, आत्माका ज्ञान-
रूप नीरूप प्रकाश है । 'अत्रायं पुरुष. स्वय ज्योति.' इत्यादि आगम भी आत्माको स्वप्रकाश कहते हैं । नैयायिक एव पूर्वमीमासक आत्माको कर्ता मानते हैं, किंतु साख्य निरवयवमें परिस्पन्द एव परिणामलक्षण क्रियाको असम्भव समझकर उसे असङ्ग एव अकर्ता ही कहते हैं । वैशेषिक, योगी, नैयायिक आदि भोक्ता जीवसे भिन्न सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् विश्वकर्ता ईश्वर मानते हैं । जाग्रत्कालमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धादि विषयवेद्य हैं । उनमें गो- अश्वादिवत् परस्पर विचित्रताके कारण उनकी भिन्नता भी माननी चाहिये । उन शब्दादिका बोध या संवित् उनसे भिन्न है । वेद्य और वेदिताका भेद प्रसिद्ध ही है । प्रकाश्य, प्रकाशका भेद भी लोकमें प्रसिद्ध है । रूप और उसके प्रकाशक सौरालोकमें भेद स्पष्ट ही है । इसी तरह वेद्य शब्दादि एव आकाशादिसे उनका भासक बोध और अनुभव भिन्न है । जैसे शब्दादिकी परस्पर विचित्रता होनेसे भिन्नता है, उस तरह उनके बोधोंमें विचित्रता नहीं है । अतः उनका भेद भी नही है । अतएव बोध-बोध सब एक ही है । अनुमान भी किया जा सकता है । विवादास्पद शब्दादि-बोध स्वाभाविकभेदशून्य हैं, क्योकि उपाधिको बिना ग्रहण किये हुए उनका भेद गृहीत नहीं होता, जैसे आकाशमें घटादि उपाधिके बिना भेद नहीं गृहीत होता, अतः वह भी स्वाभाविक भेदशून्य है, तद्वत् प्रकृतमे भी समझना चाहिये । संवित् होनेसे शब्दसंवित् स्पर्शसंवित्से भिन्न नहीं है, जैसे स्पर्शसंवित् अपनेसे भिन्न नहीं है । जैसे एक ही आकाशमें घटादि उपाधिके भेदसे भेद- व्यवहार हो जाता है, उसी तरह आकाशवत् व्यापक एक ही संवित्मे शब्दादि विषयरूप उपाधिके भेदसे भेद-व्यवहार बन ही जायगा । उसी प्रकार स्वप्नमें भी विषयोंमें भेद और संवित्में अभेद है । स्वप्न और जागरमे भेद इतना ही है कि जागरमें विषय स्थिर है और स्वप्नमें अस्थिर । स्वप्न-जागर अवस्थाएँ और उनके विषय भी विचित्रताके कारण पृथक् पृथक् हो सकते हैं, परंतु दोनों अवस्थाओके बोध एकरूप होनेसे अभिन्न ही हैं । इसी तरह सुषुप्ति-अवस्थाकी संवित् भी सुषुप्ति-अवस्थासे भिन्न है । सुषुप्ति और जाग्रदादि परस्पर विलक्षण होनेसे भिन्न हैं, परंतु उनकी संवित् एकरूप होनेसे परस्पर अभिन्न ही है । सोकर जगनेके पश्चात् सुप्तोत्थित प्राणीको सुषुप्ति-अवस्थाके अज्ञान या तमका स्मरण होता है, 'मैं सुखपूर्वक सोता था और कुछ भी नही जानता था ।' प्रत्यक्ष-साधन विषये- न्द्रिय-सन्निकर्ष एव अनुमान साधन व्याप्ति-लिङ्गादि न होनेसे ऐसे ज्ञानको स्मृति ही मानना उचित है । स्मृति अनुभवपूर्वक ही होती है, अतः सुषुप्तिकालमे सुख एवं तमोरूप अज्ञानका अनुभव मानना उचित है । यह अज्ञान अन्धकारके तुल्य वस्तुतत्त्वको ढकनेवाला भावरूप है । इसीलिये इसके द्वारा ज्ञानरूप ब्रह्मका
६८८ मार्क्सवाद और रामराज्य आवरण होता है । 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्' (गीता ५।१५) यह ज्ञानाभाव नहीं है; क्योकि ज्ञानाभाव जाननेके लिये उसके अनुयोगी (आधार) प्रतियोगी (ज्ञान) का ज्ञान होना चाहिये । जैसे घटाभाव जाननेके लिये अनुयोगी ( भूतलादि ) और प्रतियोगी ( घट ) का ज्ञान आवश्यक होता है । परंतु यहाँ यदि इसी तरह अनुयोगी- प्रतियोगीका ज्ञान हो तब ज्ञानाभाव कैसा ? और यदि उनका ज्ञान नहीं तो ज्ञानाभावका ज्ञान ही नही हो सकता । अतः भावरूप अज्ञान ही साक्षीके द्वारा प्रकाशित होता है । अज्ञानका उपलब्ध होनेसे ही तद्विरुद्ध ज्ञानका अभाव विदित हो जाता है । इसलिये इस अज्ञानको तम भी कहा जाता है । इसी तरह दिनो, पक्षो, मासो, वर्षो, युगो, कल्पो, अतीतो, अनागतोमें भेद है, परंतु उनके बोधोमें कोई भी भेद नहीं । एक अनन्त आकाशके तुल्य ही यह बोध भी अनन्त एवं एक ही है । अतः इसका न उदय होता है न अन्त । क्योकि उस बोधका प्रागभाव या उत्पत्ति अथवा विनाश भी बोधके बिना सिद्ध नहीं होता । यदि प्रागभाव-साधक बोध है, तो बोधका प्रागभाव ही कैसे कहा जा सकता है ? यदि बोध नहीं तो प्रागभाव सिद्ध ही कैसे होगा ? बोधोमें भेद नहीं होता, अतः अन्य बोधका प्रागभाव अन्य बोधसे सिद्ध होगा, यह भी नहीं कहा जा सकता । इस तरह अत्यन्ताबाध्य होनेके कारण वही बोधस्वरूप भी है । यही संवित् आत्मस्वरूप भी है; क्योकि नित्य होकर स्वप्रकाश है । जो नित्य स्वप्रकाश नही वह आत्मा नहीं, जैसे घटादि । बोध नित्य एवं स्वप्रकाश है, अतः वही बोध, संवित्, अनुभव या ज्ञान आत्मा है । आत्मा परप्रेमास्पद है, अतः आनन्दस्वरूप भी है । ससारमें सर्वत्र ही प्रेम आत्माके लिये होता है, आत्मामें प्रेम अन्यके लिये नहीं होता । जैसे शर्कराके सम्बन्धसे अन्यत्र मिठास होती है, किंतु शर्करामें मिठास स्वतः होती है । उसी तरह आत्मामें प्रेम स्वतः होता है । अन्यत्र प्रेम आत्मसम्बन्धसे होता है । निद्रादि सब जिनसे अनुभूत होते हैं, उस अनुभवका अपलाप नहीं किया जा सकता । अनुभूतिको अनुभाव्य माननेसे अनवस्था-दोष होता है, अतः अनुभूति अनुभाव्य हुए बिना ही स्वप्रकाश है । ज्ञाता और ज्ञानका दूसरा ज्ञान न होनेसे वे ज्ञेय नहीं होते । असत् होनेसे उन्हें अज्ञेय नहीं कहा जा सकता । निद्रा आनन्दादि साक्षी होनेसे उसे असत् नहीं कहा जा सकता ।
उपलब्ध होती .है, शून्य बुद्धि नहीं होती । इसलिये तूष्णींस्थितिमें शून्य नहीं कहा जा सकता । 'उस समय सद्बुद्धि भी न होनेसे सत् भी नहीं रहता', यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सद्बुद्धि होनेपर भी स्वप्रकाश होनेसे सत् सिद्ध होता है । निर्मनस्कताका साक्षी स्वप्रकाश होता ही है, जैसे मनकी चञ्चलता मिटनेपर साक्षी स्वच्छ होता है, उसी प्रकार मायाका विजृम्भण या विकास रुकने- पर स्वप्रकाश सत् भी स्फुट हो जाता है । कुछ लोग आकाशादिसे भिन्न सत् नहीं मानते, परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि 'आकाशः सत् घटः सत्' इत्यादि व्यवहारोंमें जैसे घटादि शब्द एवं घटादि बुद्धि होती है उसी तरह सत् शब्द एवं सद्बुद्धि होनेसे आकाश और सत्— दोनों ही पृथक् पदार्थ हैं । जैसे 'मृद् घटः' इस व्यवहारमें शब्द एवं बुद्धिके कारण ही मृत्तिका और घट दो पदार्थ सिद्ध होते हैं । उनमें मृद्बुद्धिके अनुवृत्त होनेसे और घट-शरावादि बुद्धिके व्यावृत्त होनेसे मृत्तिका कारण और घटादि कार्य समझे जाते हैं । उसी तरह सत् अनुवृत्त होनेसे कारण तथा आकाश घटादि व्यावृत्त होनेसे कार्य सिद्ध होते हैं । अधिक वृत्ति होनेसे सत् धर्मी है, अल्पवृत्ति होनेसे आकाशादि धर्म हैं । बुद्धिसे यदि आकाशसे सत्को पृथक् कर दें तब तो आकाश असत् ही हो जाता है । जैसे जाति-व्यक्ति और देह-देहीका भेद होता है, वैसे ही आकाशादि प्रपञ्च एवं सत्का भी भेद सिद्ध होता है । सावधानी एवं एकाग्रतासे विचार करनेपर भेद-ज्ञान स्थिर हो जाता है । विवेचन करनेपर सत् शून्य अवकाशात्मक आकाश रह जाता है एवं निरवकाशात्मक सत् रह जाता है— येनेक्षते शृणोतीदं जिघ्रति व्याकरोति च । स्वाद्वस्वादू विजानाति तत्प्रज्ञानमुदीरितम् ॥ ( पञ्चदशी, महावाक्यविवेकप्र० १ ) जिस नेत्रजन्यवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे पुरुष रूपको देखता है, श्रोत्रजन्य शब्दाकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे शब्द ग्रहण करता है, गन्धाकारवृत्तिव्यक्त चैतन्यसे गन्ध ग्रहण होता है, वही बोधस्वरूप चैतन्य प्रज्ञान है—'न हि द्रष्टु- र्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।' ( बृहदा० उप० ४ । ३ । २३ ) द्रष्टाकी स्वरूपभूत दृष्टिका कभी भी विलोप नहीं होता । जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिकी सभी वस्तुएँ अपने-अपने स्थानपर ही रहती हैं; किंतु द्रष्टा तीनों ही अवस्थामें रहता है । जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिके प्रपञ्चका जो प्रकाशक भान है, वही ब्रह्म है । तीनो अवस्थाओका भासक साक्षी भोग्य-भोक्ता और भोग— तीनोंसे ही विलक्षण होता है । वह चिन्मात्र ही है । चिदाभास एव अहंका भी सुषुप्तिमें विलय होता है उसका भी साक्षीसे ही प्रकाश होता है । मा० रा० ४४—
६९० मार्क्सवाद और रामराज्य जैसे आकाशीय सूर्यद्वारा प्रकाशित घट-कुड्यादि दर्पणदित्यदीप्तिसे प्रकाशित होता है अर्थात् दर्पणप्रतिबिम्बित आदित्यद्वारा प्रकाशित होता है। यदि कुड्यपर अनेक दर्पण-प्रतिबिम्बित आदित्यकी दीप्तियाँ प्रकट हों, तो उनके बीच-बीचमें स्वाभाविक निरुपाधिक आकाशीय आदित्यकी दीप्तियाँ परिलक्षित होती हैं और दर्पणजन्य विशेष प्रभावोंके न होनेपर भी वह सामान्य आदित्य- प्रकाश रहता ही है। ठीक इसी तरह स्वप्रकाश बोध सामान्य चेतनद्वारा प्रकाशित देह भी बुद्धि-प्रतिबिम्बित चिदाभासके द्वारा प्रकाशित होता है। चिदाभासविशिष्ट बुद्धि-वृत्तियोंके बीच-बीचमें सामान्य-चेतन या शुद्ध नित्यबोध परिलक्षित होता है। बुद्धिवृत्तिप्रतिबिम्बित चिदाभासोंके बिना भी वह स्वप्रकाश बोध रहता ही है। घट-ज्ञानादि शब्दवाच्य चिदाभासविशिष्ट बुद्धिवृत्तियोंकी संधियो एवं सुषुप्तिमें उन बुद्धिवृत्तियोंके अभावका प्रकाशक नित्य-बोध रहता है। घटाकार-बुद्धिस्थ चित् घटमात्रका प्रकाश करती है, परंतु घटगत ज्ञातताका प्रबोध नित्य-चैतन्यसे ही होता है। घटाकार-बुद्धिके प्रथम 'घटो मया न ज्ञातः' इस प्रकार घटकी अज्ञातता भी व्यापक अखण्ड बोधसे ही गृहीत होती है। जैसे अज्ञातत्वेन घट ब्रह्मबोधित था, उसी तरह बुद्धि उत्पन्न होनेपर घट ज्ञातत्वेन भी ब्रह्म-चैतन्यसे ही प्रकाशित होता है। कोई भी घटादि विषय चित्प्रतिबिम्बयुक्त बुद्धिवृत्ति एवं अज्ञान दोनोंसे ही व्याप्त होते हैं। जब वह चिदाभासयुक्त वृत्तिसे व्याप्त होता है तब ज्ञात कहलाता है, जन अज्ञानसे व्याप्त होता है तब अज्ञात कहलाता है। अज्ञातरूपसे घटादि ब्रह्म अर्थात् व्यापक नित्य बोधसे प्रकाशित होता है। यह शङ्का हो सकती है कि 'चिदाभासयुक्त वृत्तिसे ही घटका प्रकाश हो सकता है फिर ब्रह्म-प्रकाशकी क्या आवश्यकता ?' परंतु यह ठीक नहीं; क्योकि जैसे अज्ञानने घटमें अज्ञातता पैदा की है, उसी तरह चिदाभासके द्वारा घटमें ज्ञातता उत्पन्न होती है। कहा जा सकता है कि 'ज्ञातता तो घटमें वृत्तिमात्रसे उत्पन्न हो सकती है,' परंतु यह ठीक नहीं। चिदाभासहीन बुद्धिसे घटादिमें ज्ञातता उत्पन्न नहीं हो सकती; क्योकि मृत्तिकादिके तुल्य चिदाभासरहित बुद्धि या वृत्ति जड ही है। अतः जैसे काली-पीली मिट्टीसे लिप्त घट ज्ञात नहीं कहा जा सकता, उसी तरह बुद्धिवृत्तिव्याप्त घट भी ज्ञात नहीं कहा जा सकता। अतः वृत्ति-व्याप्त घटमें चित्प्रतिबिम्बका उदय होनेसे ही घटमें ज्ञातताका व्यवहार बनता है। कहा जा सकता है कि आकाशीय सौरालोक-तुल्य सामान्य नित्य-बोधरूप ब्रह्मसे ही घटादिकी ज्ञातता बन सकती है फिर दर्पणादित्यदीप्तिके तुल्य वृत्तिपर चित्प्रति- बिम्ब या चिदाभास क्यों माना जाय ? परंतु यह कहना ठीक नहीं। कारण, नित्य बोधरूप ब्रह्म तो प्रमाण-प्रवृत्तिके पहले भी था ही। यहाँ तो प्रमाण प्रवृत्तिके पश्चात् घटादिमें ज्ञातताका व्यवहार होता है, यह चिदाभासमूलक ही है। अतः वृत्तिगत व्यक्त चित्प्रतिबिम्ब घटमें ज्ञातता उत्पन्न करता है। वह ज्ञातता,
अज्ञातताके तुल्य ही ब्रह्मसे भास्य होती है। बुद्धिवृत्ति, चिदाभास एव घटादि सभी सामान्य सौरालोक-तुल्य नित्यवोधसे भासित होते हैं, फिर भी घटव्याप्त वृत्तिपर ही चिदाभासरूप फल होता है। अतः एक घटका ही स्फुरण होता है। घटादि विषयपर द्विगुणित चैतन्य व्यक्त होता है। जैसे कुड्यपर एक सामान्य सौरालोक फैला होता है, दूसरे दर्पणादित्यदीप्तिके फैलनेसे द्विगुणित प्रकाश हो जाता है, उसी तरह सामान्य नित्यबोधसे व्याप्त घटादिपर चित्प्रतिविम्बयुक्त वृत्तिकी व्याप्ति होनेसे द्विगुणित चेतन्य हो जाता है। इसीलिये घटादिकी ज्ञातताका भासक ब्रह्म-चैतन्य माना जाता है। नैयायिक आदि उसे ही अनुव्यवसाय (ज्ञानविषय ज्ञान) कहते हैं। 'घटोऽयम्' यह घट है—नैयायिकोंके शब्दोंमें यह व्यवसायात्मक ज्ञान है, यह बुद्धिवृत्तिसे होता है। 'मया घटो ज्ञातः' मैंने घट जान लिया, यह अनुव्यवसायात्मक ज्ञान नित्य बोधरूप ब्रह्मसे होता है। इसी तरह अहंवृत्ति एवं काम क्रोधादि वृत्तियोंमें चिदाभास, उसी तरह व्याप्त होकर रहता है, जैसे लोहपर अग्नि व्याप्त होती है। जैसे अग्नि-व्याप्त लोह केवल अपने-आपको ही प्रकाशता है अन्यको नहीं, उसी तरह आभाससहित वृत्तियाँ अपनेको ही भासित करती हैं। क्रमसे विच्छिन्नविच्छिन्न होकर वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। सुषुप्ति, मूर्च्छा और समाधिमें सभी वृत्तियाँ लीन हो जाती हैं। सभी वृत्तियोंकी संधियाँ और अभाव जिस निर्विकार नित्य-बोधसे प्रकाशित होते हैं, उसे ही वेदान्तमतसे कूटस्थ शब्दसे कहा जाता है। जैसे बाहर वृत्ति-व्याप्त घटमें भासक चिदाभास और घटकी ज्ञातताका भासक ब्रह्मचैतन्य द्विगुण चैतन्य होता है, उसी तरह भीतर भी वृत्तियोंपर संधिकी अपेक्षा द्विगुण चैतन्यव्यक्त होता है। इसीलिये संधियोंकी अपेक्षा वृत्तियोंकी स्पष्टता अधिक होती है। भेद इतना अवश्य है कि बाहर घटादिमें ज्ञातता, अज्ञातता—दोनों ही रहती हैं, वैसे वृत्तियोंमें ज्ञातता, अज्ञा- तता—दोनों नहीं रहतीं। वृत्तियाँ स्वयं अपने-आपको ग्रहण नहीं करतीं, इसलिये ज्ञातता नहीं होती और वृत्तिके उत्पन्न होते ही वृत्तिगोचर अज्ञान नहीं रहता अतः वृत्तियोंकी अज्ञातता भी नहीं होती । वृत्तिगोचर वृत्ति माननेसे अनव- स्थादि दोष आते हैं। अतः वृत्तियाँ साक्षिभास्य कही जाती हैं। चित्प्रतिबिम्बरूप ज्ञानकी उत्पत्ति और विनाश प्रतीत होते हैं, अतः उसे विनश्वर कहा जाता है। अन्तःकरण एव तद्वृत्तियोंका साक्षी अखण्ड नित्यबोध निर्विकार होनेसे कूटस्थ कहलाता है। बुद्धिसे परिच्छिन्न कूटस्थ एव चिदाभासयुक्त बुद्धिके मिश्रणसे ही जीव- व्यवहार होता है। बुद्धि स्वच्छ है, इसलिये उसपर चित्प्रतिविम्ब होता है। प्रतिबिम्ब एव बिम्बमें कुछ तुल्यता ओर कुछ विलक्षणता होती है, इसी तरह
३. तृतीय खण्ड: धर्म, नैतिकता, आत्मा एवं ईश्वर-विषयक साम्यवादी भ्रांतियों का निवारण
६९२ मार्क्सवाद और रामराज्य स्फूर्तिरूपतामें तुल्यता होनेपर भी सङ्गिता विकारितारूप विलक्षणता भी बिम्बकी अपेक्षा प्रतिबिम्बमें रहती है । कहा जा सकता है कि जैसे मृत्तिका रहनेपर ही घट रहता है, वैसे ही बुद्धिके रहनेपर ही चिदाभास रहता है, बुद्धिके न रहनेपर नहीं रहता । फिर उसे बुद्धिसे भिन्न क्यो माना जाय ? यदि शास्त्र प्रमाणसे देहके मरनेपर भी बुद्धिका अस्तित्व माना जा सकता है तो बुद्धिसे भिन्न चिदाभास भी शास्त्रोंसे सिद्ध होता ही है । बुद्धिकी विभिन्न वृत्तियो एव अज्ञानके साक्षीरूपसे सर्वावभासक सर्वाधिष्ठान अखण्ड बोधरूप ब्रह्म सिद्ध होता है । अखण्ड बोध-स्वरूप ब्रह्म ही अहंवृत्तिसे युक्त होकर कर्ता कहलाता है, इदंवृत्तियुक्त हो प्रपञ्चाकार प्रतीत होता है, वही आन्तर-बाह्य सभी विषयोको साक्षीरूपसे प्रकाशित करता है । नृत्यशालास्थित दीप जैसे प्रभु, सभ्य एवं नर्तकी सभीको प्रकाशित करता है, उसी तरह साक्षी आत्मा ही अहंकार बुद्धि एव सभी विषयोको प्रकाशित करता है । जैसे प्रभु, सभ्य आदिके न रहनेपर दीप सबके अभावका भी भासक होता है, उसी तरह अहंकार बुद्धिके सुषुप्ति दशामें न रहनेपर भी साक्षी ही सबके अभावका भी प्रकाशन करता है । अखण्ड बोधरूप आत्मा नित्य ही स्वप्रकाशरूपसे विराजमान रहता है ।'उसीके प्रकाशसे प्रकाशित होकर बुद्धि आदि व्यावृत्त होती हैं । जैसे दीप स्वस्थानस्थित रहकर ही आन्तर-बाह्य सभी वस्तुओको प्रकाशित करता है, उसी तरह कूटस्थसाक्षी आन्तर-बाह्य सभी विषयोको प्रकाशित करता है। देहकी अपेक्षासे ही उसमें आन्तरत्व एवं बाह्यत्व प्रतीत होता है । अन्तःस्थ बुद्धि ही इन्द्रियोंके द्वारा बार-बार बाह्य विषयोकी ओर जाती है । उसीकी चञ्चलता- से तद्भासक साक्षीमें भी चञ्चलता प्रतीत होती है । सर्वदेश, काल, वस्तु बुद्धिकृत ही हैं । सर्वभासक अखण्ड बोधकी दृष्टिसे कुछ भी नही है । जैसे अग्निमें उष्णता एवं प्रकाश रहता है, वैसे ही आत्माका चैतन्य स्वभाव है। शब्दादि अचेतन होनेसे स्वतः सिद्ध नहीं हो सकते, किंतु शब्दाद्याकार- वृत्तियोसे ही उनकी सिद्धि होती है । वह वृत्तियाँ परस्पर भिन्न शब्दादि विषय विशेषणवाली होती हैं, अतः नीलपीताद्याकारवाली वृत्तियो या ज्ञानोंकी भी स्वतः सिद्धि नहीं हो सकती । जबतक नीलपीतादि बाह्याकार न होगे तबतक बाह्याकार- प्रत्यय उत्पन्न ही नहीं हो सकते । इस तरह प्रत्यय भी संहत होनेसे अचेतन ही ठहरते हैं। इस दृष्टिसे स्वरूपभिन्न ग्राहकसे ही प्रत्यय भी ग्राह्य होगे । जो असहत होकर चैतन्यात्मक है, वही स्वार्थ हो सकता है । अन्य संहत अचेतन वस्तु परार्थ ही होते हैं । नील-पीताद्याकार ज्ञानोंका उपलब्ध्वा आत्मा विक्षेपवान् है, ऐसा सशय होता है । परतु इसका समाधान यह है कि परिणामी चित्तादि क्रमसे ही स्वविषयोके ग्राहक होते हैं, परंतु कूटस्थ आत्मा अक्रमेण सभी प्रत्ययोका
मार्क्स और आत्मा ६९३ उपलम्भ करता है । अतएव अपरिणामिता सिद्ध होती है । अशेषचित्त प्रचारकी उपलब्धि कूटस्थताका निश्चायक है । यदि कूटस्थ आत्मा परिणामी होता तो अशेष स्वविषयचित्त प्रचारका साक्षी न होता, जैसे चित्त किंवा इन्द्रियाँ अपने विषयोके एक देशका ही उपलम्भ करते हैं, इस तरह आत्मा अपने विषयोके एक देशका उपलम्भ नही करता, किंतु अशेष प्रत्ययोकी उपलब्धि आत्मासे होती है, अतः वह अपरिणामी ही है । कहा जा सकता है कि उपलब्धि धात्वर्थ क्रिया ही है, फिर उपलब्धि- क्रियाका कर्ता विक्रियावान् ही है । उपपूर्वक लभ धातुसे कर्तामें तृच् प्रत्यय करनेपर उपलब्धा शब्द बनता है । धात्वर्थ सर्वत्र क्रिया ही होता है । क्रिया स्वयं उत्पत्ति-विनाशशील होती है, अतः उपलब्धि भी क्रिया ही है, अतः उत्पत्ति विनाश उसका भी मानना ही चाहिये, फिर वह नित्य कैसे कहा जा सकता है । इसका समाधान यह है कि 'धात्वर्थ सर्वत्र क्रिया ही होता है और कर्ता ही प्रत्ययार्थ होता है, यह नियम सार्वत्रिक नहीं, क्योकि 'गडि वदनैकदेशे' इस गडि धातुसे गण्ड बनता है । जो कि मुखैकदेश कपोलका ही बोधक है । इसी तरह 'सविता प्रकाशते' 'सविता प्रकाशयति' 'सविता प्रकाशमान है या घटादिका प्रकाशक है,' यहाँपर सविता किसी प्रकाश क्रियाका कर्ता नही है, क्योकि प्रकाश उसका स्वरूप ही है । उसके निर्विकार रहते हुए ही उसके सन्निधानमात्रसे अन्य वस्तुओका प्रकाश होता है । बुद्धिजन्य वृत्तिरूप बौद्ध प्रत्यय ही क्रिया या विक्रिया है । वही धात्वर्थ है । आत्माकी स्वरूपभूत नित्य उपलब्धिमें विक्रिया- का उपचार होता है । जैसा कि सूर्यके स्वरूपभूत प्रकाशमें भी विक्रियात्वका उपचार होता है ।' कहा जा सकता है कि 'बुद्धि द्रव्य है, उसका परिणाम वृत्ति भी मृत्तिका- परिणाम घटादिके तुल्य द्रव्य ही है । उसे भी क्रिया नही कहा जा सकता । परंतु मृत्तिकादि अपने पूर्वरूपको तिरोहित करके घटादिके रूपमें परिणत होते हैं ।' पर यहाँ तो तृणजलूका ( जोक ) एव प्रकाशके तुल्य संकोच-विकासरूप ही क्रिया है । ऐसा परिणाम तो परिणामिकी चेष्टारूप ही है । इसी तरह बुद्धिका परिणाम ही वृत्ति है, वही क्रिया है । उस वृत्तिपर अभिव्यक्त बोध प्रतिबिम्ब नित्य बोधरूप बिम्बके तुल्य ही होता है । इसीलिये चिच्छायापन्न वृत्तिके क्रिया होनेसे नित्यबोधमें भी क्रियात्वका आरोप होता है । लोकमे अर्थ-प्रकाश ही उपलब्धि- शब्दार्थ प्रसिद्ध है । वह अर्थ-प्रकाश अर्थका धर्म नहीं हो सकता, क्योकि वह तो जड है, स्वतः स्फूर्तिरहित होना ही जडताका लक्षण है । अन्तःकरणका भी धर्म प्रकाश नही कहा जा सकता, क्योकि वह तो प्रकाशकरण ( असाधारण कारण ) है, अतः वह भी चैतन्यरूप प्रकाशका आश्रय नहीं हो सकता । फिर भी
६९४ मार्क्सवाद और रामराज्य स्वयं प्रकाशमान चैतन्य आत्मामें अहंरूपसे अन्तःकरणका अध्यास होता है। वह कभी भी अप्रकाशित होकर नहीं रहता । वही आत्मचैतन्य व्याप्त अन्तःकरण विषयवृत्तिको उत्पन्न करता हुआ उपलब्धा कहलाता है, वही कर्ता और प्रमाता भी कहलाता है । जैसे लोह पिण्डमें दाहकत्व-प्रकाशकत्वका व्यवहार होता है वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये । अखण्ड बोधस्वरूप आत्माका आकाशवत् अविक्रिय होनेपर भी तादृक् अन्तःकरणगत चिदाभासके अविवेकसे अन्तःकरणके धर्मों एवं उसकी अवस्थाओंसे युक्त होकर प्रतीत होने लगता है । जैसे अग्नि निराकार होनेपर भी काष्ठोंपर प्रकट होती है वैसे ही त्रिकोण-चतुष्कोण मोटा-पतला-सा प्रतीत होता है और अग्निका उत्पन्न होना, नष्ट होना भी उसी काष्ठादि उपाधिसे प्रतीत होता है । इसी तरह विकारी अन्तःकरणमें कर्तृत्व होनेपर भी उपलब्धिमें उत्पद्यमानता नहीं होती । अतः उपलब्धिस्वरूप आत्मा निर्विकार कूटस्थ ही है। कहा जा सकता है कि 'जैसे छिदिक्रियासाध्य द्वैधीभावरूप फल विक्रिया है, उसी तरह उपलब्धिरूप फल भी साध्य ही है, अतः वह भी विक्रिया ही है ।' परंतु वस्तुतः स्वरूपसे उपलब्धि फल ही नहीं है, वृत्तिव्याप्त घटादि विषयोंपर व्यक्त चित्प्रतिबिम्ब ही फल है । नित्यौपलब्धिस्वरूप आत्मामें उसीके अविवेकसे फलत्वका व्यपदेश होता है, अतएव यहाँ उपलब्धि एवं उपलब्धामें भेद नहीं हैं । उपलब्धि-स्वरूप ही आत्मा है। यह उपलब्धि नित्य है, विक्रिया नहीं है । विक्रियारूप उपलब्धि चैतन्यव्याप्त बुद्धिवृत्ति है । उससे अविवेकके कारण ही नित्योपलब्धिमें फलत्वका व्यवहार होता है । इसीलिये उपलब्ध्याभासावसान ही उपलब्धिका धात्वर्थ है । उसी नित्योपलब्धिस्वरूप आत्मामें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति-तीनो ही अवस्थावाला अन्तःकरण भासित होता है । तीनो ही अवस्थाएँ आगन्तुक हैं । उपलब्धिस्वरूप आत्मा सर्वत्र अव्यभिचरितरूपसे विद्यमान रहता है । सुषुप्तिमें भी कुछ नहीं देखा, इस प्रकार सर्वाभावकी उपलब्धि होती ही है। जाग्रदादिमे भी प्रमाता स्वतःसिद्ध होता है । वही स्वयं प्रमाणद्वारा प्रमेयोंको जानता है । प्रमाताका भी भासक अखण्डबोध आत्मा स्वतःसिद्ध है । लोह-जल आदिमें दाहकत्व-प्रकाशकत्व लानेके लिये अग्निकी अपेक्षा होती है, किंतु अग्निमें दाहकत्व-प्रकाशकत्व लानेके लिये अन्य अग्नि आदिकी अपेक्षा नहीं होती । वही स्वतःसिद्ध संवित् आत्मा है। वृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्य प्रमाण है, वृत्तिमदन्तः- करण प्रतिबिम्बित चैतन्य प्रमाता है। प्रमेयप्रकाशकालमें वे दोनों ही प्रकाशित रहते हैं। उनका प्रकाशक कोई अन्य प्रमाता या प्रमाणान्तर माननेमें अनवस्था आदि दोष आते हैं, अतः स्वयंज्योतिः आत्माको ही तीनोंका भासक मानना ठीक है। कहा जा सकता है कि 'संवित् या बोध प्रमाणके फलरूपसे ही प्रसिद्ध है, फिर वह नित्य कैसे हो सकता है ?' परंतु यह ठीक नहीं; कारण, वृत्तिप्रतिबिम्बित
मार्क्स और आत्मा ६९५ अवगति ही अनित्या है, वही प्रमा है, वही प्रमाणफल है, विम्बभूत अवगति नित्य ही है। यदि अवगति नित्य है, तब तो प्रमाण व्यापार व्यर्थ होगा और अनित्य है तो प्रमाण व्यापार आवश्यक होगा । परंतु प्रमाताकी अवगति तो प्रमाण- निरपेक्ष स्वतःसिद्ध है ही। यदि प्रमाताको आत्मसिद्धिमें प्रमाणकी अपेक्षा हो तो किसे प्रमित्सा होगी, यह भी विचारणीय है। जिसे प्रमित्सा होती है, वही प्रमाता होता है। प्रमित्सा प्रमेयविषयक ही होती है, प्रमातृविषया नहीं । प्रमातृविषयक प्रमित्सा होनेसे अनवस्था-दोष भी होता है। प्रमाताकी प्रमित्सा अव्यवहित होनेसे प्रमातृविषया नहीं हो सकती । लोकमें प्रमाताकी इच्छा, स्मृति, प्रयत्न एवं प्रमाणजन्यके अनन्तर प्रमेय सिद्ध होता है। प्रमेय-विषया-अवगति अभीष्ट होती है। स्वयं प्रमाता अपनेसे या अन्य इच्छादिसे व्यवहित नहीं हो सकता । स्मृति भी स्मर्तव्यविषया होती है, स्मर्तृविषया स्मृति नहीं होती । इसी तरह इच्छा भी इष्टविषया होती है, इच्छावद्विषया इच्छा नहीं होती । यदि स्मृति एवं इच्छा स्मर्ता एवं इच्छावान्को विषय करे तब इसमें भी अनवस्था-दोष आयेगा । स्मृति, इच्छा, प्रयत्न एवं प्रमाण जन्मके अनन्तर ही स्मर्तव्य, इष्यमाण, प्रयत्नितव्य एवं प्रमेयका व्यवहार हो सकता है। कहा जा सकता है कि 'प्रमातृविषयक अवगति-उपपत्ति उपपन्न न होनेसे आत्मा अनवगत ही रहेगा', परंतु यह कहना ठीक नहीं। अवगन्ताकी अवगति अवगन्तव्यविषयक होती है, अवगन्तृविषयक अवगति नहीं होती । यदि ऐसा होगा तो अनवस्था-प्रसङ्ग होगा । आत्माकी अवगति स्वरूपभूत ही है अर्थात् अवगन्ताकी अवगति उत्पन्न नहीं होती । अग्निकी उष्णता और प्रकाशके तुल्य ही आत्माका स्वभाव ही अवगति है। 'अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः' 'आत्मैवास्यज्योतिः' 'एषोऽस्य परमो लोकः' 'न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते' (बृहदा० उप० ४।३।३०) इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार आत्माकी स्वरूपभूत ज्योति है। चैतन्यात्मज्योतिकी अवगति अनित्य है ही नहीं । असंहत, स्वप्रकाश एव अपरार्थ ही आत्मा है। यदि आत्मा- की अवगति अनित्य होगी तो उत्पत्तिसे प्रथम एव प्रध्वंससे ऊर्ध्व उसका अभाव कहना पड़ेगा । फिर आत्माकी अपरार्थता आदि सभी बाधित होंगे । अवगति प्रमा है, वह स्मृति इच्छादिपर्णिता अनित्या है, आत्मा स्वरूपभूत नित्य है। जैसे तिष्ठति शब्द अचलत्व-अर्थमें प्रयुक्त होता है, जङ्गम पदार्थ गतिपूर्वक अचल होते हैं; आकाश-पर्वतादि स्थावर पदार्थ सदा ही अचल रहते हैं, दोनोंमें ही तिष्ठति शब्दका प्रयोग होता है । 'तिष्ठन्ति मनुष्याः, तिष्ठन्ति पर्वताः, तिष्ठत्याकाशः' उसी तरह अनित्य अवगति एव नित्य आत्मस्वरूप-अवगतिमें भी प्रमात्व- व्यवहार बन जाता है । फलस्वरूप प्रमामें कोई अन्तर नहीं । प्रमाण फल ही प्रमा है । वह प्रमातृगतचित्स्वरूप प्रकाश ही है । यद्यपि वृत्तिव्याप्त विषयस्य- चित्प्रतिविम्ब ही फल है तथापि 'मयेदं विदितम्' मैंने यह जाना, इस तरह प्रमाण-
६९६ . मार्क्सवाद और रामराज्य प्रमेयसम्बन्ध आत्मामें प्रतीत होता है, अतः प्रमातृगतचित्प्रकाशसे सम्बन्ध मानना ही पड़ता है । जड अन्तःकरण यद्यपि व्यापारका आश्रय हो सकता है तथापि वह चित्का आश्रय नहीं हो सकता । चिदात्मा कूटस्थ होता है, अतः वह व्यापारका आश्रय नहीं हो सकता । इसीलिये वह प्रमाके प्रति कर्ता भी नहीं हो सकता और मुख्यवृत्तिसे जड-अजड कोई भी प्रमाता नहीं बन सकता । अतः परस्पराध्याससे ही आत्मा ही बाह्य-विषयका भी प्रमाता बनता है । फिर स्वात्मामें स्वयंप्रकाश होनेसे प्रमातामें कोई शङ्का ही नही । अतएव अनवगत होने या प्रमाणकी अपेक्षा रखनेकी कोई कल्पना ही नही हो सकती । अर्थात् कूटस्थ नित्य आत्मज्योतिमे ही अन्तःकरणादि-उपाधिद्वारा औपाधिक ही प्रमातृत्व होते हैं । प्रमाणसापेक्ष शब्दादि सभी अचेतन, संहत एवं अनात्मा हैं । अवगति स्वयं अन्यानपेक्ष स्वतःसिद्ध है, वही आत्मा है । उसमे भी सोपाधिक अवगति अनित्य है, निरुपाधिक नित्य है । यद्यपि कहा जा सकता है कि ‘मै मनुष्य हूँ, जानता हूँ’ इस व्यवहारमें प्रत्यक्षादि प्रमाणकी अपेक्षा नहीं रहती है, तथापि मृति, सुषुप्ति आदिमें देहसिद्धिके लिये भी प्रमाणकी अपेक्षा होती ही है । उसकी भी अवगति कूटस्थ, स्वयंसिद्ध आत्मज्योति ही है । अवगतिसे भिन्न देहादि, ग्राह्य, ग्राहक, करणादि रूपसे भूत ही परिणत होते हैं । अवगति यद्यपि स्वयं नित्यसिद्ध है तथापि प्रमाणजन्य प्रत्यक्षादि वृत्तिरूप प्रत्ययकी अनित्यतासे ही तदभिव्यक्त अवगतिमें भी अनित्यता एवं प्रमाणफलताका व्यवहार होता है । सभी वृत्तियाँ परस्पर व्यभिचरित होती हैं । बोध, स्फुरण उनमें एक रूपसे ही समान होता है, अतः वही स्फुरण, बोध या अवगति नित्य एकरस हैं । जैसे स्वप्नके नील-पीतादि प्रत्यय-भेद व्यभिचरित होनेसे असत्य हैं, अवगति ही सत्य है, वैसे ही सर्वत्र प्रत्ययोमें भिन्नता होनेसे मिथ्यात्व है । बोधमात्र ही अभिन्न एव एक है । उस अवगतिका अवगन्ता अन्य कोई नहीं है । वह स्वयं नित्य है । उसका हान या उपादान नहीं हो सकता । जैसे शब्दादि, लोष्ठादि ज्ञेय हैं, ज्ञात नही, उसी तरह भूतपरिणाम देहादि भी ज्ञेय ही हैं, ज्ञाता नहीं । जो वस्तु स्वतःसत्तास्फूर्तिवाली नहीं है वह जड है, उसे सत्तास्फूर्ति देनेवाला ही चेतन है । वही ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ है । ज्ञाता आत्मा, ज्ञेय अनात्मा, इदमंश अनात्मा है, द्रष्टा अनिदमंश ही आत्मा है । अहमर्थमें भी दृश्य अहं इदमंश ही है, दृक् आत्मा ब्रह्म है । जैसे सौरालोकमें स्फटिकादि मणियोंपर जपाकुसुमादिकी रक्ताद्याकारता प्रतीत होती है, उसी तरह स्वप्रकाशबोधरूप आत्मप्रकाशमे ही बुद्ध्यादिमें विषयाकारताकी प्रतीति होती है । जैसे सौरालोकसे ही स्फटिक एवं रक्ताद्याकारता दोनों ही भासित होती हैं, वैसे ही नित्य-बोधसे ही बुद्ध्यादि एवं विषयाकारता दोनो ही भासित होती हैं ।
मार्क्स और आत्मा ६९७ बुद्धि होनेपर बुद्ध्यारूढ पदार्थ दृश्य होते हैं । निद्राकालमें बुद्धि विलीन होनेपर दृश्य उपलब्ध नहीं होता, परन्तु द्रष्टा तो सदा एक सा ही रहता है । अविवेकसे बुद्धि सर्वसाक्षीका अभाव समझती है । विवेकसे स्वप्रकाश सर्वसाक्षीसे भिन्न बुद्धि अपने आपको भी नहीं समझती । ब्रह्मादिस्थावरान्त प्राणी अखण्ड- बोधस्वरूप आत्माके पुर ही हैं, फिर भी वह आत्मा सर्वभासक भान सर्वभूतोंसे असम्पृष्ट ही रहता है । जैसे निर्विकार आकाशको बालकलोग नीला समझते हैं, वैसे ही सर्वभासक भान निष्प्रपञ्च होते हुए भी सप्रपञ्च-सा प्रतीत होता है । सर्व- प्राणि-बुद्धियाँ भी उस अखण्डभानके पूर ही हैं । जो भी पदार्थ उत्पत्तिमान् हैं और ज्ञान विक्षेप हैं, वह स्वप्नवत् ही हैं । नित्यनिर्विषय ज्ञान सर्वविनाशसाक्षी स्वतन्त्र ही है । ज्ञाताकी स्वरूपभूता ज्ञप्ति नित्य है, सुषुप्तिमें जो आत्मा शब्दादि- को नहीं जानता वह जानता हुआ ही नहीं जानता । अन्य ज्ञेय नहीं है, इसलिये नहीं जानता है, स्वरूपभूत ज्ञप्ति तो रहती है । विज्ञाताकी विज्ञातिका कभी भी विलोप नहीं होता— 'यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।' (वृहदा० उप० ४।३।२३) जाग्रदादिकालकी जो घटादि-ज्ञप्ति होती है, वह तो भ्रान्ति ही है । फिर भी सभी बुद्धिवृत्तियाँ स्फुरणसे व्याप्त ही होती हैं, अतः सर्ववृत्तियोकी उत्पत्ति, स्थिति, विनाशका साक्षीस्फुरण सर्वत्र एकरस ही रहता है । जागर, स्वप्नमें विषय, समकालमें सुप्ति, समाधि आदिमें विषयाभाव सभी कालमें स्फुरण रहता है, अतः वह शुद्ध है । शुद्ध दृशि ही अमर आत्मा है, जैसे दर्पणादिमें मुखका प्रतिबिम्ब होता है, तब दर्पणादिगत दोषोंका मुखमे आरोप किया जाता है, उसी तरह दृशिका अहङ्कारमें प्रतिबिम्ब होनेसे अहङ्कारगत दोषोका दृशिमें आरोप किया जाता है। श्रुत्यादिसे विज्ञाति अर्थात् अनित्य विज्ञातिका विज्ञाता नित्यबोध नित्यदृशिस्वरूप आत्मा विदित होता है । उस दृशिस्वरूपमें ज्ञान-अज्ञान—दोनों ही कल्पित होते हैं। विज्ञातिका विज्ञाता शुद्ध विज्ञाता ही है, वह विज्ञेय नहीं होता । आत्मा अलुप्तदृक् है । अनित्य बुद्धिवृत्तिरूप दृष्टिके कारण इसमे जन्यताकी प्रतीति होती है । जैसे व्यञ्जक आलोक व्यङ्ग्यकी आकारताको प्राप्त होता है, उसी तरह शुद्ध नित्य ज्ञान- स्वरूप ज्ञाता स्वभास्य प्रत्ययोंके आकारका प्रतीत होता है । जैसे दीप बिना यत्नके ही उपस्थित विषयोंको एव विषयाकारवृत्तियोंको भी प्रकाशित करता है, जैसे ज्योति अन्यका द्योतक होनेपर भी अपना प्रकाशक नहीं होता, वैसे ही ज्ञानस्वरूप आत्मा अन्यका भासक होनेपर भी आत्मभासक नहीं होता । जैसे अग्नि अपना दहन- प्रकाशन नही करता, वैसे ही आत्मा अपना प्रकाशन नहीं करता । फिर भी जैसे रविके स्वात्म-प्रकाशके लिये अन्य ज्योतिकी अपेक्षा नहीं होती, उसी तरह बोध- स्वरूप आत्माको स्वात्मप्रकाशके लिये अन्यबोधकी अपेक्षा नहीं होती । जो
जिसका स्वरूप होता है, उसे उसकी अपेक्षा नहीं होती। जैसे प्रकाश प्रकाशान्तरसे दृश्य नहीं होता, प्रकाशके समागमसे अप्रकाश स्वरूपकी व्यक्ति होती है, परन्तु प्रकाशस्वरूप सूर्यकी व्यक्ति प्रकाश-समागमकी अपेक्षा नहीं रखती। जैसे प्राणी प्रकाशस्थ देहको सप्रकाश मानता है, उसी तरह चेतन द्रष्टासे प्रकाशित चित्तको सप्रकाश मानकर 'अहं द्रष्टा' ऐसा व्यवहार करने लगता है। प्राणी इसी तरह सभी दृश्य पदार्थोंके साथ अपना अभेद समझकर आत्माको तत्तद्दृश्यविशिष्ट मानने लगता है। जैसे स्वप्न और स्मृतिमे घटादिका आकार भासित होता है, अतः अनुभवावस्था में घटाद्याकारका आभास माना जाता है। अतः स्वप्न, स्मृतिमें बाह्यार्थके बिना ही विषयाकारवृत्तिमदन्तःकरण ही प्रतीत होता है। इसी तरह स्वप्नमें सिंहासनारूढ देह दृश्य होता है, द्रष्टा स्वयं वह नहीं है। उसी प्रकार जाग्रत्कालमें भी दृश्य देहसे द्रष्टा भिन्न ही है। जैसे मूर्ति आदिके साँचेमें डाला हुआ द्रवीभूत ताम्रादि साँचेके आकारका ही हो जाता है, जैसे व्यञ्जक-आलोक व्यङ्ग्यके आकारका बन जाता है, उसी तरह सर्वार्थव्यञ्जक बुद्धि सर्वार्थाकार हो जाती है। अर्थाकार बुद्धि ही द्रष्टा अखण्डबोधरूप आत्मासे दृष्ट होती है। वही स्वप्नके दृशिस्वरूप आत्मासे दृश्य होती है। अखण्ड दृशिस्वरूप बोधसे ही सर्वदेहोंकी बुद्धियाँ भासित होती हैं। जैसे घटादि प्रकाश सम्पर्कसे 'घट. प्रकाशते' इस रूपसे प्रकाशके कर्त्ता होते हैं, वैसे ही सूर्यादि प्रकाश प्रकाशान्तर-सम्पर्कके बिना ही 'सूर्यः प्रकाशते' इस तरह सूर्य प्रकाशका कर्त्ता कहा जाता है। इसी तरह बुद्धयादि अखण्डबोधके सम्पर्कसे प्रकाशित होते हैं, परन्तु अखण्डबोध स्वतः ही प्रकाशित होता है। जैसे सूर्यमे सत्तामात्रसे प्रकाशकर्तृत्वका व्यवहार होता है, उसी तरह दृशिस्वरूप आत्मामें सन्निधानमात्रसे प्रकाशकत्वका व्यवहार होता है। जैसे बिलसे निकलनेपर सूर्यकी सत्तामात्रसे सर्पादि भासित होते हैं, सूर्यमे किसी कर्तृत्वादि विकारकी आवश्यकता नहीं पड़ती, इसी तरह दृश्यके उपस्थित होनेपर दृशिस्वरूप आत्मासे दृश्यका प्रकाश होता है, एतदर्थ उसमें कर्तृत्वादि विकारकी अपेक्षा नहीं होती। इसी प्रकार दाह्यका संनिधान होनेपर उष्णस्वरूप अग्निमे दाहकत्वका व्यवहार होता है। इसी तरह प्रयत्न बिना भी बोधस्वरूप आत्मा ज्ञाता, बोद्धा आदि कहा जाता है। वस्तुतः आत्मा विदित-अविदित—दोनोंसे ही अन्य है। जैसे प्रकाशस्वरूप सूर्यमें दिन-रात नहीं होते, वैसे ही बोधस्वरूप आत्मामें बोध, अबोध नहीं होते। अतएव बौद्धों-जैसी इस अखण्डबोधमें स्वसंवेद्यता भी नहीं है। साथ ही बोधको शून्य भी नहीं कहा जा सकता; क्योकि जैसे घटादि दृश्य हैं, वैसे ही बुद्धि भी साक्षिभास्यरूपसे स्पष्ट प्रतीत होती है। जैसे घटादि विकल्प कार्य निर्विकल्प-कारणपूर्वक होते हैं, उसी तरह बुद्धि आदि सविकल्प सप्रकाश निर्विकल्प-प्रकाशपूर्वक होने ही चाहिये।
बौद्ध क्षणिक ज्ञानको ही आत्मा कहते हैं । जैसे दीपमें 'स एवायं दीपः', यह वही दीपक है, इस प्रकार प्रत्यभिज्ञा ( पहचान ) से सादृश्यमूलक एकत्वकी भ्रान्ति होती है । उसी तरह क्षणिक ज्ञानोंकी धारामें ही सादृश्यके कारण 'स एवाहम्' मैं वही हूँ, इस प्रकार एकत्वकी भ्रान्ति होती है । बाह्याकार भी क्षणिक ज्ञान ही है, परंतु यह सब कहना ठीक नहीं । कारण कि ज्ञेयकी उत्पत्तिके पहले उसका ज्ञान सम्बन्ध कैसे होगा । ज्ञान उत्पन्न होते ही नष्ट होता है तब उसका ज्ञेयके साथ सम्बन्ध कैसे होगा ? ज्ञेयको प्रत्यक्षताका अनुभव होता है, फिर उसे अनुमेय माननेवाला पक्ष भी असङ्गत ही है । अनुभविता भी यदि क्षणिक ज्ञान ही है तब स्मृति भी कैसे सम्पन्न होगी ? अन्य अनुभूतका अन्य स्मरण कर नहीं सकता । यदि कोई स्थायी आत्मा हो, तभी ज्ञानसे संस्कार उत्पन्न हो तभी स्मृति हो सकेगी । संस्कारका स्थायी आधार न होनेसे ही पूर्वापरकी तुल्यताका ग्रहण सम्भव नहीं होता । अतः सादृश्यमूलक एकत्वकी भ्रान्ति भी नहीं कही जा सकती । क्षणिक विज्ञान व्यक्तियोंसे अतिरिक्त विज्ञान- [L14
७०० मार्क्सवाद और रामराज्य बन सकता, इसलिये भी सुख ज्ञानग्राह्य नहीं हो सकता । यदि कहा जाय कि सुख-दुःखादि ज्ञानग्राह्य मत हो, तो यह भी ठीक नहीं; कारण, 'सुखं मया ज्ञातम्' 'दुःखं मया ज्ञातम्' इस रूपसे सुख-दुःखकी स्मृति सुख- दुःखके अनुभवको बोधित करती है । जो कहा जाता है कि 'ज्ञान-विशिष्ट आत्मामें समवेत होनेसे सुखादिका भान होगा', यह भी ठीक नहीं । कारण, एक कालमें आत्मा अनेक विशेष गुणोंका समवायी नहीं हो सकता । एक असमवायी- कारण आत्ममनः संयोगसे एक ही कार्य उत्पन्न होनेका नियम मान्य है । यदि ज्ञान-विशिष्ट आत्म-समवेत होनेसे सुखादिका ग्रहण हो तब तो आत्मगत संख्या परिमाणादिका भी ग्रहण होना ही चाहिये । यदि कहा जाय कि 'सुख, दुःख, ज्ञानादिका आत्माके गुण या धर्म होनेसे आत्माद्वारा ही प्रकाशित होना ठीक है', वह भी ठीक नहीं; कारण, नैयायिकोंका आत्मा प्रकाश- स्वरूप नहीं है । फिर उससे सुखादिका प्रकाश कैसे होगा ? नैयायिक आत्माको व्यापक और नित्य भी मानते हैं, अतः ज्ञान, सुखादि उसके विकार नहीं हो सकते । व्यापक, नित्यको विकारी कहना भी असङ्गत ही है । अतः आत्मा न तो ज्ञानादि गुणवाला ही सिद्ध होता है और न गुण-गुणीमें ग्राह्य-ग्राहकभाव ही बन सकता है । फिर सभी अनेक व्यापक आत्मामें आत्ममनः-संयोग समान ही है । अतः एक आत्माके सुखादिसे सभी आत्माओंको सुखादिमान् कहना पड़ेगा । अदृष्टादि भी किस आत्मामें हैं, किसमें नहीं, इसका निर्णय अशक्य होगा । अतः सुख-दुःख एवं वृत्तिरूप ज्ञानादि स्वप्रकाश व्यापक आत्मासे भास्य मानना ही युक्त है । वही आत्मा नित्य-बोध है । ज्ञानको ज्ञेय माननेसे अनवस्थित ज्ञानमाला अनिवार्य होगी । यह भी विचारणीय है कि विषय-प्रकाश-कालमें विषय-प्रकाशक ज्ञान भासमान होता है या नहीं, यदि नहीं तो विषय स्वयं भासित होता है या ज्ञानाधीन होकर भासित होता है, यह निर्णय नहीं हो सकेगा । अतः विषय-प्रकाश-कालमें ही प्रकाशक ज्ञानका भानस्वरूप ज्ञानान्तर मानना चाहिये । यदि वह ज्ञान भी भासमान नहीं है तो उसके द्वारा पूर्व ज्ञानका भान नहीं बनेगा । फिर उस ज्ञानके भानके लिये भी ज्ञानान्तर मानना पड़ेगा । 'पूर्व-पूर्व ज्ञान उत्तरोत्तर ज्ञानसे भासित होंगे', यह पक्ष भी सम्भव नहीं है । क्योंकि प्रथम ज्ञान उत्पन्न होनेके अनन्तर मनमें क्रिया उत्पन्न होगी, उससे विभाग होगा, तब पूर्व संयोग नाश होगा, पुनः दूसरा संयोग उत्पन्न होगा, तब ज्ञानान्तर उत्पन्न होगा । इस तरह बहुक्षणविलम्बसे जब उत्तर ज्ञान उत्पन्न होगा तब पूर्वज्ञान रहेगा ही नहीं, फिर उसका भान कैसे होगा । यदि इन सब दोषोंसे बचनेके लिये एक ही आत्म-मनःसंयोगसे दो ज्ञान या अनेक ज्ञानकी उत्पत्ति मानी जाय तब तो एक ही आत्म-मनः-संयोगसे युगपत् संनिकृष्ट रूप, रस, गन्धादिका भी समकालमें ही ज्ञान होना चाहिये । संस्कार-उद्बोध होनेपर
उसी समय स्मृतियों भी उत्पन्न होनी चाहिये, परंतु यह सब सिद्धान्तविरुद्ध होगा। नैयायिकोंके सिद्धान्तमे न तो अनुभव एवं स्मृतियोंकी समकालता मान्य है और न तो विशेष गुणोंकी समकालता ही मान्य है 'युगपज्ज्ञानानुपपत्तिर्म- नसो लिङ्गम्' (न्यायदर्शन १।१।१६) एक कालमें अनेक ज्ञानोंका न उत्पन्न होना अणुपरिमाण मनके होनेमें लिङ्ग है । इसलिये दीर्घशष्कुली (पापड) खाते समय समकालमें शब्द, स्पर्श, रूप रस, गन्धकी अनुभूतिको भी नैयायिक क्रमिक ही मानते हैं । यदि ज्ञान या चैतन्य आत्माका स्वरूप-लक्षण माना जाय तो जैसे गन्धादि पृथ्वीका लक्षण है, वैसे ही ज्ञान आत्माका लक्षण हुआ, फिर तो जैसे गन्धादि पृथ्वी आदिका स्वरूप ही है, वैसे ही ज्ञान भी आत्माका स्वरूप ही ठहरता है । फिर 'अनित्य ज्ञानवाला आत्मा है', यह कथन व्यर्थ ही है । यदि ज्ञान आत्माका तटस्थ लक्षण है तो आत्माका स्वरूप लक्षण भी बतलाना चाहिये । पर वह चेतनातिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं हो सकता । अतः देहादि-जड़-विलक्षण ही आत्मा है, यह कहना पड़ेगा । तथा च निर्विशेष चिद्रूप ही आत्मा हुआ । बोधस्वरूप आत्म-ज्योतिसे दीप्त होकर बुद्धि भ्रान्तिसे अपनेमें ही बोध मानती है । 'अन्य साक्षी बोद्धा नहीं है, मैं ही बोद्धा हूँ', यह बुद्धिका भ्रम ही है । बुद्धि आगन्तुक है, किंतु बोध तो सुषुप्तिमें बुद्धिके न रहनेपर भी रहता है । अतः अविवेकसे ही बुद्धिमें बोधरूपताकी भ्रान्ति होती है । स्वप्नके सभी वेद्य- प्रपञ्चको इसी बोधमे जाना जाता है । क्योंकि स्वप्नमें आदित्य, चन्द्र, चक्षु, वाक् आदि सभी ज्योतियाँ लुप्त होती हैं, मन स्वयं वेद्यरूपसे ही परिणत है । भासक ज्योति आत्मासे भिन्न होकर कुछ भी नहीं है । अतएव स्वप्नमें जिसमें रूपदर्शन, शब्दश्रवण, वाग्व्यवहार होता है वह चक्षु, श्रोत्र, मन एवं वाक् आदि, आत्मज्योति ही है,—'सा श्रोतु श्रुतिर्यया स्वप्ने शृणोति । सा वक्तुर्वक्तिर्यया स्वप्ने वदति।' जैसे एक ही स्फटिक मणिमें नील, पीत, हरित उपाधिके भेदसे अनेक रूप परिलक्षित होते हैं, उसी तरह एक ही नित्य ज्ञान स्वप्नकल्पित शब्दादि अनेक उपाधिभेदसे श्रुति, मति, विज्ञाति आदि रूपमें प्रतीत होता है । इसी चिद्रूप ज्ञानका ही विकल्प जाग्रत् भी है । अज्ञानोपाधिक ज्ञानस्वरूप आत्मा बुद्धिकी कल्पना करता है । बुद्धिसे उपहित होकर बुद्धिस्थ अर्थका ही व्याकरण करता हुआ उनका प्रकाशक वही ज्ञानस्वरूप आत्मा सर्वव्यवहार- भागी होता है । जैसे स्वप्नका व्यवहार, ठीक वैसा ही जाग्रत्का भी व्यवहार होता है । फिर भी शुद्धचित्तमें निर्विकल्प नित्यज्ञानका साक्षात्कार होता है । बाह्येन्द्रियोंसे विषयोपलम्भ जागर है । संस्कारवशात् निद्राकालमें प्रतीत प्रपञ्च-
स्वप्न एक प्रकारकी स्मृति है। दोनोंहीका अभाव सुषुप्ति है। तीनोंका ही साक्षी नित्य ज्ञान है। सुषुप्तिका तम ही जागर, स्वप्नका बीज है। स्वात्म-प्रबोधसे बीज दग्ध होनेपर अनन्तज्ञान निष्प्रपञ्चरूपसे भासित होता है। जैसे अदृश्य भी राहु चन्द्रविम्बपर उपरक्त होकर दृश्य होता है, जैसे जलमें चन्द्रादिका प्रतिबिम्ब लक्षित होता है, वैसे ही शुद्ध बुद्धिपर ही निर्विकल्प-बोध लक्षित-होता है। जैसे जलमें भानुका बिम्ब एवं उष्णता प्रतीत होनेपर भी वह जलका धर्म नहीं, किंतु भानुका ही धर्म है, उसी प्रकार बुद्धिमें बोध लक्षित होनेपर भी बोध बुद्धिका धर्म नहीं है। जैसे जलका शैत्य एवं अप्रकाश धर्म निश्चित है, वैसे ही बुद्धिका भी जडत्व धर्म निश्चित है। अतः जैसे जलमें प्रतीत होते हुए भी उष्णता और प्रकाश भानुका ही धर्म है, वैसे ही बुद्धिमें स्फुरण या बोध प्रतीत होनेपर भी आत्माका ही स्वरूप है। चक्षुके द्वारा रूपाकारवृत्तिका अवभासन करता हुआ साक्षी अलुप्तदृक् रहता है। वही दृष्टिका द्रष्टा, श्रुतिका श्रोता है। केवल मानसी वृत्तिका भासन करता हुआ वही मतिका मन्ता कहा जाता है। वह विज्ञातिका विज्ञाता है। उसीके सम्बन्धमें श्रुतिने कहा है— न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येः, न श्रुतेः श्रोतारं शृणुयाः, न मतेर्मन्तारं मन्वीथाः ॥ ‘मतिका मन्ता है’ यह कहनेपर भी उसमें मन्तृत्वादि विकार नहीं होते। बुद्धि आदिके ही व्यापारसे केवल तद्भासकमें मन्तृत्वादिकी प्रतीति होती है। सुषुप्तिमे भी ज्ञस्वरूप बना ही रहता है। केवल दृश्य न होनेसे विशेष दर्शनादिका अभाव रहता है। घटादि बाह्य वस्तु दृष्टिसे व्यवहित होता है अतः परोक्ष है। आत्मा तो दृष्टिका भी आत्मा है, अतः आत्मा अपरोक्ष है। श्रुतिमे भी ब्रह्मात्माको साक्षात् अपरोक्ष कहा गया है—'यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' (बृहदा० उप० ३।४।१) जैसे दीपको स्वात्मप्रकाशमें दीपान्तरकी अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही बोधस्वरूप आत्माको भी स्वात्म- प्रकाशमें बोधान्तरकी अपेक्षा नहीं है। उसी स्वयंज्योति उपलब्धिस्वरूप आत्माके संनिधानसे साभास अन्तःकरण ही आत्मा मालूम पड़ता है। स्वतःसिद्ध आत्मामें जाति, गुण, क्रिया आदि न होनेसे कोई भी शब्द उपाधिद्वारा ही उसमे पर्यवसित होते हैं। अहंकारादिमें आत्मचैतन्याभासका उदय होता है, अतः अहंकार आत्मशब्द वाच्य होता है। जैसे 'उल्मुकं दहति' अयो दहति' इत्यादि प्रयोगोंमें उल्मुक या लोहादिमें दाहकत्वका व्यवहार होता है, परंतु केवल उल्मुक या लोहादिमें दाहकत्वका व्यवहार नहीं बन सकता, अतः वह्निमें ही दाहकत्वका पर्यवसान होता है। उसी तरह 'अहं जानामि' इत्यादिरूपसे साभास अन्तःकरण या अहंकारमें ज्ञातृत्व-आत्मत्वका व्यवहार होता है, परंतु अहंकार जड एवं प्रकाश्यके अधीन है। अतः ज्ञातृत्व-आत्मत्वका पर्यवसान नित्यबोधमें ही होता है। जैसे दर्पणादि उपाधिवशात् मुखसे अन्य मुखाभास दर्पणस्थ प्रतिबिम्ब होता
है, फिर भी स्वरूपसे पृथक् नहीं होता; क्योंकि बिम्बकी चेष्टा बिना प्रतिबिम्बमें चेष्टा नहीं होता। आभाससे मुख भी अन्य होता है; क्योंकि वह आदर्शानुविधायी नहीं होता। ग्रीवास्थ मुख दर्पणादिककी अपेक्षा करके ही स्फुटित होता है। मुखाभासके तुल्य अहङ्कार आत्माभास है। वैसे ही आत्मा और आत्माभास-बुद्धिमें चैतन्याभास होता है। आत्मामें चैतन्यरूपता होती है। तभी वेदादिशास्त्र ब्रह्मतत्त्वका ज्ञानशब्दसे प्रतिपादन करते हैं। चैतन्याभासयुक्त बुद्धि ज्ञानशब्दका वाच्य है। शुद्ध चैतन्य ज्ञानशब्दका तात्पर्यार्थ है। प्रकाशस्वभाव वस्तु जिसमें प्रतिबिम्बित होती है उसके प्रकाशोदयका हेतु होती है। जैसे जलमें प्रतिबिम्बित सूर्य जल- प्रकाशका हेतु होता है, वैसे बुद्धिमें प्रतिबिम्बित चैतन्यबुद्धिमें चित्प्रकाशके उदयका हेतु होता है। उसी चिदाभासयुक्त बुद्धिमें जानाति शब्दोंका प्रयोग होता है। लक्षणासे शुद्ध चैतन्यका बोध होता है। कहा जा सकता है कि 'करोति, गच्छति' इत्यादि स्थानोंमें प्रकृत्यर्थ क्रिया एवं प्रत्ययार्थ कर्तृत्व—दोनोंका ही आश्रय एक ही है। कहीं भी क्रिया और कर्तृत्वकी भिन्नाश्रयता नहीं होती, परंतु 'जानाति' में भिन्नाश्रयता क्यों ? इसपर वेदान्तियोंका कहना है किबुद्धिगत आत्माभास (चिदाभास) 'तिङ्' प्रत्ययका अर्थ है और 'ज्ञा'धातुरूप प्रकृतिका अर्थ वृत्तिरूपा क्रिया बुद्धिमें रहती है। बुद्धि एवं चिदाभासके अन्योन्य अविवेकसे 'जानाति' का प्रयोग होता है। इस दृष्टिसे चिदा- भासन्यास सक्रिय बुद्धिके साथ आत्माका ऐक्याध्यास होनेसे ही 'आत्मा जानाति' यह व्यवहार होता है। इस तरह साभास साधिष्ठान बुद्धिमें ही प्रत्ययार्थ कर्तृत्व एवं प्रकृत्यर्थ वृत्ति—दोनों ही बन जाते हैं। बुद्धिमें चित्प्रकाशरूप बोध नहीं होता। बोधस्वरूप आत्मामें क्रिया नहीं बनती है। इसीलिये दोनोंमेंसे किसी एकमें 'जानाति' व्यवहार नहीं बन सकता। अतः बुद्धि एवं बोधस्वरूप आत्माके आरोपित ऐक्यमें ही 'जानाति' व्यवहार होता है। वही प्रकृत्यर्थ क्रिया और प्रत्ययार्थ दोनोंका ही आश्रय है। 'ज्ञप्तिर्ज्ञानम्' इस प्रकार भाव-व्युत्पत्तिसे भी ज्ञानशब्द आत्मामें नहीं प्रयुक्त हो सकता; क्योंकि नित्य आत्मा भाव अर्थात् धात्वर्थ सामान्य भी नहीं हो सकता; नित्य निर्विकार आत्मामें किसी प्रकारकी विक्रिया नहीं हो सकती। इस तरह 'ज्ञायतेऽनेन' इस कारण व्युत्पत्तिसे ज्ञानशब्द आत्मामें सङ्गत नहीं है। इस व्युत्पत्तिसे तो बुद्धि ही ज्ञान-शब्दार्थ ठहरती है। यदि आत्मा ज्ञानका करण होगा, तब कर्ता उससे कोई अन्य ढूँढना पड़ेगा; जो कि असम्भव है। अतएव चिदाभास और चिदात्माके अन्योन्याध्याससे ही ज्ञातृत्व व्यवहार आत्मामें सम्भव होता है। बुद्धिके कर्तृत्वका आत्मामें अध्यास करके आत्मामें ज्ञातृत्व होता है। आत्माका अचैतन्यबुद्धिमें अध्यास करनेसे बुद्धिमें ज्ञत्वका व्यवहार होता है। आत्मा ज्ञानस्वरूप है और वही ज्योतियोंका भी ज्योति कहा जाता है। अतः बुद्धि एवं चक्षुरादिसे भी ज्ञान उत्पन्न नहीं होता--
७०४ मार्क्सवाद और रामराज्य तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ( बृहदा० ४ । ४ । १६ ) अन्तः पुरुषे ज्योतिः । ( छान्दो० ३ । १३ । ७ ) जैसे तत्त्वज्ञान बिना अविवेकी देहको ही आत्मा मानता है, वैसे ही अवि- वेकी बुद्धिको ही ज्ञानकर्ता कहता है । चिदाभासयुक्त बुद्धिवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, यही देखकर ज्ञानकी उत्पत्तिका व्यवहार होता है । जैसे प्रतिबिम्ब दर्पणानु- विधायी होता है वैसे ही चिदाभास भी बुद्धिधर्मका अनुविधायी होता है । चिदा- भाससे दीपित बुद्धिवृत्तियाँ विषयग्राहिका उसी तरह होती हैं, जैसे उल्मुकका दाहकत्व- व्यवहार । वे ग्राहिका वृत्तियाँ स्वयं भासित होती हैं, इसीलिये बौद्धोंने प्रत्ययोंके भासक साक्षीका अपलाप किया है, तथापि उनका आत्मा भासयुक्तबुद्धि प्रत्ययोंके भाव एवं अभाव जिस साक्षीसे विदित होते हैं वह साक्षी ही उनकी उत्पत्ति- विनाशको जानता है । साक्षीके रहनेपर भी चिदाभास आवश्यक है; क्योंकि वस्तु-स्फुरणके लिये वृत्तिव्याप्त वस्तुपर चिदाभास आवश्यक है । केवल साक्षीद्वारा यदि वस्तुका प्रकाश होता हो, तब तो वृत्तिके समान ही काष्ठ-पाषाणादिका भी स्फुरण होना चाहिये । प्रकाशस्वरूप आत्माके सम्बन्धसे ही अचेतनबुद्धि चेतन-सी प्रतीत होती है । फिर तो उसकी वृत्तियाँ भी चेतन-सी ही प्रतीत होती हैं । जैसे तप्त लौहपिण्डसे निकलनेवाले विस्फुलिङ्ग भी अग्निवत् प्रतीत होते हैं । वृत्ति-तदभाव, आभास तथा आभासाभावका ग्राहक तादृक् प्रत्यय नहीं हो सकता । अतः अत्यन्त विविक्त साक्षीसे ही वे भासित होते हैं । फिर भी जैसे लौहपिण्डमें अग्निकी संक्रान्ति होती है, वैसे बुद्धिमें चित्की विकाररूप संक्रान्ति नहीं होती । दर्पणमें प्रतिबिम्बके तुल्य ही बुद्धिमें चित्की संक्रान्ति होती है । जैसे लौहपिण्ड अग्न्याभास होता है, उसी तरह बुद्धि चेतनाभास प्रतीत होती है । चित्त ही चेतन है, यह वैसे ही असङ्गत है, जैसे देहको चेतन कहना । इसी तरह चक्षुरादिमें भी चेतनत्व कहना भ्रममूलक है । अहङ्कारसहित बुद्ध्यारूढ़ सभी वस्तु साक्षीसे ही भासित होते हैं । इसलिये अखण्डबोधरूप साक्षी सर्वाव- भासक कहलाता है । सुषुप्तिमें 'नाद्राक्षम्' इस रूपसे प्रत्ययका ही निषेध है, फिर भी भावरूप अज्ञान एवं प्रत्ययाभावका बोध तो रहता ही है । प्रमातृ-प्रमाण- प्रमेयादिरूप विशेष ग्राह्य नहीं अनुभूत होता । किंतु भाव-अभावका साक्षी चिद्रूप आत्मा एकरस है । शास्त्रोंके अनुसार प्रत्यय स्पष्ट ही उत्पत्ति-विनाशशील एवं कूटस्थ चैतन्य- स्वरूप अलुप्तदृक् है । प्रत्यगात्मा-नित्यज्योतिमें ही अहंका पर्यवसान है । अनुभवके आधारपर ही सब कुछ सिद्ध होता है । आत्मा अनुभवस्वरूप है । प्रत्यय और प्रत्ययी अन्तःकरण—दोनों ही जड़ हैं । नित्य चैतन्यसे ही इन सबका भान होता है । जैसे सेनाका जय राजामें आरोपित होता है, उसी तरह प्रमाणफल कूटस्थ साक्षीसे आरोपित होता है । अविकृत चिदात्माका अन्तःकरणमें प्रतिबिम्ब होता