मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिसका स्वरूप होता है, उसे उसकी अपेक्षा नहीं होती। जैसे प्रकाश प्रकाशान्तरसे दृश्य नहीं होता, प्रकाशके समागमसे अप्रकाश स्वरूपकी व्यक्ति होती है, परन्तु प्रकाशस्वरूप सूर्यकी व्यक्ति प्रकाश-समागमकी अपेक्षा नहीं रखती। जैसे प्राणी प्रकाशस्थ देहको सप्रकाश मानता है, उसी तरह चेतन द्रष्टासे प्रकाशित चित्तको सप्रकाश मानकर 'अहं द्रष्टा' ऐसा व्यवहार करने लगता है। प्राणी इसी तरह सभी दृश्य पदार्थोंके साथ अपना अभेद समझकर आत्माको तत्तद्दृश्यविशिष्ट मानने लगता है। जैसे स्वप्न और स्मृतिमे घटादिका आकार भासित होता है, अतः अनुभवावस्था में घटाद्याकारका आभास माना जाता है। अतः स्वप्न, स्मृतिमें बाह्यार्थके बिना ही विषयाकारवृत्तिमदन्तःकरण ही प्रतीत होता है। इसी तरह स्वप्नमें सिंहासनारूढ देह दृश्य होता है, द्रष्टा स्वयं वह नहीं है। उसी प्रकार जाग्रत्कालमें भी दृश्य देहसे द्रष्टा भिन्न ही है। जैसे मूर्ति आदिके साँचेमें डाला हुआ द्रवीभूत ताम्रादि साँचेके आकारका ही हो जाता है, जैसे व्यञ्जक-आलोक व्यङ्ग्यके आकारका बन जाता है, उसी तरह सर्वार्थव्यञ्जक बुद्धि सर्वार्थाकार हो जाती है। अर्थाकार बुद्धि ही द्रष्टा अखण्डबोधरूप आत्मासे दृष्ट होती है। वही स्वप्नके दृशिस्वरूप आत्मासे दृश्य होती है। अखण्ड दृशिस्वरूप बोधसे ही सर्वदेहोंकी बुद्धियाँ भासित होती हैं। जैसे घटादि प्रकाश सम्पर्कसे 'घट. प्रकाशते' इस रूपसे प्रकाशके कर्त्ता होते हैं, वैसे ही सूर्यादि प्रकाश प्रकाशान्तर-सम्पर्कके बिना ही 'सूर्यः प्रकाशते' इस तरह सूर्य प्रकाशका कर्त्ता कहा जाता है। इसी तरह बुद्धयादि अखण्डबोधके सम्पर्कसे प्रकाशित होते हैं, परन्तु अखण्डबोध स्वतः ही प्रकाशित होता है। जैसे सूर्यमे सत्तामात्रसे प्रकाशकर्तृत्वका व्यवहार होता है, उसी तरह दृशिस्वरूप आत्मामें सन्निधानमात्रसे प्रकाशकत्वका व्यवहार होता है। जैसे बिलसे निकलनेपर सूर्यकी सत्तामात्रसे सर्पादि भासित होते हैं, सूर्यमे किसी कर्तृत्वादि विकारकी आवश्यकता नहीं पड़ती, इसी तरह दृश्यके उपस्थित होनेपर दृशिस्वरूप आत्मासे दृश्यका प्रकाश होता है, एतदर्थ उसमें कर्तृत्वादि विकारकी अपेक्षा नहीं होती। इसी प्रकार दाह्यका संनिधान होनेपर उष्णस्वरूप अग्निमे दाहकत्वका व्यवहार होता है। इसी तरह प्रयत्न बिना भी बोधस्वरूप आत्मा ज्ञाता, बोद्धा आदि कहा जाता है। वस्तुतः आत्मा विदित-अविदित—दोनोंसे ही अन्य है। जैसे प्रकाशस्वरूप सूर्यमें दिन-रात नहीं होते, वैसे ही बोधस्वरूप आत्मामें बोध, अबोध नहीं होते। अतएव बौद्धों-जैसी इस अखण्डबोधमें स्वसंवेद्यता भी नहीं है। साथ ही बोधको शून्य भी नहीं कहा जा सकता; क्योकि जैसे घटादि दृश्य हैं, वैसे ही बुद्धि भी साक्षिभास्यरूपसे स्पष्ट प्रतीत होती है। जैसे घटादि विकल्प कार्य निर्विकल्प-कारणपूर्वक होते हैं, उसी तरह बुद्धि आदि सविकल्प सप्रकाश निर्विकल्प-प्रकाशपूर्वक होने ही चाहिये।