मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबौद्ध क्षणिक ज्ञानको ही आत्मा कहते हैं । जैसे दीपमें 'स एवायं दीपः', यह वही दीपक है, इस प्रकार प्रत्यभिज्ञा ( पहचान ) से सादृश्यमूलक एकत्वकी भ्रान्ति होती है । उसी तरह क्षणिक ज्ञानोंकी धारामें ही सादृश्यके कारण 'स एवाहम्' मैं वही हूँ, इस प्रकार एकत्वकी भ्रान्ति होती है । बाह्याकार भी क्षणिक ज्ञान ही है, परंतु यह सब कहना ठीक नहीं । कारण कि ज्ञेयकी उत्पत्तिके पहले उसका ज्ञान सम्बन्ध कैसे होगा । ज्ञान उत्पन्न होते ही नष्ट होता है तब उसका ज्ञेयके साथ सम्बन्ध कैसे होगा ? ज्ञेयको प्रत्यक्षताका अनुभव होता है, फिर उसे अनुमेय माननेवाला पक्ष भी असङ्गत ही है । अनुभविता भी यदि क्षणिक ज्ञान ही है तब स्मृति भी कैसे सम्पन्न होगी ? अन्य अनुभूतका अन्य स्मरण कर नहीं सकता । यदि कोई स्थायी आत्मा हो, तभी ज्ञानसे संस्कार उत्पन्न हो तभी स्मृति हो सकेगी । संस्कारका स्थायी आधार न होनेसे ही पूर्वापरकी तुल्यताका ग्रहण सम्भव नहीं होता । अतः सादृश्यमूलक एकत्वकी भ्रान्ति भी नहीं कही जा सकती । क्षणिक विज्ञान व्यक्तियोंसे अतिरिक्त विज्ञान- [L14