भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 866 में से

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७०० मार्क्सवाद और रामराज्य बन सकता, इसलिये भी सुख ज्ञानग्राह्य नहीं हो सकता । यदि कहा जाय कि सुख-दुःखादि ज्ञानग्राह्य मत हो, तो यह भी ठीक नहीं; कारण, 'सुखं मया ज्ञातम्' 'दुःखं मया ज्ञातम्' इस रूपसे सुख-दुःखकी स्मृति सुख- दुःखके अनुभवको बोधित करती है । जो कहा जाता है कि 'ज्ञान-विशिष्ट आत्मामें समवेत होनेसे सुखादिका भान होगा', यह भी ठीक नहीं । कारण, एक कालमें आत्मा अनेक विशेष गुणोंका समवायी नहीं हो सकता । एक असमवायी- कारण आत्ममनः संयोगसे एक ही कार्य उत्पन्न होनेका नियम मान्य है । यदि ज्ञान-विशिष्ट आत्म-समवेत होनेसे सुखादिका ग्रहण हो तब तो आत्मगत संख्या परिमाणादिका भी ग्रहण होना ही चाहिये । यदि कहा जाय कि 'सुख, दुःख, ज्ञानादिका आत्माके गुण या धर्म होनेसे आत्माद्वारा ही प्रकाशित होना ठीक है', वह भी ठीक नहीं; कारण, नैयायिकोंका आत्मा प्रकाश- स्वरूप नहीं है । फिर उससे सुखादिका प्रकाश कैसे होगा ? नैयायिक आत्माको व्यापक और नित्य भी मानते हैं, अतः ज्ञान, सुखादि उसके विकार नहीं हो सकते । व्यापक, नित्यको विकारी कहना भी असङ्गत ही है । अतः आत्मा न तो ज्ञानादि गुणवाला ही सिद्ध होता है और न गुण-गुणीमें ग्राह्य-ग्राहकभाव ही बन सकता है । फिर सभी अनेक व्यापक आत्मामें आत्ममनः-संयोग समान ही है । अतः एक आत्माके सुखादिसे सभी आत्माओंको सुखादिमान् कहना पड़ेगा । अदृष्टादि भी किस आत्मामें हैं, किसमें नहीं, इसका निर्णय अशक्य होगा । अतः सुख-दुःख एवं वृत्तिरूप ज्ञानादि स्वप्रकाश व्यापक आत्मासे भास्य मानना ही युक्त है । वही आत्मा नित्य-बोध है । ज्ञानको ज्ञेय माननेसे अनवस्थित ज्ञानमाला अनिवार्य होगी । यह भी विचारणीय है कि विषय-प्रकाश-कालमें विषय-प्रकाशक ज्ञान भासमान होता है या नहीं, यदि नहीं तो विषय स्वयं भासित होता है या ज्ञानाधीन होकर भासित होता है, यह निर्णय नहीं हो सकेगा । अतः विषय-प्रकाश-कालमें ही प्रकाशक ज्ञानका भानस्वरूप ज्ञानान्तर मानना चाहिये । यदि वह ज्ञान भी भासमान नहीं है तो उसके द्वारा पूर्व ज्ञानका भान नहीं बनेगा । फिर उस ज्ञानके भानके लिये भी ज्ञानान्तर मानना पड़ेगा । 'पूर्व-पूर्व ज्ञान उत्तरोत्तर ज्ञानसे भासित होंगे', यह पक्ष भी सम्भव नहीं है । क्योंकि प्रथम ज्ञान उत्पन्न होनेके अनन्तर मनमें क्रिया उत्पन्न होगी, उससे विभाग होगा, तब पूर्व संयोग नाश होगा, पुनः दूसरा संयोग उत्पन्न होगा, तब ज्ञानान्तर उत्पन्न होगा । इस तरह बहुक्षणविलम्बसे जब उत्तर ज्ञान उत्पन्न होगा तब पूर्वज्ञान रहेगा ही नहीं, फिर उसका भान कैसे होगा । यदि इन सब दोषोंसे बचनेके लिये एक ही आत्म-मनःसंयोगसे दो ज्ञान या अनेक ज्ञानकी उत्पत्ति मानी जाय तब तो एक ही आत्म-मनः-संयोगसे युगपत् संनिकृष्ट रूप, रस, गन्धादिका भी समकालमें ही ज्ञान होना चाहिये । संस्कार-उद्बोध होनेपर

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