भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 460, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 460

उसी समय स्मृतियों भी उत्पन्न होनी चाहिये, परंतु यह सब सिद्धान्तविरुद्ध होगा। नैयायिकोंके सिद्धान्तमे न तो अनुभव एवं स्मृतियोंकी समकालता मान्य है और न तो विशेष गुणोंकी समकालता ही मान्य है 'युगपज्ज्ञानानुपपत्तिर्म- नसो लिङ्गम्' (न्यायदर्शन १।१।१६) एक कालमें अनेक ज्ञानोंका न उत्पन्न होना अणुपरिमाण मनके होनेमें लिङ्ग है । इसलिये दीर्घशष्कुली (पापड) खाते समय समकालमें शब्द, स्पर्श, रूप रस, गन्धकी अनुभूतिको भी नैयायिक क्रमिक ही मानते हैं । यदि ज्ञान या चैतन्य आत्माका स्वरूप-लक्षण माना जाय तो जैसे गन्धादि पृथ्वीका लक्षण है, वैसे ही ज्ञान आत्माका लक्षण हुआ, फिर तो जैसे गन्धादि पृथ्वी आदिका स्वरूप ही है, वैसे ही ज्ञान भी आत्माका स्वरूप ही ठहरता है । फिर 'अनित्य ज्ञानवाला आत्मा है', यह कथन व्यर्थ ही है । यदि ज्ञान आत्माका तटस्थ लक्षण है तो आत्माका स्वरूप लक्षण भी बतलाना चाहिये । पर वह चेतनातिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं हो सकता । अतः देहादि-जड़-विलक्षण ही आत्मा है, यह कहना पड़ेगा । तथा च निर्विशेष चिद्रूप ही आत्मा हुआ । बोधस्वरूप आत्म-ज्योतिसे दीप्त होकर बुद्धि भ्रान्तिसे अपनेमें ही बोध मानती है । 'अन्य साक्षी बोद्धा नहीं है, मैं ही बोद्धा हूँ', यह बुद्धिका भ्रम ही है । बुद्धि आगन्तुक है, किंतु बोध तो सुषुप्तिमें बुद्धिके न रहनेपर भी रहता है । अतः अविवेकसे ही बुद्धिमें बोधरूपताकी भ्रान्ति होती है । स्वप्नके सभी वेद्य- प्रपञ्चको इसी बोधमे जाना जाता है । क्योंकि स्वप्नमें आदित्य, चन्द्र, चक्षु, वाक् आदि सभी ज्योतियाँ लुप्त होती हैं, मन स्वयं वेद्यरूपसे ही परिणत है । भासक ज्योति आत्मासे भिन्न होकर कुछ भी नहीं है । अतएव स्वप्नमें जिसमें रूपदर्शन, शब्दश्रवण, वाग्व्यवहार होता है वह चक्षु, श्रोत्र, मन एवं वाक् आदि, आत्मज्योति ही है,—'सा श्रोतु श्रुतिर्यया स्वप्ने शृणोति । सा वक्तुर्वक्तिर्यया स्वप्ने वदति।' जैसे एक ही स्फटिक मणिमें नील, पीत, हरित उपाधिके भेदसे अनेक रूप परिलक्षित होते हैं, उसी तरह एक ही नित्य ज्ञान स्वप्नकल्पित शब्दादि अनेक उपाधिभेदसे श्रुति, मति, विज्ञाति आदि रूपमें प्रतीत होता है । इसी चिद्रूप ज्ञानका ही विकल्प जाग्रत् भी है । अज्ञानोपाधिक ज्ञानस्वरूप आत्मा बुद्धिकी कल्पना करता है । बुद्धिसे उपहित होकर बुद्धिस्थ अर्थका ही व्याकरण करता हुआ उनका प्रकाशक वही ज्ञानस्वरूप आत्मा सर्वव्यवहार- भागी होता है । जैसे स्वप्नका व्यवहार, ठीक वैसा ही जाग्रत्का भी व्यवहार होता है । फिर भी शुद्धचित्तमें निर्विकल्प नित्यज्ञानका साक्षात्कार होता है । बाह्येन्द्रियोंसे विषयोपलम्भ जागर है । संस्कारवशात् निद्राकालमें प्रतीत प्रपञ्च-