भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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स्वप्न एक प्रकारकी स्मृति है। दोनोंहीका अभाव सुषुप्ति है। तीनोंका ही साक्षी नित्य ज्ञान है। सुषुप्तिका तम ही जागर, स्वप्नका बीज है। स्वात्म-प्रबोधसे बीज दग्ध होनेपर अनन्तज्ञान निष्प्रपञ्चरूपसे भासित होता है। जैसे अदृश्य भी राहु चन्द्रविम्बपर उपरक्त होकर दृश्य होता है, जैसे जलमें चन्द्रादिका प्रतिबिम्ब लक्षित होता है, वैसे ही शुद्ध बुद्धिपर ही निर्विकल्प-बोध लक्षित-होता है। जैसे जलमें भानुका बिम्ब एवं उष्णता प्रतीत होनेपर भी वह जलका धर्म नहीं, किंतु भानुका ही धर्म है, उसी प्रकार बुद्धिमें बोध लक्षित होनेपर भी बोध बुद्धिका धर्म नहीं है। जैसे जलका शैत्य एवं अप्रकाश धर्म निश्चित है, वैसे ही बुद्धिका भी जडत्व धर्म निश्चित है। अतः जैसे जलमें प्रतीत होते हुए भी उष्णता और प्रकाश भानुका ही धर्म है, वैसे ही बुद्धिमें स्फुरण या बोध प्रतीत होनेपर भी आत्माका ही स्वरूप है। चक्षुके द्वारा रूपाकारवृत्तिका अवभासन करता हुआ साक्षी अलुप्तदृक् रहता है। वही दृष्टिका द्रष्टा, श्रुतिका श्रोता है। केवल मानसी वृत्तिका भासन करता हुआ वही मतिका मन्ता कहा जाता है। वह विज्ञातिका विज्ञाता है। उसीके सम्बन्धमें श्रुतिने कहा है— न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येः, न श्रुतेः श्रोतारं शृणुयाः, न मतेर्मन्तारं मन्वीथाः ॥ ‘मतिका मन्ता है’ यह कहनेपर भी उसमें मन्तृत्वादि विकार नहीं होते। बुद्धि आदिके ही व्यापारसे केवल तद्भासकमें मन्तृत्वादिकी प्रतीति होती है। सुषुप्तिमे भी ज्ञस्वरूप बना ही रहता है। केवल दृश्य न होनेसे विशेष दर्शनादिका अभाव रहता है। घटादि बाह्य वस्तु दृष्टिसे व्यवहित होता है अतः परोक्ष है। आत्मा तो दृष्टिका भी आत्मा है, अतः आत्मा अपरोक्ष है। श्रुतिमे भी ब्रह्मात्माको साक्षात् अपरोक्ष कहा गया है—'यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' (बृहदा० उप० ३।४।१) जैसे दीपको स्वात्मप्रकाशमें दीपान्तरकी अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही बोधस्वरूप आत्माको भी स्वात्म- प्रकाशमें बोधान्तरकी अपेक्षा नहीं है। उसी स्वयंज्योति उपलब्धिस्वरूप आत्माके संनिधानसे साभास अन्तःकरण ही आत्मा मालूम पड़ता है। स्वतःसिद्ध आत्मामें जाति, गुण, क्रिया आदि न होनेसे कोई भी शब्द उपाधिद्वारा ही उसमे पर्यवसित होते हैं। अहंकारादिमें आत्मचैतन्याभासका उदय होता है, अतः अहंकार आत्मशब्द वाच्य होता है। जैसे 'उल्मुकं दहति' अयो दहति' इत्यादि प्रयोगोंमें उल्मुक या लोहादिमें दाहकत्वका व्यवहार होता है, परंतु केवल उल्मुक या लोहादिमें दाहकत्वका व्यवहार नहीं बन सकता, अतः वह्निमें ही दाहकत्वका पर्यवसान होता है। उसी तरह 'अहं जानामि' इत्यादिरूपसे साभास अन्तःकरण या अहंकारमें ज्ञातृत्व-आत्मत्वका व्यवहार होता है, परंतु अहंकार जड एवं प्रकाश्यके अधीन है। अतः ज्ञातृत्व-आत्मत्वका पर्यवसान नित्यबोधमें ही होता है। जैसे दर्पणादि उपाधिवशात् मुखसे अन्य मुखाभास दर्पणस्थ प्रतिबिम्ब होता