मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै, फिर भी स्वरूपसे पृथक् नहीं होता; क्योंकि बिम्बकी चेष्टा बिना प्रतिबिम्बमें चेष्टा नहीं होता। आभाससे मुख भी अन्य होता है; क्योंकि वह आदर्शानुविधायी नहीं होता। ग्रीवास्थ मुख दर्पणादिककी अपेक्षा करके ही स्फुटित होता है। मुखाभासके तुल्य अहङ्कार आत्माभास है। वैसे ही आत्मा और आत्माभास-बुद्धिमें चैतन्याभास होता है। आत्मामें चैतन्यरूपता होती है। तभी वेदादिशास्त्र ब्रह्मतत्त्वका ज्ञानशब्दसे प्रतिपादन करते हैं। चैतन्याभासयुक्त बुद्धि ज्ञानशब्दका वाच्य है। शुद्ध चैतन्य ज्ञानशब्दका तात्पर्यार्थ है। प्रकाशस्वभाव वस्तु जिसमें प्रतिबिम्बित होती है उसके प्रकाशोदयका हेतु होती है। जैसे जलमें प्रतिबिम्बित सूर्य जल- प्रकाशका हेतु होता है, वैसे बुद्धिमें प्रतिबिम्बित चैतन्यबुद्धिमें चित्प्रकाशके उदयका हेतु होता है। उसी चिदाभासयुक्त बुद्धिमें जानाति शब्दोंका प्रयोग होता है। लक्षणासे शुद्ध चैतन्यका बोध होता है। कहा जा सकता है कि 'करोति, गच्छति' इत्यादि स्थानोंमें प्रकृत्यर्थ क्रिया एवं प्रत्ययार्थ कर्तृत्व—दोनोंका ही आश्रय एक ही है। कहीं भी क्रिया और कर्तृत्वकी भिन्नाश्रयता नहीं होती, परंतु 'जानाति' में भिन्नाश्रयता क्यों ? इसपर वेदान्तियोंका कहना है किबुद्धिगत आत्माभास (चिदाभास) 'तिङ्' प्रत्ययका अर्थ है और 'ज्ञा'धातुरूप प्रकृतिका अर्थ वृत्तिरूपा क्रिया बुद्धिमें रहती है। बुद्धि एवं चिदाभासके अन्योन्य अविवेकसे 'जानाति' का प्रयोग होता है। इस दृष्टिसे चिदा- भासन्यास सक्रिय बुद्धिके साथ आत्माका ऐक्याध्यास होनेसे ही 'आत्मा जानाति' यह व्यवहार होता है। इस तरह साभास साधिष्ठान बुद्धिमें ही प्रत्ययार्थ कर्तृत्व एवं प्रकृत्यर्थ वृत्ति—दोनों ही बन जाते हैं। बुद्धिमें चित्प्रकाशरूप बोध नहीं होता। बोधस्वरूप आत्मामें क्रिया नहीं बनती है। इसीलिये दोनोंमेंसे किसी एकमें 'जानाति' व्यवहार नहीं बन सकता। अतः बुद्धि एवं बोधस्वरूप आत्माके आरोपित ऐक्यमें ही 'जानाति' व्यवहार होता है। वही प्रकृत्यर्थ क्रिया और प्रत्ययार्थ दोनोंका ही आश्रय है। 'ज्ञप्तिर्ज्ञानम्' इस प्रकार भाव-व्युत्पत्तिसे भी ज्ञानशब्द आत्मामें नहीं प्रयुक्त हो सकता; क्योंकि नित्य आत्मा भाव अर्थात् धात्वर्थ सामान्य भी नहीं हो सकता; नित्य निर्विकार आत्मामें किसी प्रकारकी विक्रिया नहीं हो सकती। इस तरह 'ज्ञायतेऽनेन' इस कारण व्युत्पत्तिसे ज्ञानशब्द आत्मामें सङ्गत नहीं है। इस व्युत्पत्तिसे तो बुद्धि ही ज्ञान-शब्दार्थ ठहरती है। यदि आत्मा ज्ञानका करण होगा, तब कर्ता उससे कोई अन्य ढूँढना पड़ेगा; जो कि असम्भव है। अतएव चिदाभास और चिदात्माके अन्योन्याध्याससे ही ज्ञातृत्व व्यवहार आत्मामें सम्भव होता है। बुद्धिके कर्तृत्वका आत्मामें अध्यास करके आत्मामें ज्ञातृत्व होता है। आत्माका अचैतन्यबुद्धिमें अध्यास करनेसे बुद्धिमें ज्ञत्वका व्यवहार होता है। आत्मा ज्ञानस्वरूप है और वही ज्योतियोंका भी ज्योति कहा जाता है। अतः बुद्धि एवं चक्षुरादिसे भी ज्ञान उत्पन्न नहीं होता--