भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 455

६९६ . मार्क्सवाद और रामराज्य प्रमेयसम्बन्ध आत्मामें प्रतीत होता है, अतः प्रमातृगतचित्प्रकाशसे सम्बन्ध मानना ही पड़ता है । जड अन्तःकरण यद्यपि व्यापारका आश्रय हो सकता है तथापि वह चित्‌का आश्रय नहीं हो सकता । चिदात्मा कूटस्थ होता है, अतः वह व्यापारका आश्रय नहीं हो सकता । इसीलिये वह प्रमाके प्रति कर्ता भी नहीं हो सकता और मुख्यवृत्तिसे जड-अजड कोई भी प्रमाता नहीं बन सकता । अतः परस्पराध्याससे ही आत्मा ही बाह्य-विषयका भी प्रमाता बनता है । फिर स्वात्मामें स्वयंप्रकाश होनेसे प्रमातामें कोई शङ्का ही नही । अतएव अनवगत होने या प्रमाणकी अपेक्षा रखनेकी कोई कल्पना ही नही हो सकती । अर्थात् कूटस्थ नित्य आत्मज्योतिमे ही अन्तःकरणादि-उपाधिद्वारा औपाधिक ही प्रमातृत्व होते हैं । प्रमाणसापेक्ष शब्दादि सभी अचेतन, संहत एवं अनात्मा हैं । अवगति स्वयं अन्यानपेक्ष स्वतःसिद्ध है, वही आत्मा है । उसमे भी सोपाधिक अवगति अनित्य है, निरुपाधिक नित्य है । यद्यपि कहा जा सकता है कि ‘मै मनुष्य हूँ, जानता हूँ’ इस व्यवहारमें प्रत्यक्षादि प्रमाणकी अपेक्षा नहीं रहती है, तथापि मृति, सुषुप्ति आदिमें देहसिद्धिके लिये भी प्रमाणकी अपेक्षा होती ही है । उसकी भी अवगति कूटस्थ, स्वयंसिद्ध आत्मज्योति ही है । अवगतिसे भिन्न देहादि, ग्राह्य, ग्राहक, करणादि रूपसे भूत ही परिणत होते हैं । अवगति यद्यपि स्वयं नित्यसिद्ध है तथापि प्रमाणजन्य प्रत्यक्षादि वृत्तिरूप प्रत्ययकी अनित्यतासे ही तदभिव्यक्त अवगतिमें भी अनित्यता एवं प्रमाणफलताका व्यवहार होता है । सभी वृत्तियाँ परस्पर व्यभिचरित होती हैं । बोध, स्फुरण उनमें एक रूपसे ही समान होता है, अतः वही स्फुरण, बोध या अवगति नित्य एकरस हैं । जैसे स्वप्नके नील-पीतादि प्रत्यय-भेद व्यभिचरित होनेसे असत्य हैं, अवगति ही सत्य है, वैसे ही सर्वत्र प्रत्ययोमें भिन्नता होनेसे मिथ्यात्व है । बोधमात्र ही अभिन्न एव एक है । उस अवगतिका अवगन्ता अन्य कोई नहीं है । वह स्वयं नित्य है । उसका हान या उपादान नहीं हो सकता । जैसे शब्दादि, लोष्ठादि ज्ञेय हैं, ज्ञात नही, उसी तरह भूतपरिणाम देहादि भी ज्ञेय ही हैं, ज्ञाता नहीं । जो वस्तु स्वतःसत्तास्फूर्तिवाली नहीं है वह जड है, उसे सत्तास्फूर्ति देनेवाला ही चेतन है । वही ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ है । ज्ञाता आत्मा, ज्ञेय अनात्मा, इदमंश अनात्मा है, द्रष्टा अनिदमंश ही आत्मा है । अहमर्थमें भी दृश्य अहं इदमंश ही है, दृक् आत्मा ब्रह्म है । जैसे सौरालोकमें स्फटिकादि मणियोंपर जपाकुसुमादिकी रक्ताद्याकारता प्रतीत होती है, उसी तरह स्वप्रकाशबोधरूप आत्मप्रकाशमे ही बुद्ध्यादिमें विषयाकारताकी प्रतीति होती है । जैसे सौरालोकसे ही स्फटिक एवं रक्ताद्याकारता दोनों ही भासित होती हैं, वैसे ही नित्य-बोधसे ही बुद्ध्यादि एवं विषयाकारता दोनो ही भासित होती हैं ।