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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 454, कुल 866 में से

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पृष्ठ 454

मार्क्स और आत्मा ६९५ अवगति ही अनित्या है, वही प्रमा है, वही प्रमाणफल है, विम्बभूत अवगति नित्य ही है। यदि अवगति नित्य है, तब तो प्रमाण व्यापार व्यर्थ होगा और अनित्य है तो प्रमाण व्यापार आवश्यक होगा । परंतु प्रमाताकी अवगति तो प्रमाण- निरपेक्ष स्वतःसिद्ध है ही। यदि प्रमाताको आत्मसिद्धिमें प्रमाणकी अपेक्षा हो तो किसे प्रमित्सा होगी, यह भी विचारणीय है। जिसे प्रमित्सा होती है, वही प्रमाता होता है। प्रमित्सा प्रमेयविषयक ही होती है, प्रमातृविषया नहीं । प्रमातृविषयक प्रमित्सा होनेसे अनवस्था-दोष भी होता है। प्रमाताकी प्रमित्सा अव्यवहित होनेसे प्रमातृविषया नहीं हो सकती । लोकमें प्रमाताकी इच्छा, स्मृति, प्रयत्न एवं प्रमाणजन्यके अनन्तर प्रमेय सिद्ध होता है। प्रमेय-विषया-अवगति अभीष्ट होती है। स्वयं प्रमाता अपनेसे या अन्य इच्छादिसे व्यवहित नहीं हो सकता । स्मृति भी स्मर्तव्यविषया होती है, स्मर्तृविषया स्मृति नहीं होती । इसी तरह इच्छा भी इष्टविषया होती है, इच्छावद्विषया इच्छा नहीं होती । यदि स्मृति एवं इच्छा स्मर्ता एवं इच्छावान्को विषय करे तब इसमें भी अनवस्था-दोष आयेगा । स्मृति, इच्छा, प्रयत्न एवं प्रमाण जन्मके अनन्तर ही स्मर्तव्य, इष्यमाण, प्रयत्नितव्य एवं प्रमेयका व्यवहार हो सकता है। कहा जा सकता है कि 'प्रमातृविषयक अवगति-उपपत्ति उपपन्न न होनेसे आत्मा अनवगत ही रहेगा', परंतु यह कहना ठीक नहीं। अवगन्ताकी अवगति अवगन्तव्यविषयक होती है, अवगन्तृविषयक अवगति नहीं होती । यदि ऐसा होगा तो अनवस्था-प्रसङ्ग होगा । आत्माकी अवगति स्वरूपभूत ही है अर्थात् अवगन्ताकी अवगति उत्पन्न नहीं होती । अग्निकी उष्णता और प्रकाशके तुल्य ही आत्माका स्वभाव ही अवगति है। 'अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः' 'आत्मैवास्यज्योतिः' 'एषोऽस्य परमो लोकः' 'न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते' (बृहदा० उप० ४।३।३०) इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार आत्माकी स्वरूपभूत ज्योति है। चैतन्यात्मज्योतिकी अवगति अनित्य है ही नहीं । असंहत, स्वप्रकाश एव अपरार्थ ही आत्मा है। यदि आत्मा- की अवगति अनित्य होगी तो उत्पत्तिसे प्रथम एव प्रध्वंससे ऊर्ध्व उसका अभाव कहना पड़ेगा । फिर आत्माकी अपरार्थता आदि सभी बाधित होंगे । अवगति प्रमा है, वह स्मृति इच्छादिपर्णिता अनित्या है, आत्मा स्वरूपभूत नित्य है। जैसे तिष्ठति शब्द अचलत्व-अर्थमें प्रयुक्त होता है, जङ्गम पदार्थ गतिपूर्वक अचल होते हैं; आकाश-पर्वतादि स्थावर पदार्थ सदा ही अचल रहते हैं, दोनोंमें ही तिष्ठति शब्दका प्रयोग होता है । 'तिष्ठन्ति मनुष्याः, तिष्ठन्ति पर्वताः, तिष्ठत्याकाशः' उसी तरह अनित्य अवगति एव नित्य आत्मस्वरूप-अवगतिमें भी प्रमात्व- व्यवहार बन जाता है । फलस्वरूप प्रमामें कोई अन्तर नहीं । प्रमाण फल ही प्रमा है । वह प्रमातृगतचित्स्वरूप प्रकाश ही है । यद्यपि वृत्तिव्याप्त विषयस्य- चित्प्रतिविम्ब ही फल है तथापि 'मयेदं विदितम्' मैंने यह जाना, इस तरह प्रमाण-

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