मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९४ मार्क्सवाद और रामराज्य स्वयं प्रकाशमान चैतन्य आत्मामें अहंरूपसे अन्तःकरणका अध्यास होता है। वह कभी भी अप्रकाशित होकर नहीं रहता । वही आत्मचैतन्य व्याप्त अन्तःकरण विषयवृत्तिको उत्पन्न करता हुआ उपलब्धा कहलाता है, वही कर्ता और प्रमाता भी कहलाता है । जैसे लोह पिण्डमें दाहकत्व-प्रकाशकत्वका व्यवहार होता है वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये । अखण्ड बोधस्वरूप आत्माका आकाशवत् अविक्रिय होनेपर भी तादृक् अन्तःकरणगत चिदाभासके अविवेकसे अन्तःकरणके धर्मों एवं उसकी अवस्थाओंसे युक्त होकर प्रतीत होने लगता है । जैसे अग्नि निराकार होनेपर भी काष्ठोंपर प्रकट होती है वैसे ही त्रिकोण-चतुष्कोण मोटा-पतला-सा प्रतीत होता है और अग्निका उत्पन्न होना, नष्ट होना भी उसी काष्ठादि उपाधिसे प्रतीत होता है । इसी तरह विकारी अन्तःकरणमें कर्तृत्व होनेपर भी उपलब्धिमें उत्पद्यमानता नहीं होती । अतः उपलब्धिस्वरूप आत्मा निर्विकार कूटस्थ ही है। कहा जा सकता है कि 'जैसे छिदिक्रियासाध्य द्वैधीभावरूप फल विक्रिया है, उसी तरह उपलब्धिरूप फल भी साध्य ही है, अतः वह भी विक्रिया ही है ।' परंतु वस्तुतः स्वरूपसे उपलब्धि फल ही नहीं है, वृत्तिव्याप्त घटादि विषयोंपर व्यक्त चित्प्रतिबिम्ब ही फल है । नित्यौपलब्धिस्वरूप आत्मामें उसीके अविवेकसे फलत्वका व्यपदेश होता है, अतएव यहाँ उपलब्धि एवं उपलब्धामें भेद नहीं हैं । उपलब्धि-स्वरूप ही आत्मा है। यह उपलब्धि नित्य है, विक्रिया नहीं है । विक्रियारूप उपलब्धि चैतन्यव्याप्त बुद्धिवृत्ति है । उससे अविवेकके कारण ही नित्योपलब्धिमें फलत्वका व्यवहार होता है । इसीलिये उपलब्ध्याभासावसान ही उपलब्धिका धात्वर्थ है । उसी नित्योपलब्धिस्वरूप आत्मामें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति-तीनो ही अवस्थावाला अन्तःकरण भासित होता है । तीनो ही अवस्थाएँ आगन्तुक हैं । उपलब्धिस्वरूप आत्मा सर्वत्र अव्यभिचरितरूपसे विद्यमान रहता है । सुषुप्तिमें भी कुछ नहीं देखा, इस प्रकार सर्वाभावकी उपलब्धि होती ही है। जाग्रदादिमे भी प्रमाता स्वतःसिद्ध होता है । वही स्वयं प्रमाणद्वारा प्रमेयोंको जानता है । प्रमाताका भी भासक अखण्डबोध आत्मा स्वतःसिद्ध है । लोह-जल आदिमें दाहकत्व-प्रकाशकत्व लानेके लिये अग्निकी अपेक्षा होती है, किंतु अग्निमें दाहकत्व-प्रकाशकत्व लानेके लिये अन्य अग्नि आदिकी अपेक्षा नहीं होती । वही स्वतःसिद्ध संवित् आत्मा है। वृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्य प्रमाण है, वृत्तिमदन्तः- करण प्रतिबिम्बित चैतन्य प्रमाता है। प्रमेयप्रकाशकालमें वे दोनों ही प्रकाशित रहते हैं। उनका प्रकाशक कोई अन्य प्रमाता या प्रमाणान्तर माननेमें अनवस्था आदि दोष आते हैं, अतः स्वयंज्योतिः आत्माको ही तीनोंका भासक मानना ठीक है। कहा जा सकता है कि 'संवित् या बोध प्रमाणके फलरूपसे ही प्रसिद्ध है, फिर वह नित्य कैसे हो सकता है ?' परंतु यह ठीक नहीं; कारण, वृत्तिप्रतिबिम्बित