भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 452

मार्क्स और आत्मा ६९३ उपलम्भ करता है । अतएव अपरिणामिता सिद्ध होती है । अशेषचित्त प्रचारकी उपलब्धि कूटस्थताका निश्चायक है । यदि कूटस्थ आत्मा परिणामी होता तो अशेष स्वविषयचित्त प्रचारका साक्षी न होता, जैसे चित्त किंवा इन्द्रियाँ अपने विषयोके एक देशका ही उपलम्भ करते हैं, इस तरह आत्मा अपने विषयोके एक देशका उपलम्भ नही करता, किंतु अशेष प्रत्ययोकी उपलब्धि आत्मासे होती है, अतः वह अपरिणामी ही है । कहा जा सकता है कि उपलब्धि धात्वर्थ क्रिया ही है, फिर उपलब्धि- क्रियाका कर्ता विक्रियावान् ही है । उपपूर्वक लभ धातुसे कर्तामें तृच् प्रत्यय करनेपर उपलब्धा शब्द बनता है । धात्वर्थ सर्वत्र क्रिया ही होता है । क्रिया स्वयं उत्पत्ति-विनाशशील होती है, अतः उपलब्धि भी क्रिया ही है, अतः उत्पत्ति विनाश उसका भी मानना ही चाहिये, फिर वह नित्य कैसे कहा जा सकता है । इसका समाधान यह है कि 'धात्वर्थ सर्वत्र क्रिया ही होता है और कर्ता ही प्रत्ययार्थ होता है, यह नियम सार्वत्रिक नहीं, क्योकि 'गडि वदनैकदेशे' इस गडि धातुसे गण्ड बनता है । जो कि मुखैकदेश कपोलका ही बोधक है । इसी तरह 'सविता प्रकाशते' 'सविता प्रकाशयति' 'सविता प्रकाशमान है या घटादिका प्रकाशक है,' यहाँपर सविता किसी प्रकाश क्रियाका कर्ता नही है, क्योकि प्रकाश उसका स्वरूप ही है । उसके निर्विकार रहते हुए ही उसके सन्निधानमात्रसे अन्य वस्तुओका प्रकाश होता है । बुद्धिजन्य वृत्तिरूप बौद्ध प्रत्यय ही क्रिया या विक्रिया है । वही धात्वर्थ है । आत्माकी स्वरूपभूत नित्य उपलब्धिमें विक्रिया- का उपचार होता है । जैसा कि सूर्यके स्वरूपभूत प्रकाशमें भी विक्रियात्वका उपचार होता है ।' कहा जा सकता है कि 'बुद्धि द्रव्य है, उसका परिणाम वृत्ति भी मृत्तिका- परिणाम घटादिके तुल्य द्रव्य ही है । उसे भी क्रिया नही कहा जा सकता । परंतु मृत्तिकादि अपने पूर्वरूपको तिरोहित करके घटादिके रूपमें परिणत होते हैं ।' पर यहाँ तो तृणजलूका ( जोक ) एव प्रकाशके तुल्य संकोच-विकासरूप ही क्रिया है । ऐसा परिणाम तो परिणामिकी चेष्टारूप ही है । इसी तरह बुद्धिका परिणाम ही वृत्ति है, वही क्रिया है । उस वृत्तिपर अभिव्यक्त बोध प्रतिबिम्ब नित्य बोधरूप बिम्बके तुल्य ही होता है । इसीलिये चिच्छायापन्न वृत्तिके क्रिया होनेसे नित्यबोधमें भी क्रियात्वका आरोप होता है । लोकमे अर्थ-प्रकाश ही उपलब्धि- शब्दार्थ प्रसिद्ध है । वह अर्थ-प्रकाश अर्थका धर्म नहीं हो सकता, क्योकि वह तो जड है, स्वतः स्फूर्तिरहित होना ही जडताका लक्षण है । अन्तःकरणका भी धर्म प्रकाश नही कहा जा सकता, क्योकि वह तो प्रकाशकरण ( असाधारण कारण ) है, अतः वह भी चैतन्यरूप प्रकाशका आश्रय नहीं हो सकता । फिर भी